ट्रैकोमा: आंखों का वह संक्रमण जो रोशनी छीन सकता है
भूमिका
हमारी आंखें दुनिया को देखने की खिड़की हैं, लेकिन कई बार छोटी-सी लापरवाही और गंदगी इस खिड़की को हमेशा के लिए बंद कर देती है। ट्रैकोमा ऐसी ही एक बीमारी है। यह आंखों का एक पुराना और संक्रामक बैक्टीरियल रोग है, जो अगर समय पर इलाज न मिले तो स्थायी अंधेपन का कारण बन सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार ट्रैकोमा दुनिया में संक्रमण से होने वाले अंधेपन का सबसे बड़ा कारण रहा है। राहत की बात यह है कि इसे पूरी तरह रोका जा सकता है और शुरुआती अवस्था में इसका इलाज आसान है। भारत ने भी इस दिशा में बड़ी सफलता पाई है, और 2024 में WHO ने भारत को ट्रैकोमा-मुक्त घोषित किया।
ट्रैकोमा क्या है?
ट्रैकोमा आंख की सबसे बाहरी पारदर्शी परत (कंजंक्टिवा) और कॉर्निया का संक्रमण है। इसका कारण क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस (Chlamydia trachomatis) नामक बैक्टीरिया है। यह बैक्टीरिया पलकों की भीतरी सतह को प्रभावित करता है। बार-बार संक्रमण होने से पलकों के भीतर घाव और निशान बनने लगते हैं। धीरे-धीरे पलक अंदर की ओर मुड़ जाती है और पलकों के बाल कॉर्निया को रगड़ने लगते हैं। इसी रगड़ से कॉर्निया पर निशान पड़ते हैं और रोशनी चली जाती है।
यह बीमारी आमतौर पर बचपन में शुरू होती है, लेकिन अंधापन अक्सर वयस्क अवस्था में, यानी वर्षों बाद दिखाई देता है। इसीलिए इसे एक “धीमी गति से बढ़ने वाली” बीमारी कहा जाता है।
यह कैसे फैलता है?
ट्रैकोमा अत्यंत संक्रामक है। इसके फैलने के मुख्य तरीके ये हैं:
- संक्रमित व्यक्ति की आंख या नाक के स्राव से सीधा संपर्क। बच्चे अक्सर खेलते समय या साथ सोते समय एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं।
- साझा चीजों का उपयोग: तौलिया, रुमाल, तकिए का कवर और चेहरे पर लगाने वाले कपड़े।
- मक्खियां: आंखों से निकलने वाले स्राव पर बैठने वाली मक्खियां बैक्टीरिया को एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुंचा सकती हैं।
- गंदे हाथ: संक्रमित आंख को छूने के बाद बिना हाथ धोए दूसरे को छूना।
जोखिम किन्हें अधिक होता है?
यह रोग उन इलाकों में ज्यादा फैलता है जहां:
- स्वच्छ पानी की कमी हो,
- साफ-सफाई और शौचालय की सुविधा अपर्याप्त हो,
- घर में भीड़भाड़ हो और कई लोग एक ही कमरे में रहते हों,
- मक्खियों की बहुतायत हो।
छोटे बच्चे, खासकर पांच वर्ष से कम उम्र के, सबसे अधिक संक्रमित होते हैं और वे ही परिवार में संक्रमण के मुख्य स्रोत बन जाते हैं। महिलाओं में अंधेपन का खतरा पुरुषों की तुलना में अधिक देखा गया है, क्योंकि वे बच्चों की देखभाल करती हैं और बार-बार संक्रमण के संपर्क में आती हैं।
ट्रैकोमा के लक्षण
ट्रैकोमा के लक्षण अवस्था के अनुसार बदलते हैं।
शुरुआती लक्षण:
- आंखों और पलकों में खुजली और जलन
- आंखों से पानी या चिपचिपा स्राव निकलना
- आंखों का लाल होना
- पलकों में सूजन
- रोशनी में असहजता (फोटोफोबिया)
- आंखों में दर्द
बार-बार संक्रमण होने पर:
- पलकों की भीतरी सतह पर छोटे-छोटे दाने या उभार
- पलकों का मोटा और सख्त हो जाना
- आंख में किरकिरी जैसा एहसास
गंभीर अवस्था:
- पलकों के भीतर निशान पड़ना
- पलक का अंदर की ओर मुड़ना (एंट्रोपियन)
- पलकों के बाल कॉर्निया से रगड़ खाना (ट्राइकियासिस)
- कॉर्निया पर धुंधलापन और अल्सर
- दृष्टि का कमजोर होना और अंत में अंधापन
रोग की अवस्थाएं
WHO ने ट्रैकोमा को सरल रूप में पांच चरणों में बांटा है:
- TF (ट्रैकोमेटस इन्फ्लेमेशन – फॉलिक्यूलर): पलक की भीतरी सतह पर दाने।
- TI (ट्रैकोमेटस इन्फ्लेमेशन – इंटेंस): पलक का गंभीर रूप से सूजना और मोटा होना।
- TS (ट्रैकोमेटस स्कारिंग): पलक के भीतर निशान बनना।
- TT (ट्रैकोमेटस ट्राइकियासिस): पलक के बाल भीतर की ओर मुड़कर आंख को रगड़ना।
- CO (कॉर्नियल ओपेसिटी): कॉर्निया का धुंधला हो जाना, जिससे दृष्टि को खतरा।
निदान कैसे होता है?
नेत्र रोग विशेषज्ञ आमतौर पर आंख और पलकों की जांच से ही ट्रैकोमा की पहचान कर लेते हैं। इसके लिए वे पलक को उलटकर उसकी भीतरी सतह देखते हैं। जरूरत पड़ने पर आंख से स्राव का नमूना लेकर प्रयोगशाला में जांच की जाती है। समुदाय स्तर पर स्वास्थ्य कार्यकर्ता WHO के सरलीकृत ग्रेडिंग तरीके से भी इसकी पहचान करते हैं।
इलाज
ट्रैकोमा का इलाज अवस्था पर निर्भर करता है।
1. एंटीबायोटिक उपचार: शुरुआती अवस्था में एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं। इनमें अज़िथ्रोमाइसिन की गोली (अक्सर एक खुराक) या टेट्रासाइक्लिन आंखों का मरहम शामिल है। दवा का प्रकार और खुराक डॉक्टर तय करते हैं। बिना सलाह के दवा लेना ठीक नहीं है।
2. सर्जरी: जब पलक अंदर की ओर मुड़ जाए (ट्राइकियासिस या एंट्रोपियन), तब पलक की सर्जरी की जाती है। यह छोटी शल्य प्रक्रिया पलक को सही स्थिति में लाती है ताकि बाल कॉर्निया को न रगड़ें। यह अंधेपन को रोकने में बेहद कारगर है।
3. कॉर्निया की समस्या: यदि कॉर्निया पर गहरे निशान पड़ चुके हों, तो कुछ मामलों में कॉर्निया प्रत्यारोपण पर विचार किया जाता है, हालांकि यह हमेशा सफल नहीं होता। इसलिए बचाव और शुरुआती इलाज सबसे महत्वपूर्ण हैं।
WHO की SAFE रणनीति
ट्रैकोमा के उन्मूलन के लिए WHO ने चार-सूत्री “SAFE” रणनीति बनाई है:
- S – Surgery (सर्जरी): पलक मुड़ने की समस्या का ऑपरेशन।
- A – Antibiotics (एंटीबायोटिक): संक्रमित व्यक्तियों और कई बार पूरे समुदाय को दवा देना।
- F – Facial cleanliness (चेहरे की सफाई): बच्चों का चेहरा नियमित रूप से धुलवाना।
- E – Environmental improvement (पर्यावरण सुधार): स्वच्छ पानी, शौचालय और स्वच्छता की व्यवस्था, मक्खियों पर नियंत्रण।
इन चारों उपायों को मिलाकर अपनाने से कई देशों ने ट्रैकोमा पर काबू पाया है।
बचाव के उपाय
ट्रैकोमा से बचना कठिन नहीं है। कुछ सरल आदतें इसे रोक सकती हैं:
- चेहरा और हाथ बार-बार साबुन-पानी से धोएं, विशेषकर बच्चों के।
- आंखों को गंदे हाथों से न छुएं या रगड़ें।
- तौलिया, रुमाल और तकिए का कवर किसी से साझा न करें।
- घर और आसपास की सफाई रखें, कचरे को खुला न छोड़ें ताकि मक्खियां न पनपें।
- शौचालय का उपयोग करें और खुले में शौच से बचें।
- स्वच्छ पेयजल का इस्तेमाल करें।
- संक्रमित व्यक्ति के बर्तन, कपड़े और बिस्तर अलग रखें और उन्हें गर्म पानी से धोएं।
- बच्चों की आंखों से स्राव को साफ कपड़े से तुरंत पोंछें, और वह कपड़ा दोबारा इस्तेमाल न करें।
- आंखों में लालिमा, खुजली या स्राव जैसे लक्षण दिखें तो देर किए बिना नेत्र चिकित्सक से मिलें।
भारत में ट्रैकोमा
एक समय भारत में ट्रैकोमा अंधेपन का एक प्रमुख कारण था। 1950 और 60 के दशक में देश के बड़े हिस्से, खासकर राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में यह व्यापक रूप से फैला था। राष्ट्रीय अंधता नियंत्रण कार्यक्रम के तहत सरकार ने सर्वेक्षण, इलाज, जागरूकता और स्वच्छता सुधार पर काम किया। लगातार प्रयासों के परिणामस्वरूप 2017 में भारत को सक्रिय संक्रामक ट्रैकोमा से मुक्त घोषित किया गया, और 2024 में WHO ने भारत को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में ट्रैकोमा से मुक्त माना। यह देश की बड़ी स्वास्थ्य उपलब्धि है, लेकिन सतर्कता जरूरी है, क्योंकि अच्छी स्वच्छता और जागरूकता बनाए रखना ही इस सफलता को टिकाए रख सकता है।
समाज की भूमिका
ट्रैकोमा केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी है। जब किसी परिवार का सदस्य अंधा हो जाता है तो वह काम नहीं कर पाता, और परिवार गरीबी की ओर बढ़ता है। इसलिए स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका अहम है। बच्चों को हाथ धोने की आदत सिखाना, माताओं को स्वच्छता के बारे में जागरूक करना और गांवों में स्वच्छ पानी पहुंचाना, ये सभी कदम ट्रैकोमा को दोबारा उभरने से रोकते हैं।
निष्कर्ष
ट्रैकोमा एक ऐसी बीमारी है जो पूरी तरह रोकी जा सकती है, फिर भी लापरवाही से यह जीवन भर का अंधापन दे सकती है। इसके पीछे का कारण गंदगी, भीड़भाड़ और स्वच्छ पानी की कमी जैसी परिस्थितियां हैं, जिन्हें हम सामूहिक प्रयास से बदल सकते हैं। नियमित चेहरा धोना, व्यक्तिगत चीजें साझा न करना, साफ-सफाई रखना और समय रहते डॉक्टर से मिलना इस बीमारी से बचाव की कुंजी है।
याद रखें, आंखों की रोशनी अनमोल है। थोड़ी-सी सावधानी और स्वच्छता की आदत से हम न केवल अपनी, बल्कि अपने बच्चों और समाज की आंखों की रक्षा कर सकते हैं। यदि आपकी या आपके परिवार के किसी सदस्य की आंखों में लंबे समय से लालिमा, खुजली या स्राव है, तो उसे हल्के में न लें और तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से परामर्श करें।
(नोट: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी उपचार के लिए योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।)
