एंट्रोपियन और एक्ट्रोपियन (Entropion & Ectropion - पलकों का मुड़ना या लटकना)
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एंट्रोपियन और एक्ट्रोपियन: पलकों का अंदर की ओर मुड़ना और बाहर की ओर लटकना

भूमिका

हमारी आँखों की सुरक्षा में पलकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। पलकें हर पल झपककर आँख की सतह पर आँसुओं की पतली परत फैलाती हैं, धूल-मिट्टी को दूर रखती हैं और तेज़ रोशनी से बचाव करती हैं। जब पलकों की बनावट या स्थिति में गड़बड़ी आ जाती है, तो आँख की सुरक्षा कमज़ोर पड़ जाती है और कई परेशानियाँ शुरू हो जाती हैं।

पलकों की ऐसी ही दो आम समस्याएँ हैं एंट्रोपियन (Entropion) और एक्ट्रोपियन (Ectropion)। एंट्रोपियन में पलक अंदर की ओर मुड़ जाती है, जबकि एक्ट्रोपियन में पलक बाहर की ओर लटक जाती है। ये दोनों समस्याएँ मुख्य रूप से निचली पलक को प्रभावित करती हैं और बुज़ुर्गों में ज़्यादा देखी जाती हैं। समय पर इलाज न मिलने पर ये आँख को स्थायी नुकसान भी पहुँचा सकती हैं।

एंट्रोपियन क्या है?

एंट्रोपियन वह स्थिति है जिसमें पलक का किनारा आँख की ओर अंदर मुड़ जाता है। इसके कारण पलक की बरौनियाँ (eyelashes) और पलक की त्वचा आँख की पुतली के सामने की पारदर्शी परत, यानी कॉर्निया, पर लगातार रगड़ खाने लगती है। यह रगड़ आँख में जलन, दर्द और संक्रमण का कारण बनती है।

एंट्रोपियन के प्रकार

1. आयु-संबंधी (Involutional) एंट्रोपियन: यह सबसे आम प्रकार है। उम्र बढ़ने के साथ पलक की मांसपेशियाँ और स्नायु (tendons) ढीले पड़ जाते हैं। इससे पलक अपनी जगह पर टिक नहीं पाती और अंदर की ओर मुड़ जाती है। यह अधिकतर 60 वर्ष से ऊपर के लोगों में होता है।

2. निशान-जन्य (Cicatricial) एंट्रोपियन: पलक के भीतरी हिस्से (कंजंक्टाइवा) में निशान या सिकुड़न आने से पलक अंदर खिंच जाती है। इसके कारणों में ट्रेकोमा (आँख का एक पुराना संक्रमण), रासायनिक जलन, आँख की चोट, पहले हुई सर्जरी, स्टीवेंस-जॉनसन सिंड्रोम और कुछ पुराने एलर्जिक रोग शामिल हैं।

3. ऐंठन-जन्य (Spastic) एंट्रोपियन: आँख में तेज़ सूजन या जलन होने पर पलक की गोलाकार मांसपेशी (orbicularis) में ऐंठन आ जाती है, जिससे पलक अस्थायी रूप से अंदर मुड़ जाती है। यह अक्सर आँख की सर्जरी के बाद देखा जाता है।

4. जन्मजात (Congenital) एंट्रोपियन: यह बहुत कम मामलों में जन्म से ही मौजूद होता है और आमतौर पर शिशु की पलक की बनावट में गड़बड़ी के कारण होता है।

एंट्रोपियन के लक्षण

  • आँख में किरकिरी या कुछ चुभने जैसा अहसास
  • आँख का लाल होना और लगातार पानी बहना
  • रोशनी में असहजता (photophobia)
  • आँख में दर्द और जलन
  • सुबह उठने पर पलकों पर पपड़ी या चिपचिपा स्राव
  • धुंधला दिखाई देना
  • बार-बार आँख मलने की इच्छा

एंट्रोपियन से होने वाली जटिलताएँ

अगर बरौनियाँ लंबे समय तक कॉर्निया को रगड़ती रहें, तो कॉर्निया पर खरोंच (corneal abrasion) आ सकती है। खरोंच में संक्रमण होने पर कॉर्नियल अल्सर बन सकता है। गंभीर मामलों में कॉर्निया पर स्थायी निशान पड़ जाते हैं, जिससे दृष्टि कम हो सकती है या हमेशा के लिए जा सकती है। इसलिए इस समस्या को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

एक्ट्रोपियन क्या है?

एक्ट्रोपियन में पलक का किनारा आँख से दूर, बाहर की ओर मुड़ जाता है। इससे पलक के भीतर की गुलाबी परत खुली दिखने लगती है और निचली पलक नीचे लटकी हुई नज़र आती है। पलक आँख से ठीक से चिपकी नहीं रहती, इसलिए आँसू सही तरह से बह नहीं पाते और आँख की सतह सूखने लगती है।

एक्ट्रोपियन के प्रकार

1. आयु-संबंधी (Involutional) एक्ट्रोपियन: यह सबसे आम प्रकार है। बढ़ती उम्र में पलक की मांसपेशियाँ और स्नायु ढीले हो जाते हैं और पलक का भार उसे नीचे की ओर खींचने लगता है।

2. पक्षाघात-जन्य (Paralytic) एक्ट्रोपियन: चेहरे की नस (facial nerve) में लकवा होने पर पलक की मांसपेशी कमज़ोर हो जाती है। बेल्स पाल्सी, स्ट्रोक या चेहरे की सर्जरी के बाद ऐसा हो सकता है।

3. निशान-जन्य (Cicatricial) एक्ट्रोपियन: पलक की बाहरी त्वचा में सिकुड़न आने से पलक नीचे खिंच जाती है। जलने, चोट, त्वचा के रोग (जैसे एक्ज़िमा या डर्मेटाइटिस), त्वचा के कैंसर या पिछली सर्जरी के कारण ऐसा होता है।

4. यांत्रिक (Mechanical) एक्ट्रोपियन: पलक पर गाँठ, ट्यूमर या सूजन का वज़न पलक को नीचे खींच सकता है।

5. जन्मजात (Congenital) एक्ट्रोपियन: यह दुर्लभ है और कुछ आनुवंशिक स्थितियों या जन्मजात विकारों के साथ जुड़ा हो सकता है।

एक्ट्रोपियन के लक्षण

  • आँख से लगातार पानी बहना, क्योंकि आँसू की निकासी नली से बाहर की ओर बह जाते हैं
  • आँख में सूखापन, जलन और किरकिराहट
  • आँख और पलक के भीतरी हिस्से का लाल होना
  • रोशनी और हवा के प्रति संवेदनशीलता
  • निचली पलक का नीचे लटकना और भीतरी हिस्से का दिखना
  • पलक का मोटा और सूजा हुआ दिखना
  • गाल पर आँसू बहने से त्वचा में जलन या घाव

एक्ट्रोपियन की जटिलताएँ

पलक ठीक से बंद न होने के कारण कॉर्निया खुली रह जाती है और सूखने लगती है। इसे एक्सपोज़र केराटोपैथी कहते हैं। लंबे समय तक ऐसा रहने पर कॉर्निया में सूजन, संक्रमण, अल्सर और निशान बन सकते हैं। बार-बार होने वाला कंजंक्टिवाइटिस भी इस स्थिति की आम समस्या है।

दोनों में अंतर

बिंदुएंट्रोपियनएक्ट्रोपियन
पलक की स्थितिअंदर की ओर मुड़ी हुईबाहर की ओर लटकी हुई
मुख्य समस्याबरौनियों की कॉर्निया पर रगड़कॉर्निया का खुला रहना और सूखना
मुख्य लक्षणचुभन, दर्द, पानी बहनापानी बहना, सूखापन, लालिमा
सबसे आम कारणउम्र के साथ ढीलापनउम्र के साथ ढीलापन

जाँच कैसे होती है?

नेत्र रोग विशेषज्ञ (ophthalmologist) आमतौर पर आँख और पलकों की सामान्य जाँच से ही निदान कर लेते हैं। स्लिट लैम्प माइक्रोस्कोप से कॉर्निया पर किसी खरोंच या अल्सर की जाँच की जाती है। पलक की ढीलेपन की जाँच के लिए स्नैप-बैक टेस्ट किया जाता है, जिसमें निचली पलक को हल्का नीचे खींचकर छोड़ा जाता है और देखा जाता है कि वह कितनी जल्दी अपनी जगह पर लौटती है। पलक जितनी धीमी लौटे, ढीलापन उतना अधिक माना जाता है। कारण पता करने के लिए चेहरे की नस की जाँच या पलक के किसी घाव की जाँच भी की जा सकती है।

इलाज के विकल्प

अस्थायी और सहायक उपाय

शुरुआती अवस्था में या सर्जरी से पहले आँख को सुरक्षित रखने के लिए ये उपाय अपनाए जाते हैं:

  • कृत्रिम आँसू (Lubricating eye drops) और मलहम: आँख को नम रखते हैं और रगड़ या सूखेपन से होने वाली जलन घटाते हैं। रात को सोते समय मलहम लगाना उपयोगी होता है।
  • एंटीबायोटिक ड्रॉप्स: संक्रमण होने पर चिकित्सक की सलाह से दी जाती हैं।
  • चिकित्सकीय टेप या अस्थायी टाँके: एंट्रोपियन में पलक को अस्थायी रूप से सही दिशा में रखने के लिए इनका प्रयोग किया जा सकता है।
  • बोटुलिनम टॉक्सिन इंजेक्शन: कुछ मामलों में, ख़ासकर ऐंठन-जन्य एंट्रोपियन में, अस्थायी राहत के लिए दिया जाता है।
  • बैंडेज कॉन्टैक्ट लेंस: कॉर्निया को बरौनियों की रगड़ से बचाने के लिए लगाया जा सकता है।

ये उपाय केवल अस्थायी राहत देते हैं। पलक की बनावट की गड़बड़ी को स्थायी रूप से ठीक करने के लिए अक्सर सर्जरी ही एकमात्र उपाय होती है।

शल्य चिकित्सा (Surgery)

दोनों स्थितियों में सर्जरी का तरीका कारण पर निर्भर करता है।

आयु-संबंधी एंट्रोपियन और एक्ट्रोपियन में सबसे आम तरीका लेटरल टार्सल स्ट्रिप प्रक्रिया है, जिसमें पलक के बाहरी कोने के पास पलक को छोटा और कसा जाता है ताकि वह अपनी सही जगह पर टिकी रहे। एंट्रोपियन में पलक को खींचने वाली मांसपेशियों (retractors) को दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया भी की जाती है।

निशान-जन्य मामलों में अधिक जटिल सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है। एंट्रोपियन में पलक की भीतरी परत में सुधार या घुमाने की प्रक्रिया की जाती है, जबकि एक्ट्रोपियन में त्वचा की कमी को पूरा करने के लिए शरीर के किसी अन्य हिस्से (जैसे कान के पीछे या ऊपरी पलक) से त्वचा का ग्राफ्ट लगाया जाता है।

पक्षाघात-जन्य एक्ट्रोपियन में पहले नस के ठीक होने का इंतज़ार किया जाता है और तब तक आँख को नम रखा जाता है। ठीक न होने पर पलक को सहारा देने वाली सर्जरी की जाती है।

ये सर्जरी आमतौर पर स्थानीय एनेस्थीसिया में की जाती हैं और अधिकांश मामलों में मरीज़ उसी दिन घर जा सकता है। ऑपरेशन के बाद कुछ दिनों तक सूजन, नीलापन और हल्का दर्द रहना सामान्य है। चिकित्सक की बताई दवाइयाँ और मलहम नियमित रूप से लगाने चाहिए। सर्जरी की सफलता दर अच्छी है, हालाँकि कुछ मामलों में समस्या दोबारा उभर सकती है।

घरेलू देखभाल और बचाव

हालाँकि इन स्थितियों को पूरी तरह रोकना हमेशा संभव नहीं है, फिर भी कुछ सावधानियाँ मदद कर सकती हैं:

  • आँख को बार-बार या ज़ोर से न मलें, इससे पलक और ढीली हो सकती है।
  • आँख में चोट या जलन होने पर तुरंत इलाज कराएँ।
  • आँख के संक्रमण, जैसे ट्रेकोमा, का पूरा और समय पर इलाज कराएँ।
  • चेहरे पर लकवे की स्थिति में आँख की विशेष देखभाल करें और चिकित्सक से नियमित जाँच कराएँ।
  • धूप का चश्मा पहनें और धूल-हवा से आँखों को बचाएँ।
  • त्वचा पर होने वाले घाव या गाँठ को नज़रअंदाज़ न करें, क्योंकि निशान बनने से पलक की स्थिति बिगड़ सकती है।
  • बुज़ुर्ग लोग साल में एक बार आँखों की जाँच अवश्य कराएँ।

डॉक्टर से कब मिलें?

इन स्थितियों में बिना देरी के नेत्र रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें:

  • पलक का अंदर मुड़ना या बाहर लटकना दिखाई दे
  • आँख में लगातार चुभन, दर्द या लालिमा बनी रहे
  • आँख से लगातार पानी या गाढ़ा स्राव आए
  • दृष्टि धुंधली होने लगे
  • रोशनी सहन न हो
  • आँख में तेज़ दर्द के साथ सफ़ेद धब्बा दिखाई दे, जो कॉर्नियल अल्सर का संकेत हो सकता है

निष्कर्ष

एंट्रोपियन और एक्ट्रोपियन पलकों की स्थिति से जुड़ी ऐसी समस्याएँ हैं जो देखने में मामूली लग सकती हैं, पर आँख की सेहत पर गहरा असर डाल सकती हैं। एंट्रोपियन में बरौनियाँ कॉर्निया को खरोंचती हैं, जबकि एक्ट्रोपियन में आँख सूखकर असुरक्षित रह जाती है। दोनों ही स्थितियों में कॉर्निया के संक्रमण और स्थायी दृष्टि हानि का ख़तरा रहता है।

अच्छी बात यह है कि आधुनिक चिकित्सा में इनका प्रभावी इलाज उपलब्ध है। शुरुआती चरण में सही देखभाल और समय पर सर्जरी से पलक की स्थिति ठीक की जा सकती है और आँख को स्थायी नुकसान से बचाया जा सकता है। इसलिए पलकों में कोई भी असामान्य बदलाव दिखे, तो घरेलू नुस्खों के भरोसे न रहें और किसी योग्य नेत्र रोग विशेषज्ञ से जाँच अवश्य कराएँ।

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