सबग्लॉटिक स्टेनोसिस (Subglottic Stenosis - श्वासनली के ऊपरी हिस्से का सिकुड़ना)
| | |

सबग्लॉटिक स्टेनोसिस (Subglottic Stenosis): श्वासनली के ऊपरी हिस्से का सिकुड़ना

परिचय

साँस लेना हमारे लिए इतनी सहज क्रिया है कि जब तक इसमें रुकावट न आए, हम इसके बारे में सोचते भी नहीं। लेकिन कुछ लोगों में स्वर यंत्र (वॉयस बॉक्स) के ठीक नीचे वाला हिस्सा सिकुड़ जाता है और हवा के आने-जाने का रास्ता तंग हो जाता है। इस स्थिति को सबग्लॉटिक स्टेनोसिस कहते हैं। यह बच्चों और वयस्कों, दोनों में हो सकती है और कई बार इसे अस्थमा या बार-बार होने वाले क्रुप (croup) की बीमारी समझ लिया जाता है, जिससे सही इलाज में देरी हो जाती है।

इस लेख में हम जानेंगे कि सबग्लॉटिक स्टेनोसिस क्या है, यह क्यों होता है, इसके लक्षण क्या हैं, इसकी जाँच कैसे होती है और इसका इलाज क्या है।

सबग्लॉटिक क्षेत्र क्या है?

हमारे गले में स्वर यंत्र (लैरिंक्स) होता है, जिसमें स्वर-तंतु (वोकल कॉर्ड्स) स्थित होते हैं। स्वर-तंतुओं वाले हिस्से को “ग्लॉटिस” कहते हैं। इसके ठीक नीचे, क्रिकॉइड कार्टिलेज तक का हिस्सा सबग्लॉटिस कहलाता है, और उसके नीचे श्वासनली (ट्रेकिया) शुरू होती है।

यह क्षेत्र पूरे श्वसन मार्ग का सबसे संकरा स्थान है, क्योंकि क्रिकॉइड कार्टिलेज एक पूरी अंगूठी की तरह होती है जो फैल नहीं सकती। इसलिए यहाँ ज़रा-सी सूजन या घाव भी हवा के रास्ते को बहुत तंग कर सकता है। बच्चों में यह रास्ता पहले से ही छोटा होता है, इसलिए एक मिलीमीटर की सूजन भी गंभीर रुकावट पैदा कर सकती है।

सबग्लॉटिक स्टेनोसिस क्या है?

जब इस क्षेत्र में घाव के ऊतक (स्कार टिशू), सूजन या बनावट की गड़बड़ी के कारण हवा का रास्ता सामान्य से संकरा हो जाए, तो उसे सबग्लॉटिक स्टेनोसिस कहते हैं। रुकावट हल्की हो सकती है, जिसमें केवल मेहनत करने पर साँस फूलती है, या इतनी गंभीर कि जान को खतरा हो जाए।

सबग्लॉटिक स्टेनोसिस के प्रकार

1. जन्मजात (Congenital): कुछ बच्चे जन्म से ही संकरे सबग्लॉटिस के साथ पैदा होते हैं। इसका कारण भ्रूण के विकास के दौरान क्रिकॉइड कार्टिलेज की बनावट में गड़बड़ी होता है। जन्मजात मामले अक्सर शुरुआती महीनों में पकड़ में आते हैं।

2. अर्जित (Acquired): यह सबसे आम प्रकार है। यह जन्म के बाद किसी चोट, संक्रमण या चिकित्सा प्रक्रिया के कारण होता है।

3. इडियोपैथिक (Idiopathic): कुछ वयस्कों, विशेषकर मध्यम आयु की महिलाओं में, बिना किसी स्पष्ट कारण के यह समस्या विकसित हो जाती है। इसे इडियोपैथिक सबग्लॉटिक स्टेनोसिस कहा जाता है। माना जाता है कि इसमें हार्मोनल और सूजन संबंधी कारण भूमिका निभा सकते हैं।

प्रमुख कारण

लंबे समय तक इंटुबेशन (वेंटिलेटर): अर्जित स्टेनोसिस का सबसे बड़ा कारण यही है। जब किसी को साँस की नली (एंडोट्रेकियल ट्यूब) डालकर कई दिनों तक वेंटिलेटर पर रखा जाता है, तो ट्यूब के दबाव से सबग्लॉटिस की नाज़ुक परत को चोट पहुँचती है। घाव भरते समय स्कार बन जाता है, जो धीरे-धीरे सिकुड़कर रास्ते को तंग कर देता है। समय से पहले जन्मे बच्चे (प्रीमैच्योर शिशु), जिन्हें लंबे समय तक वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ती है, इसके प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

ऑटोइम्यून और सूजन संबंधी रोग: ग्रैनुलोमेटोसिस विद पॉलीएंजाइटिस (पहले वेगनर्स ग्रैनुलोमेटोसिस), सारकॉइडोसिस और रिलैप्सिंग पॉलीकॉन्ड्राइटिस जैसी बीमारियाँ इस क्षेत्र में सूजन और स्कार पैदा कर सकती हैं।

गैस्ट्रोएसोफेजियल रिफ्लक्स (GERD): पेट का एसिड ऊपर आकर गले के नाज़ुक ऊतकों को लगातार जलाता रहे तो स्टेनोसिस की संभावना बढ़ सकती है या मौजूदा समस्या बिगड़ सकती है।

गले की चोट या सर्जरी: गर्दन पर चोट, जलना या पहले हुई गले की सर्जरी भी कारण बन सकती है।

संक्रमण: बार-बार या गंभीर संक्रमण से सूजन और घाव बन सकते हैं।

लक्षण

लक्षण रुकावट की मात्रा पर निर्भर करते हैं। शुरुआत में ये हल्के होते हैं और धीरे-धीरे बढ़ते हैं, इसलिए अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाते हैं।

  • स्ट्राइडर (Stridor): साँस लेते समय तेज़ आवाज़ या सीटी जैसी आवाज़ आना, जो इस रोग का प्रमुख लक्षण है
  • मेहनत करने, चलने या सीढ़ियाँ चढ़ने पर साँस फूलना
  • लगातार खाँसी
  • आवाज़ में बदलाव या भारीपन
  • बार-बार “क्रुप” या छाती के संक्रमण होना
  • दवा से ठीक न होने वाला “अस्थमा”
  • बच्चों में साँस लेते समय पसलियों के बीच या गले के गड्ढे में त्वचा का अंदर धँसना, दूध पीने में कठिनाई और वज़न न बढ़ना

चेतावनी: अगर किसी को साँस लेने में बहुत तकलीफ़ हो, होंठ या चेहरा नीला पड़ने लगे या बच्चा सुस्त हो जाए, तो यह आपातकाल है। तुरंत अस्पताल पहुँचें।

निदान कैसे होता है?

सही निदान के लिए ईएनटी (कान-नाक-गला) विशेषज्ञ या लैरिंगोलॉजिस्ट की ज़रूरत होती है। आमतौर पर ये जाँचें की जाती हैं:

फ्लेक्सिबल लैरिंगोस्कोपी: नाक के रास्ते एक पतली कैमरे वाली नली डालकर स्वर-तंतुओं और उसके आसपास का हिस्सा देखा जाता है। इससे स्वर-तंतुओं की गतिविधि की जाँच होती है।

डायरेक्ट लैरिंगो-ब्रोंकोस्कोपी: यह सबसे भरोसेमंद जाँच है। इसे आमतौर पर एनेस्थीसिया देकर ऑपरेशन थिएटर में किया जाता है। इसमें सिकुड़न की जगह, लंबाई और गंभीरता को सीधे देखा और मापा जा सकता है।

सीटी स्कैन: सिकुड़न की लंबाई और आसपास की संरचनाओं की जानकारी देता है।

पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट: फेफड़ों की कार्यक्षमता और हवा के प्रवाह की जाँच के लिए, खासकर वयस्कों में।

रक्त जाँच: यदि ऑटोइम्यून बीमारी का संदेह हो।

गंभीरता का वर्गीकरण: स्टेनोसिस को आमतौर पर मायर-कॉटन (Myer-Cotton) प्रणाली से चार ग्रेड में बाँटा जाता है। ग्रेड 1 में 50% तक रुकावट होती है और ग्रेड 4 में रास्ता लगभग पूरी तरह बंद होता है। ग्रेड से इलाज की दिशा तय होती है।

उपचार के विकल्प

इलाज रुकावट की गंभीरता, उसकी लंबाई, मरीज की उम्र और सामान्य स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।

1. निगरानी

बहुत हल्के मामलों में, जब लक्षण न के बराबर हों, डॉक्टर नियमित जाँच के साथ केवल निगरानी की सलाह दे सकते हैं। रिफ्लक्स की दवाएँ भी दी जा सकती हैं।

2. एंडोस्कोपिक उपचार

कम गंभीर और छोटी रुकावट में मुँह के रास्ते, बिना बाहरी चीरे के इलाज संभव है:

  • बैलून डाइलेटेशन: संकरे हिस्से में गुब्बारा डालकर उसे धीरे-धीरे फुलाया जाता है ताकि रास्ता चौड़ा हो सके।
  • लेज़र से स्कार काटना: स्कार टिशू को लेज़र से काटकर रास्ता खोला जाता है।
  • स्टेरॉयड इंजेक्शन: सूजन और स्कार दोबारा बनने की संभावना कम करने के लिए।
  • मिटोमाइसिन-C: कुछ मामलों में स्कार दोबारा बनने से रोकने के लिए स्थानीय रूप से लगाई जाती है।

इन प्रक्रियाओं के बाद कई बार दोबारा सिकुड़न हो सकती है, इसलिए कभी-कभी इन्हें दोहराना पड़ता है।

3. खुली सर्जरी (Open Airway Surgery)

गंभीर और लंबी रुकावट में पुनर्निर्माण सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है:

  • लैरिंगोट्रैकियल रीकंस्ट्रक्शन (LTR): इसमें पसली से लिया गया कार्टिलेज का टुकड़ा सिकुड़े हुए हिस्से में लगाकर रास्ता चौड़ा किया जाता है। कभी-कभी कुछ समय के लिए अस्थायी सहारे वाली नली (स्टेंट) रखी जाती है।
  • क्रिको-ट्रैकियल रीसेक्शन (CTR): इसमें सिकुड़ा हुआ हिस्सा निकालकर स्वस्थ श्वासनली को ऊपर के हिस्से से जोड़ दिया जाता है। यह जटिल लेकिन अच्छे परिणाम वाली सर्जरी है, जो अनुभवी विशेषज्ञ ही करते हैं।

4. ट्रेकियोस्टोमी

जब रुकावट बहुत गंभीर हो या अन्य तरीके संभव न हों, तो गर्दन में एक छोटा छेद बनाकर नली डाली जाती है, जिससे मरीज सीधे साँस ले सके। यह कई मरीजों में अस्थायी समाधान होता है, जब तक अंतिम सर्जरी न हो जाए।

5. अंतर्निहित रोग का इलाज

यदि कारण ऑटोइम्यून रोग है, तो उसकी दवाएँ (स्टेरॉयड और इम्यूनोसप्रेसेंट) और रिफ्लक्स का नियंत्रण भी इलाज का ज़रूरी हिस्सा है।

संभावित जटिलताएँ

अगर समय पर इलाज न हो तो साँस लेने में गंभीर तकलीफ़, बार-बार संक्रमण, बच्चों में विकास और पोषण की समस्या, और आपातकालीन स्थिति में साँस रुकने का खतरा हो सकता है। सर्जरी के बाद आवाज़ में बदलाव, निगलने में दिक्कत या दोबारा सिकुड़न जैसी समस्याएँ भी संभव हैं, जिनकी जानकारी सर्जन से पहले ही ले लेनी चाहिए।

रोकथाम

हर मामले को रोकना संभव नहीं, पर कुछ कदम जोखिम घटा सकते हैं:

  • वेंटिलेटर पर रखे गए मरीजों, खासकर नवजात शिशुओं में सही आकार की ट्यूब का उपयोग और कम से कम समय तक इंटुबेशन
  • लंबे समय तक इंटुबेशन होने पर समय पर विशेषज्ञ की राय
  • रिफ्लक्स का उचित नियंत्रण
  • ऑटोइम्यून रोगों का नियमित इलाज
  • इंटुबेशन के बाद साँस की आवाज़ या खाँसी में बदलाव पर तुरंत ध्यान देना

डॉक्टर से कब मिलें?

इन स्थितियों में देर न करें:

  • साँस लेते समय लगातार आवाज़ आए
  • “अस्थमा” का इलाज करने पर भी राहत न मिले
  • वेंटिलेटर या इंटुबेशन के बाद साँस की तकलीफ़ बनी रहे
  • बच्चा बार-बार क्रुप से पीड़ित हो
  • साँस फूलना धीरे-धीरे बढ़ता जाए

निष्कर्ष

सबग्लॉटिक स्टेनोसिस एक गंभीर लेकिन इलाज योग्य स्थिति है। चूँकि इसके लक्षण अस्थमा जैसे दिखते हैं, इसलिए सही निदान में अक्सर देर हो जाती है। जिन्हें पहले वेंटिलेटर पर रहना पड़ा हो या जिनकी साँस की समस्या दवाओं से ठीक न हो रही हो, उन्हें ईएनटी विशेषज्ञ से जाँच ज़रूर करानी चाहिए। आधुनिक एंडोस्कोपिक तकनीकों और पुनर्निर्माण सर्जरी से अधिकांश मरीज बेहतर और सामान्य जीवन जी पाते हैं। समय पर पहचान और अनुभवी विशेषज्ञ की देखरेख सबसे महत्वपूर्ण है।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *