सबएक्यूट स्क्लेरोजिंग पैनएन्सेफेलाइटिस (SSPE)
| |

सबएक्यूट स्क्लेरोजिंग पैनएन्सेफेलाइटिस (SSPE): एक विस्तृत जानकारी

परिचय

सबएक्यूट स्क्लेरोजिंग पैनएन्सेफेलाइटिस, जिसे संक्षेप में SSPE कहा जाता है, मस्तिष्क की एक अत्यंत दुर्लभ किंतु जानलेवा बीमारी है। यह एक प्रगतिशील (progressive) न्यूरोलॉजिकल विकार है, जो खसरा (मीज़ल्स) वायरस के संक्रमण के कारण वर्षों बाद विकसित होता है। यह बीमारी धीरे-धीरे मस्तिष्क की कोशिकाओं को नष्ट करती है, जिससे व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक क्षमताओं में क्रमिक गिरावट आती है। दुर्भाग्य से, यह बीमारी अंततः मृत्यु का कारण बनती है, और वर्तमान में इसका कोई निश्चित इलाज उपलब्ध नहीं है।

SSPE का कारण

SSPE का मुख्य कारण खसरा वायरस (measles virus) है। सामान्यतः जब कोई बच्चा खसरे से संक्रमित होता है, तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता वायरस को नष्ट कर देती है और व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। परंतु कुछ दुर्लभ मामलों में, खसरा वायरस का एक असामान्य (defective) रूप शरीर से पूरी तरह समाप्त नहीं होता। यह वायरस मस्तिष्क की कोशिकाओं में छिपा रहता है और वर्षों तक निष्क्रिय अवस्था में बना रहता है।

धीरे-धीरे यह वायरस मस्तिष्क में सक्रिय होकर तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) को संक्रमित करना शुरू कर देता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर खसरा होने के 6 से 10 वर्ष बाद शुरू होती है, हालांकि कुछ मामलों में यह अवधि कम या अधिक भी हो सकती है। जिन बच्चों को दो वर्ष की आयु से पहले खसरा हुआ हो, उनमें SSPE विकसित होने का खतरा अधिक पाया गया है।

SSPE कितना दुर्लभ है

यह बीमारी अत्यंत दुर्लभ है। अनुमान के अनुसार, प्राकृतिक रूप से खसरे से संक्रमित हर 10,000 से 1,00,000 बच्चों में से लगभग एक बच्चे में SSPE विकसित होने की संभावना होती है। जिन देशों में खसरे का टीकाकरण व्यापक रूप से नहीं हो पाया है, वहां इस बीमारी के मामले अपेक्षाकृत अधिक देखे जाते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में भी समय-समय पर SSPE के मामले सामने आते रहे हैं, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां टीकाकरण कवरेज कम रहा है।

यह बीमारी लड़कों में लड़कियों की तुलना में अधिक पाई जाती है, और ग्रामीण तथा कम आय वाले क्षेत्रों में इसका प्रकोप अधिक देखा गया है, जहां चिकित्सा सुविधाओं और टीकाकरण की पहुंच सीमित होती है।

रोग की प्रक्रिया (पैथोफिजियोलॉजी)

SSPE में वायरस मस्तिष्क की सफेद और धूसर (white and grey) दोनों प्रकार की कोशिकाओं को प्रभावित करता है। समय के साथ मस्तिष्क में सूजन (inflammation) उत्पन्न होती है, तंत्रिका कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं, और मस्तिष्क के ऊतकों में स्क्लेरोसिस यानी कठोरता आ जाती है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे पूरे मस्तिष्क (पैन-एन्सेफेलाइटिस) को अपनी चपेट में ले लेती है, जिसके कारण इस बीमारी को यह नाम दिया गया है।

लक्षण और अवस्थाएं

SSPE की प्रगति को सामान्यतः चार अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है:

पहली अवस्था

इस अवस्था में बच्चे के व्यवहार और मानसिक स्थिति में सूक्ष्म परिवर्तन दिखाई देते हैं। बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है, पढ़ाई में ध्यान कम लगने लगता है, स्कूल का प्रदर्शन गिरने लगता है, और स्मरण शक्ति कमजोर होने लगती है। कई बार इसे सामान्य व्यवहार संबंधी समस्या समझ लिया जाता है, जिससे निदान में देरी होती है।

दूसरी अवस्था

इस चरण में मायोक्लोनिक झटके (myoclonic jerks) शुरू होते हैं, जो शरीर के किसी हिस्से का अचानक, तेज और अनैच्छिक हिलना है। इसके साथ ही दौरे (seizures), चलने-फिरने में कठिनाई, बोलने में दिक्कत, और समन्वय (coordination) की समस्याएं सामने आती हैं। बुद्धि क्षमता में भी तेजी से गिरावट देखी जाती है।

तीसरी अवस्था

यह अवस्था अधिक गंभीर होती है। इसमें मांसपेशियों में कठोरता (rigidity), शरीर की मुद्रा असामान्य होना (decerebrate या decorticate posturing), निगलने में कठिनाई, और चेतना का स्तर घटने लगता है। बच्चा धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता खो देता है और उसे पूर्ण देखभाल की आवश्यकता होने लगती है।

चौथी अवस्था

यह अंतिम और सबसे गंभीर अवस्था है, जिसमें मस्तिष्क के उच्च कार्य लगभग समाप्त हो जाते हैं। रोगी कोमा जैसी स्थिति में चला जाता है, स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (autonomic nervous system) प्रभावित होता है, जिससे रक्तचाप, हृदय गति और श्वसन में गड़बड़ी होती है। अंततः यह अवस्था मृत्यु का कारण बनती है।

पूरी बीमारी सामान्यतः निदान के 1 से 3 वर्षों के भीतर घातक सिद्ध होती है, हालांकि कुछ मामलों में यह प्रक्रिया अधिक तेज या धीमी भी हो सकती है।

निदान (डायग्नोसिस)

SSPE का निदान कई जांचों के आधार पर किया जाता है:

  • इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राम (EEG): इसमें एक विशिष्ट पैटर्न दिखाई देता है, जिसे “पेरियोडिक कॉम्प्लेक्स” कहा जाता है, जो SSPE के निदान में सहायक होता है।
  • सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड (CSF) जांच: मस्तिष्कमेरु द्रव में खसरा वायरस के प्रति एंटीबॉडी का स्तर असामान्य रूप से बढ़ा हुआ पाया जाता है।
  • रक्त जांच: रक्त में भी खसरा वायरस के प्रति एंटीबॉडी का उच्च स्तर देखा जाता है।
  • MRI (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग): मस्तिष्क की संरचना में हुए परिवर्तनों और क्षति को देखने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
  • मस्तिष्क बायोप्सी: कुछ दुर्लभ मामलों में निश्चित पुष्टि के लिए यह भी की जा सकती है, हालांकि यह सामान्यतः आवश्यक नहीं होती।

उपचार

दुर्भाग्यवश, SSPE का कोई निश्चित और प्रभावी इलाज अभी तक उपलब्ध नहीं है। उपचार का मुख्य उद्देश्य रोग की गति को धीमा करना और रोगी के लक्षणों को नियंत्रित करना होता है। इसके लिए निम्नलिखित तरीके अपनाए जाते हैं:

  • एंटीवायरल दवाएं: आइसोप्रिनोसिन (isoprinosine) और इंटरफेरॉन-अल्फा जैसी दवाओं का उपयोग कुछ मामलों में रोग की प्रगति को धीमा करने के लिए किया जाता है, हालांकि इनकी प्रभावशीलता सीमित है।
  • एंटी-एपिलेप्टिक दवाएं: दौरों और मायोक्लोनिक झटकों को नियंत्रित करने के लिए दी जाती हैं।
  • सहायक देखभाल (सपोर्टिव केयर): पोषण, फिजियोथेरेपी, संक्रमण से बचाव, और सामान्य देखभाल पर विशेष ध्यान दिया जाता है, ताकि रोगी को यथासंभव आराम मिल सके।

चूंकि यह बीमारी अंततः जानलेवा सिद्ध होती है, इसलिए परिवार को मानसिक और भावनात्मक सहयोग देना भी उपचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

रोकथाम

SSPE की सबसे प्रभावी और महत्वपूर्ण रोकथाम खसरे के टीकाकरण में निहित है। चूंकि SSPE खसरे के संक्रमण के बाद ही उत्पन्न होता है, इसलिए खसरे को रोककर इस बीमारी को भी रोका जा सकता है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जाने चाहिए:

  • सभी बच्चों को निर्धारित आयु पर MMR (मीज़ल्स, मम्प्स, रूबेला) का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।
  • टीकाकरण की दोनों खुराकें समय पर पूरी करनी चाहिए।
  • जिन क्षेत्रों में टीकाकरण की दर कम है, वहां जागरूकता अभियान चलाकर टीकाकरण को बढ़ावा देना चाहिए।
  • गर्भवती महिलाओं और शिशुओं में खसरे के संक्रमण से बचाव के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विभिन्न देशों के स्वास्थ्य विभाग खसरा उन्मूलन कार्यक्रमों के माध्यम से इस बीमारी को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। जिन देशों में टीकाकरण कवरेज अधिक हो गया है, वहां SSPE के मामलों में उल्लेखनीय कमी देखी गई है।

पूर्वानुमान (प्रोग्नोसिस)

SSPE का पूर्वानुमान अत्यंत खराब माना जाता है। यह एक प्रगतिशील बीमारी है, जिसमें रोगी की स्थिति समय के साथ लगातार बिगड़ती जाती है। अधिकांश मामलों में निदान के कुछ महीनों से लेकर 1-3 वर्षों के भीतर मृत्यु हो जाती है। कुछ अत्यंत दुर्लभ मामलों में रोग की प्रगति धीमी होती है और रोगी लंबे समय तक जीवित रह सकता है, परंतु ऐसे मामले बहुत कम हैं।

निष्कर्ष

सबएक्यूट स्क्लेरोजिंग पैनएन्सेफेलाइटिस एक ऐसी बीमारी है, जो खसरे के संक्रमण के दीर्घकालिक और गंभीर दुष्परिणाम को दर्शाती है। यह बीमारी न केवल रोगी के लिए, बल्कि उसके परिवार के लिए भी अत्यंत कष्टदायक होती है, क्योंकि इसका कोई प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं है। इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि रोकथाम ही सबसे बेहतर उपाय है। समय पर और पूर्ण टीकाकरण के माध्यम से खसरे को रोककर SSPE जैसी घातक बीमारी से बचा जा सकता है। इसलिए सभी माता-पिता को अपने बच्चों का टीकाकरण समय पर पूरा करवाना चाहिए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से बचाव किया जा सके।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *