फेनिलकेटोन्यूरिया (PKU)
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फेनिलकेटोन्यूरिया (PKU): एक दुर्लभ लेकिन पूरी तरह संभाले जा सकने वाला आनुवंशिक रोग

परिचय

कल्पना कीजिए कि एक नवजात शिशु जन्म के समय बिल्कुल स्वस्थ दिखता है। उसे कोई तकलीफ नहीं है और वह सामान्य रूप से दूध पी रहा है। फिर भी उसके शरीर के भीतर एक खामोश प्रक्रिया चल रही होती है, जो समय रहते न पहचानी जाए तो उसके मस्तिष्क को स्थायी नुकसान पहुँचा सकती है। फेनिलकेटोन्यूरिया, जिसे संक्षेप में PKU कहा जाता है, ऐसी ही एक स्थिति है।

अच्छी बात यह है कि PKU उन गिने-चुने आनुवंशिक रोगों में से है जिनकी जाँच जन्म के कुछ ही दिनों में हो सकती है और जिनका प्रभावी प्रबंधन संभव है। जिन बच्चों की पहचान जल्दी हो जाती है और जो जीवन भर सही आहार और उपचार का पालन करते हैं, वे सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

PKU क्या है?

PKU एक जन्मजात चयापचय रोग (inborn error of metabolism) है। हम जो प्रोटीन खाते हैं, वह अमीनो एसिड नामक छोटी इकाइयों में टूटता है। फेनिलएलानिन (Phenylalanine) इन्हीं में से एक आवश्यक अमीनो एसिड है। यह दूध, अंडे, मांस, दालों और मेवों जैसे लगभग सभी प्रोटीन-युक्त खाद्य पदार्थों में पाया जाता है।

सामान्य स्थिति में हमारे यकृत (लिवर) में मौजूद एक एंजाइम, फेनिलएलानिन हाइड्रॉक्सिलेज़ (PAH), फेनिलएलानिन को टायरोसिन नामक दूसरे अमीनो एसिड में बदल देता है। PKU में यह एंजाइम या तो बिल्कुल काम नहीं करता या बहुत कम काम करता है। नतीजतन फेनिलएलानिन शरीर में टूट नहीं पाता और रक्त तथा मस्तिष्क में जमा होने लगता है। इसका ऊँचा स्तर मस्तिष्क की कोशिकाओं के लिए विषैला होता है।

कारण: जीन और आनुवंशिकता

PKU का कारण PAH जीन में उत्परिवर्तन (mutation) है, जो गुणसूत्र संख्या 12 पर स्थित होता है। यह रोग ऑटोसोमल रिसेसिव (autosomal recessive) तरीके से विरासत में मिलता है। इसका अर्थ है:

  • बच्चे को रोग तभी होता है जब उसे माता और पिता, दोनों से दोषपूर्ण जीन की एक-एक प्रति मिले।
  • जिन माता-पिता में जीन की केवल एक दोषपूर्ण प्रति होती है, उन्हें “वाहक” (carrier) कहते हैं। उनमें आमतौर पर कोई लक्षण नहीं होते और उन्हें अपनी स्थिति का पता भी नहीं होता।
  • यदि दोनों माता-पिता वाहक हों, तो हर गर्भावस्था में बच्चे के PKU से ग्रस्त होने की संभावना 25%, वाहक होने की 50% और पूरी तरह अप्रभावित होने की 25% होती है।

रिश्तेदारों के बीच विवाह (consanguineous marriage) में दोनों के वाहक होने की संभावना अधिक रहती है, इसलिए ऐसे परिवारों में इस रोग का जोखिम बढ़ जाता है।

PKU के प्रकार

  • क्लासिक PKU: सबसे गंभीर रूप। इसमें एंजाइम की गतिविधि लगभग शून्य होती है और रक्त में फेनिलएलानिन का स्तर बहुत ऊँचा रहता है।
  • हल्का या मध्यम PKU: इसमें एंजाइम कुछ मात्रा में काम करता है, इसलिए स्तर अपेक्षाकृत कम बढ़ता है।
  • हल्की हाइपरफेनिलएलानिनेमिया: इसमें स्तर थोड़ा ही बढ़ता है। कई मामलों में सख्त आहार की जरूरत नहीं पड़ती, पर निगरानी आवश्यक है।
  • BH4 की कमी: कुछ दुर्लभ मामलों में PAH एंजाइम ठीक होता है, पर उसके काम के लिए जरूरी सहकारक टेट्राहाइड्रोबायोप्टेरिन (BH4) की कमी होती है। इसका उपचार अलग होता है, इसलिए निदान के समय इसकी जाँच जरूरी है।

लक्षण

जन्म के समय शिशु सामान्य दिखता है। यदि रोग की पहचान और उपचार न हो, तो कुछ महीनों में लक्षण उभरने लगते हैं:

  • विकास में देरी और सीखने की क्षमता में कमी
  • बौद्धिक अक्षमता, जो समय के साथ गंभीर हो सकती है
  • दौरे (seizures)
  • अतिसक्रियता, चिड़चिड़ापन और व्यवहार संबंधी समस्याएँ
  • त्वचा पर एक्जिमा या चकत्ते
  • त्वचा, बाल और आँखों का सामान्य से हल्का रंग, क्योंकि टायरोसिन की कमी से मेलेनिन कम बनता है
  • सिर का सामान्य से छोटा आकार (माइक्रोसेफली)
  • पसीने और मूत्र से सीलन या चूहे जैसी विशिष्ट गंध, जो फेनिलएसिटिक एसिड के कारण आती है

बड़े बच्चों और वयस्कों में, जिनका उपचार ठीक से नहीं हुआ, एकाग्रता की कमी, चिंता, अवसाद और कार्यकारी क्षमता (executive function) में कठिनाई देखी जा सकती है।

निदान: नवजात स्क्रीनिंग का महत्व

PKU की पहचान का सबसे प्रभावी तरीका नवजात शिशु की स्क्रीनिंग है। शिशु के जन्म के 24 से 72 घंटे बाद, जब वह माँ का दूध पी चुका हो, उसकी एड़ी से रक्त की कुछ बूँदें ली जाती हैं और विशेष कागज पर सुखाकर प्रयोगशाला भेजी जाती हैं। वहाँ रक्त में फेनिलएलानिन का स्तर मापा जाता है। आजकल यह जाँच अक्सर टैंडेम मास स्पेक्ट्रोमेट्री जैसी उन्नत तकनीक से होती है।

यदि स्क्रीनिंग में स्तर ऊँचा मिले, तो पुष्टि के लिए दोबारा रक्त परीक्षण, BH4 संबंधी जाँच और आवश्यकता पड़ने पर PAH जीन का आनुवंशिक परीक्षण किया जाता है। उपचार जितनी जल्दी, आदर्श रूप से जन्म के पहले कुछ हफ्तों में, शुरू हो, परिणाम उतने ही बेहतर होते हैं।

उपचार और प्रबंधन

PKU का मुख्य उपचार आहार-नियंत्रण है, जो जीवन भर चलता है। साथ में कुछ दवाएँ भी उपलब्ध हैं।

1. फेनिलएलानिन-सीमित आहार

लक्ष्य रक्त में फेनिलएलानिन का स्तर सुरक्षित सीमा में रखना है। दुनिया भर के दिशानिर्देश आमतौर पर लगभग 120 से 360 माइक्रोमोल प्रति लीटर (लगभग 2 से 6 मिग्रा/डेसीलीटर) का लक्ष्य रखते हैं। सही लक्ष्य डॉक्टर और आहार विशेषज्ञ हर व्यक्ति के लिए तय करते हैं।

सीमित या बंद किए जाने वाले खाद्य पदार्थ:

  • मांस, मछली, अंडे
  • दूध, दही, पनीर और अन्य डेयरी उत्पाद
  • दालें, राजमा, चना, सोयाबीन और उससे बने उत्पाद
  • मेवे और बीज
  • एस्पार्टेम युक्त उत्पाद, जैसे शुगर-फ्री मिठाइयाँ, डाइट ड्रिंक और कुछ च्युइंग गम, क्योंकि एस्पार्टेम में फेनिलएलानिन होता है

अपेक्षाकृत सुरक्षित खाद्य पदार्थ (मात्रा विशेषज्ञ की सलाह से):

  • अधिकांश फल और कम प्रोटीन वाली सब्जियाँ
  • विशेष रूप से तैयार कम-प्रोटीन वाली रोटी, पास्ता और चावल जैसे उत्पाद
  • घी, तेल, चीनी और स्टार्च आधारित चीजें

2. विशेष चिकित्सीय फॉर्मूला

चूँकि सामान्य प्रोटीन बहुत सीमित करना पड़ता है, शरीर को बाकी अमीनो एसिड, विटामिन और खनिज देने के लिए फेनिलएलानिन-मुक्त विशेष फॉर्मूला या मेडिकल फूड दिया जाता है। यह पोषण की कमी से बचाता है और इसे नियमित रूप से, दिन में कई बार, लेना जरूरी है। शिशुओं में माँ के दूध या सामान्य फॉर्मूला की मात्रा को इस विशेष फॉर्मूला के साथ सावधानी से संतुलित किया जाता है।

3. दवाएँ

  • सैप्रोप्टेरिन (Sapropterin): यह BH4 का कृत्रिम रूप है। यह उन मरीजों में फेनिलएलानिन का स्तर घटाने में मदद करता है जो इसके प्रति प्रतिक्रिया देते हैं, और इससे कुछ लोग आहार में थोड़ी अधिक छूट पा सकते हैं। सभी मरीजों पर यह असर नहीं करता।
  • पेगवैलियेज़ (Pegvaliase): यह एक एंजाइम-आधारित इंजेक्शन उपचार है, जो चुनिंदा वयस्क मरीजों में उपयोग होता है जिनका स्तर अन्य उपायों से नियंत्रित नहीं हो पाता। इसके दुष्प्रभावों, विशेषकर एलर्जिक प्रतिक्रियाओं, की निगरानी जरूरी है।
  • बड़े न्यूट्रल अमीनो एसिड (LNAA): ये मस्तिष्क में फेनिलएलानिन के प्रवेश को कम करने में सहायक हो सकते हैं और कुछ किशोरों तथा वयस्कों में विकल्प के रूप में उपयोग किए जाते हैं।

इन दवाओं की उपलब्धता और लागत अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में भिन्न होती है, इसलिए किसी भी दवा के बारे में मेटाबॉलिक रोग विशेषज्ञ से ही सलाह लें।

4. नियमित निगरानी

रक्त में फेनिलएलानिन की जाँच नियमित रूप से करानी पड़ती है। शिशुओं में यह अक्सर हर हफ्ते होती है, जबकि बड़े होने पर अंतराल बढ़ सकता है। साथ ही बच्चे की वृद्धि, विकास, पोषण और स्कूल में प्रदर्शन पर भी नजर रखी जाती है।

मातृ PKU: गर्भावस्था में विशेष सावधानी

जिन महिलाओं को PKU है, उनके लिए गर्भावस्था के दौरान फेनिलएलानिन का स्तर नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है। माँ के रक्त में ऊँचा स्तर गर्भ में पल रहे शिशु को नुकसान पहुँचा सकता है, भले ही शिशु को स्वयं PKU न हो। इससे जन्मजात हृदय दोष, कम वजन, छोटा सिर और बौद्धिक अक्षमता का खतरा बढ़ता है। इसे “मातृ PKU सिंड्रोम” कहते हैं। इसीलिए गर्भधारण की योजना बनाने से पहले ही विशेषज्ञ से परामर्श लेकर आहार को सख्ती से नियंत्रित करना चाहिए और पूरी गर्भावस्था में इसे जारी रखना चाहिए।

भारत में स्थिति

विश्व स्तर पर PKU लगभग 10,000 से 15,000 जन्मों में एक बच्चे को प्रभावित करता है, हालाँकि यह दर अलग-अलग आबादियों में काफी भिन्न होती है। भारत में इसके व्यापक और भरोसेमंद आँकड़े सीमित हैं, क्योंकि यहाँ सार्वभौमिक नवजात स्क्रीनिंग अभी सभी जगह लागू नहीं है। कई बच्चों की पहचान तब होती है जब विकास में देरी या दौरे जैसे लक्षण दिखने लगते हैं, और तब तक कुछ नुकसान हो चुका होता है।

अन्य चुनौतियाँ भी हैं: विशेष फॉर्मूला और कम-प्रोटीन खाद्य पदार्थों की सीमित उपलब्धता और ऊँची कीमत, मेटाबॉलिक विशेषज्ञों और आहार-विशेषज्ञों की कमी, और आम लोगों में जागरूकता का अभाव। शाकाहारी भोजन में दालें और दूध-दही रोज के आहार का बड़ा हिस्सा होते हैं, इसलिए भारतीय परिवारों के लिए आहार-नियोजन और भी सावधानी की माँग करता है।

रोकथाम और आनुवंशिक परामर्श

PKU को होने से रोका नहीं जा सकता, क्योंकि यह जीन से जुड़ा रोग है, पर इसके दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। इसके लिए:

  • हर नवजात की स्क्रीनिंग सुनिश्चित करें।
  • जिस परिवार में पहले से PKU का कोई मामला हो, वह गर्भधारण से पहले आनुवंशिक परामर्श (genetic counselling) लें।
  • वाहक जाँच और आवश्यकता पड़ने पर गर्भावस्था में प्रसवपूर्व निदान (prenatal diagnosis) के विकल्पों पर विशेषज्ञ से चर्चा करें।

PKU के साथ जीवन

PKU का निदान होने पर माता-पिता का चिंतित होना स्वाभाविक है, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि सही देखभाल से बच्चा पढ़-लिख सकता है, खेल सकता है, नौकरी कर सकता है और परिवार बसा सकता है। कुछ बातें जो मदद करती हैं:

  • अनुशासन: आहार और फॉर्मूला का समय पर और नियमित पालन करें। किशोरावस्था में अक्सर पालन ढीला पड़ जाता है, इसलिए इस उम्र में विशेष प्रोत्साहन जरूरी है।
  • शिक्षा: बच्चे को उम्र के अनुसार उसकी स्थिति समझाएँ, ताकि वह खुद जिम्मेदारी ले सके।
  • स्कूल और परिवार का सहयोग: शिक्षकों, रिश्तेदारों और दोस्तों को आहार-संबंधी जरूरतों की जानकारी दें।
  • खाद्य लेबल पढ़ने की आदत: पैकेज्ड उत्पादों में प्रोटीन और एस्पार्टेम की जाँच करें।
  • सहायता समूह: समान स्थिति वाले परिवारों से जुड़ना भावनात्मक और व्यावहारिक, दोनों तरह से सहायक होता है।
  • आजीवन फॉलो-अप: वयस्क होने के बाद भी उपचार बंद नहीं करना चाहिए। आहार छोड़ने से एकाग्रता, मनोदशा और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है।

निष्कर्ष

फेनिलकेटोन्यूरिया एक दुर्लभ रोग है, पर यह चिकित्सा विज्ञान की एक बड़ी सफलता की कहानी भी है। जो रोग कभी बच्चों में गंभीर बौद्धिक अक्षमता का कारण बनता था, वह आज समय पर पहचान और सही प्रबंधन से लगभग पूरी तरह संभाला जा सकता है। इस कहानी की सबसे अहम कड़ी है नवजात स्क्रीनिंग, जो हर शिशु का अधिकार होनी चाहिए।

यदि आपके परिवार में PKU का इतिहास है, या आपके बच्चे में विकास संबंधी देरी, दौरे या असामान्य गंध जैसे लक्षण दिखें, तो देर न करें और बाल रोग विशेषज्ञ या मेटाबॉलिक रोग विशेषज्ञ से मिलें। जागरूकता, समय पर जाँच और नियमित देखभाल ही PKU से प्रभावित बच्चों को स्वस्थ भविष्य दे सकती है।

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