एपिग्लोटाइटिस (Epiglottitis - श्वासनली के ढक्कन की सूजन, जो जानलेवा हो सकती है)
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एपिग्लोटाइटिस: श्वासनली के ढक्कन की जानलेवा सूजन

परिचय

हमारे गले में जीभ की जड़ के ठीक पीछे एक छोटी-सी पत्ती के आकार की संरचना होती है, जिसे एपिग्लॉटिस (Epiglottis) कहते हैं। इसे श्वासनली का ढक्कन भी कहा जा सकता है। जब हम खाना या पानी निगलते हैं, तो यह ढक्कन श्वासनली के मुँह को बंद कर देता है, ताकि भोजन फेफड़ों में न चला जाए। सांस लेते समय यह खुल जाता है और हवा को अंदर जाने देता है।

जब किसी संक्रमण या चोट के कारण यही ढक्कन सूज जाता है, तो इस स्थिति को एपिग्लोटाइटिस (Epiglottitis) कहते हैं। सूजा हुआ एपिग्लॉटिस हवा के रास्ते को आंशिक या पूरी तरह रोक सकता है। इसी कारण यह एक मेडिकल इमरजेंसी है और समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकती है। कई बार कुछ ही घंटों में मरीज की हालत बहुत गंभीर हो जाती है।

एपिग्लॉटिस क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

एपिग्लॉटिस उपास्थि (cartilage) से बनी एक लचीली संरचना है, जो म्यूकस झिल्ली से ढकी होती है। यह स्वरयंत्र (larynx) के प्रवेश द्वार पर स्थित होती है। इसका मुख्य काम भोजन और हवा के रास्तों को अलग रखना है। यदि यह सूज जाए, तो:

  • सांस की नली संकरी हो जाती है।
  • हवा फेफड़ों तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँच पाती।
  • शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है।

बच्चों की श्वास नली वयस्कों की तुलना में पहले से ही पतली होती है, इसलिए थोड़ी-सी सूजन भी उनके लिए अधिक खतरनाक होती है।

एपिग्लोटाइटिस के कारण

1. बैक्टीरियल संक्रमण

सबसे आम कारण बैक्टीरिया का संक्रमण है। इनमें प्रमुख हैं:

  • हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी (Hib): बच्चों में यह लंबे समय तक सबसे बड़ा कारण रहा है। टीकाकरण शुरू होने से पहले यह रोग मुख्यतः दो से सात वर्ष के बच्चों में देखा जाता था।
  • स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिया और स्ट्रेप्टोकोकस पायोजेनिस: ये बैक्टीरिया वयस्कों और टीकाकृत बच्चों में संक्रमण पैदा कर सकते हैं।
  • स्टैफिलोकोकस ऑरियस, जिसमें कुछ दवा-प्रतिरोधी प्रकार (MRSA) भी शामिल हैं।

2. वायरस और फंगस

कभी-कभी वायरस या फंगस भी इसका कारण बन सकते हैं। कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों, जैसे एचआईवी संक्रमित, कैंसर के मरीज या लंबे समय तक स्टेरॉयड लेने वालों में फंगल संक्रमण की संभावना अधिक होती है।

3. चोट और जलन

गले में चोट लगना, बहुत गर्म खाना या पेय पीना, किसी रसायन या धुएँ का सांस के साथ अंदर जाना, या गले में फंसी कोई बाहरी वस्तु भी एपिग्लॉटिस में सूजन पैदा कर सकती है। नशीले पदार्थों को धुएँ के रूप में लेने से भी गले में जलन और क्षति हो सकती है।

4. अन्य कारण

कुछ एलर्जिक प्रतिक्रियाएँ और दुर्लभ मामलों में कुछ दवाओं के प्रभाव से भी ऐसा हो सकता है।

जोखिम किसे अधिक है?

  • जिन बच्चों को Hib का टीका नहीं लगा है या जिनका टीकाकरण अधूरा है।
  • वयस्क, विशेषकर 40 से 50 वर्ष की उम्र के आसपास के पुरुष, जिनमें अब यह रोग अपेक्षाकृत अधिक रिपोर्ट होता है।
  • मधुमेह के मरीज।
  • कमजोर प्रतिरक्षा तंत्र वाले लोग।
  • धूम्रपान या तंबाकू का सेवन करने वाले लोग।
  • जिन लोगों का स्प्लीन (तिल्ली) निकाल दी गई हो या जो सही ढंग से काम न करती हो।

लक्षण: कैसे पहचानें?

एपिग्लोटाइटिस के लक्षण बहुत तेजी से बढ़ते हैं। बच्चों में ये कुछ ही घंटों में गंभीर हो सकते हैं, जबकि वयस्कों में एक-दो दिन में विकसित होते हैं। प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:

  • गले में तेज दर्द, जो सामान्य गले की खराश से कहीं अधिक होता है।
  • निगलने में कठिनाई और दर्द।
  • तेज बुखार और ठंड लगना।
  • आवाज का दबा हुआ या भारी हो जाना, जैसे मुँह में कुछ भरा हो।
  • लार टपकना, क्योंकि निगलने में दर्द के कारण मरीज लार निगल नहीं पाता। यह बच्चों में खासतौर पर देखा जाता है।
  • सांस लेने में तकलीफ, तेज सांस चलना और सांस के साथ सीटी जैसी या खुरदरी आवाज आना, जिसे स्ट्राइडर (stridor) कहते हैं।
  • बेचैनी और घबराहट।
  • मरीज का आगे की ओर झुककर, गर्दन आगे निकालकर और मुँह खोलकर बैठना, क्योंकि इस मुद्रा में सांस लेना थोड़ा आसान लगता है। इसे ट्राइपॉड पोजीशन कहते हैं।
  • गंभीर स्थिति में होंठों और त्वचा का नीला पड़ना।

डॉक्टर इन्हें याद रखने के लिए अक्सर “चार D” का उपयोग करते हैं: Drooling (लार टपकना), Dysphagia (निगलने में कठिनाई), Dysphonia (आवाज में बदलाव) और Distress (सांस की परेशानी)।

सामान्य गले की खराश से अंतर

सामान्य सर्दी-जुकाम में गले का दर्द धीरे-धीरे होता है और सांस में रुकावट नहीं होती। एपिग्लोटाइटिस में गला खुलकर देखने पर बहुत कम दिखाई दे सकता है, लेकिन दर्द और सांस की तकलीफ असामान्य रूप से अधिक होती है। यदि गले के दर्द के साथ लार टपकना, आवाज बदलना या सांस लेने में कठिनाई हो, तो इसे हल्के में बिल्कुल न लें।

तुरंत अस्पताल कब जाएँ?

निम्नलिखित स्थितियों में बिना देर किए नजदीकी अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में जाएँ या एम्बुलेंस बुलाएँ:

  • सांस लेने में स्पष्ट कठिनाई या सांस के साथ तेज आवाज।
  • बच्चे का लगातार लार टपकाना और निगल न पाना।
  • तेज बुखार के साथ गले में अत्यधिक दर्द।
  • होंठ या चेहरे का नीला पड़ना।
  • मरीज का आगे झुककर बैठना और लेटने से मना करना।

ध्यान रखें: घर पर बच्चे के मुँह में चम्मच या उँगली डालकर गला देखने की कोशिश न करें। इससे ऐंठन हो सकती है और सांस का रास्ता पूरी तरह बंद हो सकता है। मरीज को शांत रखें, उसे उसकी पसंद की आरामदायक मुद्रा में बैठे रहने दें और जल्दी से जल्दी अस्पताल पहुँचें। उसे जबरदस्ती लिटाएँ नहीं।

निदान कैसे होता है?

एपिग्लोटाइटिस का निदान सावधानी से किया जाता है, क्योंकि जाँच के दौरान भी मरीज को तनाव या ऐंठन हो सकती है। आमतौर पर डॉक्टर निम्न तरीके अपनाते हैं:

  1. नैदानिक परीक्षण: लक्षणों और मरीज की मुद्रा को देखकर संदेह किया जाता है। बच्चों में गले को जीभ दबाने वाली स्पैचुला से देखने से आमतौर पर बचा जाता है।
  2. फाइबरऑप्टिक लैरिंगोस्कोपी: एक पतली, लचीली नली (कैमरे सहित) नाक के रास्ते से डालकर एपिग्लॉटिस को सीधे देखा जाता है। वयस्कों में यह सबसे भरोसेमंद जाँच है।
  3. गर्दन का एक्स-रे: साइड से लिए गए एक्स-रे में सूजा हुआ एपिग्लॉटिस अंगूठे जैसा दिखता है, जिसे “थंब साइन” कहते हैं।
  4. रक्त जाँच और कल्चर: संक्रमण की पुष्टि और बैक्टीरिया की पहचान के लिए खून और कभी-कभी गले के स्राव की जाँच की जाती है।
  5. सीटी स्कैन: कुछ चुनिंदा मामलों में, जब मरीज स्थिर हो।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गंभीर लक्षणों वाले मरीज की सांस का रास्ता सुरक्षित करने को जाँचों से पहले प्राथमिकता दी जाती है।

इलाज

1. सांस के रास्ते की सुरक्षा

इलाज का पहला और सबसे जरूरी कदम है हवा का रास्ता खुला रखना। मरीज को ऑक्सीजन दी जाती है और अनुभवी विशेषज्ञ, जैसे एनेस्थेटिस्ट, ईएनटी सर्जन या क्रिटिकल केयर डॉक्टर की देखरेख में रखा जाता है। यदि सूजन अधिक हो, तो मुँह या नाक के रास्ते से श्वास नली (endotracheal tube) डालकर इंटुबेशन किया जाता है। बहुत गंभीर मामलों में गले में सीधे छोटा चीरा लगाकर सांस का रास्ता बनाना पड़ सकता है, जिसे क्रिकोथायरोटॉमी या ट्रेकियोस्टॉमी कहते हैं। ऐसे मरीजों को आमतौर पर आईसीयू में भर्ती किया जाता है।

2. एंटीबायोटिक्स

बैक्टीरियल संक्रमण की संभावना को देखते हुए नस के जरिए (intravenous) एंटीबायोटिक्स शुरू किए जाते हैं। आमतौर पर सेफ्ट्रायाक्सोन जैसी तीसरी पीढ़ी की सेफालोस्पोरिन दवाएँ दी जाती हैं, और जरूरत पड़ने पर MRSA जैसे प्रतिरोधी बैक्टीरिया को ध्यान में रखकर अन्य दवाएँ भी जोड़ी जाती हैं। कल्चर रिपोर्ट आने के बाद दवा में बदलाव किया जा सकता है। सामान्यतः इलाज कई दिनों तक चलता है।

3. अन्य सहायक इलाज

  • नस से तरल पदार्थ (IV fluids), क्योंकि मरीज निगल नहीं पाता।
  • बुखार और दर्द के लिए दवाएँ।
  • कुछ मामलों में सूजन कम करने के लिए कॉर्टिकोस्टेरॉयड दिए जाते हैं, हालाँकि इसके उपयोग पर चिकित्सकों में अलग-अलग राय है।
  • यदि फोड़ा (abscess) बन गया हो, तो उसका ड्रेनेज किया जा सकता है।

सही समय पर इलाज मिलने पर अधिकांश मरीज कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं और अस्पताल से छुट्टी पा लेते हैं।

संभावित जटिलताएँ

यदि इलाज में देरी हो जाए, तो निम्नलिखित गंभीर समस्याएँ हो सकती हैं:

  • सांस का पूरी तरह रुक जाना और ऑक्सीजन की कमी से मस्तिष्क को नुकसान।
  • निमोनिया।
  • गले या छाती में फोड़ा।
  • संक्रमण का खून में फैल जाना (सेप्सिस)।
  • मेनिनजाइटिस, गठिया या पेरिकार्डाइटिस जैसी जटिलताएँ, विशेषकर Hib संक्रमण में।
  • दुर्लभ मामलों में मृत्यु।

बचाव के उपाय

टीकाकरण सबसे प्रभावी सुरक्षा है

Hib वैक्सीन के आने के बाद बच्चों में एपिग्लोटाइटिस के मामलों में भारी कमी आई है। भारत के सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम में Hib का टीका पेंटावैलेंट वैक्सीन के हिस्से के रूप में शामिल है, जो शिशुओं को निर्धारित अंतराल पर दिया जाता है। माता-पिता को चाहिए कि:

  • बच्चे का पूरा टीकाकरण समय पर करवाएँ।
  • छूटे हुए टीकों के बारे में अपने बाल रोग विशेषज्ञ या नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से सलाह लें।
  • न्यूमोकोकल वैक्सीन भी निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार लगवाएँ।

अन्य सावधानियाँ

  • हाथों की स्वच्छता का ध्यान रखें। खाने से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ धोएँ।
  • बीमार व्यक्ति के साथ बर्तन, गिलास और तौलिया साझा न करें।
  • धूम्रपान और तंबाकू से दूर रहें।
  • मधुमेह और अन्य पुरानी बीमारियों को नियंत्रित रखें।
  • बहुत गर्म खाद्य पदार्थ और पेय सावधानी से लें।
  • संक्रमित व्यक्ति के निकट संपर्क में आने वाले, विशेषकर बिना टीका लगे छोटे बच्चों के मामले में डॉक्टर निवारक दवा की सलाह दे सकते हैं।

भ्रांतियाँ और सच्चाई

भ्रांति: यह बीमारी केवल बच्चों को होती है। सच्चाई: टीकाकरण के बाद बच्चों में मामले कम हुए हैं, जबकि वयस्कों में भी यह बीमारी देखी जाती है और उनमें भी जानलेवा हो सकती है।

भ्रांति: गले की खराश के लिए घरेलू नुस्खे काफी हैं। सच्चाई: सामान्य खराश में घरेलू उपाय राहत दे सकते हैं, लेकिन सांस में तकलीफ, लार टपकना या आवाज बदलने जैसे लक्षण हों, तो घरेलू उपायों में समय गँवाना खतरनाक हो सकता है।

भ्रांति: गला देखकर ही पता चल जाएगा कि सूजन है या नहीं। सच्चाई: एपिग्लॉटिस जीभ के पीछे गहराई में होता है और सामान्य रूप से मुँह खोलकर दिखाई नहीं देता। इसलिए विशेष जाँच जरूरी होती है।

निष्कर्ष

एपिग्लोटाइटिस भले ही दुर्लभ बीमारी हो, लेकिन इसकी गंभीरता को कम नहीं आँका जा सकता। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह शुरुआत में सामान्य गले की खराश जैसी लग सकती है और फिर अचानक गंभीर रूप ले लेती है। तेज गले के दर्द के साथ निगलने में कठिनाई, लार टपकना, आवाज में बदलाव या सांस की तकलीफ दिखे, तो इसे आपात स्थिति मानकर तुरंत अस्पताल पहुँचना चाहिए।

समय पर पहचान, सांस के रास्ते की सुरक्षा और उचित एंटीबायोटिक इलाज से अधिकांश मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं। बच्चों का समय पर टीकाकरण, स्वच्छता की आदतें और जागरूकता इस खतरनाक रोग से बचाव के सबसे कारगर उपाय हैं।

नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और डॉक्टरी सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

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