हरपीज जोस्टर ऑप्थेल्मिकस (Herpes Zoster Ophthalmicus - आंख में शिंगल्स)
| | |

हरपीज जोस्टर ऑप्थेल्मिकस (आंख में शिंगल्स): कारण, लक्षण, इलाज और बचाव

परिचय

शिंगल्स (दाद या हरपीज जोस्टर) एक वायरल संक्रमण है जिसमें त्वचा पर दर्दनाक, जलन वाले फफोले निकलते हैं। जब यही संक्रमण चेहरे की उस नस को प्रभावित करता है जो आंख और माथे को संवेदना देती है, तो उसे हरपीज जोस्टर ऑप्थेल्मिकस (HZO) कहते हैं। यह शिंगल्स का एक गंभीर रूप है, क्योंकि समय पर इलाज न होने पर आंख की रोशनी हमेशा के लिए कम हो सकती है या पूरी तरह जा सकती है।

शिंगल्स के लगभग 10 से 20 प्रतिशत मामलों में आंख प्रभावित होती है। यह अक्सर 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में होता है, लेकिन कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले युवाओं में भी हो सकता है।

यह रोग क्यों होता है?

इसका कारण वैरिसेला जोस्टर वायरस (VZV) है, वही वायरस जो बचपन में चिकनपॉक्स (छोटी माता) करता है। चिकनपॉक्स ठीक होने के बाद वायरस शरीर से पूरी तरह खत्म नहीं होता। वह नसों की जड़ों (गैंग्लिया) में सुप्त अवस्था में छिपा रहता है, इनमें ट्राइजेमिनल नर्व की जड़ भी शामिल है।

वर्षों बाद, जब रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, तो वायरस फिर सक्रिय होकर नस के रास्ते त्वचा और आंख तक पहुंच जाता है। ट्राइजेमिनल नर्व की पहली शाखा (ऑप्थेल्मिक डिवीजन) माथे, ऊपरी पलक, नाक और आंख को संवेदना देती है, इसलिए इसके संक्रमण से HZO होता है।

जोखिम बढ़ाने वाले कारक:

  • 50 वर्ष से अधिक उम्र
  • मधुमेह
  • एचआईवी/एड्स
  • कैंसर और कीमोथेरेपी
  • अंग प्रत्यारोपण के बाद ली जाने वाली दवाएं
  • लंबे समय तक स्टेरॉयड का सेवन
  • अत्यधिक तनाव, थकान या गंभीर बीमारी

लक्षण

शुरुआती (प्रोड्रोमल) लक्षण: दाने निकलने से 1 से 5 दिन पहले माथे या सिर के एक तरफ जलन, चुभन, झुनझुनी या तेज दर्द शुरू हो सकता है। साथ में हल्का बुखार, सिरदर्द, थकान और बेचैनी भी हो सकती है। इस अवस्था में इसे अक्सर माइग्रेन या साइनस का दर्द समझ लिया जाता है।

दाने और फफोले: कुछ दिनों में चेहरे के केवल एक तरफ (दाएं या बाएं) लाल चकत्ते उभरते हैं, जो पानी भरे फफोलों में बदल जाते हैं। ये फफोले फिर पीले पड़कर पपड़ी बनते हैं और 2 से 4 सप्ताह में सूखते हैं। दाने माथे, ऊपरी पलक और नाक पर निकलते हैं, और चेहरे की मध्य रेखा को पार नहीं करते।

आंख से जुड़े लक्षण:

  • आंख में लालिमा, दर्द और जलन
  • पलकों में सूजन
  • पानी आना
  • रोशनी से परेशानी (फोटोफोबिया)
  • धुंधला दिखना या नजर कम होना
  • आंख में किरकिरी जैसा एहसास

हचिन्सन साइन (Hutchinson’s Sign): नाक की नोक या उसके किनारे पर दाने निकलना एक महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत है। नाक और आंख को संवेदना देने वाली नस (नेज़ोसिलिअरी नर्व) एक ही है, इसलिए ऐसा होने पर आंख के प्रभावित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। इस स्थिति में तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से जांच जरूरी है।

आंख पर होने वाले प्रभाव और जटिलताएं

वायरस आंख की लगभग हर परत को प्रभावित कर सकता है:

  1. कंजंक्टिवाइटिस: आंख की बाहरी झिल्ली में लालिमा और सूजन।
  2. केराटाइटिस: कॉर्निया (आंख की पारदर्शी परत) में सूजन या अल्सर। यह सबसे आम और गंभीर समस्या है। इससे कॉर्निया पर निशान पड़ सकते हैं और दृष्टि स्थायी रूप से कम हो सकती है।
  3. यूवाइटिस (आइराइटिस): आंख के भीतरी हिस्से में सूजन, जिससे दर्द, लालिमा और रोशनी से तकलीफ होती है।
  4. ग्लूकोमा: सूजन के कारण आंख का दबाव बढ़ सकता है, जो ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचाता है।
  5. रेटिना की समस्याएं: रेटिना में सूजन या नेक्रोसिस (एक्यूट रेटिनल नेक्रोसिस), जो दुर्लभ लेकिन बहुत गंभीर है।
  6. ऑप्टिक न्यूराइटिस: दृष्टि नस में सूजन।
  7. मोतियाबिंद: लंबी सूजन और स्टेरॉयड के उपयोग से।
  8. नर्व पैरालिसिस: आंख की मांसपेशियों को चलाने वाली नसों पर असर से आंख हिलाने में कठिनाई या दोहरा दिखना।

पोस्ट-हरपेटिक न्यूरैल्जिया (PHN): दाने ठीक हो जाने के बाद भी महीनों या वर्षों तक चेहरे और माथे में जलन वाला तीव्र दर्द बना रह सकता है। यह बुजुर्गों में ज्यादा होता है और जीवन की गुणवत्ता को काफी प्रभावित करता है।

कॉर्निया की संवेदना में कमी: ठीक होने के बाद भी कॉर्निया सुन्न रह सकता है। तब आंख में चोट या कचरा जाने का पता नहीं चलता और संक्रमण या अल्सर का खतरा बना रहता है। रोग कई बार महीनों बाद दोबारा भड़क भी सकता है।

निदान

निदान मुख्यतः लक्षणों और जांच पर आधारित होता है। एक तरफा दर्दनाक दाने आमतौर पर पहचान के लिए काफी होते हैं। नेत्र विशेषज्ञ निम्न जांचें करते हैं:

  • स्लिट लैंप जांच: कॉर्निया, यूविया और आंख के अगले हिस्से की बारीक जांच
  • फ्लोरेसीन स्टेनिंग: कॉर्निया के घाव या डेंड्राइटिक अल्सर पहचानने के लिए
  • आंख के दबाव (IOP) की जांच: ग्लूकोमा का पता लगाने के लिए
  • फंडस/रेटिना जांच: पुतली फैलाकर रेटिना और ऑप्टिक नर्व की जांच
  • कॉर्नियल सेंसेशन टेस्ट

संदिग्ध मामलों में फफोले के द्रव या आंख के नमूने की PCR जांच से वायरस की पुष्टि की जा सकती है।

इलाज

HZO में शुरुआती इलाज सबसे अहम है। दाने निकलने के 72 घंटे के भीतर एंटीवायरल दवा शुरू करने पर जटिलताओं का खतरा काफी घटता है। देर से शुरू करने पर भी इलाज फायदेमंद रहता है, इसलिए हिचकिचाएं नहीं।

1. एंटीवायरल दवाएं: डॉक्टर आमतौर पर एसाइक्लोविर, वैलासाइक्लोविर या फैमसाइक्लोविर गोलियां 7 से 10 दिन के लिए देते हैं। गंभीर मामलों या कमजोर प्रतिरक्षा वाले मरीजों में अस्पताल में नस के जरिए एसाइक्लोविर दी जाती है। खुराक मरीज की उम्र और किडनी की स्थिति के अनुसार डॉक्टर तय करते हैं।

2. आंख के लिए दवाएं:

  • स्टेरॉयड ड्रॉप्स: केराटाइटिस या यूवाइटिस की सूजन कम करने के लिए। इन्हें केवल नेत्र विशेषज्ञ की निगरानी में ही इस्तेमाल करें, क्योंकि गलत उपयोग से नुकसान हो सकता है।
  • साइक्लोप्लेजिक ड्रॉप्स: दर्द और ऐंठन कम करने के लिए।
  • ग्लूकोमा की दवाएं: यदि आंख का दबाव बढ़ा हो।
  • लुब्रिकेटिंग ड्रॉप्स/ऑइंटमेंट: सूखेपन और कॉर्निया की सुरक्षा के लिए।
  • एंटीबायोटिक ड्रॉप्स: द्वितीयक बैक्टीरियल संक्रमण रोकने के लिए।

3. दर्द प्रबंधन: शुरुआती दर्द में पैरासिटामोल या अन्य दर्द निवारक, ठंडी सिकाई और साफ, नम कपड़ा राहत देते हैं। तीव्र नर्व दर्द (PHN) में गैबापेंटिन, प्रीगैबालिन या कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाएं दी जाती हैं। लिडोकेन पैच या कैप्साइसिन क्रीम भी उपयोगी हो सकती हैं।

4. गंभीर मामलों में: कॉर्निया में स्थायी निशान होने पर कॉर्निया प्रत्यारोपण, गंभीर सूखापन में पंक्टल प्लग या विशेष उपचार की जरूरत पड़ सकती है। कभी-कभी लंबे समय तक कम खुराक की एंटीवायरल दवा दी जाती है, जिससे बार-बार होने वाले प्रकोप घटते हैं।

घर पर ध्यान रखने योग्य बातें

  • फफोलों को न फोड़ें और न खुजलाएं।
  • आंख को हाथ से न रगड़ें।
  • प्रभावित हिस्से को साफ और सूखा रखें, और छूने के बाद हाथ धोएं।
  • धूप और तेज रोशनी से बचने के लिए धूप का चश्मा पहनें।
  • आंख में कोई भी घरेलू नुस्खा, तेल, हल्दी या बिना सलाह की दवा न डालें।
  • डॉक्टर की बताई ड्रॉप्स और दवाएं समय पर और पूरी अवधि तक लें।
  • पर्याप्त आराम करें और संतुलित, पौष्टिक आहार लें।
  • मधुमेह जैसी बीमारियों को नियंत्रित रखें।

संक्रमण फैलने से बचाव: फफोलों में मौजूद द्रव से वायरस फैल सकता है। जब तक फफोले सूखकर पपड़ी न बन जाएं, तब तक गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, बिना चिकनपॉक्स हुए या बिना टीका लगे लोगों और कमजोर प्रतिरक्षा वाले व्यक्तियों से दूरी रखें। ऐसे लोगों में संपर्क से शिंगल्स नहीं, बल्कि चिकनपॉक्स हो सकता है।

बचाव: टीकाकरण

शिंगल्स और उसकी जटिलताओं से बचाव का सबसे असरदार तरीका टीका है। रीकॉम्बिनेंट जोस्टर वैक्सीन (शिंग्रिक्स) 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और कमजोर प्रतिरक्षा वाले वयस्कों के लिए सुझाई जाती है। इसकी दो खुराकें कुछ महीनों के अंतराल पर दी जाती हैं और यह शिंगल्स तथा PHN के खतरे को काफी घटाती है। जिन लोगों को पहले शिंगल्स हो चुका है, उनके लिए भी टीका सुझाया जाता है। अपने डॉक्टर से पूछें कि आपके लिए कौन-सा टीका उचित है और वह कहां उपलब्ध है।

डॉक्टर के पास कब जाएं?

निम्न स्थितियों में तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से मिलें:

  • माथे, पलक या चेहरे के एक तरफ दर्दनाक दाने निकलें
  • नाक की नोक पर दाने दिखें
  • आंख लाल हो, दर्द हो या पानी आए
  • नजर धुंधली हो या रोशनी चुभे
  • दोहरा दिखाई दे या पलक गिरने लगे
  • बुखार के साथ तेज सिरदर्द हो

HZO में देरी सबसे बड़ी गलती है। शुरुआती 72 घंटे बहुत कीमती हैं।

निष्कर्ष

आंख में शिंगल्स एक गंभीर लेकिन काफी हद तक रोकी जा सकने वाली और इलाज योग्य स्थिति है। चेहरे के एक तरफ दर्दनाक दाने, खासकर माथे या नाक पर, को कभी हल्के में न लें। समय पर एंटीवायरल इलाज, नेत्र विशेषज्ञ की नियमित निगरानी और टीकाकरण से आंख की रोशनी को बचाया जा सकता है। बुजुर्गों और मधुमेह या कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों को खास सतर्क रहना चाहिए।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *