लैरिंजाइटिस (Laryngitis - स्वरयंत्र/आवाज की नली में सूजन)
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लैरिंजाइटिस (स्वरयंत्र शोथ): कारण, लक्षण, इलाज और बचाव

क्या कभी सुबह उठने पर आपकी आवाज़ अचानक भारी हो गई, फुसफुसाहट में बदल गई या बिल्कुल गायब हो गई? अगर हाँ, तो संभव है कि आप लैरिंजाइटिस से गुज़रे हों। यह आम समस्या है, जो ज़्यादातर मामलों में कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाती है। फिर भी इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि कई बार यह लंबे समय तक बनी रहती है और किसी गंभीर कारण का संकेत भी हो सकती है। इस लेख में हम लैरिंजाइटिस के कारण, लक्षण, इलाज, घरेलू उपाय और बचाव के तरीकों को सरल भाषा में समझेंगे।

लैरिंजाइटिस क्या है?

लैरिंजाइटिस का अर्थ है लैरिंक्स यानी स्वरयंत्र (आवाज़ की नली) में सूजन। स्वरयंत्र गले के ऊपरी हिस्से में, श्वासनली के ठीक ऊपर स्थित होता है। इसके भीतर दो पतली, लचीली मांसपेशीय परतें होती हैं, जिन्हें वोकल कॉर्ड्स या स्वर रज्जु कहते हैं। सामान्य स्थिति में जब हम साँस लेते हैं तो ये खुली रहती हैं, और जब हम बोलते हैं तो पास आकर कंपन करती हैं। इसी कंपन से आवाज़ पैदा होती है।

जब किसी कारण से ये स्वर रज्जु सूज जाती हैं या उनमें जलन हो जाती है, तो उनका कंपन सामान्य ढंग से नहीं हो पाता। नतीजतन आवाज़ बदल जाती है, कर्कश हो जाती है या कभी-कभी पूरी तरह बैठ जाती है।

लैरिंजाइटिस के प्रकार

अवधि के आधार पर लैरिंजाइटिस को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है।

1. तीव्र (एक्यूट) लैरिंजाइटिस: यह अचानक शुरू होता है और आमतौर पर एक से दो सप्ताह के भीतर ठीक हो जाता है। सर्दी-ज़ुकाम, वायरल संक्रमण या ज़्यादा चिल्लाने के बाद यह सबसे अधिक देखा जाता है।

2. दीर्घकालिक (क्रॉनिक) लैरिंजाइटिस: जब आवाज़ की परेशानी तीन सप्ताह या उससे अधिक समय तक बनी रहे, तो उसे दीर्घकालिक माना जाता है। इसके पीछे अक्सर लंबे समय तक रहने वाले कारण होते हैं, जैसे धूम्रपान, एसिड रिफ्लक्स या लगातार धूल-धुएँ में रहना।

लैरिंजाइटिस के प्रमुख कारण

वायरल संक्रमण: तीव्र लैरिंजाइटिस का सबसे आम कारण वायरस है, वही वायरस जो सामान्य सर्दी-ज़ुकाम और फ्लू पैदा करते हैं। बैक्टीरियल संक्रमण भी कभी-कभी कारण बनता है, पर यह अपेक्षाकृत कम होता है।

आवाज़ का अत्यधिक या गलत उपयोग: ज़ोर से चिल्लाना, लंबे समय तक लगातार बोलना, शोर में ऊँची आवाज़ में बात करना या बहुत देर तक गाना स्वर रज्जु पर दबाव डालता है। शिक्षक, गायक, वक्ता, कॉल सेंटर कर्मचारी और दुकानदार इस कारण अधिक प्रभावित होते हैं।

एसिड रिफ्लक्स (GERD/LPR): पेट का अम्ल जब भोजन नली से ऊपर चढ़कर गले तक पहुँचता है, तो स्वरयंत्र की नाज़ुक परत में जलन पैदा करता है। दीर्घकालिक लैरिंजाइटिस का यह एक बहुत आम कारण है।

धूम्रपान और तंबाकू: सिगरेट, बीड़ी और तंबाकू का धुआँ स्वर रज्जु को सुखाकर उनमें लगातार जलन पैदा करता है। निष्क्रिय धूम्रपान यानी दूसरों के धुएँ के संपर्क में आना भी नुकसानदायक है।

शराब का सेवन: अत्यधिक शराब गले को सुखा देती है और जलन बढ़ाती है।

एलर्जी और प्रदूषण: धूल, पराग, रसायनों के धुएँ और वायु प्रदूषण से गले में एलर्जिक प्रतिक्रिया हो सकती है, जिससे सूजन आ जाती है।

अन्य कारण: साइनस के कारण नाक से गले में टपकने वाला बलगम (पोस्ट-नेज़ल ड्रिप), लंबे समय तक सूखी हवा में रहना, कुछ इनहेलर दवाओं का उपयोग और बहुत कम पानी पीना भी कारण बन सकते हैं। दुर्लभ मामलों में स्वर रज्जु पर गाँठ या पॉलिप, तंत्रिका संबंधी समस्या या गले का कैंसर भी लंबे समय की कर्कशता का कारण हो सकता है।

लैरिंजाइटिस के लक्षण

लैरिंजाइटिस के लक्षण आम तौर पर धीरे-धीरे या अचानक उभरते हैं। इनमें शामिल हैं:

  • आवाज़ का कर्कश, भारी या धीमी हो जाना
  • आवाज़ का पूरी तरह बैठ जाना
  • गले में खराश, कच्चापन या जलन
  • गला सूखा महसूस होना
  • सूखी, चुभने वाली खाँसी
  • बार-बार गला साफ़ करने की इच्छा
  • गले में गुदगुदी या कुछ अटका हुआ-सा महसूस होना
  • हल्का बुखार, थकान या बदन दर्द (संक्रमण की स्थिति में)

तीव्र लैरिंजाइटिस में लक्षण अचानक आते हैं, जबकि दीर्घकालिक रूप में आवाज़ की परेशानी हफ्तों या महीनों तक बनी रहती है और कभी-कभी कम-ज़्यादा होती रहती है।

किन लोगों को ज़्यादा खतरा है?

कुछ स्थितियों में लैरिंजाइटिस का जोखिम बढ़ जाता है: धूम्रपान या शराब का सेवन करने वाले लोग, एसिड रिफ्लक्स से परेशान लोग, जिन्हें बार-बार सर्दी-ज़ुकाम या साइनस की समस्या होती है, जो धूल, धुएँ या रसायनों वाले माहौल में काम करते हैं, और जिन्हें पेशे की वजह से बहुत बोलना या गाना पड़ता है। अस्थमा के मरीज़ जो इनहेल्ड स्टेरॉयड लेते हैं, उन्हें भी कभी-कभी आवाज़ बदलने की शिकायत हो सकती है।

बच्चों में लैरिंजाइटिस

बच्चों की श्वास नली छोटी और संकरी होती है, इसलिए वहाँ मामूली सूजन भी साँस लेने में परेशानी पैदा कर सकती है। छोटे बच्चों में वायरल लैरिंजाइटिस के साथ “क्रुप” की स्थिति बन सकती है, जिसमें भौंकने जैसी खाँसी, साँस लेते समय सीटी जैसी आवाज़ (स्ट्राइडर) और साँस लेने में कठिनाई होती है। यदि बच्चे को साँस लेने में तकलीफ़ हो, होंठ नीले पड़ें, वह लार निगल न पाए या बहुत सुस्त दिखे, तो तुरंत अस्पताल ले जाएँ। यह आपातकालीन स्थिति हो सकती है।

डॉक्टर को कब दिखाएँ?

अधिकांश तीव्र मामले घर पर ही ठीक हो जाते हैं, लेकिन निम्न स्थितियों में चिकित्सकीय सलाह ज़रूर लें:

  • आवाज़ की परेशानी दो से तीन सप्ताह से अधिक बनी रहे
  • साँस लेने या निगलने में कठिनाई हो
  • खाँसी में खून आए
  • तेज़ बुखार या गले में बहुत तेज़ दर्द हो
  • गले या गर्दन में गाँठ महसूस हो
  • बिना किसी स्पष्ट कारण के आवाज़ बार-बार बदले
  • धूम्रपान करने वाले व्यक्ति की आवाज़ लंबे समय से भारी हो

इस स्थिति में ईएनटी (कान-नाक-गला) विशेषज्ञ से मिलना सबसे उचित रहता है।

निदान कैसे होता है?

डॉक्टर पहले आपके लक्षणों, आदतों, पेशे और चिकित्सा इतिहास के बारे में पूछते हैं। इसके बाद गले की जाँच की जाती है। ज़रूरत पड़ने पर लैरिंगोस्कोपी की जाती है, जिसमें एक पतले कैमरे वाले उपकरण से स्वर रज्जु को सीधे देखा जाता है। यह जाँच आमतौर पर कम समय में हो जाती है। यदि दीर्घकालिक समस्या के पीछे कोई गाँठ या संदिग्ध घाव दिखे, तो बायोप्सी की सलाह दी जा सकती है। संक्रमण की आशंका होने पर गले का स्वैब या अन्य जाँचें भी करवाई जा सकती हैं।

इलाज

इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि समस्या का कारण क्या है।

वायरल लैरिंजाइटिस: इसमें सबसे महत्वपूर्ण है आराम, ख़ासकर आवाज़ को आराम देना। एंटीबायोटिक वायरस पर असर नहीं करती, इसलिए बिना ज़रूरत इनका उपयोग नहीं करना चाहिए। डॉक्टर लक्षणों के अनुसार दर्द या बुखार की दवा दे सकते हैं।

बैक्टीरियल संक्रमण: यदि जाँच में जीवाणु संक्रमण की पुष्टि हो, तभी डॉक्टर एंटीबायोटिक देते हैं।

एसिड रिफ्लक्स: इसमें अम्ल कम करने वाली दवाएँ और खान-पान तथा जीवनशैली में बदलाव सुझाए जाते हैं, जैसे देर रात भारी भोजन से बचना और खाने के तुरंत बाद न लेटना।

एलर्जी: एलर्जी के कारण का पता लगाकर उससे बचाव और आवश्यकतानुसार दवाएँ दी जाती हैं।

वॉइस थेरेपी: जिन लोगों की आवाज़ का गलत उपयोग समस्या की जड़ हो, उन्हें स्पीच-लैंग्वेज थेरेपिस्ट की मदद से आवाज़ को सही ढंग से इस्तेमाल करना सिखाया जाता है।

अन्य उपचार: स्वर रज्जु पर गाँठ या पॉलिप होने पर कुछ मामलों में सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है। कोई भी दवा, ख़ासकर स्टेरॉयड, केवल चिकित्सक की सलाह से ही लें।

घरेलू उपाय और देखभाल

हल्के और तीव्र लैरिंजाइटिस में ये उपाय राहत देते हैं:

  1. आवाज़ को आराम दें: जितना हो सके कम बोलें। ज़रूरत हो तो धीमे, सामान्य स्वर में बोलें।
  2. फुसफुसाने से बचें: आश्चर्य की बात है कि फुसफुसाने से स्वर रज्जु पर ज़्यादा दबाव पड़ता है। सामान्य, हल्के स्वर में बोलना बेहतर है।
  3. खूब पानी पिएँ: गुनगुना पानी और अन्य तरल पदार्थ गले को नम रखते हैं।
  4. भाप लें: गुनगुनी भाप गले को आराम देती है और सूखापन कम करती है।
  5. नमी बनाए रखें: सूखे मौसम या एसी वाले कमरे में ह्यूमिडिफ़ायर उपयोगी हो सकता है।
  6. गुनगुने नमक के पानी से गरारे: एक गिलास गुनगुने पानी में आधा चम्मच नमक डालकर गरारे करने से गले को आराम मिलता है।
  7. गर्म पेय: हल्दी वाला दूध, अदरक-तुलसी की चाय या शहद मिला गुनगुना पानी गले को सुकून देते हैं। ध्यान रहे, एक वर्ष से छोटे बच्चों को शहद नहीं देना चाहिए।
  8. धूम्रपान और शराब से दूर रहें: ये दोनों जलन को बढ़ाते हैं।
  9. ज़्यादा मसालेदार, तला हुआ और बहुत ठंडा भोजन कम करें, ख़ासकर यदि रिफ्लक्स की शिकायत हो।
  10. गला बार-बार साफ़ न करें: इससे स्वर रज्जु पर और चोट लगती है। इसके बजाय पानी का एक घूँट लें।

घरेलू उपाय सहायक होते हैं, लेकिन वे उचित चिकित्सा का विकल्प नहीं हैं।

लैरिंजाइटिस से बचाव

कुछ सरल आदतें इस समस्या का जोखिम काफ़ी घटा सकती हैं:

  • धूम्रपान और तंबाकू पूरी तरह छोड़ें
  • शराब का सेवन सीमित रखें या बंद करें
  • दिनभर पर्याप्त पानी पिएँ
  • शोर वाली जगह पर चिल्लाकर बोलने से बचें
  • ज़्यादा बोलने वाले पेशे में बीच-बीच में आवाज़ को आराम दें
  • धूल, धुएँ और रसायनों वाली जगहों पर मास्क पहनें
  • सर्दी-ज़ुकाम के समय आवाज़ का अधिक उपयोग न करें
  • हाथों की स्वच्छता रखें ताकि संक्रमण कम फैले
  • एसिड रिफ्लक्स का समय पर इलाज कराएँ और रात का भोजन सोने से कुछ घंटे पहले करें
  • बहुत गर्म और बहुत ठंडे पेय के बीच अचानक बदलाव से बचें

गायक और शिक्षक जैसे लोगों को आवाज़ की देखभाल, यानी वार्म-अप और उचित साँस लेने की तकनीक, सीखनी चाहिए।

निष्कर्ष

लैरिंजाइटिस स्वरयंत्र की सूजन है, जो ज़्यादातर वायरल संक्रमण या आवाज़ के अत्यधिक उपयोग से होती है और आराम तथा देखभाल से कुछ दिनों में ठीक हो जाती है। लेकिन जब आवाज़ की समस्या तीन सप्ताह से अधिक खिंचे, साँस या निगलने में दिक्कत हो, या धूम्रपान करने वाले व्यक्ति में बदलाव दिखे, तो देर किए बिना विशेषज्ञ को दिखाना ज़रूरी है। आवाज़ हमारी पहचान और संवाद का आधार है। थोड़ी सावधानी, सही आदतें और समय पर इलाज से इसे लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है।

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