न्यूरोपैथी (Neuropathy / नसों की कमजोरी)
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हंटिंगटन रोग: एक आनुवंशिक मस्तिष्क विकार की पूरी जानकारी

परिचय

हंटिंगटन रोग (Huntington’s Disease, HD) एक दुर्लभ, वंशानुगत और धीरे-धीरे बढ़ने वाला तंत्रिका-तंत्र का रोग है। इसमें मस्तिष्क की कुछ विशेष तंत्रिका कोशिकाएँ समय के साथ नष्ट होने लगती हैं। इसका असर शरीर की गतिविधियों, सोचने-समझने की क्षमता और भावनात्मक व्यवहार, तीनों पर पड़ता है। इसीलिए इसे अक्सर “तीन रोगों का मेल” कहा जाता है, क्योंकि इसमें मूवमेंट डिसऑर्डर, डिमेंशिया जैसी समस्याएँ और मानसिक स्वास्थ्य की दिक्कतें साथ-साथ दिखाई देती हैं।

यह रोग आमतौर पर 30 से 50 वर्ष की उम्र के बीच शुरू होता है, यानी उस समय जब व्यक्ति करियर और परिवार की जिम्मेदारियों के शिखर पर होता है। इसी कारण इसका प्रभाव केवल मरीज पर नहीं, पूरे परिवार पर पड़ता है।

इतिहास

इस रोग का नाम अमेरिकी चिकित्सक जॉर्ज हंटिंगटन के नाम पर पड़ा। उन्होंने 1872 में इसका विस्तृत वर्णन प्रकाशित किया। उन्होंने देखा कि यह बीमारी कुछ परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है और उसमें अनियंत्रित, नृत्य जैसी हरकतें होती हैं। पुराने समय में इसे “हंटिंगटन कोरिया” कहा जाता था। “कोरिया” यूनानी शब्द है जिसका अर्थ नृत्य है। 1993 में वैज्ञानिकों ने इस रोग के लिए जिम्मेदार जीन की पहचान कर ली, जो आनुवंशिक रोगों की खोज के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि थी।

कारण और आनुवंशिकी

हंटिंगटन रोग का कारण चौथे गुणसूत्र (क्रोमोसोम 4) पर स्थित HTT जीन में होने वाला परिवर्तन (म्यूटेशन) है। यह जीन “हंटिंगटिन” नामक प्रोटीन बनाता है। इस जीन में CAG नामक डीएनए खंड कई बार दोहराया जाता है।

  • सामान्य व्यक्तियों में यह दोहराव आमतौर पर 26 बार या उससे कम होता है।
  • 27 से 35 बार दोहराव वाले लोगों में रोग आमतौर पर नहीं होता, पर अगली पीढ़ी में जोखिम बढ़ सकता है।
  • 36 से 39 बार दोहराव पर रोग होने की संभावना रहती है, पर पक्की नहीं होती।
  • 40 या उससे अधिक दोहराव होने पर व्यक्ति में रोग लगभग निश्चित रूप से विकसित होता है।

दोहराव जितना अधिक होता है, रोग उतनी ही कम उम्र में शुरू होता है और उतनी तेजी से बढ़ता है। असामान्य रूप से लंबा हंटिंगटिन प्रोटीन मस्तिष्क की कोशिकाओं में जमा होकर उन्हें नुकसान पहुँचाता है। सबसे अधिक असर मस्तिष्क के गहरे हिस्से “बेसल गैंग्लिया” (विशेषकर स्ट्रायटम) पर पड़ता है, जो गति के नियंत्रण, निर्णय लेने और भावनाओं के संचालन में मदद करता है। रोग बढ़ने पर मस्तिष्क का बाहरी हिस्सा (कॉर्टेक्स) भी प्रभावित होता है।

यह रोग “ऑटोसोमल डोमिनेंट” ढंग से विरासत में मिलता है। इसका अर्थ है कि यदि माता या पिता में से किसी एक को यह रोग है, तो हर संतान में यह जीन आने की संभावना 50 प्रतिशत होती है, चाहे संतान लड़का हो या लड़की। जिस व्यक्ति में यह जीन आ जाता है, उसमें जीवनकाल में रोग के लक्षण आने की आशंका बहुत अधिक होती है। कई बार अगली पीढ़ी में दोहराव बढ़ जाता है, विशेषकर जब जीन पिता से मिलता है। इसलिए बच्चों में लक्षण माता-पिता से पहले शुरू हो सकते हैं। इस प्रवृत्ति को “एंटिसिपेशन” कहते हैं।

लक्षण

हंटिंगटन रोग के लक्षण धीरे-धीरे उभरते हैं और वर्षों में बढ़ते जाते हैं। इन्हें तीन वर्गों में समझा जा सकता है।

1. गति संबंधी लक्षण

शुरुआत में हल्की बेचैनी, हाथ-पैरों में अनजानी फड़कन या चेहरे की छोटी-मोटी हरकतें दिख सकती हैं। आगे चलकर ये लक्षण उभरते हैं:

  • कोरिया: हाथ, पैर, चेहरे और धड़ की अनियंत्रित, झटकेदार और लहराती हरकतें
  • चलने में लड़खड़ाहट और संतुलन बिगड़ना, जिससे बार-बार गिरना
  • बोलने में अस्पष्टता और आवाज पर नियंत्रण की कमी
  • निगलने में कठिनाई, जिससे खाना श्वास-नली में जाने का खतरा रहता है
  • रोग की उन्नत अवस्था में मांसपेशियों में अकड़न, धीमापन और शरीर की मुद्राओं का असामान्य होना

2. संज्ञानात्मक (सोचने-समझने संबंधी) लक्षण

अक्सर ये लक्षण गति संबंधी लक्षणों से पहले शुरू हो जाते हैं, पर पहचाने कम जाते हैं। इनमें शामिल हैं:

  • योजना बनाने, चीजें व्यवस्थित करने और एक साथ कई काम संभालने में कठिनाई
  • ध्यान केंद्रित करने में परेशानी और सोचने की गति धीमी होना
  • नई चीजें सीखने और निर्णय लेने में दिक्कत
  • काम या पढ़ाई के प्रदर्शन में गिरावट

समय के साथ ये समस्याएँ डिमेंशिया के स्तर तक पहुँच सकती हैं, हालाँकि व्यक्ति कई बार अपने आसपास के लोगों को पहचानता रहता है।

3. मानसिक और व्यवहार संबंधी लक्षण

  • लंबे समय तक उदासी या अवसाद
  • चिड़चिड़ापन, गुस्सा और मूड में तेज उतार-चढ़ाव
  • चिंता, किसी बात पर अटक जाना या दोहराव वाला व्यवहार
  • उदासीनता, यानी किसी चीज में रुचि न रहना
  • कुछ मामलों में भ्रम या मतिभ्रम

अवसाद इस रोग में बहुत आम है और आत्म-हानि के विचारों का जोखिम भी अन्य लोगों की तुलना में अधिक माना गया है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान जरूरी है। कई परिवार शुरुआत में व्यवहार-परिवर्तन को “स्वभाव की समस्या” या तनाव समझ लेते हैं, जबकि वह रोग का ही हिस्सा होता है।

किशोर हंटिंगटन रोग

लगभग 5 से 10 प्रतिशत मामलों में लक्षण 20 वर्ष की उम्र से पहले शुरू हो जाते हैं। इसे जुवेनाइल (किशोर) हंटिंगटन रोग कहते हैं। इसमें कोरिया की जगह मांसपेशियों की अकड़न और धीमापन अधिक दिखता है। साथ ही दौरे पड़ना, पढ़ाई में अचानक गिरावट और व्यवहार में बदलाव हो सकते हैं। यह रूप अक्सर तेजी से बढ़ता है।

निदान

निदान कई चरणों में होता है।

  1. नैदानिक जाँच: न्यूरोलॉजिस्ट पारिवारिक इतिहास पूछते हैं और गति, संतुलन, प्रतिक्रियाओं तथा मानसिक स्थिति की जाँच करते हैं।
  2. आनुवंशिक जाँच: रक्त के नमूने से HTT जीन में CAG दोहराव की गिनती की जाती है। यह जाँच निदान की पुष्टि करने वाली सबसे विश्वसनीय विधि है।
  3. मस्तिष्क इमेजिंग: MRI या CT स्कैन में स्ट्रायटम का सिकुड़ना दिख सकता है। यह रोग की पुष्टि नहीं करता, पर अन्य कारणों को अलग करने में मदद देता है।

जिन लोगों के परिवार में रोग है पर उनमें अभी लक्षण नहीं हैं, वे “प्रेडिक्टिव जेनेटिक टेस्टिंग” करा सकते हैं। यह जाँच केवल वयस्कों के लिए और आनुवंशिक परामर्श (जेनेटिक काउंसलिंग) के बाद ही की जानी चाहिए। रिपोर्ट सकारात्मक आने पर भी इलाज अभी सीमित है, इसलिए यह निर्णय भावनात्मक रूप से बहुत भारी होता है। कई लोग जाँच न कराने का विकल्प भी चुनते हैं। परिवार-नियोजन के इच्छुक दंपतियों के लिए भ्रूण-पूर्व आनुवंशिक जाँच जैसे विकल्प भी उपलब्ध हैं, जिनकी जानकारी काउंसलर से मिल सकती है।

उपचार और प्रबंधन

अब तक की जानकारी के अनुसार हंटिंगटन रोग का कोई ऐसा इलाज उपलब्ध नहीं है जो इसे रोक दे या पलट दे। उपचार का लक्ष्य लक्षणों को नियंत्रित करना और जीवन की गुणवत्ता बनाए रखना है।

दवाइयाँ: कोरिया के लिए टेट्राबेनाज़ीन, ड्यूटेट्राबेनाज़ीन और वैल्बेनाज़ीन जैसी दवाएँ उपयोग होती हैं। अवसाद, चिंता और चिड़चिड़ापन के लिए एंटीडिप्रेसेंट और मूड-स्टेबलाइज़र दिए जाते हैं। गंभीर मानसिक लक्षणों में एंटीसाइकोटिक दवाएँ काम आती हैं। दवाओं का चयन और मात्रा रोगी की स्थिति के अनुसार डॉक्टर तय करते हैं।

पुनर्वास और सहायक चिकित्सा:

  • फिजियोथेरेपी से चाल, संतुलन और मांसपेशियों की क्षमता बनाए रखने में मदद मिलती है।
  • स्पीच थेरेपी से बोलने और निगलने की समस्याओं का प्रबंधन होता है।
  • ऑक्यूपेशनल थेरेपी से रोजमर्रा के काम आसान बनाने के तरीके सिखाए जाते हैं।
  • पोषण विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है, क्योंकि इस रोग में शरीर की ऊर्जा की खपत बढ़ जाती है और वजन घटने का खतरा रहता है।
  • मनोचिकित्सा और काउंसलिंग से रोगी और परिवार को भावनात्मक सहारा मिलता है।

देखभाल और परिवार की भूमिका

चूँकि यह रोग लंबे समय तक चलता है, इसलिए परिवार और देखभाल करने वालों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ व्यावहारिक बातें:

  • घर को सुरक्षित बनाएँ: फिसलने वाली सतहें हटाएँ, सीढ़ियों और बाथरूम में सहारा लगवाएँ।
  • रोज की दिनचर्या तय रखें, क्योंकि पूर्वानुमेय माहौल में रोगी कम असहज रहता है।
  • निगलने की दिक्कत हो तो भोजन नरम रखें और खाते समय सीधा बैठाएँ।
  • चिड़चिड़ापन या गुस्से पर प्रतिक्रिया देने के बजाय समझें कि यह रोग का लक्षण है, इरादतन व्यवहार नहीं।
  • देखभाल करने वाले अपने स्वास्थ्य और आराम का भी ध्यान रखें। सहायता समूहों और काउंसलिंग से सहारा मिलता है।

रोग की बढ़ी हुई अवस्था में चौबीसों घंटे देखभाल की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में पैलिएटिव केयर और विशेषज्ञ नर्सिंग सुविधाएँ उपयोगी होती हैं। रोगी की इच्छाओं के बारे में समय रहते बातचीत कर लेना और कानूनी व चिकित्सीय निर्णयों की तैयारी करना भी बेहतर रहता है।

रोग का पूर्वानुमान

लक्षण शुरू होने के बाद रोग आमतौर पर 15 से 20 वर्षों में उन्नत अवस्था तक पहुँचता है। मृत्यु का सीधा कारण अक्सर रोग की जटिलताएँ होती हैं, जैसे निमोनिया (निगलने की समस्या से), गिरने से लगी चोटें या संक्रमण। अच्छी देखभाल से जटिलताओं का जोखिम घटाया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता सुधारी जा सकती है।

अनुसंधान और भविष्य की आशा

वैज्ञानिक इस रोग के इलाज के लिए कई दिशाओं में काम कर रहे हैं। इनमें मुख्य हैं हंटिंगटिन प्रोटीन के उत्पादन को घटाने वाली “जीन-साइलेंसिंग” तकनीकें, एंटीसेंस ओलिगोन्यूक्लियोटाइड्स और जीन थेरेपी। कुछ शुरुआती परीक्षणों के नतीजे उत्साहजनक रहे हैं, हालाँकि कुछ परीक्षण बंद भी हुए हैं। ये उपचार अभी शोध के चरण में हैं और आम मरीजों के लिए सामान्य रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इस क्षेत्र में स्थिति तेजी से बदल रही है, इसलिए ताजा जानकारी के लिए न्यूरोलॉजिस्ट या अनुसंधान संस्थाओं की वेबसाइट देखना बेहतर है। क्लिनिकल ट्रायल में भाग लेने के इच्छुक रोगी अपने डॉक्टर से बात कर सकते हैं।

हर वर्ष 5 जून को वैश्विक हंटिंगटन रोग जागरूकता दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस रोग के प्रति समझ बढ़ाना और प्रभावित परिवारों को सहारा देना है।

निष्कर्ष

हंटिंगटन रोग एक जटिल आनुवंशिक रोग है, जो शरीर, मन और व्यवहार तीनों को प्रभावित करता है। भारत जैसे देशों में इसकी जानकारी और विशेषज्ञ सुविधाएँ अभी सीमित हैं, इसलिए कई मामले देर से पहचाने जाते हैं। यदि परिवार में इस रोग का इतिहास हो, या किसी व्यक्ति में अनियंत्रित हरकतें, व्यवहार-परिवर्तन और सोचने की क्षमता में गिरावट दिखे, तो न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेना जरूरी है।

अभी इसका पूर्ण इलाज नहीं है, फिर भी समय पर निदान, उचित दवाइयों, पुनर्वास, मानसिक सहयोग और परिवार के स्नेह से रोगी सम्मानजनक और सक्रिय जीवन जी सकता है। जागरूकता, संवेदनशीलता और लगातार जारी शोध ही इस रोग से लड़ने की सबसे बड़ी उम्मीद हैं।

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