इबोला वायरस रोग (Ebola Virus Disease)
प्रस्तावना
इबोला वायरस रोग (EVD) एक गंभीर और प्रायः घातक संक्रामक बीमारी है, जो इबोलावायरस वंश के विषाणुओं से फैलती है। पहले इसे “इबोला रक्तस्रावी बुखार” कहा जाता था। यह रोग मनुष्यों और बंदर, चिम्पैंजी, गोरिल्ला जैसे गैर-मानव प्राइमेट जानवरों, दोनों को प्रभावित करता है। इसकी सबसे बड़ी चिंता इसकी उच्च मृत्यु दर है। प्रकोप और वायरस के प्रकार के अनुसार औसतन लगभग 50 प्रतिशत मरीजों की मृत्यु हो जाती है, जबकि कुछ प्रकोपों में यह दर 25 से 90 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।
इबोला का नाम कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य की इबोला नदी के नाम पर पड़ा, जिसके निकट 1976 में इस बीमारी की पहली बार पहचान की गई थी। तब से अफ्रीका में समय-समय पर इसके प्रकोप होते रहे हैं। सबसे बड़ा प्रकोप 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में हुआ, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा।
इतिहास और प्रमुख प्रकोप
इबोला के दो प्रारंभिक प्रकोप 1976 में लगभग एक ही समय पर सामने आए। एक दक्षिण सूडान (तत्कालीन सूडान) के नजारा क्षेत्र में और दूसरा कांगो (तत्कालीन ज़ायरे) के यम्बुकु गाँव में। इसके बाद दशकों तक अफ्रीका के मध्य और पश्चिमी हिस्सों में छोटे-बड़े प्रकोप होते रहे।
सबसे विनाशकारी प्रकोप दिसंबर 2013 में गिनी से शुरू हुआ और लाइबेरिया तथा सिएरा लियोन तक फैल गया। इसमें लगभग 28,000 से अधिक मामले सामने आए और 11,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अगस्त 2014 में इसे “अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल” घोषित किया। कुछ मामले यूरोप और अमेरिका में भी पहुँचे, जिससे वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ी।
इसके बाद कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में 2018 से 2020 के बीच एक और बड़ा प्रकोप हुआ, जो उस देश के इतिहास का सबसे बड़ा प्रकोप माना जाता है। युगांडा में भी समय-समय पर इसके मामले सामने आते रहे हैं।
रोग का कारण और वायरस के प्रकार
इबोला का कारक फिलोविरिडे (Filoviridae) परिवार का एक धागे जैसी आकृति वाला RNA वायरस है। इबोलावायरस वंश में कई प्रजातियाँ हैं, जिनमें से मनुष्यों में रोग पैदा करने वाली प्रमुख प्रजातियाँ ये हैं:
- ज़ायरे इबोलावायरस (EBOV): सबसे घातक प्रजाति, जो अधिकांश बड़े प्रकोपों के लिए जिम्मेदार रही है।
- सूडान वायरस (SUDV)
- बुंदीबुग्यो वायरस (BDBV)
- ताई फॉरेस्ट वायरस (TAFV)
रेस्टन वायरस मुख्यतः जानवरों को प्रभावित करता है और मनुष्यों में गंभीर रोग उत्पन्न करता नहीं पाया गया है।
वायरस का प्राकृतिक स्रोत
माना जाता है कि इबोला वायरस का प्राकृतिक भंडार (रिज़र्वायर) फल खाने वाले चमगादड़ हैं, विशेषकर टेरोपोडिडे परिवार के चमगादड़। ये चमगादड़ वायरस को अपने शरीर में रखते हैं, पर स्वयं बीमार नहीं पड़ते। वहाँ से यह वायरस संक्रमित बंदरों, चिम्पैंजी, गोरिल्ला, वन-मृग और साही जैसे जानवरों तक पहुँच सकता है। जब लोग इन संक्रमित जानवरों को छूते हैं, मारते हैं या उनका मांस पकाते और खाते हैं, तो वायरस मनुष्यों में प्रवेश कर जाता है। इसे “स्पिलओवर घटना” कहते हैं।
संक्रमण कैसे फैलता है
एक बार मनुष्य संक्रमित हो जाए, तो यह रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है। संक्रमण मुख्यतः इन तरीकों से फैलता है:
- सीधा संपर्क: संक्रमित व्यक्ति के रक्त, लार, उल्टी, मल, पसीने, मूत्र, वीर्य या स्तन के दूध जैसे शारीरिक तरल पदार्थों से, टूटी हुई त्वचा या आँख, नाक, मुँह की श्लेष्मा झिल्ली के माध्यम से।
- दूषित वस्तुएँ: संक्रमित व्यक्ति के कपड़ों, बिस्तर, सुइयों और चिकित्सा उपकरणों के संपर्क से।
- शवों के संपर्क से: मृतक के शरीर में वायरस काफी समय तक सक्रिय रहता है। अंतिम संस्कार की कुछ पारंपरिक प्रथाओं, जैसे शव को छूना या नहलाना, ने कई प्रकोपों को फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई।
- स्वास्थ्यकर्मियों में संक्रमण: सुरक्षा उपकरणों के अभाव में चिकित्सक, नर्स और देखभाल करने वाले परिजन अत्यधिक जोखिम में रहते हैं।
- यौन संपर्क: ठीक हो चुके पुरुषों के वीर्य में वायरस महीनों तक पाया जा सकता है।
इबोला आमतौर पर हवा से नहीं फैलता और सामान्यतः तब तक संक्रामक नहीं होता जब तक व्यक्ति में लक्षण न दिखने लगें।
लक्षण
संक्रमण के बाद लक्षण दिखने में सामान्यतः 2 से 21 दिन लगते हैं, जिसे ऊष्मायन अवधि कहते हैं। आमतौर पर लक्षण 8 से 10 दिन में प्रकट होते हैं।
प्रारंभिक लक्षण:
- अचानक तेज बुखार
- अत्यधिक थकान और कमजोरी
- मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द
- सिरदर्द
- गले में खराश
बाद के लक्षण:
- उल्टी और दस्त
- पेट दर्द
- त्वचा पर चकत्ते
- गुर्दे और यकृत की कार्यक्षमता में कमी
- कुछ मामलों में आंतरिक और बाहरी रक्तस्राव
रक्तस्राव सभी मरीजों में नहीं होता, पर गंभीर अवस्था में अंगों की विफलता और सदमे की स्थिति बन सकती है। मृत्यु का मुख्य कारण प्रायः निर्जलीकरण, अंग विफलता और सदमा होता है।
निदान
इबोला के शुरुआती लक्षण मलेरिया, टाइफाइड, लासा बुखार और हैजा जैसी बीमारियों से मिलते-जुलते हैं, इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर निदान कठिन होता है। पुष्टि के लिए प्रयोगशाला जाँच आवश्यक है, जैसे:
- RT-PCR जाँच: रक्त में वायरस के आनुवंशिक पदार्थ की पहचान।
- एंटीजन-कैप्चर ELISA जाँच
- एंटीबॉडी जाँच
संदिग्ध मरीज के नमूने अत्यंत सावधानी से और उच्च जैव-सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं में जाँचे जाते हैं।
उपचार
लंबे समय तक इबोला का कोई विशिष्ट इलाज उपलब्ध नहीं था और उपचार केवल सहायक देखभाल तक सीमित था। इसमें शामिल हैं:
- ओरल या नस के द्वारा तरल पदार्थ देकर शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बनाए रखना
- ऑक्सीजन का स्तर और रक्तचाप बनाए रखना
- अन्य संक्रमणों का उपचार
- बुखार और दर्द का प्रबंधन
2019 में कांगो में हुए परीक्षणों के बाद दो मोनोक्लोनल एंटीबॉडी उपचार, इनमाज़ेब (Inmazeb) और एबांगा (Ebanga), ज़ायरे इबोलावायरस के उपचार में प्रभावी पाए गए और इन्हें मंजूरी मिली। इन्होंने मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी की है, विशेषकर जल्दी इलाज शुरू होने पर। शीघ्र निदान और तुरंत चिकित्सा देखभाल से जीवित रहने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
टीकाकरण
इबोला की रोकथाम में टीकों ने बड़ी सफलता दिलाई है। Ervebo (rVSV-ZEBOV) टीका, जिसे 2019 में मंजूरी मिली, ज़ायरे इबोलावायरस के विरुद्ध अत्यधिक प्रभावी पाया गया है। प्रकोप के दौरान “रिंग वैक्सीनेशन” की रणनीति अपनाई जाती है, जिसमें पुष्ट मरीज के संपर्क में आए लोगों और उनके संपर्क में आए लोगों को टीका लगाया जाता है। इससे संक्रमण की श्रृंखला तोड़ने में मदद मिलती है।
एक अन्य दो-खुराक वाला टीका (Zabdeno/Mvabea) भी विकसित किया गया है, जिसका उपयोग विशेष परिस्थितियों में होता है। सूडान वायरस जैसी अन्य प्रजातियों के लिए टीके अभी शोध और परीक्षण के चरणों में हैं, इसलिए ज़ायरे प्रजाति के टीके इन पर प्रभावी नहीं माने जाते।
रोकथाम और नियंत्रण
इबोला के नियंत्रण के लिए समुदाय, स्वास्थ्य प्रणाली और सरकारों के समन्वित प्रयास जरूरी हैं। प्रमुख उपाय इस प्रकार हैं:
व्यक्तिगत स्तर पर:
- प्रकोप वाले क्षेत्रों में जंगली जानवरों, विशेषकर चमगादड़ और बंदरों के संपर्क और उनके कच्चे या अधपके मांस के सेवन से बचना
- संक्रमित या संदिग्ध मरीजों और उनके शारीरिक तरल पदार्थों से सीधे संपर्क से बचना
- साबुन और पानी से बार-बार हाथ धोना
- लक्षण दिखने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लेना
स्वास्थ्य संस्थानों में:
- दस्ताने, गाउन, मास्क और चश्मे जैसे व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों (PPE) का उचित उपयोग
- मरीजों को अलग वार्ड में रखना (आइसोलेशन)
- सुइयों और उपकरणों का सुरक्षित निपटान और कीटाणुशोधन
सामुदायिक स्तर पर:
- संपर्क-अनुरेखण (कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग) और संपर्क में आए लोगों की 21 दिन तक निगरानी
- सुरक्षित और गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार की व्यवस्था
- जनजागरूकता अभियान और भ्रांतियों का निवारण
- हवाई अड्डों और सीमाओं पर स्क्रीनिंग
ठीक होने के बाद की स्थिति
इबोला से बचे लोगों को लंबे समय तक कुछ स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जैसे जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, थकान, सिरदर्द, आँखों की समस्याएँ (जैसे यूवाइटिस) और दृष्टि हानि। इन्हें “पोस्ट-इबोला सिंड्रोम” कहा जाता है। इसके अलावा बचे हुए लोगों को सामाजिक कलंक और भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है, इसलिए उन्हें चिकित्सकीय के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सहयोग की भी आवश्यकता होती है। ठीक हुए व्यक्ति के कुछ शारीरिक तरल पदार्थों में वायरस लंबे समय तक रह सकता है, इसलिए सुरक्षित यौन व्यवहार की सलाह दी जाती है।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
इबोला केवल स्वास्थ्य संकट नहीं है, बल्कि इसका गहरा सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी होता है। 2014 के प्रकोप में प्रभावित देशों की कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ चरमरा गईं, बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मियों की जान गई, स्कूल बंद हुए और कृषि, व्यापार तथा पर्यटन को भारी नुकसान पहुँचा। अनेक बच्चे अनाथ हुए। साथ ही, इस दौरान अन्य बीमारियों जैसे मलेरिया और प्रसव संबंधी जटिलताओं के इलाज में बाधा आने से भी अतिरिक्त मौतें हुईं। यह अनुभव बताता है कि मजबूत स्वास्थ्य तंत्र और जनता का विश्वास किसी भी महामारी से लड़ने की बुनियाद हैं।
भारत के संदर्भ में
भारत में इबोला का कोई स्थानीय प्रकोप नहीं हुआ है। 2014 के प्रकोप के दौरान भारत ने हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग, संदिग्ध यात्रियों की निगरानी और विशेष आइसोलेशन व्यवस्था जैसे एहतियाती कदम उठाए थे। कुछ मामलों में प्रभावित देशों से लौटे यात्रियों की जाँच की गई। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) और पुणे स्थित राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान जैसी संस्थाएँ ऐसी उच्च जोखिम वाली बीमारियों की निगरानी और जाँच में भूमिका निभाती हैं। वैश्विक आवागमन के इस दौर में सतर्कता और तैयारी बनाए रखना आवश्यक है।
निष्कर्ष
इबोला वायरस रोग एक गंभीर बीमारी है, पर यह अब पूरी तरह लाइलाज नहीं रही। प्रभावी टीकों और नई चिकित्सा पद्धतियों ने स्थिति को काफी बदला है। फिर भी इसकी रोकथाम का सबसे बड़ा आधार शीघ्र पहचान, मरीजों का त्वरित पृथक्करण, संपर्कों की निगरानी, सुरक्षित स्वास्थ्य प्रथाएँ और समुदाय की भागीदारी है। भ्रांतियों और भय को दूर कर सही जानकारी का प्रसार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भविष्य में ऐसे प्रकोपों से निपटने के लिए मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली, वैश्विक सहयोग, निरंतर अनुसंधान और वन्यजीवों के साथ मनुष्य के संपर्क के प्रति सावधानी अनिवार्य है। जागरूकता और सतर्कता ही इबोला जैसी बीमारियों के विरुद्ध हमारा सबसे सशक्त हथियार है।
नोट: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी चिंता के लिए योग्य चिकित्सक या स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों से परामर्श करें।
