रुमिनेशन विकार (Rumination Disorder): कारण, लक्षण और उपचार
परिचय
क्या आपने कभी किसी व्यक्ति को खाना खाने के तुरंत बाद बिना किसी मतली या उल्टी की तकलीफ़ के भोजन को बार-बार मुँह में वापस लाते और दोबारा चबाते या निगलते देखा है? यह आदत केवल “बुरी आदत” नहीं, बल्कि एक पहचाना हुआ चिकित्सकीय विकार हो सकती है, जिसे रुमिनेशन विकार कहते हैं। इसे अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन की मार्गदर्शिका DSM-5 में “फीडिंग और ईटिंग डिसऑर्डर” की श्रेणी में रखा गया है।
अक्सर लोग शर्म या झिझक के कारण इस समस्या को छिपाते हैं, जिससे सही निदान में वर्षों लग जाते हैं। इस लेख में हम इस विकार को सरल भाषा में समझेंगे।
एक ज़रूरी स्पष्टीकरण: दो अलग “रुमिनेशन”
“रुमिनेशन” शब्द मनोविज्ञान में दो अलग संदर्भों में आता है।
पहला है मानसिक रुमिनेशन, यानी किसी चिंता, दुख या गलती के बारे में बार-बार सोचते रहना। यह अवसाद और चिंता विकारों से जुड़ा है। दूसरा है रुमिनेशन विकार, जिसकी चर्चा इस लेख में है। यह खाने से जुड़ा एक शारीरिक-व्यवहारिक विकार है, जिसका सोचने की आदत से सीधा संबंध नहीं है। दोनों को एक-दूसरे से न मिलाएँ।
रुमिनेशन विकार क्या है?
रुमिनेशन विकार में व्यक्ति भोजन के बाद बिना प्रयास या बहुत हल्के प्रयास से निगला हुआ भोजन पेट से वापस मुँह में ले आता है (रिगर्जिटेशन)। फिर वह उसे दोबारा चबाकर निगल लेता है या थूक देता है।
यह उल्टी से अलग है। उल्टी में मतली, पेट में ऐंठन और ज़ोर लगाना होता है, जबकि रुमिनेशन में भोजन लगभग बिना कष्ट के वापस आ जाता है, और कई बार उसका स्वाद भी अप्रिय नहीं लगता क्योंकि वह अभी अम्लीय नहीं हुआ होता।
किन्हें होता है?
यह विकार किसी भी उम्र में हो सकता है।
- शिशुओं में: आमतौर पर 3 से 12 महीने की उम्र में दिखता है। कई बार यह अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ मामलों में इलाज ज़रूरी होता है।
- बच्चों और किशोरों में: यह अक्सर तनाव, ध्यान की कमी या आदत के रूप में शुरू होता है।
- वयस्कों में: इसकी पहचान अक्सर देर से होती है, क्योंकि लोग इसे एसिडिटी या पाचन की सामान्य दिक्कत समझ लेते हैं।
- बौद्धिक विकलांगता या विकासात्मक समस्याओं वाले लोगों में: इनमें यह अपेक्षाकृत ज़्यादा देखा जाता है।
सही आँकड़े सीमित हैं, क्योंकि बहुत से मामले रिपोर्ट ही नहीं होते।
प्रमुख लक्षण
रुमिनेशन विकार के सामान्य लक्षण ये हैं:
- खाने के कुछ मिनटों के भीतर भोजन का बार-बार मुँह में वापस आना
- वापस आए भोजन को दोबारा चबाना, निगलना या थूकना
- बिना मतली या उल्टी की भावना के रिगर्जिटेशन
- पेट में हल्की असुविधा या दबाव, जो रिगर्जिटेशन से पहले महसूस हो सकता है
- साँस में बदबू और दाँतों में क्षरण
- वज़न में कमी या पोषण की कमी (गंभीर मामलों में)
- सामाजिक स्थितियों में खाने से बचना, शर्म और चिंता
- होंठ या गले के आसपास जलन और बार-बार गला साफ़ करना
निदान के मापदंड (DSM-5)
डॉक्टर निम्न बातों के आधार पर निदान करते हैं:
- भोजन का बार-बार वापस आना, जो कम से कम एक महीने तक जारी रहे। वापस आया भोजन दोबारा चबाया जाता है, निगला जाता है या थूका जाता है।
- यह किसी अन्य पाचन संबंधी रोग (जैसे गैस्ट्रोइसोफेजियल रिफ्लक्स) के कारण न हो।
- यह एनोरेक्सिया नर्वोसा, बुलिमिया नर्वोसा, बिंज ईटिंग या अवॉइडेंट/रिस्ट्रिक्टिव फ़ूड इनटेक डिसऑर्डर के दौरान न हो।
- यदि यह किसी मानसिक विकार या विकासात्मक स्थिति के साथ हो, तो वह इतना गंभीर हो कि अलग से चिकित्सकीय ध्यान की ज़रूरत पड़े।
संभावित कारण
इसका कोई एक निश्चित कारण नहीं है। शोधकर्ता कई कारकों की भूमिका मानते हैं:
1. सीखी हुई आदत: कुछ लोगों में पेट की मांसपेशियों को अनजाने में सिकोड़ने की आदत बन जाती है, जिससे पेट के भीतर दबाव बढ़ता है और भोजन ऊपर आ जाता है। समय के साथ यह स्वचालित हो जाता है।
2. तनाव और भावनात्मक कारक: चिंता, अकेलापन, उपेक्षा या पारिवारिक तनाव इसे शुरू या बढ़ा सकते हैं।
3. शिशुओं में भावनात्मक जुड़ाव की कमी: कई बार शिशु को पर्याप्त ध्यान या स्नेह न मिलने पर वह स्वयं को शांत करने के लिए यह व्यवहार अपनाता है।
4. पूर्व की पाचन संबंधी समस्या: किसी संक्रमण या पेट की बीमारी के बाद यह आदत विकसित हो सकती है।
5. जल्दी-जल्दी खाना: तेज़ी से खाने और ज़्यादा हवा निगलने से भी रिगर्जिटेशन की संभावना बढ़ती है।
जटिलताएँ
यदि इलाज न हो तो यह विकार कई परेशानियाँ पैदा कर सकता है:
- कुपोषण और वज़न में कमी
- निर्जलीकरण और इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन
- भोजन नली में जलन और सूजन (एसोफैगाइटिस)
- दाँतों के इनेमल का क्षरण
- साँस की नली में भोजन जाने का जोखिम
- सामाजिक अलगाव, आत्मविश्वास में कमी और अवसाद
- शिशुओं में विकास और वृद्धि पर असर
निदान कैसे होता है?
निदान मुख्यतः रोगी के इतिहास और लक्षणों पर आधारित होता है। डॉक्टर यह जानने की कोशिश करते हैं कि रिगर्जिटेशन कब, कितनी देर बाद और किस तरह होता है। ज़रूरत पड़ने पर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट निम्न जाँचें सुझा सकते हैं:
- एंडोस्कोपी, ताकि अन्य कारणों को बाहर किया जा सके
- एसोफेजियल मैनोमेट्री या इम्पीडेंस जाँच
- ब्लड टेस्ट, जिनसे पोषण की कमी का पता चलता है
निदान में मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की भूमिका भी अहम होती है, ताकि खाने के अन्य विकारों और तनाव के कारणों को परखा जा सके।
उपचार
अच्छी बात यह है कि रुमिनेशन विकार का इलाज संभव है और अधिकांश लोगों में व्यवहारिक उपचार से अच्छे परिणाम मिलते हैं।
1. डायाफ्रामेटिक (पेट से) साँस लेने की तकनीक
यह सबसे प्रभावी और पहली पसंद का उपचार माना जाता है। खाने के दौरान और उसके बाद 10 से 15 मिनट तक धीमी, गहरी पेट वाली साँस ली जाती है। यह तकनीक उस मांसपेशी संकुचन को रोकती है जो रिगर्जिटेशन कराता है, क्योंकि साँस लेने और रिगर्जिटेशन की क्रिया एक साथ नहीं हो सकती। इसे किसी प्रशिक्षित चिकित्सक या थेरेपिस्ट से सीखना बेहतर है।
2. आदत परिवर्तन थेरेपी (Habit Reversal)
इसमें व्यक्ति को अपने व्यवहार के संकेतों को पहचानना सिखाया जाता है और उसकी जगह कोई प्रतिस्पर्धी क्रिया अपनाना सिखाया जाता है।
3. संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (CBT)
जब इसके पीछे चिंता, तनाव या भावनात्मक कारण हों, तब CBT उपयोगी होती है।
4. आहार संबंधी बदलाव
- धीरे-धीरे और छोटे कौर में खाना
- खाते समय शांत और तनावमुक्त माहौल रखना
- खाने के तुरंत बाद लेटने से बचना
5. शिशुओं में उपचार
शिशुओं में सबसे ज़रूरी है माता-पिता का स्नेह, गोद में लेना, बातचीत करना और भोजन के समय शांत वातावरण देना। कई मामलों में इससे ही सुधार हो जाता है। ज़रूरत हो तो बाल रोग विशेषज्ञ की सलाह लें।
6. दवाइयाँ
यह इलाज का मुख्य हिस्सा नहीं है, लेकिन कुछ मामलों में डॉक्टर सहायक दवाएँ दे सकते हैं। कोई भी दवा बिना चिकित्सकीय सलाह के न लें।
परिवार और देखभालकर्ताओं की भूमिका
- व्यक्ति को शर्मिंदा न करें और न डाँटें। यह जानबूझकर की गई हरकत नहीं है।
- खाने के समय दबाव-मुक्त और सहज वातावरण बनाएँ।
- चिकित्सक द्वारा बताई गई तकनीकों का अभ्यास करने में साथ दें।
- शिशु या बच्चे में लक्षण दिखें तो देर न करें।
कब डॉक्टर से मिलें?
निम्न स्थितियों में विशेषज्ञ से संपर्क करें:
- रिगर्जिटेशन कई हफ़्तों से लगातार हो रहा हो
- वज़न घट रहा हो या बच्चे का विकास प्रभावित हो
- खाने से डर या बचने की प्रवृत्ति बढ़ रही हो
- गले, सीने या मुँह में लगातार जलन रहती हो
- रिगर्जिटेशन के साथ साँस लेने में तकलीफ़ या खाँसी हो
प्रचलित भ्रांतियाँ
भ्रांति 1: यह केवल एसिडिटी है।
सच: एसिडिटी और रुमिनेशन अलग स्थितियाँ हैं, और एसिडिटी की दवा अकेले इसे ठीक नहीं करती।
भ्रांति 2: व्यक्ति जानबूझकर ऐसा करता है।
सच: अधिकांशतः यह अनजाने में होने वाली स्वचालित प्रतिक्रिया है।
भ्रांति 3: यह सिर्फ़ बच्चों की समस्या है।
सच: वयस्कों में भी यह काफ़ी आम है, बस अक्सर पहचानी नहीं जाती।
निष्कर्ष
रुमिनेशन विकार भले ही कम चर्चित हो, पर यह व्यक्ति के स्वास्थ्य, पोषण और आत्मविश्वास को गहराई से प्रभावित कर सकता है। सही समय पर पहचान और उचित व्यवहारिक उपचार, विशेषकर डायाफ्रामेटिक साँस की तकनीक, से अधिकांश लोग इससे उबर जाते हैं। सबसे ज़रूरी है शर्म और झिझक को छोड़कर विशेषज्ञ से बात करना। यदि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य इन लक्षणों से गुज़र रहा है, तो किसी गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से सलाह लें।
