गैस्ट्रिक वॉल्वुलस (Gastric Volvulus - पेट का मुड़ जाना)
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गैस्ट्रिक वॉल्वुलस (पेट का मुड़ जाना): कारण, लक्षण, निदान और उपचार

परिचय

हमारा पेट (आमाशय) पाचन तंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो भोजन को पचाने की प्रारंभिक प्रक्रिया करता है। सामान्य अवस्था में पेट कुछ स्नायुबंधों (ligaments) और आसपास के अंगों द्वारा अपनी जगह पर टिका रहता है। लेकिन जब पेट अपनी धुरी पर असामान्य रूप से घूम जाता है या मुड़ जाता है, तो इस स्थिति को गैस्ट्रिक वॉल्वुलस कहते हैं।

“वॉल्वुलस” शब्द लैटिन भाषा के “volvere” से बना है, जिसका अर्थ है “घुमाना”। इस स्थिति में पेट का एक हिस्सा या पूरा पेट 180 डिग्री से अधिक घूम जाता है, जिससे भोजन का आगे बढ़ना रुक जाता है और रक्त संचार बाधित हो सकता है। यह एक दुर्लभ लेकिन गंभीर स्थिति है, जिसमें तीव्र अवस्था में तुरंत इलाज न मिलने पर जान को खतरा हो सकता है।

गैस्ट्रिक वॉल्वुलस क्या है?

पेट को अपनी जगह पर रखने के लिए चार प्रमुख स्नायुबंध होते हैं: गैस्ट्रोफ्रेनिक, गैस्ट्रोस्प्लेनिक, गैस्ट्रोकोलिक और गैस्ट्रोहेपेटिक लिगामेंट। जब ये बंधन ढीले पड़ जाते हैं, कमजोर हो जाते हैं या किसी कारण से अपनी पकड़ खो देते हैं, तो पेट को घूमने की आज़ादी मिल जाती है। परिणामस्वरूप पेट मुड़ जाता है और उसके दोनों सिरे, यानी भोजन नली की ओर वाला हिस्सा और छोटी आंत की ओर वाला हिस्सा, बंद हो जाते हैं।

इस स्थिति को आम बोलचाल में “पेट का उलट जाना” या “पेट का मुड़ना” भी कहा जाता है। इसे एक ऐसे गुब्बारे की तरह समझा जा सकता है जिसके दोनों सिरे मरोड़ दिए गए हों, जिससे अंदर की हवा और तरल पदार्थ न बाहर निकल पाते हैं, न आगे जा पाते हैं।

गैस्ट्रिक वॉल्वुलस के प्रकार

इस रोग को दो आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है।

1. घूमने की धुरी के आधार पर

अंग-अक्षीय (Organoaxial) वॉल्वुलस: यह सबसे आम प्रकार है, जो लगभग 59 प्रतिशत मामलों में पाया जाता है। इसमें पेट अपनी लंबी धुरी पर घूमता है, यानी भोजन नली के जोड़ से पाइलोरस (पेट का निचला द्वार) तक खींची गई काल्पनिक रेखा पर। इसमें पेट का निचला हिस्सा ऊपर की ओर पलट जाता है। यह प्रकार अक्सर डायफ्राम की समस्याओं से जुड़ा होता है और इसमें रक्त आपूर्ति कटने तथा गैंग्रीन का खतरा अधिक होता है।

मेसेन्टेरोअक्षीय (Mesenteroaxial) वॉल्वुलस: इसमें पेट अपनी छोटी धुरी पर घूमता है, यानी छोटी और बड़ी वक्रता को जोड़ने वाली रेखा पर। यह लगभग 29 प्रतिशत मामलों में होता है। यह प्रकार अक्सर दीर्घकालिक (क्रोनिक) और आंशिक होता है तथा बच्चों में अधिक देखा जाता है।

संयुक्त (Combined) प्रकार: इसमें दोनों प्रकार के घुमाव एक साथ होते हैं। यह बहुत दुर्लभ है।

2. शुरुआत और अवधि के आधार पर

तीव्र (Acute) वॉल्वुलस: यह अचानक शुरू होता है, इसके लक्षण गंभीर होते हैं और यह एक आपातकालीन स्थिति है।

दीर्घकालिक (Chronic) वॉल्वुलस: इसमें लक्षण हल्के, रुक-रुक कर आने वाले और अस्पष्ट होते हैं। मरीज़ को लंबे समय तक पेट फूलना, जल्दी पेट भर जाना या बार-बार दर्द जैसी शिकायतें रहती हैं।

3. कारण के आधार पर

प्राथमिक (Primary): लगभग 30 प्रतिशत मामलों में पेट के स्नायुबंधों की कमजोरी या ढीलेपन के कारण, बिना किसी अन्य संरचनात्मक रोग के, पेट मुड़ जाता है।

द्वितीयक (Secondary): लगभग 70 प्रतिशत मामलों में यह किसी अन्य रोग या विकृति के कारण होता है, जैसे डायफ्राम में दोष या पेट के आसपास कोई गांठ।

कारण और जोखिम कारक

गैस्ट्रिक वॉल्वुलस के पीछे कई कारण हो सकते हैं:

1. डायफ्राम संबंधी दोष: डायफ्रामेटिक हर्निया, विशेषकर पैराईसोफेजियल हर्निया (जिसमें पेट का हिस्सा छाती की ओर खिसक जाता है), इसका सबसे प्रमुख कारण है। डायफ्राम में जन्मजात छेद या चोट से हुई क्षति भी कारण बन सकती है।

2. स्नायुबंधों की कमजोरी: उम्र बढ़ने के साथ या जन्म से ही पेट को थामने वाले लिगामेंट ढीले हो सकते हैं।

3. पेट के आसपास की विकृतियाँ: पेट, प्लीहा (स्प्लीन) या अग्न्याशय में ट्यूमर या सिस्ट, पेट के अल्सर के कारण बने घाव या चिपकाव (adhesions) पेट की स्थिति बदल सकते हैं।

4. पेट की गतिशीलता में गड़बड़ी: पेट की मांसपेशियों की कमजोरी या असामान्य गति भी कारण हो सकती है।

5. अन्य कारण: पेट पर गंभीर चोट, पूर्व की सर्जरी, रीढ़ की हड्डी में विकृति (काइफोस्कोलियोसिस) और अत्यधिक भोजन के बाद पेट का फैलाव भी जोखिम बढ़ाते हैं।

आयु वर्ग: यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है, किंतु प्रायः 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिक देखा जाता है। बच्चों में यह अक्सर जन्मजात डायफ्राम दोष या स्नायुबंधों की अपरिपक्वता से जुड़ा होता है।

लक्षण

तीव्र गैस्ट्रिक वॉल्वुलस के लक्षण

तीव्र अवस्था में लक्षणों का एक विशिष्ट समूह मिलता है, जिसे बोर्चार्ड्ट ट्रायड (Borchardt’s triad) कहा जाता है:

  1. ऊपरी पेट में तेज़ दर्द और फैलाव: अचानक शुरू होने वाला तीव्र दर्द, जो अक्सर छाती के निचले हिस्से या पेट के ऊपरी भाग में महसूस होता है।
  2. उल्टी की कोशिश, पर उल्टी न होना (Retching without vomiting): मरीज़ को बार-बार उल्टी जैसा महसूस होता है, पर कुछ बाहर नहीं निकलता।
  3. नली (नेज़ोगैस्ट्रिक ट्यूब) डालने में असमर्थता: पेट में नली डालने का प्रयास सफल नहीं होता, क्योंकि पेट का मार्ग मुड़ा हुआ होता है।

इसके अतिरिक्त अन्य लक्षण भी हो सकते हैं, जैसे सीने में दर्द या दबाव, सांस लेने में तकलीफ, पेट का ऊपरी भाग फूला हुआ और निचला भाग सपाट होना, तेज़ धड़कन, पसीना आना और रक्तचाप गिरना। यदि पेट की रक्त आपूर्ति कट जाए तो तेज़ बुखार, झटका (शॉक) और बेहोशी भी हो सकती है।

दीर्घकालिक वॉल्वुलस के लक्षण

पेट के ऊपरी हिस्से में रुक-रुक कर दर्द, खाने के बाद पेट भारी लगना, जल्दी पेट भर जाना, डकार और गैस, सीने में जलन, निगलने में कठिनाई, कभी-कभी उल्टी और वज़न में कमी। ये लक्षण अन्य पाचन रोगों से मिलते-जुलते हैं, इसलिए निदान में देरी हो सकती है।

जटिलताएँ

यदि समय पर इलाज न हो, तो गंभीर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं:

  • इस्कीमिया और गैंग्रीन: पेट की रक्त आपूर्ति रुकने से उसके ऊतक मरने लगते हैं।
  • पेट का फटना (Perforation): इससे पेट की सामग्री उदर गुहा में फैल जाती है और गंभीर संक्रमण (पेरिटोनाइटिस) हो जाता है।
  • शॉक और बहु-अंग विफलता
  • रक्तस्राव: पेट की भीतरी परत से रक्त बहना।
  • अग्न्याशय और प्लीहा को क्षति: आसपास के अंगों पर भी असर पड़ सकता है।

तीव्र गैस्ट्रिक वॉल्वुलस में, यदि गैंग्रीन हो जाए, तो मृत्यु दर काफ़ी अधिक रहती है। इसीलिए शीघ्र निदान और उपचार अत्यंत आवश्यक है।

निदान

शारीरिक परीक्षण

डॉक्टर मरीज़ के लक्षणों, चिकित्सा इतिहास और पेट की जाँच से प्रारंभिक अनुमान लगाते हैं।

जाँच के तरीके

1. छाती और पेट का एक्स-रे: इसमें पेट में हवा से भरा फैला हुआ भाग, कभी-कभी छाती में दो हवा के बुलबुले (डबल एयर-फ्लूइड लेवल) दिख सकते हैं।

2. बेरियम स्वैलो (Barium Swallow): मरीज़ को बेरियम पिलाकर एक्स-रे लिया जाता है। इसमें पेट की मुड़ी हुई आकृति और रुकावट स्पष्ट दिखती है। स्थिर मरीज़ों में यह उपयोगी है, पर तीव्र आपातकाल में आमतौर पर नहीं किया जाता।

3. सीटी स्कैन (CT Scan): यह सबसे भरोसेमंद जाँच मानी जाती है। इससे घुमाव का प्रकार, कारण (जैसे हर्निया) और रक्त आपूर्ति की स्थिति स्पष्ट होती है।

4. एंडोस्कोपी: इससे पेट की भीतरी परत देखी जा सकती है, पर तीव्र वॉल्वुलस में इसे सावधानी से किया जाता है क्योंकि इससे और हवा भरने का जोखिम रहता है।

उपचार

उपचार का तरीका इस बात पर निर्भर करता है कि स्थिति तीव्र है या दीर्घकालिक, और मरीज़ कितना स्थिर है।

तीव्र वॉल्वुलस का उपचार

यह एक सर्जिकल इमरजेंसी है। सबसे पहले मरीज़ को स्थिर किया जाता है, जिसमें नसों के ज़रिए तरल पदार्थ, दर्द निवारक और आवश्यकतानुसार एंटीबायोटिक दिए जाते हैं। संभव होने पर पेट का दबाव कम करने के लिए नली डालने का प्रयास किया जाता है।

इसके बाद शल्य चिकित्सा की जाती है, जिसमें आमतौर पर ये कदम शामिल होते हैं:

  • पेट को खोलकर सीधा करना (Detorsion): मुड़े हुए पेट को उसकी सही स्थिति में लाया जाता है।
  • रक्त आपूर्ति की जाँच: यदि पेट का कोई हिस्सा मृत हो चुका हो, तो उसे काटकर निकाला जाता है (गैस्ट्रेक्टॉमी)।
  • हर्निया की मरम्मत: यदि डायफ्राम में दोष है, तो उसे सुधारा जाता है।
  • गैस्ट्रोपेक्सी (Gastropexy): पेट को उदर की दीवार से टाँका लगाकर स्थिर किया जाता है, ताकि वह दोबारा न मुड़े।
  • गैस्ट्रोस्टोमी ट्यूब: कभी-कभी पेट को स्थिर रखने और दबाव कम करने के लिए ट्यूब लगाई जाती है।

आजकल लैप्रोस्कोपिक (कीहोल) सर्जरी भी कई मामलों में की जाती है, जिसमें छोटे चीरों से ऑपरेशन होता है। इससे दर्द कम होता है, रिकवरी जल्दी होती है और अस्पताल में रुकने का समय घटता है। हालाँकि गंभीर या अस्थिर मरीज़ों में खुली सर्जरी ज़रूरी हो सकती है।

दीर्घकालिक वॉल्वुलस का उपचार

यदि लक्षण हल्के हों और मरीज़ सर्जरी के लिए उपयुक्त न हो, तो शुरुआत में कुछ सावधानियाँ अपनाई जा सकती हैं:

  • थोड़ी-थोड़ी मात्रा में, बार-बार भोजन करना
  • अधिक भारी या गैस बनाने वाले भोजन से परहेज़
  • खाने के तुरंत बाद लेटने से बचना

फिर भी, अधिकांश मामलों में, विशेषकर यदि लक्षण बार-बार लौट रहे हों, सर्जरी ही स्थायी समाधान है। कुछ चुनिंदा मरीज़ों में एंडोस्कोपिक तरीके से पेट को सीधा करना और पीईजी (PEG) ट्यूब द्वारा गैस्ट्रोपेक्सी भी की जाती है।

सर्जरी के बाद देखभाल और रिकवरी

सर्जरी के बाद कुछ दिनों तक अस्पताल में निगरानी रखी जाती है। शुरुआत में मुँह से खाना रोककर नसों से पोषण दिया जा सकता है, फिर धीरे-धीरे तरल और हल्का भोजन शुरू किया जाता है। मरीज़ों को सलाह दी जाती है कि वे:

  • कुछ हफ़्तों तक भारी वज़न न उठाएँ
  • डॉक्टर के निर्देशानुसार आहार लें और छोटे-छोटे भोजन करें
  • नियमित फॉलो-अप जाँच करवाएँ
  • टाँकों की जगह पर संक्रमण के लक्षणों (लालिमा, मवाद, बुखार) पर नज़र रखें

रोकथाम और जीवनशैली

चूँकि अधिकांश मामले संरचनात्मक कारणों से होते हैं, इसलिए पूर्ण रोकथाम हमेशा संभव नहीं है। फिर भी कुछ बातें मददगार हो सकती हैं:

  • हर्निया या डायफ्राम की समस्या का समय पर इलाज कराना
  • अत्यधिक भोजन करने से बचना
  • पेट के पुराने लक्षणों, जैसे बार-बार जलन, निगलने में कठिनाई या दर्द, को नज़रअंदाज़ न करना
  • वृद्धावस्था में नियमित स्वास्थ्य जाँच कराना
  • पेट की चोट के बाद उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन करवाना

डॉक्टर के पास कब जाएँ?

निम्न लक्षण दिखें तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा लें:

  • ऊपरी पेट या छाती में अचानक तेज़ दर्द
  • उल्टी की इच्छा होने पर भी कुछ बाहर न निकलना
  • पेट का अचानक फूल जाना
  • सांस लेने में कठिनाई, चक्कर या बेहोशी

निष्कर्ष

गैस्ट्रिक वॉल्वुलस एक दुर्लभ, पर संभावित रूप से जानलेवा स्थिति है, जिसमें पेट अपनी धुरी पर मुड़ जाता है। इसके लक्षण कभी-कभी अन्य सामान्य पाचन रोगों जैसे लगते हैं, इसलिए निदान में देरी हो सकती है। बोर्चार्ड्ट ट्रायड, यानी तेज़ पेट दर्द, उल्टी की असफल कोशिश और नली डालने में कठिनाई, इस रोग की प्रमुख पहचान है।

तीव्र अवस्था में शीघ्र निदान और तत्काल सर्जरी से अधिकांश मरीज़ों की जान बचाई जा सकती है। दीर्घकालिक मामलों में भी सही जाँच और उचित उपचार से जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होता है। यदि आपको या आपके किसी परिजन को ऐसे लक्षण महसूस हों, तो देर न करें और तुरंत नज़दीकी अस्पताल में चिकित्सक से संपर्क करें।

अस्वीकरण: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है और चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

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