हेमोरेजिक सिस्टिटिस (Hemorrhagic Cystitis): पेशाब में खून के साथ मूत्राशय की सूजन
परिचय
हेमोरेजिक सिस्टिटिस मूत्राशय (ब्लैडर) की एक स्थिति है जिसमें मूत्राशय की अंदरूनी परत में सूजन आ जाती है और उसकी छोटी रक्त वाहिकाओं से रक्तस्राव होने लगता है। इसका सबसे प्रमुख लक्षण पेशाब में खून आना (हेमेट्यूरिया) है। यह रक्त कभी बहुत हल्का, यानी केवल सूक्ष्मदर्शी से दिखने वाला होता है, तो कभी इतना अधिक कि पेशाब गहरे लाल रंग का हो जाए और थक्के भी बनने लगें।
सामान्य मूत्र संक्रमण (UTI) में भी कभी-कभी पेशाब में खून आ सकता है, लेकिन हेमोरेजिक सिस्टिटिस में रक्तस्राव मुख्य और प्रमुख समस्या होती है। यह बच्चों और वयस्कों, दोनों में हो सकता है। कैंसर के इलाज से गुज़र रहे मरीज़ों और अस्थि मज्जा (बोन मैरो) प्रत्यारोपण कराने वाले लोगों में इसका खतरा अधिक रहता है।
हेमोरेजिक सिस्टिटिस क्या है?
मूत्राशय की भीतरी दीवार पर यूरोथीलियम नामक एक सुरक्षात्मक परत होती है, जो मूत्र में मौजूद हानिकारक रसायनों और सूक्ष्मजीवों से दीवार को बचाती है। जब किसी संक्रमण, दवा, विकिरण या रसायन के कारण यह परत क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो उसके नीचे की रक्त वाहिकाएँ उजागर हो जाती हैं। मूत्र के संपर्क में आने से सूजन बढ़ती है और वाहिकाओं से खून रिसने लगता है। यही स्थिति हेमोरेजिक सिस्टिटिस कहलाती है।
इसे दो रूपों में समझा जा सकता है:
- तीव्र (Acute): अचानक शुरू होने वाली, आमतौर पर संक्रमण या किसी दवा के कारण।
- दीर्घकालिक (Chronic): लंबे समय तक बनी रहने वाली या बार-बार लौटने वाली, अक्सर विकिरण चिकित्सा के महीनों या वर्षों बाद उभरने वाली।
प्रमुख कारण
1. बैक्टीरियल संक्रमण: ई. कोलाई (E. coli) जैसे बैक्टीरिया सबसे आम कारण हैं। महिलाओं में मूत्रमार्ग छोटा होने से यह संक्रमण अधिक होता है।
2. वायरल संक्रमण: बीके वायरस (BK virus) और एडिनोवायरस विशेष रूप से प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर होने पर मूत्राशय को प्रभावित करते हैं। बोन मैरो या किडनी प्रत्यारोपण के बाद यह एक बड़ा कारण है।
3. कीमोथेरेपी की दवाएँ: साइक्लोफॉस्फामाइड और इफोस्फामाइड इसके प्रसिद्ध कारण हैं। शरीर में ये दवाएँ टूटने पर एक्रोलीन नामक विषैला पदार्थ बनाती हैं, जो मूत्र के साथ निकलते हुए मूत्राशय की परत को जला देता है।
4. विकिरण चिकित्सा (Radiation Therapy): पेल्विक क्षेत्र, जैसे प्रोस्टेट, गर्भाशय, मलाशय या मूत्राशय के कैंसर में दी जाने वाली रेडियोथेरेपी से मूत्राशय की दीवार को नुकसान पहुँच सकता है, जो कई महीनों बाद भी दिख सकता है।
5. रसायन और अन्य दवाएँ: कुछ रसायन, डिटर्जेंट, कीटनाशक और कुछ दवाएँ भी मूत्राशय को प्रभावित कर सकती हैं।
6. अन्य कारण: मूत्राशय की पथरी, कैथेटर का लंबे समय तक उपयोग, और कुछ परजीवी संक्रमण (जैसे शिस्टोसोमियासिस, जो कुछ क्षेत्रों में पाया जाता है) भी कारण बन सकते हैं।
लक्षण
हेमोरेजिक सिस्टिटिस के लक्षण कारण और गंभीरता के अनुसार बदल सकते हैं। आम लक्षण ये हैं:
- पेशाब में लाल, गुलाबी या चाय जैसे रंग का खून
- पेशाब में खून के थक्के
- पेशाब करते समय जलन या दर्द
- बार-बार पेशाब की तीव्र इच्छा होना
- पेशाब रोक न पाना या अचानक ज़ोर से पेशाब लगना
- पेट के निचले हिस्से में दर्द या भारीपन
- रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना
- कुछ मामलों में बुखार और कमज़ोरी
गंभीर स्थिति के संकेत: यदि थक्कों के कारण पेशाब रुक जाए, बहुत अधिक खून बहे, चक्कर आएँ, धड़कन तेज़ हो, चेहरा पीला पड़ जाए या तेज़ बुखार के साथ पीठ/कमर में दर्द हो, तो तुरंत अस्पताल जाना चाहिए।
जोखिम कारक
- कैंसर के लिए कीमोथेरेपी या पेल्विक रेडियोथेरेपी लेना
- बोन मैरो या अंग प्रत्यारोपण
- कमज़ोर प्रतिरक्षा तंत्र (जैसे HIV या लंबे समय तक इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएँ)
- मधुमेह
- महिलाएँ, जिनमें मूत्र संक्रमण का खतरा अधिक होता है
- पुरुषों में बढ़ा हुआ प्रोस्टेट, जिससे मूत्राशय पूरी तरह खाली नहीं होता
- कैथेटर का उपयोग
- पर्याप्त पानी न पीना
निदान (जाँच)
डॉक्टर सबसे पहले मरीज़ का इतिहास और लक्षण पूछते हैं, जैसे कैंसर का इलाज, दवाएँ, रेडिएशन या पिछले संक्रमण। इसके बाद ये जाँचें कराई जा सकती हैं:
पेशाब की जाँच (Urine Routine): इसमें खून, मवाद और संक्रमण के संकेत देखे जाते हैं।
यूरिन कल्चर: बैक्टीरिया की पहचान और उपयुक्त एंटीबायोटिक चुनने के लिए।
वायरल जाँच (PCR): बीके वायरस या एडिनोवायरस की पुष्टि के लिए, खासकर प्रत्यारोपण के मरीज़ों में।
रक्त जाँच: हीमोग्लोबिन, प्लेटलेट्स, थक्का जमने की क्षमता और किडनी की कार्यप्रणाली देखने के लिए।
अल्ट्रासाउंड: मूत्राशय की दीवार की मोटाई, थक्के, पथरी या किडनी में रुकावट देखने के लिए।
सिस्टोस्कोपी: एक पतली कैमरायुक्त नली से मूत्राशय के अंदर देखा जाता है। इससे रक्तस्राव का स्रोत पता चलता है और ज़रूरत पड़ने पर बायोप्सी भी ली जा सकती है।
सीटी स्कैन: अन्य कारणों, जैसे ट्यूमर या पथरी, को अलग करने के लिए।
पेशाब में खून के कई मामलों में मूत्राशय या किडनी के कैंसर जैसी गंभीर वजहें भी हो सकती हैं, इसलिए इसे कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।
उपचार
उपचार पूरी तरह कारण और रक्तस्राव की गंभीरता पर निर्भर करता है।
हल्के मामलों में
- बैक्टीरियल संक्रमण होने पर कल्चर रिपोर्ट के अनुसार एंटीबायोटिक
- खूब तरल पदार्थ पीना ताकि मूत्राशय में थक्के न जमें
- दर्द और जलन कम करने की दवाएँ
मध्यम से गंभीर मामलों में
- अस्पताल में भर्ती और तरल पदार्थ: नसों के ज़रिए द्रव देकर पेशाब का प्रवाह बनाए रखा जाता है।
- ब्लैडर इरिगेशन: तीन-तरफा कैथेटर से लगातार सलाइन चलाकर थक्कों को बाहर निकाला जाता है और रुकावट से बचाया जाता है।
- रक्त या प्लेटलेट चढ़ाना: अधिक खून बहने या एनीमिया की स्थिति में।
- सिस्टोस्कोपिक प्रक्रिया: थक्के निकालना और रक्तस्राव वाली जगह को जलाकर (फुलगुरेशन/कॉटरी) बंद करना।
- मूत्राशय में दवा डालना (इंट्रावेसिकल): कुछ विशेषज्ञ अल्युम या अन्य दवाओं का प्रयोग करते हैं।
- हाइपरबैरिक ऑक्सीजन थेरेपी (HBOT): विशेष रूप से विकिरण-जनित मामलों में ऊतकों की मरम्मत में सहायक हो सकती है।
- एंटीवायरल दवाएँ: वायरल कारण होने पर, विशेषज्ञ की सलाह से।
- एम्बोलाइज़ेशन या सर्जरी: अत्यंत गंभीर, बेकाबू रक्तस्राव में रक्त वाहिकाओं को बंद करने की प्रक्रिया या, अंतिम विकल्प के तौर पर, मूत्राशय निकालने की सर्जरी की जाती है।
महत्वपूर्ण: स्वयं दवाएँ शुरू न करें। पेशाब में खून के मामले में सही कारण जाने बिना इलाज करना खतरनाक हो सकता है।
रोकथाम
कीमोथेरेपी के मरीज़ों में इसे रोकना संभव है, और इसके लिए ये उपाय अपनाए जाते हैं:
- पर्याप्त पानी पीना: कीमोथेरेपी के दौरान और उसके बाद डॉक्टर द्वारा बताई गई मात्रा में खूब तरल पदार्थ लेना।
- बार-बार पेशाब करना: मूत्राशय में हानिकारक पदार्थों को जमा होने से रोकने के लिए।
- मेस्ना (Mesna) दवा: साइक्लोफॉस्फामाइड या इफोस्फामाइड के साथ यह दवा दी जाती है जो एक्रोलीन को निष्क्रिय करती है। यह डॉक्टर की देखरेख में ही दी जाती है।
- संक्रमण से बचाव: स्वच्छता का ध्यान रखना और मूत्र संक्रमण का समय पर इलाज कराना।
- कैथेटर की सही देखभाल: अनावश्यक कैथेटर से बचना।
- नियमित फॉलो-अप: रेडियोथेरेपी करा चुके मरीज़ों को कई वर्षों तक लक्षणों पर नज़र रखनी चाहिए।
घर पर देखभाल के सुझाव
ये उपाय डॉक्टर के इलाज का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक हैं:
- दिनभर में पर्याप्त पानी पिएँ (जब तक डॉक्टर ने सीमित न किया हो, खासकर हृदय या किडनी रोगियों में)।
- कैफीन, अत्यधिक मसालेदार भोजन और शराब से परहेज़ करें, क्योंकि ये मूत्राशय को उत्तेजित कर सकते हैं।
- पेशाब को ज़्यादा देर तक न रोकें।
- पेट के निचले हिस्से पर गुनगुना सेंक दर्द में आराम दे सकता है।
- धूम्रपान छोड़ें, क्योंकि यह मूत्राशय के लिए हानिकारक है।
- पेशाब के रंग और मात्रा पर नज़र रखें और कोई बदलाव हो तो डॉक्टर को बताएँ।
डॉक्टर से कब मिलें?
पेशाब में खून दिखने पर, चाहे वह एक बार ही क्यों न हो, डॉक्टर से मिलना चाहिए। निम्न स्थितियों में तुरंत चिकित्सा सहायता लें:
- पेशाब में थक्के आना या पेशाब बंद हो जाना
- तेज़ बुखार और कंपकंपी
- पीठ या बगल में तेज़ दर्द
- अत्यधिक कमज़ोरी, चक्कर या बेहोशी
- कीमोथेरेपी या रेडियोथेरेपी के दौरान या बाद में पेशाब में खून आना
जटिलताएँ
समय पर इलाज न होने पर ये समस्याएँ हो सकती हैं:
- गंभीर एनीमिया (खून की कमी)
- थक्कों से मूत्रमार्ग में रुकावट, जिससे मूत्राशय में तनाव और पेशाब रुकना
- किडनी पर दबाव और उसकी कार्यक्षमता में गिरावट
- मूत्राशय की दीवार का सिकुड़ना और क्षमता घटना
- बार-बार संक्रमण
- जीवन की गुणवत्ता पर असर, जैसे नींद और दैनिक गतिविधियों में बाधा
निष्कर्ष
हेमोरेजिक सिस्टिटिस एक गंभीर लेकिन उपचार योग्य स्थिति है। सही समय पर पहचान, कारण की जाँच और उचित इलाज से अधिकांश मरीज़ों में रक्तस्राव पर नियंत्रण पाया जा सकता है। विशेष रूप से कैंसर के मरीज़ों में, जहाँ कीमोथेरेपी या रेडिएशन के कारण इसका खतरा अधिक होता है, वहाँ निवारक उपाय, जैसे पर्याप्त तरल पदार्थ और मेस्ना, बहुत कारगर साबित होते हैं।
पेशाब में खून को कभी नज़रअंदाज़ न करें। यह हमेशा किसी न किसी समस्या का संकेत होता है, और शुरुआती जाँच से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है। यदि आपको या आपके किसी परिजन को ऐसे लक्षण दिखें, तो बिना देर किए यूरोलॉजिस्ट या अपने चिकित्सक से परामर्श करें।
