पेरिटोनाइटिस (पेट की झिल्ली की सूजन): कारण, लक्षण, जाँच और इलाज
परिचय
हमारे पेट के अंदर की दीवार और पेट के अंगों (जैसे आँत, लिवर, पेट/आमाशय) को ढकने वाली एक पतली, चिकनी और पारदर्शी झिल्ली होती है, जिसे पेरिटोनियम (Peritoneum) कहते हैं। यह झिल्ली अंगों को सुरक्षा देती है और उन्हें आपस में रगड़ खाने से बचाती है। जब इसी झिल्ली में संक्रमण या सूजन हो जाती है, तो इस स्थिति को पेरिटोनाइटिस कहा जाता है।
पेरिटोनाइटिस एक गंभीर और जानलेवा स्थिति हो सकती है। यदि समय पर इलाज न मिले, तो संक्रमण पूरे शरीर में फैल सकता है और सेप्सिस (रक्त संक्रमण) तथा कई अंगों के काम बंद होने का कारण बन सकता है। इसलिए इसके लक्षणों को पहचानना और तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना बहुत ज़रूरी है।
पेरिटोनाइटिस के प्रकार
पेरिटोनाइटिस को मुख्यतः तीन प्रकारों में बाँटा जाता है:
1. प्राइमरी (स्वतःस्फूर्त) बैक्टीरियल पेरिटोनाइटिस (SBP)
इसमें पेट के किसी अंग के फटे बिना ही झिल्ली में संक्रमण हो जाता है। यह ज़्यादातर उन लोगों में होता है जिन्हें लिवर की गंभीर बीमारी (सिरोसिस) के कारण पेट में पानी (जलोदर या Ascites) भर जाता है। यही जमा हुआ तरल बैक्टीरिया के पनपने का माध्यम बन जाता है।
2. सेकेंडरी पेरिटोनाइटिस
यह सबसे आम प्रकार है। इसमें पेट के किसी अंग में छेद होने, फटने या सूजन के कारण बैक्टीरिया, आंतों की सामग्री या पाचक रस पेट की गुहा में फैल जाते हैं और संक्रमण पैदा करते हैं।
3. तृतीयक (Tertiary) पेरिटोनाइटिस
यह तब होता है जब सेकेंडरी पेरिटोनाइटिस का इलाज होने के बाद भी संक्रमण बना रहता है या दोबारा लौट आता है। यह प्रायः बहुत बीमार या कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीज़ों में देखा जाता है।
इसके अलावा डायलिसिस से जुड़ा पेरिटोनाइटिस भी होता है, जो उन मरीज़ों में हो सकता है जो पेरिटोनियल डायलिसिस करवाते हैं।
पेरिटोनाइटिस के प्रमुख कारण
पेरिटोनाइटिस के कारण उसके प्रकार पर निर्भर करते हैं। आम कारण इस प्रकार हैं:
- अपेंडिक्स का फटना: अपेंडिसाइटिस का समय पर इलाज न होने पर अपेंडिक्स फट सकता है और संक्रमण पूरे पेट में फैल जाता है।
- पेट या आँत में छेद (Perforation): पेप्टिक अल्सर, टाइफाइड बुखार में आँत का छिद्र, या आँतों की टीबी के कारण छेद हो सकता है।
- डाइवर्टिकुलाइटिस: बड़ी आँत की दीवार में बनी थैलियों में सूजन और उनका फटना।
- पित्ताशय या अग्न्याशय की सूजन: कोलेसिस्टाइटिस या गंभीर पैंक्रियाटाइटिस के कारण।
- पेट की चोट या सर्जरी: दुर्घटना में पेट पर गहरी चोट लगना या ऑपरेशन के बाद संक्रमण होना।
- लिवर सिरोसिस और जलोदर: पेट में जमा पानी का संक्रमित हो जाना।
- पेरिटोनियल डायलिसिस: डायलिसिस की नली के ज़रिए बैक्टीरिया का प्रवेश।
- महिलाओं में पेल्विक संक्रमण: पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिज़ीज़ (PID) का फैलना।
- आँतों में रुकावट या गैंग्रीन: आँत की रक्त आपूर्ति बंद होने से आँत का गल जाना।
- कुछ दवाएँ या रसायन: कभी-कभी रासायनिक पदार्थ भी झिल्ली में जलन पैदा कर सकते हैं।
जोखिम कारक
निम्नलिखित स्थितियों में पेरिटोनाइटिस का ख़तरा अधिक होता है:
- लिवर सिरोसिस या जलोदर
- क्रोनिक किडनी रोग और पेरिटोनियल डायलिसिस
- कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता (जैसे एचआईवी, कैंसर की कीमोथेरेपी)
- पेट की हाल की सर्जरी
- पेप्टिक अल्सर का इतिहास
- आंतों की सूजन संबंधी बीमारियाँ (क्रोहन रोग, अल्सरेटिव कोलाइटिस)
- अनियंत्रित मधुमेह
- पेट में चोट लगना
पेरिटोनाइटिस के लक्षण
लक्षण अचानक और तेज़ी से बढ़ सकते हैं। मुख्य लक्षण हैं:
पेट से जुड़े लक्षण
- पेट में तेज़, लगातार और असहनीय दर्द, जो हिलने-डुलने, खाँसने या छूने पर और बढ़ जाता है
- पेट का कड़ा हो जाना (पेट की मांसपेशियों में अकड़न, जिसे “बोर्ड जैसा पेट” कहते हैं)
- पेट फूलना और भारीपन महसूस होना
- भूख न लगना
पूरे शरीर के लक्षण
- तेज़ बुखार और कँपकँपी
- मतली और उल्टी
- दस्त या कब्ज़, और गैस न निकल पाना
- तेज़ धड़कन और साँस तेज़ चलना
- अत्यधिक प्यास और मुँह सूखना
- पेशाब कम आना
- कमज़ोरी, थकान और चक्कर आना
- गंभीर स्थिति में बेहोशी या भ्रम की स्थिति
डायलिसिस मरीज़ों में: डायलिसिस के तरल का धुँधला या बादल जैसा दिखना, पेट दर्द और बुखार।
पेरिटोनाइटिस की जटिलताएँ
यदि इलाज में देरी हो, तो निम्नलिखित गंभीर समस्याएँ हो सकती हैं:
- सेप्सिस और सेप्टिक शॉक: संक्रमण खून में फैलकर ब्लड प्रेशर को ख़तरनाक रूप से गिरा सकता है।
- पेट में फोड़ा (Abscess) बनना
- आँतों में चिपकाव (Adhesions): जिससे भविष्य में आँत में रुकावट हो सकती है
- कई अंगों का काम बंद होना
- मृत्यु का जोखिम
रोग की जाँच (निदान)
डॉक्टर मरीज़ की हालत और लक्षण देखकर जाँच की योजना बनाते हैं:
- शारीरिक परीक्षण: पेट को दबाकर देखा जाता है कि दर्द, कड़ापन या रिबाउंड टेंडरनेस (हाथ हटाने पर अधिक दर्द) है या नहीं।
- ख़ून की जाँच: सफ़ेद रक्त कोशिकाओं (WBC) की संख्या बढ़ी हुई मिलती है। इसके साथ ब्लड कल्चर, लिवर और किडनी फंक्शन टेस्ट भी किए जाते हैं।
- एक्स-रे: पेट का एक्स-रे हवा के रिसाव या आँत में रुकावट का संकेत दे सकता है।
- अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन: ये संक्रमण का स्रोत, फोड़ा या अंग में छेद पहचानने में सहायक हैं।
- पेरिटोनियल फ्लूइड की जाँच (पैरासेंटेसिस): पेट से सुई द्वारा थोड़ा तरल निकालकर उसमें बैक्टीरिया और कोशिकाओं की जाँच की जाती है। SBP के निदान में यह बहुत महत्वपूर्ण है।
इलाज
पेरिटोनाइटिस एक आपातकालीन स्थिति है, इसलिए मरीज़ को तुरंत अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। इलाज संक्रमण के कारण और गंभीरता पर निर्भर करता है।
1. एंटीबायोटिक दवाएँ
संक्रमण को रोकने के लिए नस के ज़रिए (इंट्रावेनस) एंटीबायोटिक दी जाती हैं। शुरू में व्यापक असर वाली दवाएँ दी जाती हैं और कल्चर रिपोर्ट के अनुसार बाद में बदली जा सकती हैं।
2. सर्जरी
सेकेंडरी पेरिटोनाइटिस में अक्सर ऑपरेशन आवश्यक होता है। सर्जरी में:
- संक्रमित या क्षतिग्रस्त ऊतक हटाया जाता है
- फटे अपेंडिक्स या छेद वाली आँत की मरम्मत या उसे निकाला जाता है
- पेट की गुहा को साफ़ (धुलाई) किया जाता है
- कभी-कभी फोड़ा निकालने के लिए ड्रेनेज ट्यूब लगाई जाती है
3. सहायक उपचार
- नस के द्वारा तरल पदार्थ (IV Fluids) देकर शरीर में पानी की कमी पूरी करना
- दर्द निवारक दवाएँ
- ऑक्सीजन सहायता, यदि आवश्यक हो
- गंभीर मरीज़ों में ICU में निगरानी और ब्लड प्रेशर बनाए रखने वाली दवाएँ
- कुछ दिनों तक मुँह से खाना बंद रखकर नस के ज़रिए पोषण देना
4. SBP का इलाज
लिवर के मरीज़ों में एंटीबायोटिक के साथ एल्ब्यूमिन इन्फ्यूज़न दिया जा सकता है। बार-बार संक्रमण रोकने के लिए डॉक्टर लंबे समय तक निवारक एंटीबायोटिक भी सुझा सकते हैं।
5. डायलिसिस से जुड़ा पेरिटोनाइटिस
इसमें डायलिसिस के तरल में एंटीबायोटिक मिलाकर दी जाती है। यदि संक्रमण ठीक न हो, तो कैथेटर हटाना पड़ सकता है।
रोकथाम के उपाय
हर मामले में पेरिटोनाइटिस को रोका नहीं जा सकता, लेकिन जोखिम कम करने के लिए ये कदम उपयोगी हैं:
- पेट दर्द को नज़रअंदाज़ न करें। यदि दर्द बहुत तेज़ या लगातार है, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें। अपेंडिसाइटिस का समय पर इलाज कराना बहुत ज़रूरी है।
- पेप्टिक अल्सर का पूरा इलाज कराएँ और बिना डॉक्टरी सलाह के दर्द निवारक दवाएँ (NSAIDs) लंबे समय तक न लें।
- लिवर के मरीज़ नमक कम खाएँ, नियमित जाँच कराएँ और जलोदर होने पर डॉक्टर की सलाह मानें।
- डायलिसिस करवाने वाले लोग हाथ धोने और कैथेटर की साफ़-सफ़ाई के नियमों का सख़्ती से पालन करें।
- टाइफाइड से बचाव: साफ़ पानी पिएँ, स्वच्छ भोजन करें और टीकाकरण कराएँ।
- सर्जरी के बाद घाव की देखभाल करें और बुखार या दर्द होने पर तुरंत बताएँ।
- मधुमेह और अन्य पुरानी बीमारियों को नियंत्रण में रखें।
- शराब से परहेज़ करें, क्योंकि यह लिवर को नुकसान पहुँचाकर जोखिम बढ़ाती है।
डॉक्टर के पास कब जाएँ?
निम्न स्थितियों में बिना देर किए अस्पताल जाएँ:
- अचानक शुरू हुआ पेट का तेज़ दर्द जो कम न हो
- पेट कड़ा हो जाना और छूने से बहुत दर्द होना
- दर्द के साथ बुखार, उल्टी और पेट फूलना
- गैस या मल न निकलना
- बेहोशी, बहुत तेज़ धड़कन या साँस लेने में तकलीफ़
- डायलिसिस के तरल का धुँधला दिखना
ठीक होने के बाद देखभाल
इलाज के बाद रिकवरी में समय लग सकता है। इस दौरान:
- डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का पूरा कोर्स लें
- हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक भोजन करें; धीरे-धीरे सामान्य आहार पर आएँ
- भारी वज़न उठाने से बचें, विशेषकर सर्जरी के बाद
- घाव की सफ़ाई का ध्यान रखें
- नियमित फॉलो-अप जाँच कराएँ
- पर्याप्त आराम करें और तरल पदार्थ लें
निष्कर्ष
पेरिटोनाइटिस पेट की झिल्ली का गंभीर संक्रमण है, जो जानलेवा साबित हो सकता है। इसके लक्षण, जैसे तेज़ पेट दर्द, बुखार, उल्टी और पेट का कड़ा होना, हल्के में नहीं लेने चाहिए। आधुनिक चिकित्सा में एंटीबायोटिक और सर्जरी की मदद से यदि समय पर इलाज शुरू हो जाए, तो अधिकांश मरीज़ ठीक हो सकते हैं। सबसे ज़रूरी बात है सतर्कता, समय पर जाँच और तुरंत इलाज। लिवर रोग, किडनी रोग या डायलिसिस जैसे जोखिम वाले लोगों को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए।
