सियालोलिथियासिस (Sialolithiasis - लार ग्रंथि में पथरी)
| |

सियालोलिथियासिस (लार ग्रंथि में पथरी): कारण, लक्षण, निदान और उपचार

परिचय

हमारे मुँह में हर दिन लगभग 1 से 1.5 लीटर लार बनती है। यह लार भोजन को चबाने और निगलने में मदद करती है, भोजन के पाचन की शुरुआत करती है, मुँह को नम रखती है और दाँतों को सड़न से बचाती है। लार का निर्माण तीन प्रमुख जोड़ी ग्रंथियों में होता है: कान के आगे स्थित पैरोटिड ग्रंथि, जबड़े के नीचे स्थित सबमैंडिबुलर ग्रंथि और जीभ के नीचे स्थित सबलिंग्वल ग्रंथि। इनके अलावा मुँह में सैकड़ों छोटी लार ग्रंथियाँ भी होती हैं।

जब इन ग्रंथियों की नलिकाओं (ducts) में कैल्शियम और अन्य खनिज लवणों से बनी छोटी-छोटी पथरियाँ जमा हो जाती हैं और लार के बहाव को रोक देती हैं, तो इस स्थिति को सियालोलिथियासिस कहते हैं। इसे लार ग्रंथि की पथरी या सियालोलिथ भी कहा जाता है। यह लार ग्रंथि के रोगों में सबसे आम समस्या है और मुख्यतः 30 से 60 वर्ष की आयु के वयस्कों में देखी जाती है, हालाँकि बच्चों में भी यह हो सकती है।

लार ग्रंथि की पथरी कैसे बनती है?

लार में कैल्शियम फॉस्फेट, कैल्शियम कार्बोनेट और कुछ कार्बनिक पदार्थ घुले रहते हैं। जब किसी कारण से लार गाढ़ी हो जाती है, उसका प्रवाह धीमा पड़ जाता है या नलिका संकरी हो जाती है, तो ये लवण धीरे-धीरे किसी कण के चारों ओर परत-दर-परत जमने लगते हैं। समय के साथ यह कण एक छोटी कठोर पथरी का रूप ले लेता है। इसका आकार कुछ मिलीमीटर से लेकर 1–2 सेंटीमीटर तक हो सकता है।

लगभग 80 से 90 प्रतिशत मामलों में पथरी सबमैंडिबुलर ग्रंथि (जबड़े के नीचे) में बनती है। इसका कारण यह है कि इस ग्रंथि की नलिका लंबी होती है, ऊपर की ओर चढ़ती है और इसकी लार अपेक्षाकृत गाढ़ी व क्षारीय होती है। लगभग 5 से 20 प्रतिशत मामले पैरोटिड ग्रंथि में और 1 से 5 प्रतिशत सबलिंग्वल या छोटी ग्रंथियों में होते हैं।

प्रमुख कारण और जोखिम कारक

पथरी बनने का कोई एक निश्चित कारण नहीं होता, लेकिन निम्न स्थितियाँ इसका जोखिम बढ़ाती हैं:

  • शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन): कम पानी पीने से लार गाढ़ी हो जाती है।
  • कुछ दवाइयाँ: एंटीहिस्टामिन, मूत्रवर्धक (diuretics), रक्तचाप की कुछ दवाइयाँ, एंटीडिप्रेसेंट और एंटीकोलिनर्जिक दवाइयाँ मुँह सूखने का कारण बनती हैं, जिससे लार का बहाव घटता है।
  • कम खाना या लंबे समय तक भूखे रहना: भोजन चबाने से लार का स्राव उत्तेजित होता है, इसलिए इसकी कमी से लार ठहर सकती है।
  • धूम्रपान और तंबाकू का सेवन: ये लार की संरचना और प्रवाह दोनों को प्रभावित करते हैं।
  • लार ग्रंथि में संक्रमण या सूजन (सियालाडेनाइटिस): बार-बार संक्रमण से नलिकाएँ संकरी हो सकती हैं।
  • मुँह की खराब सफाई: इससे बैक्टीरिया नलिका में पहुँचकर सूजन पैदा कर सकते हैं।
  • शुष्क मुँह की बीमारियाँ: जैसे स्जोग्रेन सिंड्रोम।
  • गाउट: कुछ मामलों में यूरिक एसिड की पथरी भी बन सकती है।
  • नलिका की चोट या संकरापन।

लक्षण

सियालोलिथियासिस के लक्षण पथरी के आकार और नलिका के अवरोध की मात्रा पर निर्भर करते हैं। कई बार छोटी पथरी बिना किसी लक्षण के रहती है और अपने आप निकल जाती है। सामान्य लक्षण ये हैं:

  1. खाने के समय दर्द और सूजन: यह इस रोग की सबसे विशिष्ट पहचान है। भोजन की गंध, दृश्य या पहले कौर के साथ ही जब लार बनना शुरू होती है, तो रुकी हुई लार ग्रंथि में भर जाती है। इससे जबड़े के नीचे या गाल के पास अचानक सूजन और दर्द होता है।
  2. भोजन के बाद सूजन का धीरे-धीरे कम होना: कुछ समय बाद सूजन घट जाती है, पर अगली बार खाने पर फिर लौट आती है।
  3. मुँह में अप्रिय या कड़वा स्वाद।
  4. मुँह खोलने या निगलने में तकलीफ।
  5. जीभ के नीचे या गाल के अंदर कठोर गाँठ का महसूस होना।
  6. मुँह सूखना।

यदि संक्रमण हो जाए, तो ये लक्षण भी दिख सकते हैं:

  • तेज़ और लगातार दर्द
  • गाल या गर्दन पर लालिमा और गर्माहट
  • बुखार और ठंड लगना
  • नलिका के मुँह से मवाद या पीले-सफेद द्रव का निकलना
  • मुँह पूरा खोलने में कठिनाई

निदान (जाँच कैसे होती है?)

1. शारीरिक परीक्षण: डॉक्टर मुँह के अंदर और गर्दन-जबड़े के बाहर से जाँच करते हैं। सबमैंडिबुलर ग्रंथि की पथरी में जीभ के नीचे हाथ से छूकर अक्सर पथरी महसूस की जा सकती है। ग्रंथि को हल्के से दबाने पर लार निकलती है या नहीं, यह भी देखा जाता है।

2. एक्स-रे: ऑक्लूज़ल एक्स-रे या पैनोरमिक एक्स-रे में कैल्शियम युक्त पथरी दिख जाती है। हालाँकि लगभग 20 से 40 प्रतिशत पथरियाँ, खासकर पैरोटिड ग्रंथि की, एक्स-रे में नहीं दिखतीं।

3. अल्ट्रासाउंड: यह सुरक्षित, तेज़ और किफायती जाँच है, जो पथरी, नलिका के फैलाव और ग्रंथि की सूजन की जानकारी देती है।

4. सीटी स्कैन (CT Scan): छोटी पथरियों का पता लगाने में बहुत सटीक है और आसपास के ऊतकों की स्थिति भी बताता है।

5. सियालोग्राफी / एमआर सियालोग्राफी: इसमें नलिका में कंट्रास्ट डाई डालकर या एमआरआई के माध्यम से नलिका की संरचना देखी जाती है। इससे अवरोध और संकरेपन का पता चलता है।

6. सियालेंडोस्कोपी: एक बहुत पतली दूरबीन नलिका में डालकर पथरी को सीधे देखा जाता है। यह निदान और उपचार दोनों में उपयोगी है।

उपचार

उपचार पथरी के आकार, स्थान, संख्या और संक्रमण की उपस्थिति पर निर्भर करता है।

1. घरेलू और रूढ़िवादी उपचार (छोटी पथरी के लिए)

  • खूब पानी पीना: इससे लार पतली होती है और छोटी पथरी बहकर निकल सकती है।
  • खट्टे पदार्थों का सेवन: नींबू के टुकड़े चूसना, नींबू पानी पीना या शुगर-फ्री खट्टी कैंडी चूसना लार का स्राव बढ़ाता है।
  • ग्रंथि की हल्की मालिश: प्रभावित ग्रंथि पर बाहर से, पथरी की दिशा में मुँह की ओर, धीरे-धीरे मालिश करें।
  • गर्म सेक: इससे दर्द और सूजन में राहत मिलती है।
  • दर्द निवारक दवाइयाँ: डॉक्टर की सलाह से पैरासिटामोल या इबुप्रोफेन जैसी दवाइयाँ ली जा सकती हैं।
  • एंटीबायोटिक्स: संक्रमण होने पर डॉक्टर द्वारा दी जाती हैं।

2. चिकित्सकीय प्रक्रियाएँ

  • मैनुअल निष्कासन: यदि पथरी नलिका के मुँह के पास हो, तो डॉक्टर उसे उँगलियों या छोटे उपकरण से निकाल सकते हैं।
  • सियालेंडोस्कोपी द्वारा निष्कासन: दूरबीन के साथ लगी छोटी टोकरी (basket) या उपकरण से पथरी पकड़कर बाहर निकाली जाती है। यह कम चीरे वाली और प्रभावी विधि है।
  • एक्स्ट्राकॉर्पोरियल शॉकवेव लिथोट्रिप्सी (ESWL): शरीर के बाहर से ध्वनि तरंगें भेजकर पथरी को छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाता है, जो फिर लार के साथ निकल जाते हैं।
  • इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी: कुछ मामलों में इमेजिंग की मदद से पथरी निकाली जाती है।

3. शल्य चिकित्सा

जब पथरी बड़ी हो, ग्रंथि के भीतर गहराई में हो या बार-बार लौट आती हो, तब शल्य चिकित्सा की जाती है:

  • नलिका के माध्यम से पथरी निकालना: मुँह के अंदर छोटा चीरा लगाकर पथरी निकाली जाती है।
  • ग्रंथि को निकालना (सियालाडेनेक्टॉमी): यदि ग्रंथि बार-बार संक्रमित होती हो या स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो गई हो, तो उसे निकालना पड़ सकता है। शेष ग्रंथियाँ लार की ज़रूरत पूरी कर लेती हैं। इस सर्जरी में चेहरे की नस को सावधानी से बचाना होता है।

संभावित जटिलताएँ

उपचार न कराने पर निम्न समस्याएँ हो सकती हैं:

  • बार-बार संक्रमण (सियालाडेनाइटिस): ग्रंथि में दर्दनाक सूजन।
  • फोड़ा (abscess): ग्रंथि या आसपास मवाद भर जाना।
  • ग्रंथि का स्थायी नुकसान: लंबे समय के अवरोध से ग्रंथि सिकुड़ सकती है और काम करना बंद कर सकती है।
  • नलिका का संकरा होना (स्ट्रिक्चर)।
  • लुडविग एंजाइना: यह दुर्लभ पर गंभीर स्थिति है, जिसमें संक्रमण गर्दन व जीभ के नीचे फैलकर साँस लेने में रुकावट पैदा कर सकता है। यह आपातकाल है।

डॉक्टर के पास कब जाएँ?

निम्न स्थितियों में तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें:

  • खाने के साथ बार-बार जबड़े या गाल में सूजन और दर्द होना
  • तेज़ बुखार के साथ गाल, जबड़े या गर्दन में सूजन
  • मुँह से मवाद आना
  • निगलने या साँस लेने में कठिनाई
  • सूजन का कई दिनों तक कम न होना

आमतौर पर ENT विशेषज्ञ (कान-नाक-गला रोग विशेषज्ञ) या ओरल सर्जन से परामर्श लेना उचित रहता है।

बचाव के उपाय

  1. पर्याप्त पानी पिएँ: दिन में कम से कम 2 से 3 लीटर, मौसम और गतिविधि के अनुसार।
  2. मुँह की स्वच्छता रखें: दिन में दो बार ब्रश करें और नियमित रूप से कुल्ला करें।
  3. धूम्रपान और तंबाकू छोड़ें।
  4. नियमित भोजन करें और भोजन को अच्छी तरह चबाएँ।
  5. दवाइयों के असर पर ध्यान दें: यदि किसी दवा से मुँह बहुत सूखता है, तो डॉक्टर से विकल्प पूछें।
  6. लार बढ़ाने वाले उपाय अपनाएँ: शुगर-फ्री च्विंगम चबाना या खट्टे फल खाना।
  7. पहले हुई पथरी के बाद नियमित जाँच कराएँ, क्योंकि पथरी दोबारा बन सकती है।

निष्कर्ष

सियालोलिथियासिस एक आम लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली समस्या है। इसका सबसे बड़ा संकेत खाना खाते समय जबड़े के नीचे या गाल में दर्द के साथ सूजन आना है। अधिकांश मामलों में समय पर पहचान होने पर सरल उपायों, जैसे अधिक पानी पीने, खट्टे पदार्थ चूसने और मालिश से ही राहत मिल जाती है। बड़ी या अटकी हुई पथरी में सियालेंडोस्कोपी, ESWL या सर्जरी जैसे आधुनिक उपचार बहुत प्रभावी हैं। यदि लक्षण बार-बार लौटें या बुखार, मवाद और निगलने में कठिनाई जैसे संकेत दिखें, तो देर न करें और विशेषज्ञ से मिलें। सही समय पर उपचार से ग्रंथि को स्थायी नुकसान और गंभीर जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *