वैरिकोसील (अंडकोष की नसों की सूजन): कारण, लक्षण, जाँच और इलाज
परिचय
पुरुषों के स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याओं पर लोग खुलकर बात नहीं करते, और इसी झिझक की वजह से बीमारी बढ़ती चली जाती है। वैरिकोसील ऐसी ही एक आम स्थिति है। अनुमान है कि लगभग 15 प्रतिशत पुरुषों में यह किसी न किसी रूप में पाई जाती है। कई लोगों को जीवन भर इसका पता ही नहीं चलता, जबकि कुछ में यह दर्द, अंडकोष के छोटे होने और पिता बनने में कठिनाई का कारण बन जाती है। इस लेख में हम वैरिकोसील के हर पहलू को सरल भाषा में समझेंगे।
वैरिकोसील क्या है?
अंडकोष की थैली (स्क्रोटम) में शुक्राणु बनाने वाले वृषण (टेस्टिस) होते हैं। इन तक खून पहुँचाने और वापस ले जाने के लिए नसों का एक जाल होता है, जिसे पैम्पिनिफॉर्म प्लेक्सस कहते हैं। जब इस जाल की नसें फूलकर चौड़ी और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं, तो इस स्थिति को वैरिकोसील कहा जाता है। यह वैसी ही स्थिति है जैसी कई लोगों की टाँगों में वैरिकोज़ वेन्स के रूप में दिखती है।
सामान्य रूप से नसों में छोटे-छोटे वाल्व होते हैं, जो खून को केवल एक दिशा, यानी हृदय की ओर, बहने देते हैं। जब ये वाल्व कमज़ोर या खराब हो जाते हैं, तो खून उलटा बहकर नसों में जमा होने लगता है। इससे नसें फूल जाती हैं और अंडकोष का तापमान बढ़ जाता है। शुक्राणु बनने के लिए वृषण को शरीर के सामान्य तापमान से थोड़ा कम तापमान चाहिए, इसलिए बढ़ा हुआ तापमान शुक्राणुओं के निर्माण पर बुरा असर डालता है।
यह किसे और कहाँ होता है?
वैरिकोसील अधिकतर किशोरावस्था और युवावस्था में, यानी लगभग 15 से 25 वर्ष की उम्र के बीच विकसित होती है। लगभग 80 से 90 प्रतिशत मामलों में यह बाईं ओर होती है। इसका कारण शरीर की बनावट है: बाईं ओर की वृषण नस एक समकोण पर बाईं गुर्दे की नस में जुड़ती है, जहाँ दबाव अधिक रहता है, जबकि दाईं नस सीधे बड़ी नस में मिलती है। यदि केवल दाईं ओर वैरिकोसील दिखे या अचानक उभरे, तो डॉक्टर पेट के भीतर किसी गाँठ या रुकावट की संभावना भी जाँचते हैं।
मुख्य कारण
वैरिकोसील का सटीक कारण हमेशा स्पष्ट नहीं होता, पर नीचे दिए गए कारक इससे जुड़े माने जाते हैं:
- नसों के वाल्वों का जन्म से कमज़ोर या अविकसित होना।
- बाईं वृषण नस की बनावट, जिसमें दबाव अधिक रहता है।
- पारिवारिक प्रवृत्ति: यदि पिता या भाई को यह समस्या रही हो, तो जोखिम बढ़ जाता है।
- पेट में ऊँचा दबाव बनाने वाली स्थितियाँ, जैसे लंबे समय की कब्ज़ और बार-बार भारी वज़न उठाना।
- गुर्दे या पेट की किसी गाँठ का नस पर दबाव डालना (दुर्लभ)।
लक्षण
अधिकांश पुरुषों में वैरिकोसील कोई लक्षण नहीं दिखाती और किसी जाँच के दौरान संयोग से पकड़ में आती है। जब लक्षण होते हैं, तो वे इस प्रकार हो सकते हैं:
- अंडकोष में भारीपन या खिंचाव का अहसास।
- हल्का, सुस्त दर्द, जो खड़े रहने, चलने, व्यायाम या दिन के अंत में बढ़ जाता है और लेटने पर कम होता है।
- थैली में नसों के गुच्छे जैसी उभरी हुई संरचना, जिसे अक्सर “कीड़ों की थैली” जैसा महसूस होने के रूप में बताया जाता है।
- एक अंडकोष का दूसरे की तुलना में छोटा पड़ना (वृषण का सिकुड़ना)।
- थैली का एक ओर ज़्यादा लटका हुआ दिखना।
- पिता बनने में कठिनाई या शुक्राणुओं की गुणवत्ता में कमी।
वैरिकोसील के ग्रेड
डॉक्टर जाँच के दौरान इसे तीन श्रेणियों में बाँटते हैं:
- ग्रेड 1: केवल तब महसूस होती है जब व्यक्ति गहरी साँस रोककर ज़ोर लगाता है (वैल्साल्वा क्रिया)।
- ग्रेड 2: बिना ज़ोर लगाए हाथ से छूने पर महसूस होती है।
- ग्रेड 3: थैली की त्वचा के ऊपर से ही साफ़ दिखाई देती है।
ग्रेड हमेशा लक्षणों की गंभीरता से मेल नहीं खाता। कभी-कभी छोटी वैरिकोसील में भी शुक्राणुओं पर असर दिख सकता है।
प्रजनन क्षमता पर प्रभाव
पुरुषों में बाँझपन के सबसे आम पहचाने जा सकने वाले कारणों में वैरिकोसील गिनी जाती है। जिन पुरुषों को पहली बार संतान प्राप्ति में दिक्कत होती है, उनमें से लगभग 35 से 40 प्रतिशत में वैरिकोसील मिलती है, और दूसरी बार संतान की चाह वाले पुरुषों में यह आँकड़ा और अधिक होता है। इसके असर इस प्रकार हो सकते हैं:
- शुक्राणुओं की संख्या में कमी।
- शुक्राणुओं की गति (मोटिलिटी) कमज़ोर होना।
- शुक्राणुओं के आकार में असामान्यता।
- शुक्राणुओं के डीएनए को नुकसान।
- टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के स्तर में कमी (कुछ मामलों में)।
यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि वैरिकोसील वाले हर पुरुष को बाँझपन नहीं होता। बहुत से पुरुष सामान्य रूप से संतान पैदा कर पाते हैं।
जाँच कैसे होती है?
शारीरिक परीक्षण: यूरोलॉजिस्ट खड़ी और लेटी दोनों स्थितियों में अंडकोष की जाँच करते हैं और वैल्साल्वा क्रिया करवाकर नसों की स्थिति देखते हैं।
स्क्रोटल अल्ट्रासाउंड (कलर डॉप्लर): यह सबसे उपयोगी जाँच है। इससे नसों का आकार, खून का उलटा बहाव और वृषण का आकार मापा जाता है। यह छोटी वैरिकोसील और वृषण के आकार में अंतर भी पकड़ लेती है।
वीर्य विश्लेषण: जिन्हें संतान की योजना है या शुक्राणुओं को लेकर चिंता है, उन्हें यह जाँच करवाई जाती है। सही तस्वीर के लिए आमतौर पर दो या अधिक नमूनों की जाँच की जाती है।
हार्मोन जाँच: ज़रूरत होने पर टेस्टोस्टेरोन, एफएसएच और एलएच जैसे हार्मोन की जाँच की जाती है।
इलाज के विकल्प
इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति की उम्र क्या है, लक्षण कैसे हैं, शुक्राणुओं की स्थिति कैसी है और भविष्य में संतान की योजना है या नहीं।
1. निगरानी और सतर्क प्रतीक्षा
यदि वैरिकोसील छोटी है, कोई दर्द नहीं है और वीर्य की रिपोर्ट सामान्य है, तो अक्सर तुरंत इलाज की ज़रूरत नहीं होती। ऐसे में डॉक्टर नियमित अंतराल पर जाँच की सलाह देते हैं। किशोरों में खास तौर पर वृषण के आकार पर नज़र रखी जाती है, क्योंकि यदि प्रभावित वृषण का विकास रुक रहा हो, तो इलाज पर विचार करना पड़ता है।
2. दर्द के लिए दवाएँ और सहारा
हल्के दर्द में डॉक्टर की सलाह से दर्द निवारक दवाएँ ली जा सकती हैं। सहारा देने वाले अंडरवियर या सपोर्टर पहनने से भी आराम मिल सकता है। ध्यान रहे कि दवाएँ केवल लक्षणों में राहत देती हैं, ये बढ़ी हुई नसों को ठीक नहीं करतीं।
3. सर्जरी
जब निम्न स्थितियाँ हों, तब सर्जरी की सलाह दी जाती है:
- लगातार या तेज़ दर्द जो रोज़मर्रा के काम में बाधा डाले।
- वीर्य की रिपोर्ट असामान्य होना और संतान की योजना होना।
- किशोर में वृषण का स्पष्ट रूप से छोटा होना।
सबसे प्रचलित तरीका माइक्रोसर्जिकल वैरिकोसेलेक्टॉमी है। इसमें सूक्ष्मदर्शी की मदद से प्रभावित नसों को बाँध दिया जाता है, ताकि खून स्वस्थ नसों से बहे। इसमें बीमारी के दोबारा लौटने और पानी जमने (हाइड्रोसील) की संभावना अन्य तरीकों की तुलना में कम रहती है। लैपरोस्कोपिक विधि भी इस्तेमाल की जाती है। ये ऑपरेशन आम तौर पर डे-केयर होते हैं और मरीज़ को उसी दिन या अगले दिन छुट्टी मिल जाती है।
4. एम्बोलाइज़ेशन
इसमें कमर या गर्दन की नस के रास्ते एक बहुत पतली नली डालकर प्रभावित नस को कॉइल या विशेष पदार्थ से बंद कर दिया जाता है। इसमें चीरा नहीं लगता और रिकवरी जल्दी होती है, लेकिन यह हर अस्पताल में उपलब्ध नहीं होती।
इलाज के बाद क्या उम्मीद करें?
सर्जरी के बाद कई पुरुषों के शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता में सुधार देखा जाता है, पर यह सुधार कुछ महीनों में आता है। इसलिए लगभग तीन से छह महीने बाद वीर्य की दोबारा जाँच की जाती है। दर्द के मामलों में अधिकांश मरीज़ों को राहत मिलती है। परिणाम हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं और सुधार की कोई गारंटी नहीं दी जा सकती।
हर सर्जरी की तरह इसमें भी कुछ जोखिम हो सकते हैं, जैसे संक्रमण, सूजन, हाइड्रोसील बनना या कभी-कभी वैरिकोसील का दोबारा उभरना। अनुभवी सर्जन से ऑपरेशन करवाने पर ये जोखिम काफ़ी कम हो जाते हैं।
जीवनशैली और देखभाल
जीवनशैली में बदलाव वैरिकोसील को पूरी तरह ठीक नहीं करते, पर समग्र स्वास्थ्य और शुक्राणुओं की गुणवत्ता के लिए उपयोगी हैं:
- कब्ज़ से बचने के लिए रेशेदार भोजन (फल, सब्ज़ियाँ, दालें) और पर्याप्त पानी लें।
- भारी वज़न उठाते समय बहुत ज़ोर लगाने से बचें।
- वज़न नियंत्रित रखें और नियमित हल्का व्यायाम करें।
- बहुत देर तक लगातार खड़े रहने से बचें।
- तंग कपड़े पहनने की जगह आरामदायक, सहारा देने वाले अंतर्वस्त्र चुनें।
- धूम्रपान, तंबाकू और अत्यधिक शराब से दूर रहें, क्योंकि ये शुक्राणुओं को और नुकसान पहुँचाते हैं।
- गोद में लैपटॉप रखकर लंबे समय तक काम करने या बहुत गर्म पानी में देर तक नहाने से बचें।
डॉक्टर से कब मिलें?
निम्न स्थितियों में बिना देरी किसी यूरोलॉजिस्ट से मिलें:
- अंडकोष में लगातार दर्द, सूजन या भारीपन।
- थैली में कोई गाँठ या असामान्य उभार महसूस होना।
- एक अंडकोष का दूसरे से स्पष्ट रूप से छोटा होना।
- एक साल या उससे अधिक समय तक कोशिश के बाद भी संतान न होना।
- अचानक तेज़ दर्द होना। यह वृषण के मुड़ने (टेस्टिकुलर टॉर्शन) जैसी आपात स्थिति हो सकती है, जिसमें कुछ घंटों के भीतर इलाज ज़रूरी है।
- लेटने पर भी वैरिकोसील का न घटना, या केवल दाईं ओर अचानक उभरना।
आम भ्रांतियाँ
भ्रांति: वैरिकोसील का मतलब है कि पुरुष संतान पैदा नहीं कर सकता। सच: अधिकांश पुरुषों की प्रजनन क्षमता सामान्य रहती है। केवल एक हिस्से में समस्या होती है।
भ्रांति: यह यौन संबंधों या हस्तमैथुन से होती है। सच: इसका संबंध नसों के वाल्वों की बनावट से है, किसी यौन आदत से नहीं।
भ्रांति: यह कैंसर में बदल जाती है। सच: वैरिकोसील कैंसर नहीं है और आमतौर पर कैंसर में नहीं बदलती। फिर भी थैली में कोई नई गाँठ मिले तो जाँच अवश्य करवाएँ।
भ्रांति: सर्जरी के बाद पुरुषत्व या यौन क्षमता प्रभावित होती है। सच: सर्जरी का यौन इच्छा या स्तंभन क्षमता पर बुरा असर नहीं पड़ता।
निष्कर्ष
वैरिकोसील एक आम और अधिकतर मामलों में नियंत्रित की जा सकने वाली स्थिति है। यदि इसमें कोई लक्षण न हों और संतान संबंधी कोई चिंता न हो, तो केवल निगरानी पर्याप्त हो सकती है। लेकिन दर्द, वृषण का सिकुड़ना या शुक्राणुओं में गड़बड़ी जैसे संकेत मिलने पर समय पर जाँच और इलाज बहुत फ़र्क़ ला सकता है। शर्म या झिझक छोड़कर योग्य यूरोलॉजिस्ट से सलाह लें, क्योंकि जितनी जल्दी समस्या पहचानी जाती है, उतने बेहतर परिणाम मिलते हैं।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है। निदान और इलाज के लिए हमेशा योग्य चिकित्सक से परामर्श करें।
