एटिपिकल एचयूएस (Atypical Hemolytic Uremic Syndrome - aHUS)
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एटिपिकल हीमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम (Atypical HUS)

परिचय

एटिपिकल हीमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम, जिसे संक्षेप में aHUS कहा जाता है, एक अत्यंत दुर्लभ लेकिन गंभीर आनुवंशिक (genetic) बीमारी है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) का “कॉम्प्लीमेंट सिस्टम” नामक हिस्सा अनियंत्रित होकर अति-सक्रिय हो जाता है और शरीर की छोटी-छोटी रक्त वाहिकाओं (blood vessels) पर हमला करने लगता है। इसके परिणामस्वरूप रक्त की छोटी वाहिकाओं में असामान्य रक्त के थक्के (microthrombi) बनने लगते हैं, जिससे रक्त कोशिकाओं का विनाश होता है, प्लेटलेट्स की संख्या घटती है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि गुर्दे (kidneys) को गंभीर नुकसान पहुँचता है।

यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है — शिशुओं से लेकर वयस्कों तक — लेकिन यह इतनी दुर्लभ है कि दुनिया भर में प्रति दस लाख लोगों में केवल कुछ ही मामले पाए जाते हैं। समय पर पहचान और उपचार न होने पर यह जानलेवा साबित हो सकती है, इसलिए इसके बारे में जागरूकता बहुत ज़रूरी है।

एटिपिकल HUS और सामान्य HUS में अंतर

HUS यानी हीमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम मुख्यतः दो प्रकार का होता है:

  1. टिपिकल HUS (Typical HUS) – यह आमतौर पर E. coli बैक्टीरिया (विशेषकर STEC — Shiga toxin-producing E. coli) से होने वाले संक्रमण के बाद होता है, जो अक्सर दूषित भोजन या पानी से फैलता है। यह बच्चों में अधिक देखा जाता है और अक्सर दस्त (diarrhea) के बाद शुरू होता है।
  2. एटिपिकल HUS (aHUS) – यह संक्रमण से जुड़ा नहीं होता, बल्कि यह मुख्य रूप से आनुवंशिक कारणों से होता है। इसमें शरीर का कॉम्प्लीमेंट सिस्टम, जो सामान्यतः संक्रमण से लड़ने में मदद करता है, अनियंत्रित होकर खुद के शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाने लगता है। यह किसी भी उम्र में हो सकता है और बार-बार (relapsing) भी हो सकता है।

कारण (Causes)

aHUS का मुख्य कारण कॉम्प्लीमेंट सिस्टम में अनियमितता है। कॉम्प्लीमेंट सिस्टम प्रतिरक्षा प्रणाली का एक हिस्सा है जो सामान्यतः बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक तत्वों को नष्ट करने में मदद करता है। लेकिन कुछ लोगों में जन्म से ही इस सिस्टम को नियंत्रित करने वाले जीन्स (genes) में उत्परिवर्तन (mutation) होता है, जैसे:

  • CFH (Complement Factor H)
  • CFI (Complement Factor I)
  • MCP/CD46 (Membrane Cofactor Protein)
  • C3
  • CFB (Complement Factor B)
  • THBD (Thrombomodulin)

इन जीन्स में गड़बड़ी होने पर कॉम्प्लीमेंट सिस्टम अनियंत्रित होकर सक्रिय हो जाता है और शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं, विशेषकर रक्त वाहिकाओं की भीतरी परत (endothelium), पर हमला करने लगता है।

हालाँकि, केवल जीन में गड़बड़ी होना हमेशा बीमारी को ट्रिगर नहीं करता। अक्सर किसी अतिरिक्त कारण (trigger) की ज़रूरत होती है, जैसे:

  • कोई सामान्य संक्रमण (वायरल या बैक्टीरियल)
  • गर्भावस्था (pregnancy) और प्रसव के बाद की अवधि
  • सर्जरी या कोई बड़ी चोट
  • कुछ दवाइयाँ
  • ऑटोइम्यून बीमारियाँ
  • अंग प्रत्यारोपण (organ transplant)

लक्षण (Symptoms)

aHUS के लक्षण अचानक शुरू हो सकते हैं और तेज़ी से गंभीर रूप ले सकते हैं। इसके तीन मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं, जिन्हें चिकित्सा भाषा में “ट्रायड” कहा जाता है:

1. हीमोलिटिक एनीमिया (Hemolytic Anemia)

रक्त की छोटी वाहिकाओं में थक्के बनने के कारण लाल रक्त कोशिकाएँ टूटने लगती हैं। इससे व्यक्ति को थकान, कमजोरी, त्वचा का पीला पड़ना, और कभी-कभी पीलिया (jaundice) जैसे लक्षण दिखते हैं।

2. थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (Thrombocytopenia)

प्लेटलेट्स का स्तर तेज़ी से गिरता है, जिससे शरीर पर नीले निशान (bruises), त्वचा पर छोटे लाल धब्बे (petechiae), नाक या मसूड़ों से खून बहना जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।

3. एक्यूट किडनी इंजरी (Acute Kidney Injury)

गुर्दों की छोटी रक्त वाहिकाओं में थक्के बनने से गुर्दे की कार्यक्षमता तेज़ी से घटती है। इसके लक्षणों में शामिल हैं:

  • पेशाब की मात्रा में कमी
  • शरीर, खासकर पैरों और चेहरे पर सूजन (edema)
  • रक्तचाप का बढ़ना (high blood pressure)
  • अत्यधिक थकान
  • मतली और उल्टी

इसके अलावा, कुछ मरीज़ों में तंत्रिका तंत्र (nervous system) से जुड़े लक्षण भी दिख सकते हैं, जैसे दौरे (seizures), भ्रम की स्थिति (confusion), या स्ट्रोक। हृदय और फेफड़ों पर भी असर पड़ सकता है क्योंकि यह बीमारी शरीर के कई अंगों को एक साथ प्रभावित कर सकती है (multi-organ involvement)।

निदान (Diagnosis)

aHUS का निदान करना चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते हैं, जैसे थ्रोम्बोटिक थ्रोम्बोसाइटोपेनिक पर्पुरा (TTP) और टिपिकल HUS। इसलिए डॉक्टर आमतौर पर निम्नलिखित जाँचों का सहारा लेते हैं:

  • संपूर्ण रक्त परीक्षण (CBC) – हीमोग्लोबिन और प्लेटलेट्स के स्तर की जाँच के लिए
  • पेरिफेरल ब्लड स्मीयर – रक्त कोशिकाओं के असामान्य आकार (schistocytes) देखने के लिए
  • LDH और हैप्टोग्लोबिन टेस्ट – हीमोलिसिस की पुष्टि के लिए
  • किडनी फंक्शन टेस्ट – क्रिएटिनिन और यूरिया के स्तर की जाँच
  • ADAMTS13 एंजाइम टेस्ट – यह TTP को बाहर करने के लिए किया जाता है (aHUS में यह सामान्यतः सामान्य रहता है)
  • STEC टेस्ट (स्टूल टेस्ट) – टिपिकल HUS को बाहर करने के लिए
  • कॉम्प्लीमेंट स्तर की जाँच – C3, C4 और अन्य कॉम्प्लीमेंट प्रोटीन के स्तर देखने के लिए
  • जेनेटिक टेस्टिंग – संबंधित जीन्स में उत्परिवर्तन की पुष्टि के लिए, हालाँकि इसका परिणाम आने में समय लगता है और उपचार शुरू करने से पहले इसका इंतज़ार नहीं किया जाता

उपचार (Treatment)

aHUS एक आपातकालीन (emergency) स्थिति है, और जल्द से जल्द उपचार शुरू करना जीवन बचाने के लिए ज़रूरी होता है।

1. कॉम्प्लीमेंट इनहिबिटर थेरेपी

आधुनिक चिकित्सा में aHUS के उपचार में सबसे बड़ी प्रगति मोनोक्लोनल एंटीबॉडी दवाओं के रूप में आई है, जो कॉम्प्लीमेंट सिस्टम की अतिसक्रियता को रोकती हैं। इनमें प्रमुख हैं:

  • एकुलिज़ुमैब (Eculizumab)
  • रावुलिज़ुमैब (Ravulizumab)

ये दवाएँ कॉम्प्लीमेंट प्रोटीन C5 को ब्लॉक करके रक्त वाहिकाओं को होने वाले नुकसान को रोकती हैं। इन दवाओं के आने के बाद aHUS के मरीज़ों के जीवित रहने की दर और किडनी की सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

2. प्लाज़्मा थेरेपी

पहले, जब कॉम्प्लीमेंट इनहिबिटर उपलब्ध नहीं थे, तब प्लाज़्मा एक्सचेंज (plasmapheresis) या प्लाज़्मा इन्फ्यूजन का उपयोग किया जाता था। हालाँकि यह उपचार सभी मरीज़ों में समान रूप से प्रभावी नहीं होता।

3. सहायक उपचार (Supportive Care)

  • गंभीर मामलों में डायलिसिस (dialysis) की आवश्यकता पड़ सकती है
  • रक्तचाप को नियंत्रित रखने के लिए दवाइयाँ
  • ज़रूरत पड़ने पर रक्त और प्लेटलेट्स चढ़ाना
  • पोषण और तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखना

4. किडनी प्रत्यारोपण

यदि किडनी पूरी तरह से फेल हो जाए, तो किडनी ट्रांसप्लांट की ज़रूरत पड़ सकती है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि बिना उचित दवा सुरक्षा के, प्रत्यारोपित किडनी में भी बीमारी दोबारा हो सकती है, इसलिए ट्रांसप्लांट से पहले और बाद में कॉम्प्लीमेंट इनहिबिटर थेरेपी दी जाती है।

टीकाकरण संबंधी सावधानियाँ

चूँकि एकुलिज़ुमैब और रावुलिज़ुमैब जैसी दवाएँ कॉम्प्लीमेंट सिस्टम को दबाती हैं, इससे मेनिंगोकोकल बैक्टीरिया (Neisseria meningitidis) से गंभीर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए इन दवाओं को शुरू करने से पहले मरीज़ों को मेनिंगोकोकल वैक्सीन लगवाने की सलाह दी जाती है, और कई बार एहतियात के तौर पर एंटीबायोटिक्स भी दी जाती हैं।

पूर्वानुमान (Prognosis)

पहले, कॉम्प्लीमेंट इनहिबिटर उपलब्ध न होने की वजह से, aHUS के लगभग आधे मरीज़ों में किडनी फेलियर या मृत्यु जैसी गंभीर जटिलताएँ देखी जाती थीं। लेकिन आधुनिक उपचार के आने के बाद स्थिति में काफी सुधार हुआ है। समय पर निदान और उपचार शुरू होने पर अधिकांश मरीज़ों की किडनी की कार्यक्षमता बचाई जा सकती है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाई जा सकती है।

हालाँकि, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि यह बीमारी दोबारा भी हो सकती है (relapsing nature), इसलिए मरीज़ों को लंबे समय तक नियमित जाँच और डॉक्टर की निगरानी में रहना पड़ता है।

निष्कर्ष

एटिपिकल हीमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम एक दुर्लभ लेकिन गंभीर आनुवंशिक बीमारी है, जो कॉम्प्लीमेंट सिस्टम की अनियमितता के कारण होती है। इसके शुरुआती लक्षण सामान्य लग सकते हैं, लेकिन यह तेज़ी से गुर्दे की गंभीर क्षति और जानलेवा जटिलताओं का कारण बन सकती है। समय पर पहचान, सही निदान परीक्षण, और आधुनिक कॉम्प्लीमेंट इनहिबिटर थेरेपी की मदद से इस बीमारी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। यदि परिवार में इस बीमारी का इतिहास हो या अचानक एनीमिया, प्लेटलेट्स में गिरावट और किडनी संबंधी समस्याएँ एक साथ दिखें, तो तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

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