पर्टेजियम (आंख में मांस बढ़ना): कारण, लक्षण, इलाज और बचाव
परिचय
कई बार आईने में देखने पर आंख के सफेद हिस्से पर एक गुलाबी या लालिमा लिए हुए त्रिकोणाकार मांस जैसी परत दिखाई देती है, जो धीरे-धीरे काली पुतली (कॉर्निया) की ओर बढ़ती है। आम बोलचाल में इसे “आंख का जाला”, “आंख में मांस बढ़ना” या “नाखूना” कहा जाता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे पर्टेजियम (Pterygium) कहते हैं।
यह समस्या खासकर धूप, धूल और हवा वाले इलाकों में रहने वाले लोगों में अधिक दिखती है। भारत में गुजरात, राजस्थान और अन्य गर्म और शुष्क क्षेत्रों में यह काफी आम है। अधिकतर मामलों में यह कैंसर नहीं होता, लेकिन अनदेखा करने पर यह दृष्टि को प्रभावित कर सकता है।
पर्टेजियम क्या है?
आंख के सफेद भाग (स्क्लेरा) और पलकों के अंदरूनी हिस्से को ढकने वाली पतली पारदर्शी झिल्ली को कंजंक्टाइवा कहते हैं। जब इस झिल्ली के ऊतक असामान्य रूप से बढ़कर कॉर्निया के ऊपर फैलने लगते हैं, तो उसे पर्टेजियम कहा जाता है।
यह वृद्धि अक्सर आंख के भीतरी कोने (नाक की तरफ) से शुरू होती है, हालांकि कभी-कभी बाहरी कोने से भी हो सकती है। यह एक आंख में हो सकता है और दोनों आंखों में भी। इसका आकार पंख या त्रिकोण जैसा होता है, इसलिए इसे “विंग्ड ग्रोथ” भी कहा जाता है।
इससे मिलती-जुलती एक स्थिति पिंग्वेकुला (Pinguecula) है। इसमें आंख के सफेद हिस्से पर पीले-सफेद रंग का छोटा उभार बनता है, पर वह कॉर्निया तक नहीं फैलता। कुछ मामलों में पिंग्वेकुला आगे चलकर पर्टेजियम बन सकता है।
पर्टेजियम के प्रमुख कारण
पर्टेजियम का सटीक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन शोध बताते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण पराबैंगनी (UV) किरणों का लंबे समय तक संपर्क है। इसके अन्य कारण और जोखिम कारक ये हैं:
- तेज धूप में अधिक समय बिताना: खुले में काम करने वाले किसान, मजदूर, ड्राइवर, मछुआरे, निर्माण कार्य से जुड़े लोग और खिलाड़ी अधिक जोखिम में रहते हैं।
- धूल, धुआं और हवा: रेतीले और सूखे इलाकों में रहने से आंख की सतह बार-बार चिड़चिड़ाती है।
- आंखों का सूखापन: ड्राई आई की समस्या होने पर आंख की सतह कमजोर रहती है।
- रासायनिक धुएं या एलर्जी के संपर्क में रहना: फैक्ट्रियों और कारखानों में काम करने वालों में जोखिम बढ़ जाता है।
- उम्र: यह समस्या 20 से 50 वर्ष की उम्र के बीच अधिक देखी जाती है।
- पुरुषों में अधिक आम: इसका एक कारण बाहरी कामों में उनकी अधिक भागीदारी माना जाता है।
- आनुवंशिक कारण: कुछ परिवारों में यह समस्या एक से अधिक सदस्यों में दिख सकती है।
- भूमध्य रेखा के निकट रहना: जहां UV विकिरण अधिक होता है, वहां मामले ज्यादा मिलते हैं।
पर्टेजियम के लक्षण
शुरुआती अवस्था में कई बार कोई खास तकलीफ नहीं होती और केवल कोने पर हल्की लालिमा या उभार दिखता है। जैसे-जैसे वृद्धि बढ़ती है, ये लक्षण सामने आ सकते हैं:
- आंख के सफेद हिस्से पर गुलाबी या लाल मांसल उभार
- आंख में लगातार लालिमा, खासकर धूप या हवा में
- जलन, खुजली और चुभन
- आंख में कुछ पड़े होने जैसा एहसास (किरकिरी)
- आंख से पानी आना
- आंख का सूखापन
- धुंधला दिखाई देना
- वृद्धि के पुतली के बीच तक पहुंचने पर दृष्टि में गंभीर कमी
- कॉन्टैक्ट लेंस पहनने में कठिनाई
- सौंदर्य संबंधी चिंता, क्योंकि आंख की बनावट बदली हुई दिखती है
पर्टेजियम का असर दृष्टि पर कैसे पड़ता है?
जब यह वृद्धि कॉर्निया पर फैलती है, तो वह कॉर्निया की सतह का आकार बदल देती है। इससे अनियमित दृष्टिवैषम्य (Astigmatism) हो जाता है और चश्मे का नंबर बदलने लगता है। यदि मांस पुतली के ठीक सामने आ जाए, तो प्रकाश रेटिना तक पहुंचने में बाधा होती है और दृष्टि काफी कम हो सकती है। इसलिए नियमित जांच जरूरी है।
निदान: डॉक्टर कैसे जांच करते हैं?
पर्टेजियम की पहचान आमतौर पर नेत्र रोग विशेषज्ञ द्वारा आसानी से हो जाती है। जांच में शामिल हो सकते हैं:
- स्लिट लैंप जांच: इस विशेष माइक्रोस्कोप से आंख की सतह को बड़ा करके देखा जाता है।
- विज़ुअल एक्विटी टेस्ट: यह देखने की क्षमता नापता है।
- कॉर्नियल टोपोग्राफी: इससे पता चलता है कि कॉर्निया की सतह कितनी बदली है।
- वृद्धि की माप: वृद्धि का आकार और उसका प्रसार दर्ज किया जाता है, ताकि समय के साथ बदलाव की तुलना हो सके।
यदि वृद्धि का रूप असामान्य लगे, जैसे बहुत तेजी से बढ़ना या असामान्य रंग, तो डॉक्टर बायोप्सी की सलाह दे सकते हैं।
उपचार के विकल्प
1. शुरुआती अवस्था में दवाओं से राहत
यदि वृद्धि छोटी है और दृष्टि को प्रभावित नहीं कर रही, तो डॉक्टर निगरानी के साथ ये उपाय सुझा सकते हैं:
- लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स (कृत्रिम आंसू): सूखापन और किरकिरी कम करने के लिए
- सूजन-रोधी या स्टेरॉयड आई ड्रॉप्स: लालिमा और सूजन बढ़ने पर, केवल डॉक्टर की सलाह से और सीमित अवधि के लिए
- एंटी-एलर्जिक ड्रॉप्स: यदि एलर्जी का पहलू हो
ध्यान रखें, दवाएं केवल लक्षणों से राहत देती हैं। वे बढ़े हुए मांस को खत्म नहीं करतीं। बिना सलाह के स्टेरॉयड ड्रॉप्स का उपयोग मोतियाबिंद और काला मोतिया (ग्लूकोमा) जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है।
2. सर्जरी
सर्जरी तब सुझाई जाती है जब:
- वृद्धि कॉर्निया पर तेजी से बढ़ रही हो
- दृष्टि प्रभावित हो रही हो या पुतली के पास पहुंच रही हो
- दवाओं से आराम न मिल रहा हो
- आंख बार-बार लाल और चिड़चिड़ी रहती हो
- सौंदर्य या अन्य कारणों से मरीज निकलवाना चाहता हो
सर्जरी की प्रक्रिया: यह आमतौर पर डे-केयर प्रक्रिया है, जो स्थानीय निश्चेतना (आंख को सुन्न करने वाली दवा) देकर की जाती है और लगभग 20 से 30 मिनट लेती है। डॉक्टर मांस की वृद्धि को हटाते हैं।
सिर्फ मांस काटने से यह दोबारा बढ़ने की संभावना बहुत अधिक रहती है। इसलिए आजकल कंजंक्टिवल ऑटोग्राफ्ट तकनीक अपनाई जाती है। इसमें मरीज की अपनी ही आंख के ऊपरी हिस्से से एक पतली स्वस्थ झिल्ली लेकर खाली जगह पर लगाई जाती है। इसे टांकों या मेडिकल ग्लू (फाइब्रिन ग्लू) से जोड़ा जाता है। इस विधि में पुनरावृत्ति की दर काफी घट जाती है। कुछ मामलों में अम्नियोटिक मेम्ब्रेन ग्राफ्ट या सहायक दवा का भी उपयोग किया जाता है, जिसका निर्णय सर्जन करते हैं।
सर्जरी के बाद देखभाल
- डॉक्टर द्वारा दी गई आई ड्रॉप्स और दवाएं समय पर और पूरी अवधि तक डालें।
- आंख को रगड़ें या दबाएं नहीं।
- शुरुआती दिनों में आंख को धूल, धुएं और पानी के छींटों से बचाएं।
- बाहर निकलते समय UV सुरक्षा वाला धूप का चश्मा जरूर पहनें।
- शुरुआती कुछ दिनों में हल्की लालिमा, पानी आना और चुभन सामान्य है, जो धीरे-धीरे ठीक होती है।
- फॉलो-अप जांच के लिए तय समय पर डॉक्टर के पास जाएं।
पूरी तरह ठीक होने में सामान्यतः कुछ हफ्ते लग सकते हैं। यह व्यक्ति और सर्जरी की तकनीक पर निर्भर करता है।
क्या पर्टेजियम दोबारा हो सकता है?
हां, कुछ मामलों में पर्टेजियम सर्जरी के बाद दोबारा बढ़ सकता है। युवा मरीजों में और तेज धूप-धूल के संपर्क में रहने वालों में इसकी संभावना अधिक होती है। आधुनिक ग्राफ्ट तकनीकों से यह जोखिम काफी कम हो गया है, पर पूरी तरह खत्म नहीं होता। इसी कारण सर्जरी के बाद भी आंखों की सुरक्षा बनाए रखना जरूरी है।
बचाव के उपाय
पर्टेजियम से बचाव का मूल मंत्र है आंखों को UV किरणों, धूल और हवा से बचाना:
- UV प्रोटेक्शन वाला धूप का चश्मा पहनें, जो UVA और UVB दोनों किरणों को रोके। रैप-अराउंड डिज़ाइन बेहतर रहता है।
- चौड़ी किनारी वाली टोपी पहनें।
- दोपहर की तेज धूप में (लगभग 11 से 3 बजे के बीच) बाहर कम निकलें।
- धूल भरे इलाकों या निर्माण स्थलों पर सुरक्षात्मक चश्मे का उपयोग करें।
- आंखों को सूखा न रहने दें। जरूरत हो तो डॉक्टर की सलाह से कृत्रिम आंसू की बूंदें डालें।
- आंखों को बार-बार रगड़ने से बचें।
- धूम्रपान और धुएं से दूरी रखें।
- नियमित नेत्र जांच कराएं, खासकर यदि आप बाहर काम करते हैं।
- बच्चों को भी बचपन से धूप का चश्मा और टोपी पहनने की आदत डालें।
आम भ्रांतियां
भ्रांति 1: यह आंख का कैंसर है।
सच्चाई: पर्टेजियम आमतौर पर सौम्य (नॉन-कैंसरस) वृद्धि है।
भ्रांति 2: आई ड्रॉप से मांस घुल जाएगा।
सच्चाई: कोई भी आई ड्रॉप बढ़े हुए मांस को खत्म नहीं कर सकती। दवाएं केवल लक्षणों में राहत देती हैं।
भ्रांति 3: घरेलू नुस्खे या देसी उपचार से यह ठीक हो जाता है।
सच्चाई: आंख में शहद, गुलाब जल, घी, दूध जैसी चीजें या अन्य घरेलू नुस्खे डालना संक्रमण और नुकसान का खतरा बढ़ा सकता है। ऐसा न करें।
भ्रांति 4: सर्जरी से आंखों की रोशनी चली जाती है।
सच्चाई: अनुभवी नेत्र सर्जन द्वारा की गई सर्जरी आमतौर पर सुरक्षित होती है और दृष्टि सुधारने में मदद करती है।
डॉक्टर से कब मिलें?
यदि इनमें से कोई भी स्थिति हो तो नेत्र रोग विशेषज्ञ से जल्द मिलें:
- आंख में मांस जैसी वृद्धि दिखाई दे
- वृद्धि तेजी से बढ़ती लगे
- धुंधला दिखने लगे या चश्मे का नंबर अचानक बदले
- आंख में लगातार लालिमा, दर्द या जलन रहे
- आंख से असामान्य स्राव निकले
निष्कर्ष
पर्टेजियम एक आम और अधिकांशतः सौम्य नेत्र समस्या है, जो मुख्य रूप से धूप, धूल और हवा के लंबे संपर्क से होती है। शुरुआती अवस्था में लुब्रिकेटिंग ड्रॉप्स और सावधानी से नियंत्रण संभव है, जबकि बढ़ी हुई स्थिति में सर्जरी प्रभावी समाधान देती है। समय पर जांच, उचित इलाज और आंखों की सुरक्षा से दृष्टि को स्वस्थ रखा जा सकता है।
