कुष्ठ रोग (Leprosy / कोढ़)
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कुष्ठ रोग (लेप्रोसी / कोढ़)

प्रस्तावना

कुष्ठ रोग, जिसे अंग्रेज़ी में लेप्रोसी (Leprosy) और आम बोलचाल में “कोढ़” कहा जाता है, मानव इतिहास की सबसे पुरानी और सबसे अधिक भ्रांतियों से घिरी बीमारियों में से एक है। हज़ारों वर्षों से इस रोग को समाज में कलंक, पाप और श्राप का प्रतीक माना जाता रहा है, जिसके कारण इससे पीड़ित लोगों को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था। परंतु आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि कुष्ठ रोग एक साधारण जीवाणु-जनित संक्रामक बीमारी है, जिसका समय पर उपचार करने से पूर्ण इलाज संभव है। आज इस बीमारी को हैनसेन रोग (Hansen’s Disease) के नाम से भी जाना जाता है, जो इसके खोजकर्ता नॉर्वे के वैज्ञानिक डॉ. गेरहार्ड आर्मॉएर हैनसेन के नाम पर रखा गया है।

कुष्ठ रोग क्या है?

कुष्ठ रोग एक दीर्घकालिक (क्रॉनिक) संक्रामक बीमारी है जो मुख्यतः त्वचा, परिधीय तंत्रिकाओं (peripheral nerves), आँखों और श्वसन तंत्र की ऊपरी नली को प्रभावित करती है। यह “माइकोबैक्टीरियम लेप्री” (Mycobacterium leprae) नामक जीवाणु के कारण होता है, जिसकी खोज 1873 में हुई थी। यह जीवाणु बहुत धीमी गति से बढ़ता है, इसलिए संक्रमण के बाद लक्षण प्रकट होने में कई महीनों से लेकर 20 वर्ष तक का समय लग सकता है। इसी कारण रोग की पहचान में अक्सर देरी हो जाती है।

कुष्ठ रोग कैसे फैलता है?

बहुत लंबे समय तक यह माना जाता था कि कुष्ठ रोग स्पर्श मात्र से फैल जाता है, लेकिन यह पूर्णतः भ्रांति है। वास्तव में यह रोग निम्न प्रकार से फैलता है:

  • यह मुख्यतः तब फैलता है जब कोई अनुपचारित रोगी लंबे समय तक किसी स्वस्थ व्यक्ति के निकट संपर्क में रहता है, विशेषकर खांसने और छींकने के दौरान नाक व मुँह से निकलने वाली बूंदों (droplets) के माध्यम से।
  • यह छूने मात्र से, हाथ मिलाने से, साथ बैठने या भोजन करने से नहीं फैलता।
  • लगभग 95 प्रतिशत लोगों में प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता होती है, जिसके कारण जीवाणु के संपर्क में आने पर भी वे रोगग्रस्त नहीं होते।
  • एक बार उपचार शुरू हो जाने पर, कुछ ही दिनों में रोगी से यह रोग फैलने की संभावना समाप्त हो जाती है।
  • यह आनुवंशिक (वंशानुगत) रोग नहीं है, अर्थात यह माता-पिता से संतान में सीधे स्थानांतरित नहीं होता।

कुष्ठ रोग के प्रकार

चिकित्सा विज्ञान में कुष्ठ रोग को मुख्यतः दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है, जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर करते हैं:

1. पॉसीबैसिलरी कुष्ठ रोग (Paucibacillary – PB)

इसमें त्वचा पर एक से पाँच तक हल्के रंग के या लालिमा लिए हुए धब्बे (चकत्ते) होते हैं। इस प्रकार में जीवाणुओं की संख्या कम होती है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत अच्छी होती है।

2. मल्टीबैसिलरी कुष्ठ रोग (Multibacillary – MB)

इसमें त्वचा पर पाँच से अधिक धब्बे होते हैं और शरीर में जीवाणुओं की संख्या अधिक होती है। यह प्रकार अधिक गंभीर होता है और इसमें तंत्रिकाओं को नुकसान पहुँचने की संभावना भी अधिक रहती है।

इसके अतिरिक्त, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वर्गीकरण के अनुसार भी कुष्ठ रोग को ट्यूबरक्युलॉइड, बॉर्डरलाइन और लेप्रोमैटस जैसी श्रेणियों में बाँटा जाता है, जो रोग की गंभीरता और शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पर आधारित हैं।

कुष्ठ रोग के लक्षण

कुष्ठ रोग के लक्षण धीरे-धीरे और बहुत सूक्ष्म रूप से प्रकट होते हैं, इसलिए प्रारंभिक अवस्था में इन्हें पहचानना कठिन हो सकता है। प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:

  • त्वचा पर हल्के रंग के, तांबई या लाल रंग के सुन्न (जिनमें संवेदना न हो) धब्बे या चकत्ते बन जाना।
  • प्रभावित त्वचा में गर्मी, ठंडक, दर्द या स्पर्श की अनुभूति कम हो जाना या पूरी तरह समाप्त हो जाना।
  • हाथों, पैरों या चेहरे में सुन्नपन और झुनझुनी महसूस होना।
  • हाथ-पैरों की मांसपेशियों में कमज़ोरी आना, जिससे उंगलियाँ मुड़ने लगती हैं (क्लॉ हैंड)।
  • शरीर पर मोटी, चमकदार या सूखी त्वचा वाले धब्बे या गांठें (nodules) बनना।
  • भौंहों के बाल झड़ना।
  • नाक बंद रहना, बार-बार नकसीर आना, और गंभीर मामलों में नाक की हड्डी का धँस जाना।
  • आँखों में सूखापन, पलकें पूरी तरह बंद न हो पाना, जिससे दृष्टि प्रभावित हो सकती है।
  • हाथ-पैरों में संवेदना खत्म होने के कारण चोट, जलन या घाव का पता न चल पाना, जो बाद में गंभीर विकृति (deformity) का कारण बनता है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यदि समय पर उपचार न किया जाए, तो तंत्रिकाओं को होने वाली क्षति स्थायी हो सकती है और इससे शारीरिक विकलांगता उत्पन्न हो सकती है। परंतु समय पर निदान और उपचार से ये सभी जटिलताएँ रोकी जा सकती हैं।

कुष्ठ रोग का निदान

कुष्ठ रोग का निदान मुख्यतः चिकित्सकीय परीक्षण के आधार पर किया जाता है, जिसमें निम्न विधियाँ शामिल हैं:

  • त्वचा की सूक्ष्म जाँच करके सुन्न धब्बों की पहचान करना।
  • प्रभावित तंत्रिकाओं का स्पर्श परीक्षण, जिसमें तंत्रिका के मोटे होने या दर्द की जाँच की जाती है।
  • त्वचा से लिए गए स्क्रैपिंग नमूने की स्लिट-स्किन स्मियर जाँच, जिसमें जीवाणु की उपस्थिति देखी जाती है।
  • आवश्यकता पड़ने पर त्वचा या तंत्रिका की बायोप्सी करना।

कुष्ठ रोग का उपचार

कुष्ठ रोग का उपचार पूर्णतः संभव है और यह पूरी तरह से मुफ्त इलाज योग्य बीमारी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित बहु-औषधि चिकित्सा (Multi-Drug Therapy – MDT) इस रोग के उपचार की मानक विधि है। इसमें मुख्यतः तीन दवाओं का संयोजन उपयोग किया जाता है:

  1. डैप्सोन (Dapsone)
  2. रिफैम्पिसिन (Rifampicin)
  3. क्लोफैज़ीमीन (Clofazimine)

रोग के प्रकार के अनुसार उपचार की अवधि निर्धारित होती है — पॉसीबैसिलरी प्रकार के लिए सामान्यतः 6 महीने और मल्टीबैसिलरी प्रकार के लिए 12 महीने तक दवाइयाँ ली जाती हैं। यह उपचार भारत सहित अधिकांश देशों में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर निःशुल्क उपलब्ध है। नियमित रूप से पूरा कोर्स लेना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि बीच में दवा छोड़ देने से रोग फिर से सक्रिय हो सकता है या दवा-प्रतिरोधी जीवाणु उत्पन्न होने का खतरा रहता है।

उपचार शुरू होने के कुछ ही दिनों (सामान्यतः 72 घंटों) के भीतर रोगी से यह संक्रमण फैलने की क्षमता समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त, जिन रोगियों को तंत्रिका क्षति या विकृति हो चुकी है, उनके लिए फिज़ियोथेरेपी, विशेष जूते, सुरक्षात्मक उपकरण और कुछ मामलों में पुनर्निर्माण संबंधी शल्य चिकित्सा (reconstructive surgery) भी उपलब्ध है।

सामाजिक कलंक और मिथक

कुष्ठ रोग से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती इसका उपचार नहीं, बल्कि इसके साथ जुड़ा सामाजिक कलंक (stigma) है। सदियों से इस रोग को गलत तरीके से पिछले जन्मों के पापों का फल, ईश्वरीय दंड या अत्यधिक संक्रामक बीमारी माना जाता रहा, जिसके कारण रोगियों को परिवार और समाज से अलग कर दिया जाता था। इसी सोच के चलते भारत सहित कई देशों में कुष्ठ रोगियों के लिए अलग बस्तियाँ (कॉलोनियाँ) बनाई गई थीं।

वास्तविकता यह है कि:

  • कुष्ठ रोग अत्यंत कम संक्रामक है और सामान्य सामाजिक संपर्क से नहीं फैलता।
  • यह किसी पाप या श्राप का परिणाम नहीं, बल्कि एक साधारण जीवाणु संक्रमण है।
  • उपचाराधीन या उपचारित व्यक्ति के साथ सामान्य रूप से रहना, खाना-पीना पूर्णतः सुरक्षित है।
  • सही उपचार से रोगी पूर्ण रूप से स्वस्थ जीवन जी सकता है।

इस भ्रांति को दूर करने के लिए जन-जागरूकता अत्यंत आवश्यक है, ताकि रोगियों को समय पर उपचार मिल सके और वे समाज से बहिष्कृत होने के डर के बिना अपनी बीमारी को स्वीकार कर सकें।

रोकथाम और जागरूकता

कुष्ठ रोग की रोकथाम में निम्नलिखित उपाय सहायक हैं:

  • रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही तुरंत नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र में जाँच कराना।
  • कुष्ठ रोगियों के परिवारजनों और निकट संपर्क में रहने वालों की नियमित जाँच।
  • समाज में इस रोग को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को दूर करना और सही जानकारी फैलाना।
  • सरकार द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम जैसी योजनाओं में सक्रिय सहभागिता।

भारत में “राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम” (National Leprosy Eradication Programme – NLEP) के अंतर्गत निःशुल्क जाँच, उपचार और पुनर्वास की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। प्रतिवर्ष 30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर “विश्व कुष्ठ उन्मूलन दिवस” मनाया जाता है, ताकि इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाई जा सके।

निष्कर्ष

कुष्ठ रोग अब कोई असाध्य या भयावह बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि यह एक ऐसा रोग है जिसका समय पर निदान और नियमित उपचार से पूर्ण इलाज संभव है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज इस रोग को लेकर फैली भ्रांतियों और कलंक की मानसिकता को त्याग दे, तथा रोगियों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करे। जागरूकता, समय पर जाँच और उपचार के माध्यम से हम कुष्ठ रोग को पूर्णतः जड़ से समाप्त करने के लक्ष्य के करीब पहुँच सकते हैं और प्रभावित व्यक्तियों को सम्मानजनक और स्वस्थ जीवन जीने का अवसर प्रदान कर सकते हैं।

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