रिएक्टिव अर्थराइटिस (Reactive Arthritis / Reiter's Syndrome)
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रिएक्टिव अर्थराइटिस (Reactive Arthritis / Reiter’s Syndrome): कारण, लक्षण और इलाज

परिचय

रिएक्टिव अर्थराइटिस जोड़ों की एक सूजन संबंधी बीमारी है, जो शरीर के किसी अन्य हिस्से में हुए संक्रमण के बाद शुरू होती है। सबसे खास बात यह है कि जोड़ों में स्वयं कोई कीटाणु मौजूद नहीं होता। संक्रमण आमतौर पर आंतों, मूत्र मार्ग या जननांगों में होता है, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया में शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली जोड़ों पर हमला करने लगती है। इसी कारण इसे “रिएक्टिव” यानी प्रतिक्रियात्मक गठिया कहा जाता है।

पहले इस बीमारी को “रीटर्स सिंड्रोम” (Reiter’s Syndrome) कहा जाता था। यह नाम जर्मन चिकित्सक हैंस रीटर के नाम पर था। चूँकि उनका संबंध नाज़ी काल के अमानवीय चिकित्सा प्रयोगों से पाया गया, इसलिए अब चिकित्सा जगत में इस नाम का प्रयोग बंद कर दिया गया है और “रिएक्टिव अर्थराइटिस” नाम को ही अपनाया गया है।

यह बीमारी स्पॉन्डिलोअर्थ्रोपैथी (Spondyloarthropathy) नामक रोगों के समूह में आती है। इस समूह में एंकाइलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस और सोरायटिक अर्थराइटिस जैसी बीमारियाँ भी शामिल हैं।

रिएक्टिव अर्थराइटिस क्या है?

जब शरीर में कोई बैक्टीरियल संक्रमण होता है, तो प्रतिरोधक प्रणाली उससे लड़ती है। कुछ लोगों में संक्रमण ठीक हो जाने के बाद भी यह प्रणाली अति-सक्रिय रहती है और अपने ही स्वस्थ ऊतकों, खासकर जोड़ों, आँखों और त्वचा को नुकसान पहुँचाने लगती है। इससे जोड़ों में दर्द, सूजन और जकड़न होती है।

यह बीमारी अक्सर संक्रमण के 1 से 4 सप्ताह बाद प्रकट होती है। यह 20 से 40 वर्ष की उम्र के युवाओं में अधिक देखी जाती है और पुरुषों में महिलाओं की तुलना में अधिक आम है। हालाँकि बच्चों और बुजुर्गों में भी यह हो सकती है।

कारण

1. संक्रमण

रिएक्टिव अर्थराइटिस मुख्यतः दो प्रकार के संक्रमणों के बाद होती है:

जननांग-मूत्र मार्ग का संक्रमण: क्लैमिडिया ट्रैकोमैटिस (Chlamydia trachomatis) नामक बैक्टीरिया इसका सबसे प्रमुख कारण है। यह यौन संपर्क से फैलता है और कई बार बिना किसी लक्षण के भी मौजूद रहता है।

आंतों का संक्रमण: दूषित भोजन या पानी से होने वाले संक्रमण, जैसे साल्मोनेला, शिगेला, यर्सिनिया और कैम्पिलोबैक्टर, के बाद भी यह रोग हो सकता है। भारत जैसे देशों में, जहाँ पेट के संक्रमण आम हैं, इस पहलू को समझना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

2. आनुवंशिक कारण

HLA-B27 नामक जीन इस रोग से गहराई से जुड़ा है। लगभग 30 से 50 प्रतिशत रोगियों में यह जीन पाया जाता है। इसका मतलब यह है कि इस जीन वाले व्यक्ति में रोग की संभावना और गंभीरता अधिक हो सकती है। लेकिन यह जान लेना जरूरी है कि यह जीन होने का अर्थ यह नहीं कि बीमारी अवश्य होगी। बहुत से लोगों में यह जीन होता है और उन्हें कभी यह रोग नहीं होता।

लक्षण

रिएक्टिव अर्थराइटिस के लक्षण शरीर के कई अंगों में दिखाई दे सकते हैं। सभी रोगियों में सभी लक्षण हों, यह आवश्यक नहीं है।

जोड़ों के लक्षण

  • घुटनों, टखनों और पैरों के जोड़ों में दर्द और सूजन, जो सबसे आम लक्षण है
  • अक्सर शरीर के एक तरफ के या कुछ ही जोड़ प्रभावित होते हैं
  • सुबह के समय जकड़न, जो हिलने-डुलने से कुछ कम होती है
  • पीठ के निचले हिस्से में दर्द
  • एड़ी के पीछे या तलवे में दर्द (एन्थेसाइटिस), जो सुबह पहला कदम रखने पर अधिक होता है
  • उंगलियों या अंगूठों का सॉसेज की तरह सूज जाना (डैक्टिलाइटिस)

आँखों के लक्षण

  • आँखों में लालिमा, जलन और खुजली (कंजंक्टिवाइटिस)
  • तेज रोशनी से परेशानी और धुंधला दिखना (यूवाइटिस)

आँखों की सूजन को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, क्योंकि यूवाइटिस का इलाज न होने पर दृष्टि को नुकसान पहुँच सकता है।

मूत्र और जननांग संबंधी लक्षण

  • पेशाब करते समय जलन या दर्द
  • बार-बार पेशाब आना
  • पुरुषों में प्रोस्टेट की सूजन और लिंग के सिरे पर सूजन
  • महिलाओं में गर्भाशय-ग्रीवा या मूत्र मार्ग में सूजन

त्वचा और मुँह के लक्षण

  • हथेलियों और तलवों पर पपड़ीदार दाने (केराटोडर्मा ब्लेनोरेजिकम)
  • मुँह में दर्द रहित छाले
  • नाखूनों का मोटा होना या उनमें बदलाव

सामान्य लक्षण

  • हल्का बुखार
  • थकान और कमजोरी
  • वजन में कमी

निदान (जाँच)

रिएक्टिव अर्थराइटिस के लिए कोई एक निश्चित जाँच नहीं है। डॉक्टर मरीज के इतिहास, लक्षणों और जाँच रिपोर्टों के आधार पर निदान करते हैं। इसके लिए आमतौर पर रुमेटोलॉजिस्ट (जोड़ों और गठिया रोगों के विशेषज्ञ) से परामर्श लिया जाता है।

शारीरिक जाँच: डॉक्टर जोड़ों की सूजन, आँखों और त्वचा की जाँच करते हैं और हाल के संक्रमण के बारे में पूछते हैं।

रक्त जाँच: ESR और CRP से शरीर में सूजन का स्तर पता चलता है। HLA-B27 की जाँच भी की जा सकती है। रुमेटॉइड फैक्टर और एंटी-CCP जाँच से रुमेटॉइड अर्थराइटिस को अलग करने में मदद मिलती है।

संक्रमण की जाँच: मूत्र, जननांग स्राव या मल की जाँच से क्लैमिडिया या आंतों के बैक्टीरिया का पता लगाया जा सकता है।

जोड़ के द्रव की जाँच: सूजे हुए जोड़ से थोड़ा द्रव निकालकर जाँचा जाता है, ताकि गाउट या जोड़ के संक्रमण जैसी अन्य स्थितियों को अलग किया जा सके।

इमेजिंग: एक्स-रे और कभी-कभी MRI से जोड़ों और रीढ़ की स्थिति देखी जाती है।

इलाज

इलाज का उद्देश्य संक्रमण को खत्म करना, सूजन और दर्द को कम करना और जोड़ों को स्थायी नुकसान से बचाना है। इलाज हमेशा योग्य डॉक्टर की देखरेख में ही होना चाहिए।

1. संक्रमण का इलाज

यदि जाँच में संक्रमण सक्रिय पाया जाए, तो डॉक्टर एंटीबायोटिक दवाएँ देते हैं। क्लैमिडिया के मामले में यौन साथी का भी इलाज जरूरी होता है, ताकि संक्रमण दोबारा न फैले। ध्यान रहे कि एंटीबायोटिक संक्रमण को ठीक करती हैं, पर जोड़ों की सूजन पर उनका सीधा असर सीमित होता है।

2. दर्द और सूजन की दवाएँ

  • NSAIDs (नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएँ): जैसे इबुप्रोफेन, नेप्रोक्सेन और इंडोमेथासिन, जो दर्द और सूजन में राहत देती हैं। इन्हें डॉक्टर की सलाह से ही लें, क्योंकि लंबे समय तक इनके सेवन से पेट और गुर्दे पर असर पड़ सकता है।
  • स्टेरॉयड इंजेक्शन: किसी विशेष सूजे हुए जोड़ में सीधे लगाया जा सकता है।
  • स्टेरॉयड क्रीम या आई ड्रॉप: त्वचा के दानों और आँखों की सूजन के लिए।

3. रोग-संशोधक दवाएँ (DMARDs)

जिन रोगियों में लक्षण लंबे समय तक बने रहें या गंभीर हों, उनमें सल्फासालाज़ीन या मेथोट्रेक्सेट जैसी दवाएँ दी जाती हैं। ये प्रतिरोधक प्रणाली की अति-सक्रियता को नियंत्रित करती हैं।

4. बायोलॉजिक दवाएँ

बहुत जिद्दी मामलों में, जब अन्य दवाएँ काम न करें, तो TNF-अवरोधक जैसी बायोलॉजिक दवाओं का उपयोग किया जा सकता है। ये विशेषज्ञ की निगरानी में ही दी जाती हैं।

5. फिजियोथेरेपी और व्यायाम

फिजियोथेरेपी जोड़ों की गतिशीलता बनाए रखने और मांसपेशियों को मजबूत करने में सहायक है। हल्के स्ट्रेचिंग व्यायाम, तैराकी और टहलना लाभदायक हैं। तीव्र सूजन के दौरान प्रभावित जोड़ को आराम देना चाहिए, पर लंबे समय तक बिल्कुल निष्क्रिय रहना जकड़न बढ़ा सकता है।

घरेलू देखभाल और जीवनशैली

  • सूजे हुए जोड़ पर ठंडी सिकाई से सूजन में राहत मिलती है, जबकि जकड़न के लिए गर्म सिकाई उपयोगी हो सकती है।
  • संतुलित आहार लें, जिसमें फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज और ओमेगा-3 युक्त खाद्य पदार्थ (जैसे अलसी और अखरोट) शामिल हों।
  • धूम्रपान से बचें, क्योंकि यह सूजन संबंधी रोगों को बिगाड़ सकता है।
  • शराब का सेवन सीमित रखें या बंद करें।
  • स्वस्थ वजन बनाए रखें, ताकि घुटनों और टखनों पर दबाव कम रहे।
  • पर्याप्त नींद लें और तनाव कम करने के लिए योग या ध्यान करें।

रोकथाम

चूँकि यह रोग संक्रमण के बाद होता है, इसलिए संक्रमण से बचाव ही सबसे अच्छा उपाय है।

  • सुरक्षित यौन संबंध: कंडोम का उपयोग करें और एक से अधिक यौन साथी होने की स्थिति में समय-समय पर जाँच कराएँ।
  • स्वच्छ भोजन और पानी: हमेशा साफ पानी पिएँ, भोजन को अच्छी तरह पकाएँ और बाहर के कच्चे या बासी भोजन से बचें।
  • हाथों की सफाई: खाने से पहले और शौचालय के बाद हाथ अच्छी तरह धोएँ।
  • समय पर इलाज: पेशाब में जलन या दस्त जैसे संक्रमण के लक्षणों को अनदेखा न करें और तुरंत इलाज करवाएँ।

जटिलताएँ

अधिकांश रोगियों में यह बीमारी 3 से 12 महीने में ठीक हो जाती है। लेकिन कुछ लोगों में:

  • लक्षण बार-बार लौट सकते हैं
  • जोड़ों का दर्द वर्षों तक बना रह सकता है और क्रॉनिक अर्थराइटिस का रूप ले सकता है
  • रीढ़ के जोड़ प्रभावित होकर स्पॉन्डिलाइटिस हो सकता है
  • आँखों की बार-बार सूजन से दृष्टि प्रभावित हो सकती है

इसलिए समय पर निदान और नियमित फॉलो-अप जरूरी है।

डॉक्टर से कब मिलें?

निम्नलिखित स्थितियों में बिना देरी किए चिकित्सक से संपर्क करें:

  • किसी संक्रमण (पेशाब में जलन या दस्त) के कुछ हफ्तों बाद जोड़ों में दर्द और सूजन शुरू हो
  • आँखों में लालिमा के साथ दर्द या धुंधलापन हो
  • जोड़ों की सूजन कई दिनों तक बनी रहे
  • सुबह की जकड़न आधे घंटे से अधिक रहे
  • चलने-फिरने में परेशानी होने लगे

निष्कर्ष

रिएक्टिव अर्थराइटिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर के किसी हिस्से का संक्रमण जोड़ों, आँखों और त्वचा में सूजन पैदा कर देता है। इसके लक्षण कई अंगों में बिखरे होने के कारण कभी-कभी इसकी पहचान में देरी हो जाती है। अच्छी बात यह है कि सही समय पर निदान और उचित इलाज से अधिकांश लोग पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। संक्रमण से बचाव, स्वच्छता, सुरक्षित यौन व्यवहार और लक्षण दिखते ही विशेषज्ञ से परामर्श इस रोग से बचने और इसे नियंत्रित करने की कुंजी है।

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