सीलिएक स्प्रू (Celiac Sprue): ग्लूटेन असहिष्णुता का गंभीर रूप
परिचय
क्या आपने कभी सोचा है कि रोटी, दलिया या बिस्किट जैसी रोज़मर्रा की चीज़ें किसी व्यक्ति के लिए ज़हर जैसा असर कर सकती हैं? सीलिएक स्प्रू (Celiac Sprue), जिसे सीलिएक रोग (Celiac Disease) या ग्लूटेन-सेंसिटिव एंटरोपैथी भी कहा जाता है, एक ऐसी ही गंभीर स्थिति है। यह एक ऑटोइम्यून (स्व-प्रतिरक्षी) विकार है, जिसमें ग्लूटेन नामक प्रोटीन खाने पर शरीर की रोग-प्रतिरोधक प्रणाली छोटी आँत की भीतरी परत पर ही हमला कर देती है।
ग्लूटेन गेहूँ, जौ (बार्ली) और राई जैसे अनाजों में पाया जाने वाला प्रोटीन है। भारत में गेहूँ मुख्य भोजन है, इसलिए यहाँ यह रोग विशेष चिंता का विषय है। पहले माना जाता था कि यह रोग केवल पश्चिमी देशों में होता है, लेकिन अब शोध बताते हैं कि उत्तर भारत, खासकर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे गेहूँ खाने वाले क्षेत्रों में इसके मामले काफ़ी अधिक हैं। अनुमान है कि भारत में लगभग 100 में से 1 या उससे कुछ अधिक लोग इस रोग से प्रभावित हो सकते हैं, पर बहुत-से लोगों का निदान ही नहीं हो पाता।
सीलिएक रोग क्या है?
हमारी छोटी आँत की भीतरी दीवार पर अंगुली जैसे असंख्य सूक्ष्म उभार होते हैं, जिन्हें विलाई (Villi) कहते हैं। ये उभार भोजन से पोषक तत्वों को सोखने का काम करते हैं। सीलिएक रोग में ग्लूटेन के सेवन से प्रतिरक्षा तंत्र इन विलाई को नुकसान पहुँचाता है और वे धीरे-धीरे चपटे और क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इसे विलस एट्रॉफी (Villous Atrophy) कहते हैं।
जब विलाई ठीक से काम नहीं करते, तो शरीर भोजन से आयरन, कैल्शियम, विटामिन, प्रोटीन और वसा जैसे ज़रूरी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं सोख पाता। नतीजतन व्यक्ति कुपोषण, कमज़ोरी और कई अन्य समस्याओं का शिकार हो जाता है, भले ही वह भरपेट खाना खा रहा हो।
ध्यान रखें कि सीलिएक रोग एलर्जी नहीं है और न ही सामान्य “ग्लूटेन असहिष्णुता” जैसा हल्का विकार। यह एक आजीवन चलने वाला ऑटोइम्यून रोग है, जिसमें आँत को वास्तविक और स्थायी क्षति पहुँचती है।
कारण और जोखिम कारक
सीलिएक रोग के पीछे आनुवंशिक और पर्यावरणीय दोनों कारण भूमिका निभाते हैं।
1. आनुवंशिक कारण: अधिकांश रोगियों में HLA-DQ2 या HLA-DQ8 नामक जीन पाए जाते हैं। हालाँकि ये जीन लगभग एक-तिहाई सामान्य आबादी में भी होते हैं, पर सभी को रोग नहीं होता। यानी जीन ज़रूरी हैं, पर अकेले पर्याप्त नहीं।
2. पारिवारिक इतिहास: यदि माता-पिता, भाई-बहन या संतान को सीलिएक रोग है, तो अन्य सदस्यों में इसका खतरा काफ़ी बढ़ जाता है (लगभग 10 प्रतिशत तक)।
3. अन्य ऑटोइम्यून रोग: टाइप-1 मधुमेह, ऑटोइम्यून थायरॉइड रोग (हाशिमोटो), ऑटोइम्यून लिवर रोग और डाउन सिंड्रोम व टर्नर सिंड्रोम जैसी स्थितियों वाले लोगों में इसका जोखिम अधिक होता है।
4. ट्रिगर करने वाले कारक: आँतों का संक्रमण, गंभीर तनाव, सर्जरी, गर्भावस्था या प्रसव कभी-कभी रोग को सक्रिय कर सकते हैं।
लक्षण
सीलिएक रोग के लक्षण हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं और उम्र के अनुसार भी बदलते हैं।
बच्चों में लक्षण:
- लगातार दस्त या पतले, चिकने, बदबूदार मल
- पेट फूलना और दर्द
- वज़न न बढ़ना और कद का ठीक से न बढ़ना
- चिड़चिड़ापन और कमज़ोरी
- यौवन (Puberty) में देरी
- दाँतों के इनेमल में खराबी
वयस्कों में लक्षण:
- पुराना दस्त या कभी-कभी कब्ज़
- गैस, पेट फूलना और बेचैनी
- अकारण वज़न घटना
- थकान और कमज़ोरी
- एनीमिया (खून की कमी), जो आयरन देने पर भी ठीक न हो
- हड्डियों और जोड़ों में दर्द, ऑस्टियोपोरोसिस
- मुँह में बार-बार छाले
- सिरदर्द, हाथ-पैर में झुनझुनी
- अवसाद या चिंता
- महिलाओं में अनियमित माहवारी, बार-बार गर्भपात या बाँझपन
डर्मेटाइटिस हर्पेटीफॉर्मिस: यह सीलिएक रोग से जुड़ा एक त्वचा रोग है, जिसमें कोहनी, घुटनों और नितंबों पर खुजली वाले दाने और फफोले निकलते हैं।
कई लोगों में आँतों के लक्षण बहुत हल्के या अनुपस्थित होते हैं और रोग केवल एनीमिया या हड्डियों की कमज़ोरी के रूप में सामने आता है। इसे “साइलेंट सीलिएक” कहा जाता है। इसीलिए यह रोग अक्सर वर्षों तक पकड़ में नहीं आता।
निदान कैसे होता है?
सीलिएक रोग की पुष्टि के लिए कई चरणों में जाँच की जाती है। महत्वपूर्ण बात: जाँच से पहले मरीज़ को ग्लूटेन युक्त भोजन खाते रहना चाहिए। यदि कोई अपनी मर्ज़ी से पहले ही ग्लूटेन छोड़ दे, तो जाँच के नतीजे गलत (नेगेटिव) आ सकते हैं।
1. रक्त परीक्षण (सीरोलॉजी): इसमें anti-tissue transglutaminase antibody (anti-tTG IgA) की जाँच सबसे आम और विश्वसनीय है। साथ में कुल IgA स्तर की जाँच भी होती है, क्योंकि IgA की कमी होने पर नतीजे भ्रामक हो सकते हैं। एंडोमाइसियल एंटीबॉडी (EMA) जाँच भी की जा सकती है।
2. एंडोस्कोपी और बायोप्सी: रक्त परीक्षण पॉज़िटिव आने पर डॉक्टर मुँह के रास्ते एंडोस्कोप डालकर छोटी आँत के ऊपरी हिस्से (ड्यूओडेनम) से ऊतक का नमूना लेते हैं। माइक्रोस्कोप में विलाई की क्षति देखकर निदान पक्का किया जाता है। बच्चों में कुछ विशेष परिस्थितियों में, जब एंटीबॉडी स्तर बहुत ऊँचा हो, बायोप्सी के बिना भी निदान संभव है।
3. आनुवंशिक जाँच: HLA-DQ2/DQ8 की जाँच से रोग की संभावना को खारिज करने में मदद मिलती है। इनके नेगेटिव होने पर सीलिएक रोग लगभग असंभव माना जाता है, पर पॉज़िटिव होने से रोग की पुष्टि नहीं होती।
4. अन्य जाँचें: हीमोग्लोबिन, आयरन, विटामिन B12, फोलेट, विटामिन D, कैल्शियम और हड्डियों की घनत्व जाँच (DEXA स्कैन) भी की जाती हैं, ताकि पोषण की कमी का पता चल सके।
जटिलताएँ
यदि रोग का इलाज न हो या ग्लूटेन-मुक्त आहार का पालन न किया जाए, तो गंभीर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं:
- कुपोषण और एनीमिया: लगातार पोषक तत्वों की कमी से शरीर कमज़ोर होता जाता है।
- हड्डियों की कमज़ोरी: कैल्शियम व विटामिन D की कमी से ऑस्टियोमलेशिया और ऑस्टियोपोरोसिस, जिससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ता है।
- बाँझपन व गर्भपात: गर्भावस्था में जटिलताएँ और शिशु का कम वज़न।
- बच्चों में विकास अवरुद्ध: कद और वज़न कम रह जाना।
- तंत्रिका संबंधी समस्याएँ: न्यूरोपैथी, मिर्गी जैसे दौरे और संतुलन बिगड़ना (एटैक्सिया)।
- लैक्टोज़ असहिष्णुता: क्षतिग्रस्त आँत दूध की शर्करा को नहीं पचा पाती।
- कैंसर का जोखिम: लंबे समय तक अनुपचारित रोग में आँत के लिम्फोमा और अन्य आँत के कैंसर का खतरा कुछ बढ़ जाता है।
- रिफ्रैक्टरी सीलिएक रोग: दुर्लभ मामलों में सख़्त डाइट के बावजूद लक्षण बने रहते हैं।
इलाज: ग्लूटेन-मुक्त आहार ही एकमात्र उपाय
सीलिएक रोग का फ़िलहाल कोई स्थायी इलाज या दवा नहीं है। एकमात्र प्रभावी उपचार जीवन भर सख़्ती से ग्लूटेन-मुक्त आहार (Gluten-Free Diet) का पालन करना है। सही आहार शुरू करने पर कुछ हफ़्तों में लक्षणों में सुधार आने लगता है और आँत की परत महीनों से लेकर एक-दो वर्षों में ठीक हो जाती है।
क्या न खाएँ (ग्लूटेन युक्त)
- गेहूँ और उससे बनी चीज़ें: रोटी, पराँठा, पूरी, मैदा, सूजी (रवा), दलिया, सेवइयाँ
- जौ (बार्ली) और राई
- ब्रेड, बिस्किट, केक, पास्ता, नूडल्स, पिज़्ज़ा
- बाज़ार के कई प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ, सॉस, सूप मिक्स, जिनमें गेहूँ का आटा या स्टार्च गाढ़ेपन के लिए मिलाया जाता है
- कुछ बीयर और माल्ट युक्त पेय
क्या खा सकते हैं (ग्लूटेन-मुक्त)
- चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी, कुट्टू, राजगिरा (अमरनाथ), सिंघाड़ा, साबूदाना
- बेसन, चने का आटा, सोया
- सभी दालें और फलियाँ
- ताज़ी सब्ज़ियाँ और फल
- दूध, दही, पनीर (सादे, बिना मिलावट के), अंडा, मछली, मांस
- मेवे, तेल और घी
भारतीय रसोई में ज्वार, बाजरा या मक्के की रोटी, चावल के साथ दाल, इडली-डोसा (सावधानी से), पोहा, उपमा (सूजी की जगह चावल या रागी से) जैसे विकल्प आसानी से अपनाए जा सकते हैं।
रोज़मर्रा की सावधानियाँ
- लेबल पढ़ने की आदत डालें। पैकेट पर “गेहूँ”, “माल्ट”, “हाइड्रोलाइज़्ड वेजिटेबल प्रोटीन” आदि देखें। “ग्लूटेन-फ्री” प्रमाणित उत्पाद चुनें।
- क्रॉस-कॉन्टैमिनेशन से बचें। रसोई में गेहूँ पीसने वाली चक्की, एक ही तवे, बेलन या छलनी का इस्तेमाल करने से ग्लूटेन की सूक्ष्म मात्रा भी नुकसान कर सकती है। ग्लूटेन-मुक्त अनाज साफ़ चक्की में ही पिसवाएँ।
- बाहर खाते समय सतर्क रहें। रेस्तराँ में स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति बताएँ, क्योंकि तलने का तेल और बर्तन साझा हो सकते हैं।
- दवाओं और सप्लीमेंट्स की जाँच करें। कुछ दवाओं में बाइंडर के रूप में ग्लूटेन हो सकता है; डॉक्टर या फ़ार्मासिस्ट से पूछें।
- पूरक पोषण लें। डॉक्टर की सलाह से आयरन, कैल्शियम, विटामिन D, B12 और फोलिक एसिड की कमी की भरपाई करें।
- ओट्स में सावधानी रखें। ओट्स स्वयं ग्लूटेन-मुक्त होते हैं, पर अक्सर प्रोसेसिंग में गेहूँ से मिल जाते हैं; केवल प्रमाणित ग्लूटेन-फ्री ओट्स ही लें।
सीलिएक रोग और अन्य ग्लूटेन-संबंधी स्थितियों में अंतर
- सीलिएक रोग: ऑटोइम्यून, आँत को वास्तविक क्षति, एंटीबॉडी और बायोप्सी से पुष्टि।
- गेहूँ की एलर्जी: गेहूँ के प्रोटीन से तुरंत एलर्जिक प्रतिक्रिया (दाने, साँस की तकलीफ़, सूजन)।
- नॉन-सीलिएक ग्लूटेन सेंसिटिविटी: ग्लूटेन से पेट फूलना, थकान जैसे लक्षण, पर सीलिएक की जाँचें नेगेटिव और आँत को स्थायी क्षति नहीं।
इसलिए बिना जाँच के खुद से ग्लूटेन छोड़ देना ठीक नहीं है; पहले सही निदान करवाना ज़रूरी है।
नियमित देखभाल और फ़ॉलो-अप
निदान के बाद गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और आहार विशेषज्ञ (डायटीशियन) के साथ नियमित संपर्क रखना चाहिए। आमतौर पर 6 महीने से 1 वर्ष बाद एंटीबॉडी स्तर दोबारा जाँचे जाते हैं, ताकि पता चल सके कि आहार सही तरह से लिया जा रहा है या नहीं। इसके बाद सालाना जाँच की सलाह दी जाती है। परिवार के प्रथम-श्रेणी रिश्तेदारों की भी स्क्रीनिंग करवानी चाहिए।
मानसिक और सामाजिक पहलू
आजीवन आहार-प्रतिबंध का पालन करना, खासकर बच्चों और किशोरों के लिए, भावनात्मक रूप से कठिन हो सकता है। शादी-ब्याह, त्योहारों और स्कूल-ऑफ़िस में खान-पान की चुनौतियाँ आती हैं। ऐसे में परिवार, मित्रों और शिक्षकों को रोग के बारे में बताना, सहायता समूहों से जुड़ना और सकारात्मक रवैया रखना बहुत मदद करता है।
शोध और भविष्य की आशा
वैज्ञानिक ग्लूटेन को पचाने वाले एंजाइम, आँत की पारगम्यता को नियंत्रित करने वाली दवाओं और ग्लूटेन के प्रति सहनशीलता पैदा करने वाले टीकों पर काम कर रहे हैं। हालाँकि अभी ये प्रयोग के चरण में हैं और ग्लूटेन-मुक्त आहार का कोई सिद्ध विकल्प नहीं है।
निष्कर्ष
सीलिएक स्प्रू एक गंभीर, पर पूरी तरह नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारी है। समय पर निदान और ग्लूटेन-मुक्त आहार का अनुशासित पालन करने पर रोगी सामान्य, स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी सकता है। यदि आपको या आपके बच्चे को लंबे समय से पेट की समस्या, एनीमिया, वज़न न बढ़ना या अकारण थकान जैसी शिकायतें हैं, तो उन्हें हल्के में न लें और विशेषज्ञ चिकित्सक से जाँच करवाएँ। जागरूकता ही बचाव की पहली सीढ़ी है।
ध्यान दें: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी चिकित्सकीय निर्णय या आहार परिवर्तन से पहले योग्य डॉक्टर या डायटीशियन से परामर्श अवश्य करें।
