मम्प्स (Mumps / गलसुआ)
| |

मम्प्स (कण्ठमाला / गलसुआ): कारण, लक्षण, जटिलताएँ, उपचार और बचाव

परिचय

क्या आपने कभी किसी बच्चे को देखा है जिसके गाल कान के नीचे से फूलकर चौड़े हो गए हों, और जो खाना चबाने या निगलने में दर्द की शिकायत कर रहा हो? संभव है कि उसे मम्प्स हुआ हो। हिंदी में इसे आमतौर पर कण्ठमाला, गलसुआ या गलगंड कहा जाता है, और चिकित्सा भाषा में इसे पैरोटिटिस (Parotitis) कहते हैं।

मम्प्स एक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से लार बनाने वाली पैरोटिड ग्रंथियों को प्रभावित करती है। ये ग्रंथियाँ कान के आगे और नीचे, जबड़े के दोनों ओर होती हैं। यह रोग प्रायः 5 से 15 वर्ष के बच्चों में होता है, लेकिन किशोरों और वयस्कों को भी हो सकता है। वयस्कों में इसकी जटिलताएँ अधिक गंभीर हो सकती हैं, इसलिए इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।

मम्प्स क्या है और इसका कारण क्या है?

मम्प्स मम्प्स वायरस से होता है, जो पैरामिक्सोवायरस परिवार का सदस्य है। यह वायरस मुख्यतः नाक, गले और मुँह के रास्ते शरीर में प्रवेश करता है। वहाँ से यह रक्त के माध्यम से लार ग्रंथियों तक पहुँचता है और उनमें सूजन पैदा करता है।

मनुष्य ही इस वायरस का एकमात्र प्राकृतिक वाहक है। टीकाकरण शुरू होने से पहले यह बीमारी बहुत आम थी और अक्सर स्कूलों, छात्रावासों और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर फैलती थी।

यह कैसे फैलता है?

मम्प्स बहुत आसानी से फैलने वाली बीमारी है। इसके फैलने के मुख्य तरीके हैं:

  • खाँसने और छींकने से निकलने वाली बूँदों के ज़रिए
  • संक्रमित व्यक्ति की लार के सीधे संपर्क से, जैसे एक ही गिलास, चम्मच या बोतल साझा करना
  • संक्रमित व्यक्ति द्वारा छुई गई सतहों को छूने के बाद अपने मुँह, नाक या आँखों को छूना
  • घनिष्ठ संपर्क, जैसे एक ही कमरे में लंबे समय तक साथ रहना

संक्रमित व्यक्ति में गाल की सूजन शुरू होने से लगभग दो दिन पहले से लेकर सूजन आने के लगभग पाँच दिन बाद तक वायरस फैलाने की क्षमता रहती है। यानी व्यक्ति को खुद पता चलने से पहले ही वह दूसरों को संक्रमित कर सकता है। संक्रमण के बाद लक्षण दिखने में आमतौर पर 12 से 25 दिन लगते हैं, जिसे ऊष्मायन काल (इन्क्यूबेशन पीरियड) कहते हैं।

मम्प्स के लक्षण

शुरुआत में लक्षण सामान्य फ्लू जैसे लगते हैं, इसलिए कई बार पहचान में देर हो जाती है। शुरुआती लक्षण हैं:

  • हल्का या मध्यम बुखार
  • सिरदर्द
  • मांसपेशियों में दर्द और थकान
  • भूख न लगना
  • सामान्य बेचैनी और कमज़ोरी

एक से तीन दिन बाद मम्प्स का खास लक्षण उभरता है:

  • कान के नीचे और जबड़े के पास दर्द के साथ सूजन, जो पहले एक तरफ और कई बार कुछ दिनों में दोनों तरफ हो जाती है
  • चेहरा गोल या “चिपमंक” जैसा दिखना
  • चबाने, निगलने और बोलने में तकलीफ
  • खट्टा या तीखा खाने-पीने से दर्द का बढ़ना
  • कान में दर्द
  • बुखार, जो कभी-कभी 39 से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है

सूजन आमतौर पर तीन से पाँच दिन में चरम पर पहुँचती है और फिर लगभग एक सप्ताह में धीरे-धीरे उतर जाती है। ध्यान रखें कि कई संक्रमित लोगों में लक्षण बहुत हल्के होते हैं या बिल्कुल नहीं दिखते। ऐसे लोग भी बीमारी फैला सकते हैं।

संभावित जटिलताएँ

अधिकांश मामलों में मम्प्स अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ लोगों में यह दूसरे अंगों को भी प्रभावित कर सकता है।

1. ऑर्काइटिस (अंडकोष की सूजन): यह यौवन के बाद के लड़कों और पुरुषों में सबसे आम जटिलता है। इसमें अंडकोष में दर्द, सूजन, बुखार और उल्टी हो सकती है। ज़्यादातर मामलों में एक ही अंडकोष प्रभावित होता है और व्यक्ति ठीक हो जाता है। बहुत कम मामलों में प्रजनन क्षमता पर असर पड़ सकता है।

2. ऊफोराइटिस (अंडाशय की सूजन): यौवन के बाद की महिलाओं में पेट के निचले हिस्से में दर्द हो सकता है।

3. मस्तिष्क ज्वर (मेनिन्जाइटिस): मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी की झिल्लियों में सूजन हो सकती है। इसके लक्षण तेज़ सिरदर्द, गर्दन में अकड़न, उल्टी और रोशनी से परेशानी हैं। अधिकांश मामले हल्के होते हैं और बिना स्थायी नुकसान के ठीक हो जाते हैं।

4. एन्सेफेलाइटिस (मस्तिष्क की सूजन): यह बहुत दुर्लभ किंतु गंभीर जटिलता है। इसमें अत्यधिक नींद, भ्रम, दौरे या बेहोशी जैसे लक्षण आ सकते हैं।

5. अग्नाशयशोथ (पैन्क्रियाटाइटिस): पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द और उल्टी हो सकती है।

6. बहरापन: कभी-कभी एक कान की सुनने की क्षमता स्थायी रूप से कम हो सकती है। यह दुर्लभ है, लेकिन इसका नुकसान स्थायी होता है, इसलिए इस पर नज़र रखना ज़रूरी है।

गर्भावस्था की शुरुआती अवधि में मम्प्स होने पर गर्भपात का जोखिम बढ़ सकता है, इसलिए गर्भवती महिलाओं को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए।

निदान कैसे होता है?

अधिकतर मामलों में डॉक्टर लक्षणों और शारीरिक जाँच के आधार पर ही मम्प्स की पहचान कर लेते हैं। कान के नीचे की विशिष्ट सूजन इसका सबसे बड़ा संकेत है। ज़रूरत पड़ने पर या जब लक्षण स्पष्ट न हों, तब ये जाँचें कराई जा सकती हैं:

  • रक्त परीक्षण (मम्प्स के विरुद्ध एंटीबॉडी, यानी IgM और IgG, की जाँच)
  • RT-PCR जाँच (गले या गाल के अंदर से लिए गए स्वैब या लार के नमूने से वायरस की पहचान)

कान के नीचे की सूजन के और भी कारण हो सकते हैं, जैसे जीवाणु संक्रमण, लार ग्रंथि में पथरी या अन्य वायरल संक्रमण। इसलिए सही पहचान के लिए डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है।

उपचार

मम्प्स के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा नहीं है। यह वायरस से होने वाली बीमारी है, इसलिए एंटीबायोटिक दवाएँ इस पर असर नहीं करतीं। उपचार का उद्देश्य लक्षणों से राहत देना और शरीर को ठीक होने का समय देना है:

  • पूरा आराम करें और स्कूल या ऑफिस से छुट्टी लें।
  • बुखार और दर्द के लिए डॉक्टर की सलाह से पैरासिटामोल लें। बच्चों को बिना डॉक्टर की सलाह के एस्पिरिन न दें।
  • सूजी हुई जगह पर ठंडी या हल्की गर्म सिकाई से आराम मिल सकता है।
  • खूब तरल पदार्थ पिएँ, जैसे पानी, दूध, सूप और दाल का पानी, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।
  • नरम और आसानी से निगले जाने वाले भोजन लें, जैसे खिचड़ी, दलिया, दही-चावल, मसले हुए फल और सब्ज़ियाँ।
  • खट्टे और तीखे पदार्थ, जैसे नींबू, संतरे का रस और अचार, न खाएँ, क्योंकि ये लार का स्राव बढ़ाकर दर्द बढ़ा देते हैं।
  • मुँह को साफ रखने के लिए गुनगुने नमक के पानी से कुल्ला करें।

अंडकोष में दर्द या सूजन होने पर सहारा देने वाला अंडरवियर पहनना और ठंडी सिकाई करना राहत देता है, पर डॉक्टर को ज़रूर दिखाएँ।

डॉक्टर को कब दिखाएँ?

निम्न स्थितियों में तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें:

  • बहुत तेज़ सिरदर्द, गर्दन में अकड़न या बार-बार उल्टी
  • अत्यधिक नींद, भ्रम, दौरे या बेहोशी
  • अंडकोष में तेज़ दर्द या सूजन
  • पेट में तेज़ दर्द
  • सुनने में कमी महसूस होना
  • तेज़ बुखार जो दवा से कम न हो
  • सूजन के साथ साँस लेने या निगलने में बहुत कठिनाई

रोकथाम और टीकाकरण

मम्प्स से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका टीकाकरण है। इसके लिए MMR टीका (मीज़ल्स, मम्प्स, रूबेला) लगाया जाता है। सामान्यतः इसकी दो खुराकें दी जाती हैं। पहली खुराक लगभग 12 से 15 महीने की उम्र में और दूसरी लगभग 4 से 6 वर्ष की उम्र में। सटीक समय-सारणी के लिए अपने बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लें।

जिन किशोरों और वयस्कों ने टीका नहीं लगवाया है या जिन्हें पूरी खुराकें नहीं मिलीं, वे भी डॉक्टर की सलाह से टीका लगवा सकते हैं। गर्भवती महिलाओं और कमज़ोर प्रतिरक्षा वाले लोगों को MMR टीका नहीं दिया जाता, इसलिए ऐसे मामलों में डॉक्टर से अवश्य पूछें।

टीके के साथ ये सावधानियाँ भी मदद करती हैं:

  • साबुन और पानी से बार-बार हाथ धोएँ।
  • खाँसते या छींकते समय मुँह और नाक को रुमाल या कोहनी से ढकें।
  • बर्तन, गिलास, बोतल और तौलिया साझा न करें।
  • बीमार व्यक्ति को सूजन शुरू होने के बाद कम से कम पाँच दिन तक स्कूल, ऑफिस और भीड़-भाड़ वाली जगहों से दूर रखें।
  • बीमार व्यक्ति के कमरे और बार-बार छुई जाने वाली चीज़ों को साफ रखें।

मिथक और सच्चाई

मिथक: मम्प्स सिर्फ बच्चों को होता है।
सच्चाई: यह किसी भी उम्र में हो सकता है, और वयस्कों में जटिलताएँ ज़्यादा हो सकती हैं।

मिथक: एक बार हो जाए तो दोबारा नहीं होता।
सच्चाई: संक्रमण के बाद आमतौर पर लंबे समय तक प्रतिरक्षा मिलती है, लेकिन दोबारा संक्रमण के दुर्लभ मामले हो सकते हैं।

मिथक: सूजन पर घरेलू लेप लगाने से बीमारी जल्दी ठीक हो जाती है।
सच्चाई: कोई लेप वायरस को खत्म नहीं करता। कुछ चीज़ें त्वचा में जलन पैदा कर सकती हैं, इसलिए डॉक्टर की सलाह मानें।

मिथक: मम्प्स से हमेशा बांझपन हो जाता है।
सच्चाई: बांझपन बहुत कम मामलों में ही होता है। अधिकतर लोग पूरी तरह ठीक हो जाते हैं।

निष्कर्ष

मम्प्स एक आम, संक्रामक लेकिन टीके से रोकी जा सकने वाली बीमारी है। ज़्यादातर मामलों में यह दो सप्ताह के भीतर आराम, तरल पदार्थ और लक्षणों के उपचार से ठीक हो जाती है, फिर भी कुछ लोगों में मस्तिष्क, अंडकोष, अंडाशय या कान से जुड़ी जटिलताएँ हो सकती हैं। इसलिए लक्षणों पर नज़र रखें और ज़रूरत पड़ने पर देर न करें।

सबसे अच्छा बचाव समय पर MMR टीकाकरण, अच्छी स्वच्छता की आदतें और बीमार व्यक्ति का उचित पृथक्करण है। अपने बच्चों का टीकाकरण पूरा करवाएँ और अपने परिवार को इस बीमारी से सुरक्षित रखें।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *