वोकल कॉर्ड पैरालिसिस (Vocal Cord Paralysis - स्वरयंत्र का लकवा)
| |

वोकल कॉर्ड पैरालिसिस (स्वरयंत्र का लकवा): कारण, लक्षण, जाँच और इलाज

परिचय

हमारी आवाज़ गले में मौजूद स्वरयंत्र (लैरिंक्स) से निकलती है, जिसे आम भाषा में “वॉइस बॉक्स” कहा जाता है। इसके अंदर दो लचीली मांसपेशीय तहें होती हैं, जिन्हें वोकल कॉर्ड या स्वर रज्जु कहते हैं। बोलते समय ये आपस में पास आकर कंपन करती हैं और आवाज़ पैदा होती है। साँस लेते समय ये खुल जाती हैं ताकि हवा आसानी से फेफड़ों तक पहुँचे। निगलते समय ये कसकर बंद हो जाती हैं ताकि भोजन या पानी साँस की नली में न जाए।

जब इनमें से एक या दोनों वोकल कॉर्ड की गति कमज़ोर हो जाए या बंद हो जाए, तो इस स्थिति को वोकल कॉर्ड पैरालिसिस कहते हैं। यह किसी भी उम्र में हो सकता है। इसका असर सिर्फ़ आवाज़ पर नहीं, बल्कि साँस लेने और खाना निगलने पर भी पड़ सकता है।

वोकल कॉर्ड पैरालिसिस के प्रकार

1. एकतरफा (Unilateral) पैरालिसिस: इसमें एक वोकल कॉर्ड प्रभावित होती है। यह सबसे आम प्रकार है। इसमें आवाज़ कमज़ोर या फुसफुसाहट जैसी हो जाती है, पर साँस लेने में आमतौर पर गंभीर दिक्कत नहीं होती।

2. दोतरफा (Bilateral) पैरालिसिस: इसमें दोनों वोकल कॉर्ड प्रभावित होती हैं। यह कम मामलों में होता है, लेकिन अधिक गंभीर है। अक्सर दोनों कॉर्ड बीच की स्थिति में अटक जाती हैं, जिससे साँस का रास्ता तंग हो जाता है। इसमें साँस लेने में तकलीफ़ और आवाज़ के साथ घरघराहट (स्ट्राइडर) हो सकती है, और कई बार आपातकालीन इलाज की ज़रूरत पड़ती है।

मुख्य कारण

वोकल कॉर्ड की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली नसों (मुख्यतः वेगस नर्व की शाखाएँ, यानी रिकरेंट लैरिंजियल नर्व और सुपीरियर लैरिंजियल नर्व) को नुकसान पहुँचने से यह समस्या होती है। इसके प्रमुख कारण ये हैं:

  • सर्जरी के दौरान नस को चोट: थायरॉइड, पैराथायरॉइड, गर्दन, छाती, फेफड़े या हृदय की सर्जरी इसका आम कारण है। रिकरेंट लैरिंजियल नर्व गर्दन और छाती से होकर गुज़रती है, इसलिए इन ऑपरेशनों में इसे नुकसान का जोखिम रहता है।
  • गर्दन या छाती में चोट: दुर्घटना या आघात से नस क्षतिग्रस्त हो सकती है।
  • ट्यूमर या गाँठ: गले, थायरॉइड, फेफड़े, ग्रासनली, गर्दन या छाती में बनी गाँठ नस पर दबाव डाल सकती है।
  • वायरल संक्रमण: कुछ वायरल संक्रमण नस में सूजन पैदा कर सकते हैं, जिससे अस्थायी कमज़ोरी आ जाती है।
  • न्यूरोलॉजिकल बीमारियाँ: स्ट्रोक, पार्किंसन रोग, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, मस्तिष्क ट्यूमर और कुछ तंत्रिका विकार इसका कारण बन सकते हैं।
  • एंडोट्रेकियल इंट्यूबेशन: लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहने या साँस की नली डालने से कभी-कभी वोकल कॉर्ड को नुकसान पहुँचता है।
  • अज्ञात कारण (Idiopathic): कई मामलों में जाँच के बाद भी कारण पता नहीं चलता।

लक्षण

लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि कितनी वोकल कॉर्ड प्रभावित हैं और कमज़ोरी कितनी है। आम लक्षण ये हैं:

  • आवाज़ का भारी, कर्कश या फटी-फटी होना
  • आवाज़ का बहुत धीमा हो जाना या फुसफुसाहट जैसी आवाज़
  • बोलते समय जल्दी साँस फूलना, या एक ही साँस में कम शब्द बोल पाना
  • आवाज़ की पिच पर नियंत्रण न रहना, और ज़ोर से बोल या चिल्ला न पाना
  • खाना या पानी निगलते समय खाँसी या गला रुँधना (एस्पिरेशन)
  • बार-बार गला साफ़ करने की ज़रूरत
  • साँस लेते समय तेज़ आवाज़ (स्ट्राइडर), खासकर दोतरफा पैरालिसिस में
  • बार-बार छाती का संक्रमण या निमोनिया, क्योंकि भोजन या लार साँस की नली में जा सकती है

किन्हें ज़्यादा जोखिम होता है

जिन लोगों की थायरॉइड या छाती की सर्जरी हुई हो, जिन्हें गर्दन या छाती का कैंसर हो, जो लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहे हों, या जिन्हें स्ट्रोक या कोई तंत्रिका रोग हो, उनमें जोखिम अधिक होता है। इसके अलावा गायक, शिक्षक और वक्ता जैसे लोग, जो आवाज़ का अधिक उपयोग करते हैं, इसके असर को जल्दी महसूस करते हैं।

कब डॉक्टर के पास जाएँ

यदि आवाज़ में बदलाव दो से तीन सप्ताह से ज़्यादा बना रहे, तो ईएनटी (कान-नाक-गला) विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए। अगर आवाज़ बदलने के साथ निगलने में परेशानी, बार-बार खाँसी या साँस लेने में दिक्कत हो, तो देर नहीं करनी चाहिए। साँस लेने में तेज़ तकलीफ़ या होंठ नीले पड़ना आपातकालीन स्थिति है, जिसमें तुरंत अस्पताल पहुँचना ज़रूरी है।

जाँच कैसे होती है

डॉक्टर सबसे पहले मरीज़ का इतिहास पूछते हैं, जैसे कोई सर्जरी, चोट, संक्रमण या अन्य बीमारी हुई है या नहीं। इसके बाद ये जाँचें की जा सकती हैं:

  • लैरिंगोस्कोपी: एक पतले कैमरे वाले उपकरण से वोकल कॉर्ड को सीधे देखा जाता है और उनकी गति परखी जाती है। यह सबसे अहम जाँच है।
  • स्ट्रोबोस्कोपी: इसमें वोकल कॉर्ड के कंपन को विस्तार से देखा जाता है।
  • लैरिंजियल इलेक्ट्रोमायोग्राफी (LEMG): इससे मांसपेशियों और नसों की विद्युत गतिविधि मापी जाती है, जिससे नुकसान की मात्रा और ठीक होने की संभावना का अंदाज़ा मिलता है।
  • इमेजिंग (CT, MRI, एक्स-रे): गर्दन, छाती या मस्तिष्क में किसी गाँठ या अन्य कारण का पता लगाने के लिए।
  • रक्त जाँच: संक्रमण या अन्य बीमारियों की पहचान के लिए।
  • निगलने की जाँच: यह देखने के लिए कि भोजन साँस की नली में तो नहीं जा रहा।

इलाज के विकल्प

इलाज कारण, लक्षणों की गंभीरता और मरीज़ की ज़रूरत पर निर्भर करता है। कई मामलों में, खासकर वायरल कारण से हुए पैरालिसिस में, नस छह से बारह महीनों में खुद ठीक हो सकती है, इसलिए डॉक्टर पहले इंतज़ार की सलाह भी दे सकते हैं।

1. वॉइस थेरेपी

स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट की देखरेख में की जाने वाली यह थेरेपी पहली पंक्ति का इलाज है। इसमें साँस पर नियंत्रण, वोकल कॉर्ड को मज़बूत करने वाले व्यायाम और आवाज़ का सही इस्तेमाल सिखाया जाता है। इसका उद्देश्य स्वस्थ वोकल कॉर्ड को कमज़ोर कॉर्ड की भरपाई के लिए प्रशिक्षित करना है।

2. निगलने की थेरेपी

यदि निगलने में दिक्कत हो, तो खाने की बनावट बदलना (गाढ़ा तरल देना), निगलने की विशेष तकनीकें और सिर की सही स्थिति सिखाई जाती है, ताकि एस्पिरेशन का जोखिम घटे।

3. इंजेक्शन लैरिंगोप्लास्टी

इसमें कमज़ोर वोकल कॉर्ड में कोई भराव सामग्री (जैसे हायलूरोनिक एसिड, कैल्शियम हाइड्रॉक्सीलएपेटाइट या मरीज़ की अपनी चर्बी) इंजेक्ट की जाती है। इससे कॉर्ड मोटी होकर दूसरी कॉर्ड के पास आ जाती है और आवाज़ बेहतर होती है। कुछ भराव अस्थायी होते हैं, इसलिए जब नस के ठीक होने की उम्मीद हो, तब इन्हें इस्तेमाल किया जाता है।

4. मेडियलाइज़ेशन थायरोप्लास्टी

यह एक स्थायी सर्जरी है, जिसमें स्वरयंत्र की बाहरी दीवार में एक छोटा प्रत्यारोपण (इम्प्लांट) लगाकर कमज़ोर कॉर्ड को बीच की ओर धकेला जाता है। यह अक्सर स्थानीय एनेस्थीसिया में की जाती है, ताकि सर्जरी के दौरान ही आवाज़ जाँची जा सके।

5. रीइनर्वेशन सर्जरी

इसमें किसी स्वस्थ नस की शाखा को वोकल कॉर्ड की मांसपेशी से जोड़ा जाता है, ताकि उसे फिर से तंत्रिका संकेत मिलें। इससे मांसपेशी का आकार और टोन बेहतर रहता है।

6. दोतरफा पैरालिसिस में विशेष इलाज

यहाँ मुख्य लक्ष्य साँस का रास्ता खुला रखना होता है। इसके लिए ट्रेकियोस्टोमी (गले में छोटा छिद्र बनाकर साँस की नली डालना) या वोकल कॉर्ड के बीच की जगह बढ़ाने वाली सर्जरी, जैसे कॉर्डोटॉमी या एरिटेनॉइडेक्टॉमी, की जा सकती है। इन प्रक्रियाओं में साँस और आवाज़ के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

रोकथाम और देखभाल के सुझाव

सभी मामलों में रोकथाम संभव नहीं है, पर कुछ सावधानियाँ मदद कर सकती हैं:

  • थायरॉइड या गर्दन की सर्जरी किसी अनुभवी सर्जन से कराएँ और सर्जरी से पहले जोखिमों पर चर्चा करें।
  • आवाज़ को आराम दें और लंबे समय तक चिल्लाने या ज़ोर से बोलने से बचें।
  • खूब पानी पिएँ ताकि गला नम रहे।
  • धूम्रपान और तंबाकू से दूर रहें, क्योंकि ये गले के कैंसर और वोकल कॉर्ड की समस्याओं का जोखिम बढ़ाते हैं।
  • फुसफुसाकर बोलने से बचें, क्योंकि यह कॉर्ड पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
  • आवाज़ में लंबे समय तक बदलाव को नज़रअंदाज़ न करें और समय पर जाँच कराएँ।

ठीक होने की संभावना और जीवन पर असर

सही निदान और इलाज के साथ अधिकांश मरीज़ों की आवाज़ और निगलने की क्षमता में काफ़ी सुधार होता है। कुछ मामलों में नस अपने आप ठीक हो जाती है, जबकि कुछ में थेरेपी या सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है। जिन लोगों का पेशा आवाज़ पर निर्भर है, उनके लिए यह स्थिति मानसिक रूप से भी कठिन हो सकती है, इसलिए परिवार का सहयोग और धैर्य महत्वपूर्ण है। नियमित फ़ॉलो-अप और विशेषज्ञ की सलाह पर चलना सबसे बेहतर रास्ता है।

निष्कर्ष

वोकल कॉर्ड पैरालिसिस एक ऐसी स्थिति है जो आवाज़, साँस और निगलने, तीनों को प्रभावित कर सकती है। इसके कारण सर्जरी की जटिलता से लेकर वायरल संक्रमण और गंभीर बीमारियों तक हो सकते हैं। इसलिए आवाज़ में लगातार बदलाव, निगलने में परेशानी या साँस की तकलीफ़ को हल्के में नहीं लेना चाहिए। समय पर ईएनटी विशेषज्ञ से जाँच, उचित वॉइस थेरेपी और ज़रूरत पड़ने पर सर्जिकल इलाज से अधिकांश मरीज़ अपनी आवाज़ और जीवन की गुणवत्ता वापस पा सकते हैं।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *