डिप्थीरिया (Diphtheria)
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डिप्थीरिया (Diphtheria): कारण, लक्षण, उपचार और बचाव

परिचय

डिप्थीरिया एक गंभीर और अत्यधिक संक्रामक जीवाणु जनित रोग है, जो मुख्य रूप से गले, नाक और श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। यह रोग “कोरिनेबैक्टीरियम डिप्थीरी” (Corynebacterium diphtheriae) नामक जीवाणु के कारण होता है। यह जीवाणु एक शक्तिशाली विषाक्त पदार्थ (टॉक्सिन) उत्पन्न करता है, जो शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाता है और गंभीर मामलों में हृदय, तंत्रिका तंत्र और गुर्दों को भी प्रभावित कर सकता है। यदि समय पर उपचार न किया जाए तो यह रोग जानलेवा साबित हो सकता है, विशेष रूप से बच्चों के लिए।

एक समय था जब डिप्थीरिया दुनिया भर में बच्चों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक था। लेकिन टीकाकरण कार्यक्रमों की व्यापक सफलता के कारण आज यह रोग अधिकांश विकसित देशों में लगभग समाप्त हो चुका है। हालाँकि, कुछ विकासशील देशों और कम टीकाकरण दर वाले क्षेत्रों में अभी भी इसके मामले सामने आते हैं, इसलिए इस बीमारी के बारे में जागरूकता बनाए रखना आवश्यक है।

डिप्थीरिया के कारण

डिप्थीरिया “कोरिनेबैक्टीरियम डिप्थीरी” नामक जीवाणु से होता है। यह जीवाणु मुख्य रूप से दो तरीकों से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है:

1. श्वसन के माध्यम से (Respiratory Droplets): जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता, छींकता या बोलता है, तो हवा में सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से यह जीवाणु फैल सकता है। नजदीकी संपर्क में रहने वाले लोग इन बूंदों को सांस के साथ अंदर लेकर संक्रमित हो सकते हैं।

2. संक्रमित वस्तुओं या त्वचा के संपर्क से: कभी-कभी यह जीवाणु संक्रमित व्यक्ति के इस्तेमाल किए गए बर्तन, तौलिये, कपड़ों या घावों के सीधे संपर्क से भी फैल सकता है। त्वचीय डिप्थीरिया (Cutaneous Diphtheria) में यह जीवाणु त्वचा पर घाव या चकत्तों के माध्यम से संक्रमण फैलाता है।

जो लोग टीकाकरण नहीं करवाते, भीड़भाड़ वाले या अस्वच्छ वातावरण में रहते हैं, अथवा जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, उनमें इस रोग के होने की संभावना अधिक होती है।

डिप्थीरिया के लक्षण

डिप्थीरिया के लक्षण आमतौर पर संक्रमण के 2 से 5 दिनों के भीतर प्रकट होने लगते हैं। शुरुआती लक्षण सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह गंभीर रूप ले सकते हैं। प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं:

  • गले में तेज खराश और दर्द
  • हल्का से मध्यम बुखार
  • गर्दन में सूजन (लिम्फ नोड्स का बढ़ना), जिसे कभी-कभी “बुल नेक” (Bull Neck) कहा जाता है
  • कमजोरी और थकान महसूस होना
  • सांस लेने में कठिनाई या तेज सांस चलना
  • निगलने में कठिनाई
  • नाक से पानी जैसा या खूनी स्राव

डिप्थीरिया की सबसे विशिष्ट पहचान गले, टॉन्सिल या नाक के अंदर एक मोटी, धूसर या सफेद रंग की झिल्ली (Pseudomembrane) का बनना है। यह झिल्ली गले की श्वास नली को अवरुद्ध कर सकती है, जिससे सांस लेने में गंभीर कठिनाई हो सकती है। यह झिल्ली हटाने की कोशिश करने पर खून भी आ सकता है, और यही इसे सामान्य गले की खराश से अलग करता है।

डिप्थीरिया के प्रकार

डिप्थीरिया मुख्यतः दो प्रकार का होता है:

1. श्वसन तंत्र का डिप्थीरिया (Respiratory Diphtheria): यह सबसे सामान्य और गंभीर रूप है, जो गले, टॉन्सिल, नाक और स्वरयंत्र को प्रभावित करता है।

2. त्वचीय डिप्थीरिया (Cutaneous Diphtheria): इसमें त्वचा पर घाव, छाले या चकत्ते बनते हैं। यह विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक देखा जाता है जहाँ स्वच्छता का स्तर कम होता है।

डिप्थीरिया की जटिलताएँ

यदि डिप्थीरिया का समय पर उपचार न किया जाए, तो यह शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा सकता है। जीवाणु द्वारा उत्पन्न विषाक्त पदार्थ रक्त प्रवाह के माध्यम से पूरे शरीर में फैल सकता है, जिससे निम्नलिखित जटिलताएँ हो सकती हैं:

  • हृदय पर प्रभाव (Myocarditis): हृदय की मांसपेशियों में सूजन आ सकती है, जिससे हृदय गति अनियमित हो सकती है या हृदय विफलता (Heart Failure) तक हो सकती है।
  • तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव (Neuritis): तंत्रिकाओं को नुकसान पहुँचने से लकवा जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जो निगलने की क्षमता, आँखों की गति या हाथ-पैरों की गतिविधि को प्रभावित कर सकती है।
  • श्वास नली का अवरोध: गले में बनी झिल्ली सांस लेने के मार्ग को अवरुद्ध कर सकती है, जिससे दम घुटने का खतरा रहता है।
  • गुर्दों को नुकसान: गंभीर मामलों में गुर्दे भी प्रभावित हो सकते हैं।

इन जटिलताओं के कारण ही डिप्थीरिया को एक जानलेवा रोग माना जाता है, विशेष रूप से जब इसका उपचार देरी से शुरू किया जाए।

निदान (Diagnosis)

डॉक्टर सबसे पहले रोगी के गले और मुँह की शारीरिक जाँच करते हैं और झिल्ली की उपस्थिति की जाँच करते हैं। निश्चित निदान के लिए निम्नलिखित परीक्षण किए जाते हैं:

  • गले या नाक का स्वाब टेस्ट (Throat Swab Culture): प्रभावित क्षेत्र से नमूना लेकर प्रयोगशाला में जीवाणु की उपस्थिति की पुष्टि की जाती है।
  • रक्त परीक्षण: संक्रमण की गंभीरता और शरीर की प्रतिक्रिया को समझने के लिए।
  • ईसीजी (ECG): यह जांचने के लिए कि क्या हृदय पर विषाक्त पदार्थ का असर पड़ा है।

चूँकि डिप्थीरिया तेजी से गंभीर रूप ले सकता है, इसलिए संदेह होने पर परीक्षण परिणामों की प्रतीक्षा किए बिना ही उपचार शुरू कर दिया जाता है।

उपचार (Treatment)

डिप्थीरिया का उपचार जितनी जल्दी शुरू किया जाए, उतना ही बेहतर परिणाम मिलता है। उपचार की मुख्य विधियाँ इस प्रकार हैं:

1. डिप्थीरिया एंटीटॉक्सिन (Diphtheria Antitoxin): यह सबसे महत्वपूर्ण उपचार है। यह जीवाणु द्वारा उत्पन्न विषाक्त पदार्थ के प्रभाव को बेअसर करने के लिए दिया जाता है। यह इंजेक्शन जितनी जल्दी दिया जाए, जटिलताओं की संभावना उतनी ही कम होती है।

2. एंटीबायोटिक दवाएँ: जीवाणु को समाप्त करने और संक्रमण के आगे फैलाव को रोकने के लिए एंटीबायोटिक दवाएँ (जैसे पेनिसिलिन या एरिथ्रोमाइसिन) दी जाती हैं।

3. अस्पताल में भर्ती और निगरानी: गंभीर मामलों में मरीज को अस्पताल में भर्ती किया जाता है, जहाँ हृदय गति, सांस लेने की क्षमता और अन्य महत्वपूर्ण संकेतों की निरंतर निगरानी की जाती है। यदि श्वास नली अवरुद्ध हो जाए, तो कृत्रिम श्वास सहायता (वेंटिलेटर) की भी आवश्यकता पड़ सकती है।

4. आइसोलेशन (Isolation): संक्रमण को दूसरों तक फैलने से रोकने के लिए मरीज को अन्य लोगों से अलग रखा जाता है, जब तक कि वह पूरी तरह से संक्रामक न रह जाए।

बचाव और रोकथाम (Prevention)

डिप्थीरिया से बचाव का सबसे प्रभावी और सुरक्षित तरीका टीकाकरण है। भारत सहित अधिकांश देशों में डिप्थीरिया का टीका राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा है।

1. डीपीटी टीका (DPT Vaccine): यह टीका डिप्थीरिया, पर्टुसिस (काली खांसी) और टिटनेस से बचाव के लिए दिया जाता है। भारत में यह टीका शिशुओं को जन्म के बाद निर्धारित समय-सारणी के अनुसार कई खुराकों में दिया जाता है, आमतौर पर डेढ़, ढाई और साढ़े तीन महीने की उम्र में, और उसके बाद बूस्टर खुराकें भी दी जाती हैं।

2. बूस्टर खुराक: प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने के लिए बच्चों को स्कूल जाने की उम्र में और किशोरावस्था में भी बूस्टर खुराकें दी जाती हैं। वयस्कों को भी हर 10 वर्ष में बूस्टर टीका लेने की सलाह दी जाती है।

3. स्वच्छता का ध्यान: व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वच्छता बनाए रखना, भीड़भाड़ वाले स्थानों से बचना और संक्रमित व्यक्तियों से दूरी बनाए रखना भी संक्रमण के फैलाव को रोकने में सहायक है।

4. संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वालों की जाँच: यदि कोई व्यक्ति डिप्थीरिया से संक्रमित पाया जाता है, तो उसके निकट संपर्क में आए लोगों की भी जाँच की जानी चाहिए और आवश्यकता अनुसार निवारक एंटीबायोटिक या टीका दिया जाना चाहिए।

डिप्थीरिया और भारत की स्थिति

भारत में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (Universal Immunization Programme) के अंतर्गत डिप्थीरिया का टीका मुफ्त में उपलब्ध कराया जाता है। इसके बावजूद, कुछ राज्यों और ग्रामीण क्षेत्रों में टीकाकरण की दर कम होने के कारण समय-समय पर डिप्थीरिया के प्रकोप देखने को मिलते हैं। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि सभी माता-पिता अपने बच्चों को निर्धारित समय पर पूर्ण टीकाकरण अवश्य करवाएँ।

निष्कर्ष

डिप्थीरिया एक गंभीर लेकिन पूरी तरह से रोके जा सकने वाला रोग है। समय पर टीकाकरण, उचित स्वच्छता और शीघ्र निदान व उपचार के माध्यम से इस बीमारी को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। यदि गले में झिल्ली जैसी संरचना, तेज बुखार, सांस लेने में कठिनाई या गर्दन में सूजन जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि इस रोग में देरी जानलेवा साबित हो सकती है। जागरूकता और नियमित टीकाकरण के माध्यम से हम डिप्थीरिया जैसी बीमारियों को समाज से पूरी तरह समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

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