टॉन्सिलिटिस (Tonsillitis - टॉन्सिल्स का संक्रमण)
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टॉन्सिलिटिस (टॉन्सिल्स की सूजन): कारण, लक्षण, इलाज और बचाव

परिचय

गले में दर्द, निगलने में तकलीफ और बुखार, ये परेशानियाँ लगभग हर व्यक्ति ने कभी न कभी झेली होती हैं। कई बार इसकी जड़ में टॉन्सिलिटिस होता है। यह गले के दोनों ओर स्थित टॉन्सिल्स में होने वाला संक्रमण और सूजन है। यह बच्चों और किशोरों में बहुत आम है, लेकिन वयस्कों को भी हो सकता है। इसमें अधिकतर मामले हल्के होते हैं और कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं, लेकिन सही जानकारी न होने पर यह बार-बार लौट सकता है या जटिलताएँ पैदा कर सकता है।

इस लेख में हम जानेंगे कि टॉन्सिल्स क्या हैं, टॉन्सिलिटिस क्यों होता है, इसके लक्षण क्या हैं, जाँच और इलाज कैसे होता है, घरेलू उपाय कौन-से मददगार हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है।

टॉन्सिल्स क्या होते हैं?

टॉन्सिल्स गले के पिछले हिस्से में, जीभ के दोनों ओर स्थित अंडाकार, गुलाबी माँस के गोल उभार होते हैं। ये हमारी रोग-प्रतिरोधक (लसीका) प्रणाली का हिस्सा हैं। इनका काम मुँह और नाक के रास्ते शरीर में प्रवेश करने वाले कीटाणुओं को पकड़ना और उनसे लड़ने में मदद करना है। बचपन में ये अधिक सक्रिय रहते हैं, इसीलिए छोटे बच्चों में इनके संक्रमित होने की संभावना ज़्यादा रहती है। उम्र बढ़ने के साथ इनकी भूमिका घटती जाती है।

कीटाणुओं से लड़ते-लड़ते जब टॉन्सिल्स खुद संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं, तो उनमें सूजन, लालिमा और दर्द होने लगता है। इसी स्थिति को टॉन्सिलिटिस कहते हैं।

टॉन्सिलिटिस के कारण

टॉन्सिलिटिस मुख्यतः दो प्रकार के रोगाणुओं से होता है।

1. वायरल संक्रमण: अधिकांश मामले (लगभग आधे से ज़्यादा) वायरस के कारण होते हैं। सर्दी-ज़ुकाम पैदा करने वाले वायरस, इन्फ्लूएंज़ा, एडेनोवायरस और एपस्टीन-बार वायरस (जो मोनोन्यूक्लिओसिस करता है) इनमें प्रमुख हैं। वायरल टॉन्सिलिटिस में एंटीबायोटिक दवाएँ काम नहीं करतीं।

2. जीवाणु (बैक्टीरियल) संक्रमण: सबसे आम जीवाणु ग्रुप-ए स्ट्रेप्टोकोकस (Streptococcus pyogenes) है, जो “स्ट्रेप थ्रोट” भी पैदा करता है। इसमें एंटीबायोटिक की ज़रूरत पड़ती है।

संक्रमण कैसे फैलता है? यह संक्रमण खाँसने या छींकने से निकलने वाली बूँदों, संक्रमित व्यक्ति के साथ बर्तन, गिलास या तौलिया साझा करने, और दूषित सतहों को छूकर हाथ मुँह तक ले जाने से फैलता है। स्कूलों और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर यह तेज़ी से फैलता है।

जोखिम बढ़ाने वाले कारक:

  • 5 से 15 वर्ष की आयु (स्ट्रेप संक्रमण इसी उम्र में अधिक होता है)
  • संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में रहना
  • कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता
  • धूल, धुआँ और प्रदूषण
  • ठंडे पदार्थों या मौसम बदलने का असर (ये सीधे कारण नहीं, पर गले को संवेदनशील बना सकते हैं)

टॉन्सिलिटिस के लक्षण

लक्षण संक्रमण के प्रकार और गंभीरता के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। आम लक्षण ये हैं:

  • गले में तेज़ दर्द, खासकर निगलते समय
  • टॉन्सिल्स का लाल और सूजा हुआ दिखना
  • टॉन्सिल्स पर सफ़ेद या पीले धब्बे अथवा परत
  • बुखार और ठंड लगना
  • गर्दन की ग्रंथियों (लिम्फ नोड्स) में सूजन और दर्द
  • साँस में बदबू
  • आवाज़ बैठ जाना या बदल जाना
  • सिरदर्द और कान में दर्द
  • थकान और भूख न लगना
  • पेट दर्द या उल्टी (विशेषकर छोटे बच्चों में)

छोटे बच्चों में संकेत: जो बच्चे बता नहीं पाते, उनमें अक्सर खाने से इनकार, ज़्यादा लार टपकना, चिड़चिड़ापन और बिना कारण रोना दिखाई देता है।

वायरल और बैक्टीरियल में अंतर: वायरल संक्रमण में आमतौर पर खाँसी, नाक बहना, छींक और आँखें लाल होना भी साथ होता है। जीवाणु संक्रमण में खाँसी अक्सर नहीं होती, लेकिन तेज़ बुखार, टॉन्सिल पर सफ़ेद परत और गर्दन की सूजी हुई ग्रंथियाँ ज़्यादा दिखती हैं। फिर भी केवल लक्षण देखकर पक्का भेद करना कठिन है, इसलिए जाँच ज़रूरी हो सकती है।

टॉन्सिलिटिस के प्रकार

  • तीव्र (एक्यूट) टॉन्सिलिटिस: अचानक शुरू होता है और आमतौर पर 3 से 10 दिन में ठीक हो जाता है।
  • बार-बार होने वाला (रिकरेंट) टॉन्सिलिटिस: एक साल में कई बार संक्रमण होना।
  • दीर्घकालिक (क्रॉनिक) टॉन्सिलिटिस: गले में लंबे समय तक दर्द, साँस में बदबू और टॉन्सिल पर छोटे सफ़ेद-पीले पथरीले कण (टॉन्सिल स्टोन) बनना।

डॉक्टर को कब दिखाएँ?

अधिकांश गले के दर्द अपने आप ठीक हो जाते हैं, लेकिन निम्न स्थितियों में तुरंत चिकित्सक से मिलें:

  • गले का दर्द दो दिन से ज़्यादा बना रहे या बढ़ता जाए
  • तेज़ बुखार (101°F या 38.3°C से ऊपर)
  • निगलने या साँस लेने में बहुत कठिनाई
  • मुँह खोलने में दर्द या कठिनाई
  • गर्दन में अकड़न
  • लार निगल न पाना या अत्यधिक लार टपकना
  • शरीर पर लाल चकत्ते
  • बच्चे में अत्यधिक सुस्ती या पानी पीने से इनकार (निर्जलीकरण का खतरा)

साँस लेने में दिक्कत या निगलने में अत्यधिक परेशानी आपातकालीन स्थिति हो सकती है, ऐसे में देर न करें।

जाँच कैसे होती है?

डॉक्टर सबसे पहले गले, कान और नाक की जाँच करते हैं और गर्दन की ग्रंथियों को टटोलकर देखते हैं। इसके बाद ज़रूरत के अनुसार ये जाँचें हो सकती हैं:

  • रैपिड स्ट्रेप टेस्ट: गले से स्वैब लेकर कुछ ही मिनट में स्ट्रेप जीवाणु की जाँच।
  • थ्रोट कल्चर: अधिक सटीक जाँच, जिसका परिणाम एक-दो दिन में आता है। रैपिड टेस्ट नेगेटिव आने पर बच्चों में अक्सर यह कराया जाता है।
  • ब्लड टेस्ट (सीबीसी): संक्रमण के प्रकार का अंदाज़ा लगाने या मोनोन्यूक्लिओसिस की आशंका में।

इलाज

वायरल टॉन्सिलिटिस: इसमें आराम, भरपूर तरल पदार्थ और लक्षणों से राहत देने वाली दवाएँ पर्याप्त होती हैं। यह प्रायः एक सप्ताह में अपने आप ठीक हो जाता है।

बैक्टीरियल टॉन्सिलिटिस: डॉक्टर एंटीबायोटिक (जैसे पेनिसिलिन या एमोक्सिसिलिन) देते हैं। सबसे ज़रूरी बात यह है कि पूरा कोर्स खत्म करें, चाहे दो-तीन दिन में आराम मिल जाए। अधूरा कोर्स संक्रमण को दोबारा भड़का सकता है और गंभीर जटिलताओं का जोखिम बढ़ाता है। बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से एंटीबायोटिक लेना ठीक नहीं है।

दर्द और बुखार: पैरासिटामोल या इबुप्रोफेन जैसी दवाएँ राहत देती हैं, पर खुराक उम्र और वज़न के अनुसार तय होती है, इसलिए बच्चों को दवा देते समय डॉक्टर या दवा के लेबल के निर्देश का पालन करें। बच्चों और किशोरों को डॉक्टर की सलाह के बिना एस्पिरिन न दें, क्योंकि इससे रेये सिंड्रोम नामक गंभीर स्थिति का खतरा रहता है।

घरेलू उपाय और देखभाल

घरेलू उपाय इलाज की जगह नहीं लेते, पर लक्षणों में आराम देने में सहायक हो सकते हैं:

  • गुनगुने नमक के पानी से गरारे: एक गिलास गुनगुने पानी में आधा चम्मच नमक मिलाकर दिन में कई बार गरारे करें। इससे सूजन और दर्द में राहत मिलती है।
  • गुनगुने तरल पदार्थ: सादा गुनगुना पानी, सूप, दाल का पानी और हर्बल चाय गले को आराम देते हैं।
  • शहद: गुनगुने पानी या चाय में एक चम्मच शहद गले को शांत करता है। एक वर्ष से छोटे बच्चों को शहद बिल्कुल न दें।
  • पर्याप्त आराम: शरीर को संक्रमण से लड़ने के लिए नींद और आराम की ज़रूरत होती है।
  • नरम भोजन: खिचड़ी, दलिया, दही, केला जैसे नरम पदार्थ खाएँ। मसालेदार, तला हुआ और बहुत गर्म या खट्टा भोजन टालें।
  • नमी बनाए रखें: कमरे में ह्यूमिडिफायर या भाप लेने से गला सूखने से बचता है।
  • धूम्रपान और धुएँ से दूरी: ये गले की जलन को बढ़ाते हैं।
  • गले की गोलियाँ (लॉज़ेंज): बड़े बच्चों और वयस्कों के लिए अस्थायी राहत देती हैं। छोटे बच्चों को ये न दें, दम घुटने का खतरा रहता है।

संभावित जटिलताएँ

यदि इलाज न हो या अधूरा रहे, तो कुछ मामलों में समस्याएँ हो सकती हैं:

  • पेरिटॉन्सिलर एब्सेस: टॉन्सिल के पास मवाद का जमाव, जिसमें तेज़ दर्द और मुँह खोलने में कठिनाई होती है। इसके लिए मवाद निकालने की ज़रूरत पड़ सकती है।
  • गठिया बुखार (रूमैटिक फीवर): स्ट्रेप संक्रमण के बाद जोड़ों और हृदय को प्रभावित करने वाली स्थिति।
  • किडनी की सूजन (पोस्ट-स्ट्रेप्टोकोकल ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस)।
  • नींद में साँस रुकना (स्लीप एपनिया): बहुत बड़े टॉन्सिल्स के कारण खर्राटे और नींद में बाधा।
  • संक्रमण का कान या आसपास के ऊतकों में फैलना।

इन जटिलताओं से बचने का सबसे अच्छा तरीका है समय पर जाँच और पूरा इलाज।

टॉन्सिल्स निकालने की सर्जरी (टॉन्सिलेक्टॉमी)

कुछ मामलों में डॉक्टर टॉन्सिल्स निकालने की सलाह देते हैं। आमतौर पर इसकी सिफ़ारिश तब की जाती है जब:

  • साल में कई बार (अक्सर 7 या उससे अधिक बार) गंभीर संक्रमण होता हो, और यह पैटर्न लगातार बना रहे
  • बार-बार एंटीबायोटिक लेने के बावजूद आराम न मिले
  • बहुत बढ़े हुए टॉन्सिल्स से साँस या निगलने में बाधा या स्लीप एपनिया हो
  • पेरिटॉन्सिलर एब्सेस बार-बार हो
  • टॉन्सिल्स में कोई असामान्य वृद्धि हो और अन्य जाँच की ज़रूरत हो

यह एक सामान्य और प्रायः सुरक्षित शल्य-क्रिया है, जो सामान्यतः उसी दिन अस्पताल से छुट्टी वाली प्रक्रिया होती है। रिकवरी में आमतौर पर एक से दो सप्ताह लगते हैं, जिसमें गले में दर्द रहता है और नरम, ठंडा भोजन लेना होता है। सर्जरी का निर्णय हमेशा ईएनटी (कान-नाक-गला) विशेषज्ञ की सलाह से ही लें।

बचाव के उपाय

टॉन्सिलिटिस को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, लेकिन जोखिम काफ़ी कम किया जा सकता है:

  1. हाथ धोने की आदत: खाने से पहले, शौच के बाद और बाहर से आने पर साबुन से हाथ धोएँ।
  2. बर्तन और निजी सामान साझा न करें: गिलास, चम्मच, तौलिया और टूथब्रश अलग रखें।
  3. संक्रमित व्यक्ति से दूरी: बीमार व्यक्ति के नज़दीकी संपर्क से बचें और बीमार बच्चे को घर पर आराम कराएँ।
  4. टूथब्रश बदलें: संक्रमण ठीक होने के बाद पुराना टूथब्रश बदल दें।
  5. खाँसते-छींकते समय मुँह ढकें: रूमाल या कोहनी का प्रयोग करें।
  6. मुँह की स्वच्छता: दिन में दो बार ब्रश करें और नियमित रूप से कुल्ला करें।
  7. संतुलित आहार: फल, हरी सब्ज़ियाँ और प्रोटीन युक्त भोजन रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
  8. पर्याप्त नींद और पानी: शरीर को स्वस्थ रखने की बुनियादी ज़रूरतें।
  9. प्रदूषण और धुएँ से बचाव: धूम्रपान न करें और बच्चों को धुएँ से दूर रखें।

कुछ आम भ्रांतियाँ

“ठंडा खाने या आइसक्रीम से टॉन्सिलिटिस होता है।” टॉन्सिलिटिस का सीधा कारण वायरस या जीवाणु हैं, ठंडी चीज़ें नहीं। हाँ, संक्रमण की स्थिति में ठंडी या खट्टी चीज़ें गले को परेशान कर सकती हैं, इसलिए उनसे परहेज़ ठीक रहता है।

“हर गले के दर्द में एंटीबायोटिक चाहिए।” अधिकतर गले के संक्रमण वायरल होते हैं और एंटीबायोटिक से ठीक नहीं होते। गैर-ज़रूरी एंटीबायोटिक से दवा-प्रतिरोध (एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस) का खतरा बढ़ता है।

“टॉन्सिल्स निकलवाने से रोग-प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाती है।” ऐसा नहीं है। शरीर में रोग से लड़ने के अन्य कई तंत्र मौजूद हैं, और टॉन्सिल्स निकालने के बाद भी प्रतिरोधक क्षमता सामान्यतः बनी रहती है।

निष्कर्ष

टॉन्सिलिटिस एक आम संक्रमण है, जो सही देखभाल से अधिकांश मामलों में जल्दी ठीक हो जाता है। ज़रूरी है कि लक्षणों को पहचानें, गले के दर्द को हल्के में न लें, खासकर जब बुखार, टॉन्सिल पर सफ़ेद परत या निगलने में गंभीर तकलीफ़ हो। वायरल संक्रमण में आराम और घरेलू देखभाल काफ़ी होती है, जबकि जीवाणु संक्रमण में डॉक्टर द्वारा बताई गई एंटीबायोटिक का पूरा कोर्स अनिवार्य है। साफ़-सफ़ाई की अच्छी आदतें, संतुलित आहार और समय पर चिकित्सा सलाह इस समस्या से बचाव और जटिलताओं की रोकथाम का सबसे कारगर रास्ता हैं।

अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी लक्षण या दवा के संबंध में अपने डॉक्टर से परामर्श अवश्य करें।

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