फैब्री रोग (Fabry Disease): कारण, लक्षण, निदान और उपचार
परिचय
फैब्री रोग एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें शरीर की कोशिकाओं में एक विशेष प्रकार की वसा धीरे-धीरे जमा होने लगती है। इसे एंडरसन-फैब्री रोग भी कहा जाता है। इसका नाम जर्मन त्वचा-रोग विशेषज्ञ योहानेस फैब्री और अंग्रेज़ चिकित्सक विलियम एंडरसन के नाम पर पड़ा, जिन्होंने वर्ष 1898 में स्वतंत्र रूप से इसका वर्णन किया था। यह “लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर” नामक बीमारियों के समूह में आता है।
इस रोग के लक्षण गठिया, गुर्दे की बीमारी, हृदय रोग और पेट की समस्याओं जैसे कई आम रोगों से मिलते-जुलते हैं। इसलिए सही निदान में अक्सर कई साल लग जाते हैं। फिर भी समय पर पहचान और उपचार से गंभीर जटिलताओं को काफ़ी हद तक रोका या टाला जा सकता है।
फैब्री रोग क्यों होता है?
हमारी कोशिकाओं के भीतर “लाइसोसोम” नाम की छोटी संरचनाएँ होती हैं। ये कोशिका के कचरे और अनावश्यक पदार्थों को तोड़कर साफ़ करने का काम करती हैं। इस काम के लिए लाइसोसोम में अनेक एंज़ाइम मौजूद रहते हैं। इन्हीं में से एक है अल्फा-गैलेक्टोसिडेज़ ए (α-Gal A)।
फैब्री रोग में GLA नामक जीन में बदलाव (म्यूटेशन) हो जाता है। इस जीन से ही उपर्युक्त एंज़ाइम बनता है। जीन में गड़बड़ी के कारण एंज़ाइम या तो बनता ही नहीं, या बहुत कम मात्रा में बनता है, या ठीक से काम नहीं करता। नतीजतन ग्लोबोट्रायोसिलसेरामाइड (Gb3) और उससे जुड़ा पदार्थ लाइसो-Gb3 टूट नहीं पाते और कोशिकाओं में जमा होते जाते हैं। यह जमाव रक्त वाहिकाओं की दीवारों, गुर्दे, हृदय, तंत्रिकाओं और त्वचा जैसे कई अंगों को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाता है।
आनुवंशिकता: यह रोग कैसे फैलता है?
GLA जीन X गुणसूत्र पर स्थित होता है, इसलिए फैब्री रोग “X-लिंक्ड” तरीके से विरासत में मिलता है। इसके नियम इस प्रकार हैं:
- यदि पिता को यह रोग है, तो उसकी सभी बेटियों में बदला हुआ जीन आएगा, जबकि बेटों में नहीं आएगा (क्योंकि बेटों को पिता से Y गुणसूत्र मिलता है)।
- यदि माँ में बदला हुआ जीन है, तो हर संतान, चाहे बेटा हो या बेटी, में उसके पहुँचने की संभावना 50 प्रतिशत होती है।
पहले माना जाता था कि यह रोग मुख्यतः पुरुषों को होता है और महिलाएँ केवल “वाहक” होती हैं। अब यह स्पष्ट है कि कई महिलाओं में भी लक्षण विकसित होते हैं, कभी हल्के और कभी पुरुषों जितने गंभीर। महिलाओं में लक्षणों की तीव्रता इस पर निर्भर करती है कि उनकी कोशिकाओं में कौन-सा X गुणसूत्र अधिक सक्रिय है।
इसकी घटना के आँकड़े अलग-अलग अध्ययनों में भिन्न हैं। शास्त्रीय रूप लगभग 40,000 से 1,00,000 पुरुषों में से एक को प्रभावित करता है। लेकिन नवजात शिशुओं की जाँच पर आधारित अध्ययनों में हल्के या देर से शुरू होने वाले रूप कहीं अधिक पाए गए हैं, इसलिए वास्तविक संख्या शायद इससे ज़्यादा है।
फैब्री रोग के प्रकार
1. शास्त्रीय (Classic) रूप: इसमें एंज़ाइम की गतिविधि लगभग न के बराबर होती है। लक्षण बचपन या किशोरावस्था में ही शुरू हो जाते हैं और अंगों को नुकसान समय के साथ बढ़ता जाता है।
2. देर से शुरू होने वाला (Late-onset) रूप: इसमें कुछ एंज़ाइम गतिविधि बची रहती है। लक्षण वयस्क उम्र में, अक्सर 30 से 60 वर्ष के बीच, दिखते हैं और प्रायः किसी एक अंग, विशेषकर हृदय या गुर्दे, पर केंद्रित होते हैं।
प्रमुख लक्षण
फैब्री रोग एक बहु-तंत्रीय (multisystem) रोग है, यानी यह शरीर के कई हिस्सों को प्रभावित करता है।
तंत्रिका और दर्द: बचपन में हाथ-पैरों में जलन, चुभन या झनझनाहट वाला दर्द सबसे शुरुआती लक्षणों में है। इसे “एक्रोपेरेस्थीसिया” कहते हैं। बुखार, गर्मी, व्यायाम या तनाव के दौरान यह दर्द अचानक तेज़ हो सकता है, जिसे “फैब्री क्राइसिस” कहा जाता है।
पसीने में कमी: कई रोगियों को पसीना बहुत कम आता है या बिल्कुल नहीं आता, जिससे गर्मी और व्यायाम सहन करना कठिन हो जाता है।
त्वचा: पेट के निचले हिस्से, कमर और जाँघों के आसपास छोटे, गहरे लाल-बैंगनी दाने उभर सकते हैं, जिन्हें “एंजियोकेराटोमा” कहते हैं।
आँख और कान: आँख की कॉर्निया पर भँवर जैसा पैटर्न (कॉर्निया वर्टिसिलाटा) बन सकता है, जो आमतौर पर दृष्टि को प्रभावित नहीं करता, पर निदान का महत्वपूर्ण सुराग होता है। कानों में घंटी बजने जैसी आवाज़ (टिनिटस) और सुनने की क्षमता में कमी भी हो सकती है।
पाचन तंत्र: खाने के बाद पेट दर्द, ऐंठन, दस्त, मतली और जल्दी पेट भरा लगना जैसी शिकायतें आम हैं। इन्हें अक्सर “इरिटेबल बाउल सिंड्रोम” समझ लिया जाता है।
गुर्दे: शुरुआत में पेशाब में प्रोटीन (प्रोटीन्यूरिया) आता है। समय के साथ गुर्दों की कार्यक्षमता घटती है और अंततः क्रोनिक किडनी रोग या गुर्दे की विफलता हो सकती है।
हृदय: हृदय की माँसपेशियाँ मोटी हो जाती हैं (लेफ्ट वेंट्रिकुलर हाइपरट्रॉफी)। इससे साँस फूलना, सीने में दर्द, धड़कन की अनियमितता और हृदय की विफलता हो सकती है।
मस्तिष्क: कम उम्र में भी स्ट्रोक या टीआईए (क्षणिक इस्कीमिक अटैक) का खतरा बढ़ जाता है।
इनके अलावा थकान, अवसाद और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट भी आम है, क्योंकि लंबे समय तक दर्द और अनिश्चितता मानसिक रूप से थका देती है।
निदान कैसे किया जाता है?
फैब्री रोग की पहचान में डॉक्टर का सतर्क रहना बहुत ज़रूरी है। यदि किसी युवा में अकारण हाथ-पैरों में जलन, गुर्दे की समस्या, हृदय की माँसपेशी का मोटा होना या कम उम्र में स्ट्रोक हो, और परिवार में ऐसा इतिहास हो, तो इस रोग पर विचार करना चाहिए। जाँचें इस प्रकार हैं:
- एंज़ाइम गतिविधि की जाँच: रक्त (प्लाज़्मा, श्वेत रक्त कोशिकाओं या सूखे रक्त के धब्बे) में α-Gal A की गतिविधि मापी जाती है। पुरुषों में यह जाँच काफ़ी भरोसेमंद है।
- आनुवंशिक जाँच (GLA जीन परीक्षण): महिलाओं में एंज़ाइम की मात्रा सामान्य के करीब भी निकल सकती है, इसलिए उनमें निदान की पुष्टि जीन परीक्षण से होती है।
- लाइसो-Gb3 बायोमार्कर: रक्त में इसका स्तर रोग की सक्रियता समझने में मदद करता है।
- अंगों की जाँच: गुर्दे के लिए पेशाब में प्रोटीन और eGFR, हृदय के लिए ईसीजी, इको और MRI, तथा मस्तिष्क के लिए MRI जैसी जाँचें की जाती हैं। कभी-कभी गुर्दे की बायोप्सी भी होती है।
- परिवार की जाँच (Cascade Screening): एक व्यक्ति में रोग की पुष्टि होने पर उसके रक्त-संबंधियों की जाँच करना बेहद ज़रूरी है, ताकि बिना लक्षण वाले सदस्यों की भी समय रहते पहचान हो सके।
उपचार के विकल्प
फैब्री रोग का उपचार अब उपलब्ध है और यह रोग की प्रगति को धीमा कर सकता है।
1. एंज़ाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ERT): इसमें नस के माध्यम से (आमतौर पर हर दो हफ़्ते में) कृत्रिम रूप से बनाया गया एंज़ाइम दिया जाता है। इसके लिए एगैल्सिडेज़ अल्फ़ा, एगैल्सिडेज़ बीटा और हाल ही में स्वीकृत पेगुनिगैल्सिडेज़ अल्फ़ा जैसी दवाएँ उपलब्ध हैं। ये शरीर में जमा Gb3 को घटाने में मदद करती हैं।
2. चैपरोन थेरेपी: माइगालैस्टैट नामक मुँह से ली जाने वाली दवा उन रोगियों के लिए है जिनके जीन में विशिष्ट प्रकार का बदलाव (amenable mutation) है। यह शरीर के अपने एंज़ाइम को स्थिर करके उसे बेहतर काम करने में मदद करती है। सभी रोगी इसके लिए उपयुक्त नहीं होते, इसलिए पहले जीन जाँच आवश्यक है।
3. सहायक (Symptomatic) उपचार:
- नस-दर्द के लिए कार्बामेज़ेपिन या गैबापेंटिन जैसी दवाएँ।
- प्रोटीन्यूरिया और रक्तचाप के नियंत्रण के लिए ACE इनहिबिटर या ARB दवाएँ।
- हृदय की अनियमित धड़कन के लिए दवाएँ, और ज़रूरत पड़ने पर पेसमेकर या ICD।
- स्ट्रोक की रोकथाम के लिए रक्त पतला करने वाली दवाएँ, जैसा चिकित्सक उचित समझें।
- गुर्दे की विफलता की स्थिति में डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण।
4. शोध के अधीन उपचार: सबस्ट्रेट रिडक्शन थेरेपी और जीन थेरेपी जैसे नए तरीकों पर अनुसंधान चल रहा है, जो भविष्य में उम्मीद जगाते हैं।
उपचार जितनी जल्दी शुरू हो, अंगों को स्थायी नुकसान से बचाने की संभावना उतनी बेहतर होती है। इलाज आमतौर पर एक बहु-विशेषज्ञ टीम की देखरेख में होता है, जिसमें आनुवंशिकी विशेषज्ञ, नेफ्रोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट और न्यूरोलॉजिस्ट शामिल होते हैं।
दैनिक जीवन और सावधानियाँ
- अत्यधिक गर्मी और कठिन शारीरिक श्रम से बचें, क्योंकि पसीना कम आने से शरीर का तापमान बढ़ सकता है।
- पर्याप्त पानी पिएँ और दर्द भड़काने वाली स्थितियों (तनाव, बुखार, थकान) को पहचानकर उनसे बचने की कोशिश करें।
- नियमित रूप से गुर्दे, हृदय और मस्तिष्क की जाँच कराते रहें।
- धूम्रपान न करें और रक्तचाप तथा कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें।
- मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें। परामर्श और रोगी सहायता समूह बहुत मददगार हो सकते हैं।
- परिवार नियोजन से पहले आनुवंशिक परामर्श लें।
पूर्वानुमान (Prognosis)
बिना इलाज के फैब्री रोग जीवन-प्रत्याशा को घटा सकता है, क्योंकि गुर्दे, हृदय और मस्तिष्क की जटिलताएँ गंभीर रूप ले लेती हैं। लेकिन आधुनिक उपचारों और नियमित निगरानी से आज कई रोगी लंबा और अपेक्षाकृत सामान्य जीवन जी रहे हैं। इसलिए रोग की जल्दी पहचान ही सबसे अहम कदम है।
निष्कर्ष
फैब्री रोग दुर्लभ है, पर इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। हाथ-पैरों में अकारण जलन, कम पसीना, पेट की बार-बार होने वाली परेशानी, गुर्दे या हृदय की समस्या और कम उम्र में स्ट्रोक जैसे संकेत मिलें, खासकर जब परिवार में भी ऐसा इतिहास हो, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना ज़रूरी है। जागरूकता, समय पर जाँच, परिवार की स्क्रीनिंग और सही इलाज से इस रोग के साथ बेहतर जीवन जीना संभव है।
