गैलेक्टोसिमिया (Galactosemia - दूध की शर्करा को पचाने में अक्षमता)
| | |

गैलेक्टोसिमिया (Galactosemia): दूध की शर्करा को पचाने में अक्षमता

परिचय

गैलेक्टोसिमिया एक दुर्लभ आनुवंशिक (जेनेटिक) विकार है, जिसमें शरीर गैलेक्टोज नामक शर्करा को सही ढंग से पचा या उपयोग नहीं कर पाता। गैलेक्टोज मुख्य रूप से दूध और दूध से बने पदार्थों में पाई जाने वाली शर्करा लैक्टोज का एक भाग है। जब हम दूध पीते हैं, तो शरीर लैक्टोज को दो छोटे अणुओं — ग्लूकोज और गैलेक्टोज — में तोड़ता है। सामान्य स्थिति में गैलेक्टोज आगे टूटकर ऊर्जा के रूप में उपयोग होता है, लेकिन गैलेक्टोसिमिया से पीड़ित व्यक्तियों में यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है, जिसके कारण गैलेक्टोज और उससे बने हानिकारक उपपदार्थ (bye-products) रक्त और शरीर के ऊतकों में जमा होने लगते हैं। यह स्थिति जन्म से ही मौजूद होती है और यदि समय पर इसका निदान और उपचार न किया जाए, तो यह जीवन के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

गैलेक्टोसिमिया क्यों होता है?

गैलेक्टोसिमिया एक ऑटोसोमल रिसेसिव (autosomal recessive) आनुवंशिक विकार है। इसका अर्थ है कि यह बीमारी तभी होती है जब बच्चे को माता और पिता दोनों से इस दोषपूर्ण जीन की एक-एक प्रति मिलती है। यदि केवल एक माता-पिता से दोषपूर्ण जीन मिलता है, तो बच्चा “वाहक” (carrier) बन जाता है, लेकिन उसमें बीमारी के लक्षण नहीं दिखते।

यह विकार शरीर में गैलेक्टोज के चयापचय (metabolism) के लिए आवश्यक तीन प्रमुख एंजाइम्स में से किसी एक की कमी के कारण होता है:

  1. GALT (Galactose-1-phosphate uridyltransferase) — इस एंजाइम की कमी से होने वाला रूप सबसे सामान्य और सबसे गंभीर माना जाता है, जिसे “क्लासिक गैलेक्टोसिमिया” कहा जाता है।
  2. GALK (Galactokinase) — इस एंजाइम की कमी से अपेक्षाकृत हल्का रूप होता है, जिसमें मुख्य रूप से आंखों में मोतियाबिंद (cataract) की समस्या देखी जाती है।
  3. GALE (UDP-galactose-4-epimerase) — यह सबसे दुर्लभ रूप है और इसकी गंभीरता व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग-अलग हो सकती है।

गैलेक्टोसिमिया के प्रकार

1. क्लासिक गैलेक्टोसिमिया (टाइप 1)

यह सबसे आम और सबसे गंभीर प्रकार है। इसमें GALT एंजाइम पूरी तरह या लगभग पूरी तरह अनुपस्थित होता है। नवजात शिशु में दूध पिलाना शुरू करते ही कुछ ही दिनों में गंभीर लक्षण दिखने लगते हैं।

2. गैलेक्टोकाइनेज की कमी (टाइप 2)

इसमें लक्षण अपेक्षाकृत हल्के होते हैं। सबसे प्रमुख समस्या शिशु या बचपन में ही आंखों में मोतियाबिंद बनना है। अन्य अंगों पर इसका असर आमतौर पर कम होता है।

3. एपिमेरेज़ की कमी (टाइप 3)

इस प्रकार की गंभीरता बहुत भिन्न होती है — कुछ मामलों में यह हल्का और स्थानीय (localized) होता है, जबकि दुर्लभ मामलों में यह क्लासिक गैलेक्टोसिमिया जितना गंभीर भी हो सकता है।

लक्षण

क्लासिक गैलेक्टोसिमिया के लक्षण आमतौर पर जन्म के कुछ दिनों बाद, जब शिशु स्तनपान या फॉर्मूला दूध लेना शुरू करता है, दिखाई देने लगते हैं। इनमें शामिल हैं:

  • उल्टी और दस्त
  • दूध पीने से इनकार करना या खाने में कठिनाई
  • पीलिया (त्वचा और आंखों का पीला पड़ना), जो सामान्य नवजात पीलिया से अधिक समय तक रहता है
  • यकृत (लिवर) का बढ़ना और लिवर खराब होने के लक्षण
  • वजन ठीक से न बढ़ना
  • सुस्ती और कमजोरी
  • चिड़चिड़ापन
  • रक्त में संक्रमण (विशेष रूप से E. coli सेप्सिस) का खतरा बढ़ जाना
  • रक्तस्राव संबंधी समस्याएं

यदि समय पर उपचार न मिले, तो स्थिति और गंभीर होकर निम्न समस्याएं पैदा कर सकती है:

  • मस्तिष्क को नुकसान
  • मोतियाबिंद
  • गंभीर लिवर क्षति या लिवर फेलियर
  • वृद्धि और विकास में देरी
  • बौद्धिक क्षमता पर असर
  • कुछ मामलों में मृत्यु का खतरा

समय पर उपचार शुरू होने के बावजूद, कई बच्चों में लंबे समय में कुछ हल्के प्रभाव देखे जा सकते हैं, जैसे सीखने में कठिनाई, बोलने में देरी, और लड़कियों में डिम्बग्रंथि (ovarian) कार्यक्षमता का कम होना।

निदान (Diagnosis)

अधिकांश देशों में, भारत सहित कई स्थानों पर, नवजात शिशुओं की जन्म के तुरंत बाद नियमित जांच (नवजात स्क्रीनिंग) की जाती है, जिसमें गैलेक्टोसिमिया की जांच भी शामिल हो सकती है। इस जांच में एड़ी से रक्त की एक बूंद लेकर उसका परीक्षण किया जाता है।

इसके अतिरिक्त, निम्नलिखित परीक्षणों से भी इसका निदान किया जा सकता है:

  • रक्त में गैलेक्टोज-1-फॉस्फेट के स्तर की जांच
  • लाल रक्त कोशिकाओं में GALT एंजाइम की गतिविधि की जांच
  • मूत्र परीक्षण, जिसमें गैर-ग्लूकोज शर्करा की उपस्थिति देखी जाती है
  • आनुवंशिक (जेनेटिक) परीक्षण, जिससे जीन में उत्परिवर्तन (mutation) की पुष्टि होती है

जल्दी निदान बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि जितनी जल्दी उपचार शुरू होता है, गंभीर जटिलताओं से बचाव की संभावना उतनी ही अधिक होती है।

उपचार और प्रबंधन

गैलेक्टोसिमिया का कोई स्थायी इलाज (cure) उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसे आहार के माध्यम से प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। उपचार का मुख्य आधार है — आहार में गैलेक्टोज और लैक्टोज का पूरी तरह से बहिष्कार

प्रमुख आहार संबंधी बदलाव:

  • नवजात शिशुओं को सामान्य दूध (स्तनपान सहित) की जगह विशेष सोया-आधारित या लैक्टोज-मुक्त फॉर्मूला दिया जाता है।
  • दूध और दूध से बने सभी उत्पाद — जैसे पनीर, दही, मक्खन, घी (कुछ मामलों में), मिठाइयां जिनमें दूध हो — आहार से पूरी तरह हटाए जाते हैं।
  • बड़े होने पर भी व्यक्ति को जीवनभर सावधानीपूर्वक आहार का पालन करना पड़ता है, क्योंकि गैलेक्टोज कई प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों, दवाओं और यहां तक कि कुछ फलों व सब्जियों में भी थोड़ी मात्रा में पाया जा सकता है।
  • खाद्य पदार्थों के लेबल को ध्यान से पढ़ना और यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि उनमें छिपे हुए लैक्टोज या दूध के अंश न हों।

अन्य प्रबंधन उपाय:

  • नियमित रूप से डॉक्टर और आहार विशेषज्ञ (dietitian) से परामर्श
  • वृद्धि, विकास और पोषण स्तर की निगरानी
  • आंखों की नियमित जांच (मोतियाबिंद के लिए)
  • हड्डियों के घनत्व (bone density) की जांच, क्योंकि कैल्शियम की कमी हो सकती है, इसलिए वैकल्पिक स्रोतों से कैल्शियम और विटामिन डी की आपूर्ति आवश्यक हो सकती है
  • लड़कियों में हार्मोनल स्तर और डिम्बग्रंथि कार्यक्षमता की निगरानी
  • बोलने, सीखने और भाषा विकास में सहायता के लिए विशेष शिक्षा या थेरेपी की आवश्यकता पड़ सकती है

जटिलताएं

समय पर आहार नियंत्रण शुरू करने के बावजूद, गैलेक्टोसिमिया से पीड़ित कुछ बच्चों में दीर्घकालिक (long-term) समस्याएं देखी जा सकती हैं, जैसे:

  • सीखने और बोलने में कठिनाई
  • मोटर कौशल (motor skills) में देरी
  • बोलने में झिझक (speech apraxia)
  • हड्डियों का कमजोर होना (ऑस्टियोपोरोसिस)
  • महिलाओं में समय से पहले डिम्बग्रंथि की कार्यक्षमता कम होना, जिससे भविष्य में प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है

इन जटिलताओं की गंभीरता हर व्यक्ति में अलग-अलग होती है, और नियमित चिकित्सकीय निगरानी से इन्हें बेहतर ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है।

रोकथाम और आनुवंशिक परामर्श

चूंकि गैलेक्टोसिमिया एक आनुवंशिक विकार है, इसे पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। हालांकि, यदि परिवार में पहले से इस बीमारी का इतिहास रहा हो, तो गर्भधारण से पहले या गर्भावस्था के दौरान आनुवंशिक परामर्श (genetic counselling) लेना सहायक हो सकता है। इससे माता-पिता को यह समझने में मदद मिलती है कि उनके बच्चे में यह बीमारी होने की कितनी संभावना है, और वे उचित जांच व योजना बना सकते हैं।

नवजात शिशुओं की स्क्रीनिंग जांच इस बीमारी के शीघ्र निदान और गंभीर परिणामों को रोकने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

निष्कर्ष

गैलेक्टोसिमिया एक दुर्लभ लेकिन गंभीर आनुवंशिक चयापचय विकार है, जिसमें शरीर दूध की शर्करा गैलेक्टोज को ठीक से पचा नहीं पाता। यदि इसका निदान जल्दी हो जाए और आहार में गैलेक्टोज व लैक्टोज को पूरी तरह हटा दिया जाए, तो अधिकांश गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है और बच्चा एक सामान्य, स्वस्थ जीवन जी सकता है। हालांकि इसके लिए जीवनभर सतर्क आहार प्रबंधन और नियमित चिकित्सकीय देखरेख आवश्यक होती है। नवजात स्क्रीनिंग कार्यक्रम, समय पर निदान और परिवार की जागरूकता — ये सभी मिलकर इस स्थिति के प्रबंधन को आसान और प्रभावी बनाते हैं।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *