थायराइड कैंसर (Thyroid Cancer)
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थायराइड कैंसर (अवटु ग्रंथि का कैंसर): कारण, लक्षण, जाँच और उपचार

परिचय

थायराइड ग्रंथि (अवटु ग्रंथि) हमारी गर्दन के निचले हिस्से में, श्वासनली के सामने स्थित तितली के आकार की एक छोटी-सी ग्रंथि है। यह थायरॉक्सिन (T4) और ट्राईआयोडोथायरोनिन (T3) नामक हार्मोन बनाती है, जो शरीर की चयापचय क्रिया (मेटाबॉलिज्म), हृदय गति, शरीर के तापमान, वजन और ऊर्जा स्तर को नियंत्रित करते हैं।

जब इस ग्रंथि की कोशिकाएँ असामान्य रूप से और अनियंत्रित ढंग से बढ़ने लगती हैं, तो उसे थायराइड कैंसर कहा जाता है। राहत की बात यह है कि अधिकांश प्रकार के थायराइड कैंसर का समय पर पता चल जाए तो इलाज बहुत सफल रहता है और मरीज़ का जीवन सामान्य रह सकता है। फिर भी जागरूकता की कमी के कारण कई लोग देर से डॉक्टर के पास पहुँचते हैं। इसलिए इस रोग की सही जानकारी होना ज़रूरी है।

थायराइड कैंसर कितना आम है?

थायराइड कैंसर दुनिया भर में पिछले कुछ दशकों में अधिक पहचाना जा रहा है, जिसका एक कारण आधुनिक अल्ट्रासाउंड जैसी जाँच तकनीकों का बढ़ता उपयोग है। यह महिलाओं में पुरुषों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक पाया जाता है। इसका निदान आमतौर पर 30 से 60 वर्ष की आयु के बीच होता है, हालाँकि यह बच्चों और बुज़ुर्गों में भी हो सकता है। कुल कैंसरों में इसका हिस्सा अपेक्षाकृत कम है, पर भारत में भी इसके मामले बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।

थायराइड कैंसर के प्रकार

थायराइड कैंसर मुख्यतः चार प्रकार का होता है:

1. पैपिलरी थायराइड कैंसर (Papillary Carcinoma): यह सबसे आम प्रकार है और लगभग 80 प्रतिशत मामले इसी के होते हैं। यह धीमी गति से बढ़ता है और अक्सर गर्दन की लसीका ग्रंथियों (लिम्फ नोड्स) तक फैल सकता है, फिर भी इसका उपचार परिणाम बहुत अच्छा रहता है।

2. फॉलिक्युलर थायराइड कैंसर (Follicular Carcinoma): यह लगभग 10 से 15 प्रतिशत मामलों में पाया जाता है। यह रक्त के माध्यम से फेफड़ों या हड्डियों में फैल सकता है। आयोडीन की कमी वाले क्षेत्रों में यह अधिक देखा जाता है।

3. मेडुलरी थायराइड कैंसर (Medullary Carcinoma): यह लगभग 3 से 4 प्रतिशत मामलों में होता है और थायराइड की सी-कोशिकाओं (C-cells) से शुरू होता है, जो कैल्सिटोनिन हार्मोन बनाती हैं। यह कुछ मामलों में अनुवांशिक (परिवार में चलने वाला) होता है।

4. एनाप्लास्टिक थायराइड कैंसर (Anaplastic Carcinoma): यह सबसे दुर्लभ लेकिन सबसे आक्रामक प्रकार है। यह तेज़ी से बढ़ता और फैलता है तथा आमतौर पर बुज़ुर्गों में पाया जाता है। इसका उपचार अपेक्षाकृत कठिन होता है।

थायराइड कैंसर के कारण

थायराइड कैंसर का ठीक-ठीक कारण अधिकांश मामलों में अज्ञात रहता है, लेकिन कुछ कारक इसका जोखिम बढ़ा सकते हैं:

  • विकिरण (रेडिएशन) का संपर्क: बचपन में सिर या गर्दन की रेडिएशन थेरेपी या परमाणु दुर्घटनाओं जैसे उच्च विकिरण के संपर्क में आना।
  • पारिवारिक इतिहास: परिवार में थायराइड कैंसर या कुछ अनुवांशिक सिंड्रोम (जैसे MEN 2 सिंड्रोम) का होना, खासकर मेडुलरी कैंसर में।
  • आयोडीन की कमी या अधिकता: आहार में आयोडीन का असंतुलन।
  • लिंग और आयु: महिलाओं में अधिक जोखिम तथा मध्य आयु में अधिक संभावना।
  • मोटापा: कुछ अध्ययनों में अधिक वजन को जोखिम से जोड़ा गया है।
  • पुरानी थायराइड बीमारियाँ: थायराइड में पहले से मौजूद गाँठें या घेंघा, हालाँकि अधिकांश गाँठें कैंसर नहीं होतीं।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि थायराइड की ज़्यादातर गाँठें (नोड्यूल) सामान्य या सौम्य होती हैं। केवल एक छोटा प्रतिशत ही कैंसर निकलता है।

लक्षण

थायराइड कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। कई बार यह किसी अन्य कारण से कराए गए अल्ट्रासाउंड या स्वयं या डॉक्टर द्वारा गर्दन की जाँच में संयोग से पकड़ में आता है। आगे बढ़ने पर ये लक्षण दिख सकते हैं:

  • गर्दन के सामने के हिस्से में गाँठ या सूजन, जो अक्सर दर्दरहित होती है
  • आवाज़ में भारीपन, बैठना या लंबे समय तक आवाज़ में बदलाव
  • निगलने में कठिनाई या गले में कुछ अटकने जैसा अहसास
  • साँस लेने में तकलीफ़
  • गर्दन में लगातार दर्द, जो कभी-कभी कान तक जाता है
  • गर्दन में लिम्फ नोड्स (गठानों) की सूजन
  • बिना कारण लंबे समय तक खाँसी, जो सर्दी-जुकाम से जुड़ी न हो

इनमें से कई लक्षण दूसरी सामान्य बीमारियों में भी होते हैं, इसलिए घबराने के बजाय जाँच कराना सही तरीका है।

निदान (जाँच) कैसे होता है?

यदि डॉक्टर को थायराइड कैंसर का संदेह हो तो निम्न जाँचें की जाती हैं:

1. शारीरिक परीक्षण: डॉक्टर गर्दन को छूकर गाँठ, उसका आकार, कठोरता और लिम्फ नोड्स की जाँच करते हैं।

2. थायराइड फंक्शन टेस्ट (रक्त जाँच): TSH, T3 और T4 के स्तर जाँचे जाते हैं। ध्यान रहे कि थायराइड कैंसर में ये अक्सर सामान्य ही रहते हैं।

3. अल्ट्रासाउंड: यह सबसे उपयोगी जाँच है, जिससे गाँठ का आकार, बनावट और संदिग्ध लक्षण पता चलते हैं।

4. फाइन नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी (FNAC): इसमें पतली सुई से गाँठ की कोशिकाएँ निकालकर सूक्ष्मदर्शी से जाँची जाती हैं। कैंसर की पुष्टि का यह मुख्य तरीका है।

5. रेडियोआयोडीन स्कैन: इससे यह देखा जाता है कि गाँठ सक्रिय है या निष्क्रिय।

6. सीटी स्कैन, एमआरआई या पेट-सीटी: यदि कैंसर के फैलने का संदेह हो।

7. ट्यूमर मार्कर और जेनेटिक जाँच: मेडुलरी कैंसर में कैल्सिटोनिन और CEA जाँचे जाते हैं, और परिवार में इतिहास होने पर जेनेटिक परीक्षण किया जा सकता है।

कैंसर के चरण (स्टेज)

थायराइड कैंसर को आमतौर पर चरणों में बाँटा जाता है। पहले और दूसरे चरण में कैंसर थायराइड तक सीमित रहता है या आसपास थोड़ा फैला होता है। तीसरे चरण में यह आसपास के ऊतकों या लिम्फ नोड्स तक पहुँच जाता है, जबकि चौथे चरण में यह दूर के अंगों जैसे फेफड़े या हड्डियों तक फैल चुका होता है। चरण का निर्धारण रोगी की उम्र, कैंसर के प्रकार और फैलाव के आधार पर होता है, और इसी से उपचार की दिशा तय होती है।

उपचार

उपचार का चुनाव कैंसर के प्रकार, आकार, चरण और मरीज़ के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।

1. शल्य चिकित्सा (सर्जरी): अधिकांश मामलों में यही मुख्य उपचार है।

  • लोबेक्टोमी: थायराइड के एक हिस्से (लोब) को निकालना, छोटे और कम जोखिम वाले कैंसर में।
  • टोटल थायरॉइडेक्टोमी: पूरी थायराइड ग्रंथि निकालना।
  • लिम्फ नोड डिसेक्शन: यदि कैंसर लिम्फ नोड्स तक फैला हो तो उन्हें निकालना।

2. रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी (RAI): सर्जरी के बाद बची हुई या फैली हुई थायराइड कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए यह उपचार दिया जाता है। यह पैपिलरी और फॉलिक्युलर कैंसर में विशेष रूप से कारगर है।

3. थायराइड हार्मोन रिप्लेसमेंट: ग्रंथि निकालने के बाद शरीर को हार्मोन की ज़रूरत रहती है, इसलिए लेवोथायरॉक्सिन की गोली जीवनभर लेनी पड़ सकती है। यह दवा शरीर की ज़रूरत पूरी करने के साथ बचे हुए कैंसर की कोशिकाओं के विकास को दबाने में भी मदद करती है।

4. बाहरी विकिरण चिकित्सा (External Beam Radiation): कुछ उन्नत मामलों या जहाँ RAI कारगर न हो, वहाँ इसका उपयोग होता है।

5. कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी: उन्नत, आवर्ती या एनाप्लास्टिक कैंसर में टार्गेटेड दवाएँ तथा अन्य उपचार दिए जाते हैं, जो विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह पर तय होते हैं।

6. सक्रिय निगरानी: बहुत छोटे, कम जोखिम वाले पैपिलरी कैंसर में कुछ चिकित्सक तुरंत सर्जरी की जगह नियमित निगरानी का विकल्प भी सुझाते हैं।

सर्जरी के बाद की देखभाल और फॉलो-अप

उपचार के बाद नियमित जाँच बेहद ज़रूरी है। इसमें आमतौर पर शामिल हैं:

  • समय-समय पर TSH और थायरोग्लोब्युलिन (Thyroglobulin) की रक्त जाँच
  • गर्दन का अल्ट्रासाउंड
  • आवश्यकता पड़ने पर स्कैन
  • दवा की मात्रा का निर्धारण, जो डॉक्टर समय-समय पर बदल सकते हैं

लेवोथायरॉक्सिन खाली पेट, सुबह, पानी के साथ लेना बेहतर माना जाता है और इसे कैल्शियम या आयरन की गोलियों से कुछ घंटों के अंतर पर लेना चाहिए। दवा कभी भी अपनी मर्ज़ी से बंद नहीं करनी चाहिए। पूरी थायराइड निकलने पर कैल्शियम का स्तर गिरने की संभावना भी रहती है, जिसकी निगरानी चिकित्सक करते हैं।

पूर्वानुमान (रोग का परिणाम)

थायराइड कैंसर के अधिकांश मामलों, खासकर पैपिलरी और फॉलिक्युलर प्रकार में, समय पर इलाज होने पर जीवित रहने की दर बहुत अधिक है और रोगी लंबा, स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। मेडुलरी कैंसर में परिणाम चरण पर निर्भर करता है, जबकि एनाप्लास्टिक कैंसर में चुनौतियाँ अधिक होती हैं। शुरुआती पहचान सफल उपचार की कुंजी है।

बचाव और जागरूकता

थायराइड कैंसर को पूरी तरह रोकना हमेशा संभव नहीं, लेकिन जोखिम कम करने और जल्दी पहचानने के लिए कुछ कदम उपयोगी हैं:

  • गर्दन में कोई भी नई गाँठ या सूजन दिखे तो उसे नज़रअंदाज़ न करें।
  • अनावश्यक विकिरण के संपर्क से बचें, खासकर बच्चों में।
  • परिवार में थायराइड कैंसर या MEN सिंड्रोम का इतिहास हो तो डॉक्टर से जेनेटिक सलाह लें।
  • संतुलित आहार लें, जिसमें आयोडीन की उचित मात्रा हो, यानी आयोडीन युक्त नमक का सीमित उपयोग।
  • स्वस्थ वजन बनाए रखें और नियमित व्यायाम करें।
  • गर्दन की नियमित स्वयं जाँच की आदत डालें, खासकर यदि जोखिम कारक मौजूद हों।

मानसिक स्वास्थ्य और सहयोग

कैंसर का निदान किसी के लिए भी मानसिक रूप से कठिन हो सकता है। परिवार का सहयोग, खुलकर बातचीत और ज़रूरत पड़ने पर परामर्श (काउंसलिंग) रोगी को इस दौर से निकलने में मदद करते हैं। सहायता समूहों से जुड़ना भी लाभदायक हो सकता है।

निष्कर्ष

थायराइड कैंसर, अन्य कई कैंसरों की तुलना में, अधिक उपचार-योग्य माना जाता है, बशर्ते इसकी पहचान समय पर हो जाए। गर्दन में गाँठ, आवाज़ में बदलाव या निगलने में परेशानी जैसे लक्षणों को हल्के में न लें। सही जाँच, विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह और नियमित फॉलो-अप के साथ अधिकांश रोगी सामान्य जीवन जी पाते हैं। जागरूकता, समय पर जाँच और धैर्य, यही इस रोग से लड़ने के सबसे मज़बूत हथियार हैं।

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