हाशिमोटो थायरॉयडिटिस (Hashimoto's Thyroiditis)
| |

हाशिमोटो थायरॉयडिटिस: कारण, लक्षण, जाँच और इलाज की पूरी जानकारी

भूमिका

आजकल थकान, वज़न बढ़ना, बालों का झड़ना और ठंड ज़्यादा लगना जैसी शिकायतें बहुत आम हो गई हैं। ज़्यादातर लोग इन्हें तनाव या उम्र का असर मानकर टाल देते हैं। कई बार इनके पीछे थायरॉयड की एक ऑटोइम्यून बीमारी होती है, जिसे हाशिमोटो थायरॉयडिटिस कहते हैं। यह हाइपोथायरॉयडिज़्म (थायरॉयड हार्मोन की कमी) का सबसे आम कारण है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ आहार में आयोडीन पर्याप्त मिलता है। भारत भी उनमें शामिल है।

इस लेख में हम इस बीमारी के हर पहलू को सरल भाषा में समझेंगे।

हाशिमोटो थायरॉयडिटिस क्या है?

थायरॉयड गर्दन के आगे, साँस की नली के ऊपर स्थित तितली के आकार की एक छोटी ग्रंथि है। यह थायरॉक्सिन (T4) और ट्राईआयोडोथायरोनिन (T3) हार्मोन बनाती है। ये हार्मोन शरीर की चयापचय क्रिया (मेटाबॉलिज़्म), हृदय गति, शरीर के तापमान, पाचन और ऊर्जा स्तर को नियंत्रित करते हैं।

हाशिमोटो एक ऑटोइम्यून रोग है। इसमें शरीर की रोग-प्रतिरोधक प्रणाली गलती से अपनी ही थायरॉयड ग्रंथि की कोशिकाओं को दुश्मन मान लेती है और उन पर हमला करती है। इससे ग्रंथि में लंबे समय तक सूजन रहती है और धीरे-धीरे उसकी हार्मोन बनाने की क्षमता घटती जाती है। इस बीमारी का वर्णन सबसे पहले 1912 में जापानी चिकित्सक डॉ. हाकारू हाशिमोटो ने किया था, इसलिए इसे उनका नाम मिला।

किन्हें ज़्यादा खतरा है?

यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, लेकिन कुछ कारक जोखिम बढ़ाते हैं:

  • लिंग: महिलाओं में यह पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक पाई जाती है।
  • उम्र: आमतौर पर 30 से 50 वर्ष की उम्र में पहचानी जाती है, हालाँकि बच्चों और बुज़ुर्गों में भी हो सकती है।
  • पारिवारिक इतिहास: परिवार में थायरॉयड या अन्य ऑटोइम्यून रोग होने पर संभावना बढ़ जाती है।
  • अन्य ऑटोइम्यून रोग: टाइप-1 डायबिटीज़, सीलिएक रोग, रुमेटॉइड आर्थराइटिस, विटिलिगो (सफ़ेद दाग) और लupus जैसी स्थितियों वाले लोगों में जोखिम अधिक होता है।
  • गर्भावस्था और प्रसव के बाद का समय: इस दौरान प्रतिरक्षा प्रणाली में बदलाव आते हैं।
  • पर्यावरणीय कारण: बहुत अधिक आयोडीन का सेवन, विकिरण का संपर्क और कुछ संक्रमण भी भूमिका निभा सकते हैं।

कारण

इस रोग का एक निश्चित कारण अभी तक ज्ञात नहीं है। माना जाता है कि यह आनुवंशिक प्रवृत्ति और पर्यावरणीय कारकों के मेल से होता है। जिन लोगों में जीन के स्तर पर इसकी संभावना होती है, उनमें किसी ट्रिगर (जैसे संक्रमण, तनाव, हार्मोनल बदलाव या अतिरिक्त आयोडीन) के बाद प्रतिरक्षा प्रणाली थायरॉयड के विरुद्ध एंटीबॉडी बनाने लगती है। ये मुख्यतः एंटी-TPO (थायरॉयड परऑक्सीडेज़) और एंटी-थायरोग्लोबुलिन एंटीबॉडी होती हैं।

लक्षण

यह बीमारी अक्सर बहुत धीरे-धीरे बढ़ती है। कई लोगों में सालों तक कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। जब हार्मोन का स्तर गिरने लगता है, तब ये लक्षण सामने आते हैं:

  • लगातार थकान और सुस्ती
  • बिना कारण वज़न बढ़ना
  • ठंड ज़्यादा लगना
  • कब्ज़
  • त्वचा का रूखा होना
  • बालों का पतला होना या झड़ना, भौंहों के बाहरी हिस्से का पतला होना
  • चेहरे पर सूजन
  • मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द या अकड़न
  • याददाश्त कमज़ोर होना, ध्यान लगाने में कठिनाई, उदासी या चिड़चिड़ापन
  • महिलाओं में माहवारी का अनियमित या बहुत भारी होना
  • गर्दन में सूजन (घेंघा या गॉइटर), जिसमें गला भरा-भरा लग सकता है
  • दिल की धड़कन का धीमा होना

शुरुआती चरण में कभी-कभी सूजन के कारण थोड़े समय के लिए हार्मोन ज़्यादा निकल जाते हैं। तब घबराहट, धड़कन तेज़ होना और पसीना आने जैसे लक्षण भी हो सकते हैं। इसे “हाशिटॉक्सिकोसिस” कहते हैं।

जाँच कैसे होती है?

निदान के लिए डॉक्टर लक्षणों और शारीरिक जाँच के साथ ये परीक्षण कराते हैं:

  1. TSH टेस्ट: यह सबसे पहली और अहम जाँच है। थायरॉयड कम हार्मोन बनाए तो पिट्यूटरी ग्रंथि TSH बढ़ा देती है, इसलिए हाइपोथायरॉयडिज़्म में TSH का स्तर ऊँचा आता है।
  2. फ्री T4 (और ज़रूरत पड़ने पर T3): हार्मोन का वास्तविक स्तर बताता है।
  3. एंटी-TPO और एंटी-थायरोग्लोबुलिन एंटीबॉडी टेस्ट: ऑटोइम्यून कारण की पुष्टि करता है। हाशिमोटो के अधिकांश मरीज़ों में एंटी-TPO एंटीबॉडी पॉज़िटिव आती है।
  4. थायरॉयड अल्ट्रासाउंड: ग्रंथि का आकार, बनावट और गाँठों की स्थिति देखने के लिए, जब ज़रूरत हो।

संभावित जटिलताएँ

समय पर इलाज न होने पर ये समस्याएँ हो सकती हैं:

  • बड़ा गॉइटर, जिससे निगलने या साँस लेने में परेशानी हो
  • कोलेस्ट्रॉल बढ़ना और हृदय रोग का जोखिम
  • अवसाद
  • बाँझपन या गर्भपात का खतरा
  • गर्भावस्था में अनुपचारित हाइपोथायरॉयडिज़्म से शिशु के विकास पर असर
  • बहुत गंभीर मामलों में मिक्सिडीमा (एक आपात स्थिति)

बहुत दुर्लभ मामलों में हाशिमोटो के मरीज़ों में थायरॉयड लिम्फोमा का जोखिम थोड़ा अधिक पाया गया है, इसलिए गर्दन की गाँठ तेज़ी से बढ़े तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ।

इलाज

हाशिमोटो का कोई ऐसा इलाज नहीं है जो प्रतिरक्षा प्रणाली के हमले को पूरी तरह रोक दे। लेकिन थायरॉयड हार्मोन की कमी को दवा से आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।

1. लेवोथायरॉक्सिन: यह T4 हार्मोन का सिंथेटिक रूप है और मुख्य दवा है। इसकी खुराक मरीज़ के वज़न, उम्र, TSH स्तर और अन्य स्थितियों के आधार पर डॉक्टर तय करते हैं। शुरुआत में हर 6 से 8 सप्ताह में जाँच होती है, फिर स्थिर होने पर साल में एक-दो बार।

दवा लेने के सही नियम:

  • सुबह खाली पेट, नाश्ते से 30 से 60 मिनट पहले, पानी के साथ लें।
  • कैल्शियम, आयरन के सप्लीमेंट और एंटासिड से लगभग चार घंटे का अंतर रखें, क्योंकि ये दवा का अवशोषण घटाते हैं।
  • रोज़ एक ही समय पर लें और डॉक्टर से पूछे बिना खुराक न बदलें या दवा बंद न करें।

2. जिन मरीज़ों में हार्मोन सामान्य है: अगर एंटीबॉडी पॉज़िटिव हैं लेकिन TSH सामान्य है, तो अक्सर तुरंत दवा की ज़रूरत नहीं होती। ऐसे में नियमित अंतराल पर जाँच से निगरानी की जाती है।

3. सर्जरी: यह बहुत कम मामलों में, जैसे बहुत बड़े गॉइटर से साँस या निगलने में दिक्कत होने पर, की जाती है।

खान-पान और जीवनशैली

दवा के साथ कुछ आदतें आपकी सेहत को बेहतर रख सकती हैं:

  • संतुलित आहार: ताज़ी सब्ज़ियाँ, फल, दालें, साबुत अनाज और प्रोटीन शामिल करें। प्रोसेस्ड और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थ कम करें।
  • आयोडीन: सामान्य मात्रा में आयोडीन युक्त नमक पर्याप्त है। हाशिमोटो में आयोडीन के सप्लीमेंट या केल्प जैसी चीज़ें बिना डॉक्टर की सलाह के न लें, क्योंकि अधिक आयोडीन स्थिति बिगाड़ सकता है।
  • सेलेनियम और विटामिन D: कुछ लोगों में इनकी कमी पाई जाती है। सप्लीमेंट तभी लें जब जाँच में कमी मिले और डॉक्टर सलाह दें। सेलेनियम के फ़ायदे को लेकर प्रमाण अभी मिले-जुले हैं।
  • ग्लूटेन: केवल सीलिएक रोग की पुष्टि होने पर ग्लूटेन छोड़ना ज़रूरी है। सभी मरीज़ों के लिए यह अनिवार्य नहीं है।
  • सोया: सोया उत्पाद दवा के अवशोषण को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए इन्हें दवा के समय के आसपास न लें।
  • व्यायाम: रोज़ 30 मिनट टहलना, योग या हल्का व्यायाम ऊर्जा, मन और वज़न के लिए फ़ायदेमंद है।
  • तनाव और नींद: पर्याप्त नींद लें और ध्यान या प्राणायाम जैसी तनाव घटाने वाली आदतें अपनाएँ।

आम भ्रांतियाँ

भ्रांति: “थायरॉयड की दवा जीवन भर लेनी पड़ती है, इसलिए यह हानिकारक है।”
सच यह है कि सही खुराक में लेवोथायरॉक्सिन शरीर के अपने हार्मोन की जगह लेती है और सुरक्षित है। समस्या दवा से नहीं, बल्कि हार्मोन की कमी से होती है।

भ्रांति: “सिर्फ़ घरेलू नुस्खों से थायरॉयड ठीक हो जाएगा।”
आहार और जीवनशैली सहायक हैं, पर हार्मोन की कमी होने पर दवा का विकल्प नहीं हैं।

भ्रांति: “वज़न घटाने के लिए ज़्यादा खुराक ले लें।”
ज़रूरत से ज़्यादा खुराक दिल की धड़कन, हड्डियों और नींद पर बुरा असर डालती है।

गर्भावस्था में सावधानी

थायरॉयड हार्मोन गर्भ में शिशु के मस्तिष्क के विकास के लिए ज़रूरी हैं। हाशिमोटो से पीड़ित महिलाओं को गर्भधारण की योजना बनाते समय या गर्भवती होने पर तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए, क्योंकि इस दौरान अक्सर दवा की खुराक बढ़ानी पड़ती है और TSH की बार-बार जाँच ज़रूरी होती है।

डॉक्टर से कब मिलें?

  • लगातार थकान, वज़न बढ़ना, ठंड लगना और बाल झड़ने जैसे लक्षण कई हफ़्तों तक बने रहें
  • गर्दन में सूजन या गाँठ दिखे
  • परिवार में थायरॉयड रोग का इतिहास हो और लक्षण दिखें
  • दवा लेने के बावजूद लक्षण न सुधरें

निष्कर्ष

हाशिमोटो थायरॉयडिटिस एक आम और नियंत्रित की जा सकने वाली ऑटोइम्यून बीमारी है। शुरुआत में इसके लक्षण मामूली लगते हैं, इसलिए अक्सर देर से पहचान होती है। सही समय पर TSH और एंटी-TPO जाँच, डॉक्टर की सलाह से नियमित दवा और संतुलित जीवनशैली अपनाकर मरीज़ पूरी तरह सामान्य और सक्रिय जीवन जी सकते हैं। ज़रूरत है सजग रहने, नियमित जाँच कराने और भ्रांतियों से बचने की।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *