ओन्कोमाइकोसिस (नाखून का फंगल संक्रमण): कारण, लक्षण, इलाज और बचाव
परिचय
क्या आपके पैर या हाथ के नाखून का रंग पीला या भूरा पड़ने लगा है? क्या नाखून मोटा, भंगुर और बदसूरत दिखने लगा है? अगर हाँ, तो यह ओन्कोमाइकोसिस (Onychomycosis) हो सकता है, जिसे आम भाषा में नाखून का फंगल संक्रमण कहा जाता है। यह दुनिया भर में नाखूनों की सबसे आम बीमारियों में से एक है। अनुमान है कि नाखूनों की लगभग आधी समस्याओं के पीछे यही संक्रमण होता है।
यह संक्रमण हाथ के नाखूनों की तुलना में पैर के नाखूनों में कहीं ज़्यादा होता है, क्योंकि जूते-मोज़ों के भीतर की गर्म और नम जगह फंगस के पनपने के लिए अनुकूल होती है। शुरुआत में लोग इसे केवल सौंदर्य की समस्या समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, लेकिन समय पर इलाज न कराने पर यह बढ़ सकता है, दर्द दे सकता है और दूसरे नाखूनों व त्वचा तक फैल सकता है।
ओन्कोमाइकोसिस क्या है?
ओन्कोमाइकोसिस नाखून, नाखून के नीचे की त्वचा (नेल बेड) या नाखून की जड़ (नेल मैट्रिक्स) में होने वाला फंगल संक्रमण है। इसके लिए मुख्यतः तीन प्रकार के फंगस ज़िम्मेदार होते हैं:
- डर्मेटोफाइट्स: सबसे आम कारण, जैसे ट्राइकोफाइटन रुब्रम। यही एथलीट फुट (पैरों की दाद) भी करता है।
- यीस्ट (कैंडिडा): खासकर उन लोगों में जिनके हाथ बार-बार पानी में रहते हैं।
- नॉन-डर्मेटोफाइट मोल्ड्स: कुछ अन्य फफूंद, जो कम मामलों में ज़िम्मेदार होते हैं।
फंगस नाखून में मौजूद केराटिन नामक प्रोटीन को अपना भोजन बनाता है। इसी कारण नाखून की बनावट और रंग बिगड़ने लगते हैं।
ओन्कोमाइकोसिस के कारण
फंगस हमारे आसपास हर जगह मौजूद रहता है। यह त्वचा में मामूली कट या नाखून और त्वचा के बीच की छोटी दरार से भीतर प्रवेश कर जाता है। संक्रमण फैलने के प्रमुख कारण ये हैं:
- नमी और गर्मी: लंबे समय तक गीले या पसीने से भरे जूते-मोज़े पहनना।
- सार्वजनिक स्थान: स्विमिंग पूल, जिम, सामुदायिक बाथरूम और सैलून में नंगे पैर चलना।
- नाखूनों को चोट: बार-बार नाखून पर चोट लगना, या गलत तरीके से नाखून काटना।
- एथलीट फुट: पैरों की त्वचा का फंगल संक्रमण नाखूनों तक फैल सकता है।
- साझा वस्तुएँ: नेल कटर, तौलिया या चप्पल दूसरों के साथ साझा करना।
- नेल पॉलिश और आर्टिफिशियल नाखून: इनके नीचे नमी फँस जाती है।
जोखिम कारक
कुछ लोगों में यह संक्रमण होने की संभावना अधिक रहती है:
- बढ़ती उम्र: 50 वर्ष के बाद नाखूनों में रक्त संचार घटता है और नाखून धीमे बढ़ते हैं।
- डायबिटीज़ (मधुमेह): इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता और पैरों में रक्त प्रवाह कम हो जाता है।
- कमज़ोर रोग प्रतिरोधक क्षमता: एचआईवी, कैंसर के इलाज या स्टेरॉयड के लंबे सेवन की स्थिति में।
- पैरों में रक्त संचार की समस्या: जैसे पेरिफेरल आर्टरी डिज़ीज़।
- सोरायसिस: इसमें नाखून पहले से कमज़ोर होते हैं।
- पसीना अधिक आना (हाइपरहाइड्रोसिस)।
- धूम्रपान करना।
- पेशा: जिनके हाथ बार-बार पानी में रहते हैं (गृहिणियाँ, बर्तन धोने वाले) या जो दिन भर बंद जूते पहनते हैं (सैनिक, खिलाड़ी, फैक्ट्री कर्मचारी)।
- परिवार में यह समस्या होना: आनुवंशिक प्रवृत्ति भी भूमिका निभाती है।
लक्षण
शुरुआत में संक्रमण नाखून के किनारे या सिरे पर एक छोटे सफ़ेद या पीले धब्बे के रूप में दिखता है। धीरे-धीरे यह गहराई तक फैलता है। सामान्य लक्षण हैं:
- नाखून का रंग सफ़ेद, पीला, भूरा या कभी-कभी काला पड़ना
- नाखून का मोटा हो जाना
- नाखून का भंगुर होकर टूटना या किनारों से भुरभुरा होना
- नाखून का आकार बिगड़ जाना या टेढ़ा हो जाना
- नाखून का त्वचा से अलग होकर उठ जाना (ओन्कोलाइसिस)
- नाखून के नीचे मलबे जैसा पदार्थ जमा होना
- नाखून से हल्की दुर्गंध आना
- संक्रमित नाखून पर दबाव पड़ने पर दर्द होना, खासकर जूते पहनने पर
ओन्कोमाइकोसिस के प्रकार
लक्षणों और संक्रमण की जगह के आधार पर इसके कई प्रकार होते हैं:
1. डिस्टल लेटरल सबअनगुअल (DLSO): सबसे आम प्रकार। संक्रमण नाखून के सिरे से शुरू होकर जड़ की ओर बढ़ता है।
2. सफ़ेद सतही (WSO): नाखून की ऊपरी सतह पर सफ़ेद, खुरदरे धब्बे बनते हैं।
3. प्रॉक्सिमल सबअनगुअल (PSO): संक्रमण नाखून की जड़ से शुरू होता है। यह कम आम है और अक्सर कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में दिखता है।
4. कैंडिडल ओन्कोमाइकोसिस: यीस्ट के कारण होता है और अक्सर नाखून के आसपास सूजन के साथ दिखता है।
निदान (जाँच)
हर पीला या बदरंग नाखून फंगल संक्रमण नहीं होता। सोरायसिस, नाखून की चोट, लाइकेन प्लेनस और कुछ अन्य बीमारियाँ भी मिलते-जुलते लक्षण दे सकती हैं। इसलिए इलाज शुरू करने से पहले जाँच ज़रूरी है। त्वचा रोग विशेषज्ञ (डर्मेटोलॉजिस्ट) आमतौर पर ये जाँचें कराते हैं:
- KOH टेस्ट: नाखून के टुकड़े या खुरचन को पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड में रखकर माइक्रोस्कोप से देखा जाता है।
- फंगल कल्चर: फंगस की प्रजाति की पहचान के लिए नमूने को प्रयोगशाला में उगाया जाता है।
- PAS स्टेन या पीसीआर जाँच: अधिक सटीक पहचान के लिए।
इलाज
इस संक्रमण का इलाज धैर्य माँगता है। नाखून बहुत धीमे बढ़ते हैं, इसलिए पूरी तरह ठीक होने में कई महीने लग सकते हैं। पैर के नाखून को पूरी तरह नया होने में 12 से 18 महीने तक लग सकते हैं, जबकि हाथ के नाखून में आमतौर पर 4 से 6 महीने।
1. खाने की एंटीफंगल दवाएँ
मध्यम से गंभीर संक्रमण में डॉक्टर आमतौर पर टेरबिनाफिन या इट्राकोनाज़ोल जैसी दवाएँ देते हैं, जो कई हफ्तों तक ली जाती हैं। ये सबसे प्रभावी मानी जाती हैं। चूँकि इनका असर लिवर पर पड़ सकता है और ये कुछ दवाओं से प्रतिक्रिया कर सकती हैं, इसलिए इन्हें केवल डॉक्टर की देखरेख में ही लें। लिवर की बीमारी या अन्य दवाएँ लेने वालों को खास सावधानी रखनी चाहिए।
2. लगाने वाली दवाएँ
हल्के संक्रमण या केवल नाखून की ऊपरी परत के संक्रमण में एंटीफंगल नेल लैकर (जैसे एमोरोल्फिन, सिक्लोपिरोक्स) या सॉल्यूशन (जैसे एफिनाकोनाज़ोल) प्रयोग की जाती हैं। इनका असर धीमा होता है और इन्हें महीनों तक नियमित लगाना पड़ता है।
3. लेज़र थेरेपी
कुछ केंद्रों में लेज़र से इलाज किया जाता है। यह अपेक्षाकृत नया विकल्प है। इसके नतीजे अलग-अलग मरीज़ों में भिन्न रहते हैं और यह महँगा भी हो सकता है, इसलिए इसके बारे में डॉक्टर से विस्तार से बात करें।
4. नाखून की सफ़ाई (डिब्रिडमेंट)
डॉक्टर संक्रमित और मोटे नाखून को काटकर या घिसकर पतला कर सकते हैं, जिससे दवा बेहतर असर करती है और दर्द भी घटता है।
5. नाखून निकालना
बहुत गंभीर या दर्दनाक मामलों में, जब दवाएँ काम न करें, तो नाखून को शल्य क्रिया या रसायन से निकाला जा सकता है। इसके बाद नया नाखून उगता है।
घरेलू उपाय: क्या सच में असरदार हैं?
लोग अक्सर टी ट्री ऑयल, विनेगर, बेकिंग सोडा, लहसुन, नीम का तेल और विक्स वेपोरब जैसे घरेलू नुस्खे आज़माते हैं। इनमें से कुछ पर छोटे स्तर के अध्ययन हुए हैं, लेकिन इनके असर के पक्के और पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। हल्के संक्रमण में ये सहायक हो सकते हैं, पर इन पर पूरी तरह निर्भर रहना ठीक नहीं। कई बार लोग महीनों घरेलू नुस्खों में लगे रहते हैं और संक्रमण बढ़ जाता है। इसलिए घरेलू उपाय को डॉक्टर के इलाज के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि अधिक से अधिक साथ में अपनाने वाली चीज़ के रूप में देखें।
जटिलताएँ
अगर संक्रमण को अनदेखा किया जाए, तो ये परेशानियाँ हो सकती हैं:
- नाखून का स्थायी रूप से खराब हो जाना
- चलने या जूता पहनने में दर्द
- संक्रमण का अन्य नाखूनों या आसपास की त्वचा में फैलना
- त्वचा में बैक्टीरियल संक्रमण (सेल्युलाइटिस)
- डायबिटीज़ के मरीज़ों में विशेष खतरा: पैरों में घाव और गंभीर संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है, इसलिए उन्हें बिना देरी डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
बचाव के उपाय
रोकथाम इलाज से कहीं आसान है। इन आदतों को अपनाएँ:
- पैरों को साफ़ और सूखा रखें। नहाने के बाद उँगलियों के बीच अच्छी तरह पोंछें।
- सूती या नमी सोखने वाले मोज़े पहनें और पसीना आने पर बदलें।
- हवादार जूते चुनें और एक ही जोड़ी रोज़ न पहनें, ताकि जूते सूख सकें।
- सार्वजनिक जगहों पर चप्पल पहनें, जैसे पूल, जिम या साझा बाथरूम में।
- नाखून सीधे और छोटे काटें। किनारों को बहुत गहराई तक न काटें।
- अपने नेल कटर और फाइल को साफ़ रखें और किसी से साझा न करें।
- पैरों की दाद (एथलीट फुट) का तुरंत इलाज कराएँ।
- नेल सैलून चुनते समय सावधान रहें। औज़ारों की सफ़ाई सुनिश्चित करें।
- नेल पॉलिश का लगातार लंबे समय तक इस्तेमाल न करें।
- पुराने संक्रमित जूतों को एंटीफंगल पाउडर या स्प्रे से उपचारित करें।
- डायबिटीज़ को नियंत्रण में रखें और पैरों की नियमित जाँच करें।
डॉक्टर के पास कब जाएँ?
निम्न स्थितियों में त्वचा रोग विशेषज्ञ से ज़रूर मिलें:
- नाखून का रंग या बनावट बदलना शुरू हो जाए
- दर्द, सूजन, लालिमा या मवाद हो
- घरेलू उपाय से कुछ हफ्तों में सुधार न दिखे
- आपको डायबिटीज़ हो या प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो
- संक्रमण एक से अधिक नाखूनों में फैलने लगे
ठीक होने के बाद दोबारा संक्रमण से कैसे बचें?
यह संक्रमण दोबारा लौट आना आम बात है। ऐसे मामले अक्सर तब होते हैं जब इलाज बीच में छोड़ दिया जाता है या पुराने जूते-मोज़े इस्तेमाल होते रहते हैं। पूरा इलाज डॉक्टर के बताए समय तक जारी रखें, पुराने जूतों को कीटाणुरहित करें या बदलें, और ऊपर बताए बचाव के तरीके लगातार अपनाते रहें।
निष्कर्ष
ओन्कोमाइकोसिस भले ही जानलेवा बीमारी न हो, लेकिन यह असुविधा, दर्द और आत्मविश्वास में कमी का कारण बन सकती है। इसका इलाज लंबा और धैर्य वाला होता है, इसलिए जितनी जल्दी पहचान और इलाज शुरू होगा, नतीजे उतने बेहतर होंगे। पैरों की स्वच्छता, सही जूते-मोज़े और सार्वजनिक स्थानों पर सावधानी जैसी सरल आदतें इस संक्रमण से काफ़ी हद तक बचा सकती हैं। अगर आपके नाखूनों में कोई असामान्य बदलाव दिखे, तो खुद से इलाज करने या इंतज़ार करने के बजाय किसी योग्य त्वचा रोग विशेषज्ञ से सलाह लें।
