पाइलोरिक स्टेनोसिस: शिशुओं में पेट के वाल्व का सिकुड़ना
परिचय
नवजात शिशु का जन्म हर परिवार के लिए खुशी का मौका होता है, लेकिन शुरुआती हफ्तों में बच्चे का बार-बार उल्टी करना माता-पिता को चिंता में डाल देता है। शिशुओं में थोड़ा दूध लौटाना (स्पिट-अप) आम बात है, पर अगर बच्चा हर बार दूध पीने के बाद ज़ोर से उल्टी करने लगे और उसका वज़न बढ़ने के बजाय घटने लगे, तो यह पाइलोरिक स्टेनोसिस का संकेत हो सकता है।
पाइलोरिक स्टेनोसिस शिशुओं में पाई जाने वाली एक आम पाचन संबंधी समस्या है। समय पर पहचान हो जाए तो यह पूरी तरह ठीक हो सकती है। इस लेख में हम इसके कारण, लक्षण, जाँच, इलाज और देखभाल की विस्तार से चर्चा करेंगे।
पाइलोरिक स्टेनोसिस क्या है?
हमारे पेट का निचला हिस्सा एक छोटी पेशीय नली के ज़रिए छोटी आंत से जुड़ता है। इस मांसपेशीय वाल्व को पाइलोरस कहते हैं। इसका काम है पेट में पचे हुए भोजन को धीरे-धीरे छोटी आंत में जाने देना।
पाइलोरिक स्टेनोसिस में इस वाल्व की मांसपेशियाँ असामान्य रूप से मोटी हो जाती हैं। इससे पाइलोरस का रास्ता बहुत संकरा हो जाता है और दूध पेट से आगे नहीं जा पाता। नतीजतन, पेट भर जाने पर दूध ऊपर की ओर लौटता है और बच्चा उल्टी कर देता है।
चिकित्सा भाषा में इसे इन्फैंटाइल हाइपरट्रॉफिक पाइलोरिक स्टेनोसिस (IHPS) कहा जाता है। यह आमतौर पर जन्म के समय मौजूद नहीं होता, बल्कि जीवन के पहले कुछ हफ्तों में धीरे-धीरे विकसित होता है।
यह कितनी आम है और किसे होती है?
- लगभग 1000 जीवित जन्मों में 2 से 5 शिशुओं में यह समस्या देखी जाती है।
- यह लड़कों में लड़कियों की तुलना में लगभग 4 से 5 गुना अधिक होती है।
- अक्सर यह पहले बच्चे में ज़्यादा देखी जाती है।
- लक्षण आमतौर पर जन्म के 2 से 8 हफ्ते के बीच, खासकर 3 से 6 हफ्ते की उम्र में शुरू होते हैं।
- समय से पहले जन्मे शिशुओं में भी यह हो सकती है, हालाँकि लक्षण कुछ देर से दिख सकते हैं।
संभावित कारण और जोखिम कारक
इसका सटीक कारण अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं है। माना जाता है कि आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारण मिलकर इसमें भूमिका निभाते हैं।
- पारिवारिक इतिहास: अगर माता-पिता या भाई-बहन को यह समस्या रही हो, तो शिशु में इसकी संभावना बढ़ जाती है।
- कुछ एंटीबायोटिक दवाएँ: जीवन के शुरुआती दिनों में शिशु को, या गर्भावस्था के आखिरी दौर और स्तनपान के दौरान माँ को, एरिथ्रोमाइसिन जैसी मैक्रोलाइड एंटीबायोटिक देने से जोखिम कुछ बढ़ सकता है। कोई भी दवा डॉक्टर की सलाह के बिना न दें या न लें।
- गर्भावस्था में धूम्रपान: माँ के धूम्रपान करने से शिशु में इसका खतरा बढ़ता पाया गया है।
- लिंग: जैसा ऊपर बताया गया, लड़कों में जोखिम अधिक है।
- फीडिंग का तरीका: कुछ अध्ययनों में बोतल से दूध पीने वाले शिशुओं में यह थोड़ा अधिक देखा गया है, पर इस पर पूरी सहमति नहीं है।
यह जानना ज़रूरी है कि इसमें माता-पिता की कोई गलती नहीं होती। यह किसी गलत खानपान या देखभाल के कारण नहीं होता।
पाइलोरिक स्टेनोसिस के लक्षण
लक्षण धीरे-धीरे शुरू होते हैं और समय के साथ गंभीर होते जाते हैं।
1. प्रोजेक्टाइल वोमिटिंग (तेज़ धार वाली उल्टी): यह सबसे प्रमुख लक्षण है। दूध पीने के तुरंत बाद बच्चा इतनी ताकत से उल्टी करता है कि दूध कई फीट दूर तक जा सकता है। शुरुआत में उल्टी कम होती है, पर बाद में हर फीड के बाद होने लगती है।
2. उल्टी में पित्त (हरा रंग) नहीं होता: उल्टी में सिर्फ़ दूध या पचा-अधपचा दूध होता है। वाल्व पेट के बाहर की तरफ़ बंद है, इसलिए पित्त पेट तक नहीं पहुँचता। अगर उल्टी हरी या पीली-हरी हो तो यह दूसरी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है और तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
3. उल्टी के बाद भी भूख: उल्टी करने के बाद शिशु शांत हो जाता है और फिर से दूध माँगता है। वह बीमार कम, भूखा ज़्यादा दिखता है।
4. वज़न न बढ़ना या घटना: दूध पेट में टिक नहीं पाता, इसलिए पोषण नहीं मिलता और वज़न रुक जाता है या कम होने लगता है।
5. निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन): मुँह सूखना, रोते समय आँसू कम आना, सिर के ऊपर नरम हिस्सा (फॉन्टानेल) धँसा हुआ दिखना, और 6 घंटे या उससे ज़्यादा समय तक गीला डायपर न होना इसके संकेत हैं।
6. कब्ज़ और कम मल: आंत तक कम दूध पहुँचने से मल की मात्रा और बारंबारता घट जाती है।
7. पेट में लहरें: कभी-कभी दूध पिलाने के बाद बच्चे के ऊपरी पेट पर बाएँ से दाएँ जाती हुई लहर जैसी हलचल दिख सकती है। यह पेट की मांसपेशियों के ज़ोर लगाने से होती है।
8. चिड़चिड़ापन और सुस्ती: शुरुआत में बच्चा चिड़चिड़ा रहता है, पर देर होने पर बहुत सुस्त हो सकता है।
9. पीलिया: कुछ शिशुओं में हल्का पीलिया भी दिख सकता है, जो इलाज के बाद ठीक हो जाता है।
शरीर पर क्या असर पड़ता है?
लगातार उल्टी से शरीर से पानी के साथ पेट का अम्ल (क्लोराइड) और पोटैशियम भी निकल जाता है। इससे खून में हाइपोक्लोरेमिक मेटाबॉलिक एल्कलोसिस नामक असंतुलन बन जाता है। गंभीर मामलों में यह कमज़ोरी, साँस की गति में बदलाव और सुस्ती पैदा कर सकता है। इसीलिए इलाज में सबसे पहले शरीर के तरल और नमक का संतुलन ठीक किया जाता है।
जाँच और निदान
1. शारीरिक परीक्षण: शिशु रोग विशेषज्ञ या बाल शल्य चिकित्सक पेट को धीरे से दबाकर देखते हैं। कई बार दाहिने ऊपरी पेट में जैतून (ऑलिव) के आकार की छोटी, कड़ी गाँठ महसूस होती है, जो मोटा हुआ पाइलोरस होता है।
2. अल्ट्रासाउंड: यह सबसे भरोसेमंद और सुरक्षित जाँच है। इसमें विकिरण नहीं होता। इसमें पाइलोरस की मांसपेशी की मोटाई और नली की लंबाई मापी जाती है। मांसपेशी की मोटाई लगभग 3 मिलीमीटर या उससे अधिक और नली की लंबाई लगभग 15 से 17 मिलीमीटर या अधिक होने पर निदान की पुष्टि होती है।
3. ब्लड टेस्ट: इलेक्ट्रोलाइट्स (सोडियम, पोटैशियम, क्लोराइड) और ब्लड गैस की जाँच से निर्जलीकरण और एल्कलोसिस की स्थिति पता चलती है।
4. बेरियम स्टडी (कभी-कभी): अगर अल्ट्रासाउंड से स्थिति स्पष्ट न हो, तो पेट का एक्स-रे विशेष घोल के साथ किया जा सकता है।
इलाज
पाइलोरिक स्टेनोसिस दवाओं से ठीक नहीं होती। इसका स्थायी इलाज सर्जरी है, जिसे पाइलोरोमायोटॉमी (रामस्टेड ऑपरेशन) कहते हैं।
सर्जरी से पहले की तैयारी
यह सर्जरी आपातकालीन नहीं, बल्कि तैयारी के बाद की जाने वाली प्रक्रिया है। पहले शिशु को अस्पताल में भर्ती करके नसों (IV) के ज़रिए तरल और इलेक्ट्रोलाइट्स दिए जाते हैं। तब तक मुँह से दूध बंद रखा जाता है। जब शरीर का संतुलन सामान्य हो जाता है, तभी एनेस्थीसिया देकर सर्जरी की जाती है। यह तैयारी सर्जरी को सुरक्षित बनाती है।
सर्जरी की प्रक्रिया
- सर्जरी सामान्य एनेस्थीसिया में होती है।
- सर्जन मोटी हुई मांसपेशी पर लंबाई में एक हल्का चीरा लगाते हैं। आंतरिक परत को काटे बिना केवल बाहरी मांसपेशी को खोला जाता है, जिससे रास्ता चौड़ा हो जाता है।
- यह ऑपरेशन खुली विधि (छोटे चीरे से) या लैप्रोस्कोपिक विधि (कैमरे और बारीक उपकरणों से, बहुत छोटे कटों के साथ) से किया जा सकता है। लैप्रोस्कोपी में निशान कम रहते हैं, पर दोनों विधियाँ प्रभावी हैं।
- ऑपरेशन में आमतौर पर 30 से 60 मिनट लगते हैं।
सर्जरी के बाद
- अधिकांश शिशुओं को कुछ घंटों बाद दूध पिलाना शुरू कर दिया जाता है, पहले थोड़ी मात्रा में, फिर धीरे-धीरे बढ़ाकर।
- शुरुआती एक-दो दिन हल्की उल्टी हो सकती है, जो सामान्य है, क्योंकि पेट को नए तरीके से काम करने की आदत डालनी होती है।
- ज़्यादातर बच्चे 1 से 2 दिन में घर जा सकते हैं।
- बच्चे का वज़न कुछ ही दिनों में बढ़ना शुरू हो जाता है।
जोखिम
किसी भी सर्जरी की तरह इसमें भी संक्रमण, हल्का रक्तस्राव, अधूरा ऑपरेशन (जिससे उल्टी जारी रहे) या आंत में छेद जैसी जटिलताओं की बहुत छोटी संभावना होती है। अनुभवी बाल शल्य चिकित्सक के हाथों में गंभीर जटिलताएँ बहुत दुर्लभ हैं।
घर पर देखभाल और माता-पिता के लिए सुझाव
- समय पर डॉक्टर से मिलें: अगर आपका 2 से 8 हफ्ते का शिशु हर फीड के बाद ज़ोर से उल्टी करता है, तो देर न करें।
- खुद इलाज न करें: घरेलू नुस्खे या बिना सलाह की दवाएँ न दें।
- उल्टी का ब्योरा रखें: उल्टी कब होती है, कितनी होती है और उसका रंग कैसा है, यह डॉक्टर को बताएँ।
- डायपर गिनें: पेशाब कम होना निर्जलीकरण का सबसे आसान संकेत है।
- वज़न पर नज़र रखें: नियमित वज़न जाँच कराते रहें।
- सर्जरी के बाद: चीरे वाली जगह को साफ़ और सूखा रखें, डॉक्टर के बताए अनुसार दूध की मात्रा बढ़ाएँ और फीड के बाद बच्चे को कुछ देर सीधा पकड़कर डकार दिलाएँ।
- स्तनपान जारी रखें: सर्जरी के बाद डॉक्टर की अनुमति मिलते ही स्तनपान फिर शुरू किया जा सकता है।
तुरंत डॉक्टर के पास कब जाएँ?
- उल्टी में हरा रंग या खून दिखे
- बच्चा बहुत सुस्त हो, या उसे जगाना मुश्किल हो
- 6 से 8 घंटे तक पेशाब न हो
- मुँह और होंठ बहुत सूखे हों, या सिर का नरम हिस्सा धँसा दिखे
- पेट फूला हुआ और कड़ा लगे
- बच्चे को तेज़ बुखार हो या साँस तेज़ चलने लगे
रोकथाम
अभी तक इसे रोकने का कोई प्रमाणित तरीका नहीं है। फिर भी गर्भावस्था में धूम्रपान से बचना, गर्भावस्था या स्तनपान के दौरान और नवजात को बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक न देना, और नियमित बाल-स्वास्थ्य जाँच कराना सावधानी के अच्छे कदम हैं।
भविष्य और पूर्वानुमान
अच्छी खबर यह है कि पाइलोरोमायोटॉमी के बाद स्थिति आमतौर पर पूरी तरह ठीक हो जाती है। इलाज के बाद शिशु सामान्य रूप से खाता-पीता है, तेज़ी से वज़न बढ़ाता है और इस बीमारी का आगे चलकर पाचन या विकास पर कोई दीर्घकालिक असर नहीं पड़ता। यह समस्या सर्जरी के बाद दोबारा भी नहीं होती।
निष्कर्ष
पाइलोरिक स्टेनोसिस शिशुओं की एक इलाज-योग्य समस्या है। इसका मुख्य संकेत दूध पीने के बाद तेज़ धार वाली उल्टी है, जिसके बाद भी बच्चा भूखा रहता है। समय पर पहचान, अल्ट्रासाउंड से पुष्टि और अनुभवी बाल शल्य चिकित्सक द्वारा सर्जरी से बच्चा जल्द स्वस्थ हो जाता है। माता-पिता की सजगता सबसे बड़ी भूमिका निभाती है। अगर आपके नन्हे शिशु में ऐसे लक्षण दिखें, तो घबराएँ नहीं, पर देर भी न करें और तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें।
