सिस्टमिक स्केलेरोसिस / स्क्लेरोडर्मा (Scleroderma - त्वचा और अंगों का सख्त होना)
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स्क्लेरोडर्मा (Scleroderma / Systemic Sclerosis): कारण, लक्षण, जाँच और इलाज

प्रस्तावना

हमारी त्वचा आमतौर पर मुलायम और लचीली होती है। कुछ लोगों में यह धीरे-धीरे कड़ी, मोटी और खिंची हुई हो जाती है। उंगलियाँ मुड़ना बंद कर देती हैं और ठंड में नीली-सफ़ेद पड़ जाती हैं। ऐसी स्थिति स्क्लेरोडर्मा का संकेत हो सकती है। “स्क्लेरोडर्मा” यूनानी शब्दों “स्क्लेरोस” (कठोर) और “डर्मा” (त्वचा) से बना है, यानी “कठोर त्वचा”। पर यह रोग केवल त्वचा तक सीमित नहीं रहता। इसका गंभीर रूप, जिसे सिस्टेमिक स्क्लेरोसिस कहते हैं, फेफड़ों, हृदय, गुर्दों और पाचन तंत्र जैसे आंतरिक अंगों को भी प्रभावित कर सकता है।

स्क्लेरोडर्मा क्या है?

स्क्लेरोडर्मा एक दीर्घकालिक (क्रॉनिक) ऑटोइम्यून रोग है। ऑटोइम्यून रोग में शरीर की रोग-प्रतिरोधक प्रणाली गलती से अपने ही ऊतकों पर हमला करने लगती है। इस रोग में तीन गड़बड़ियाँ एक साथ चलती हैं:

  1. प्रतिरक्षा प्रणाली की असामान्य सक्रियता, जिससे सूजन होती है।
  2. छोटी रक्त वाहिकाओं को क्षति, जिससे रक्त प्रवाह घटता है।
  3. कोलेजन का अत्यधिक निर्माण। कोलेजन एक रेशेदार प्रोटीन है, और इसके ज़्यादा जमा होने से त्वचा और अंगों के ऊतक कड़े और मोटे हो जाते हैं (फ़ाइब्रोसिस)।

यह संक्रामक रोग नहीं है, यानी छूने या साथ रहने से नहीं फैलता।

स्क्लेरोडर्मा के प्रकार

1. लोकलाइज़्ड (स्थानीय) स्क्लेरोडर्मा: इसमें केवल त्वचा और उसके नीचे के ऊतक प्रभावित होते हैं, आंतरिक अंग सामान्यतः नहीं। इसके दो मुख्य रूप हैं:

  • मॉर्फ़िया: त्वचा पर कड़े, अंडाकार या गोल चकत्ते बनते हैं।
  • लीनियर स्क्लेरोडर्मा: हाथ, पैर या माथे पर रेखा जैसी पट्टी बनती है। यह बच्चों में अपेक्षाकृत अधिक दिखता है।

2. सिस्टेमिक स्क्लेरोसिस (प्रणालीगत): इसमें त्वचा के साथ आंतरिक अंग भी प्रभावित हो सकते हैं। इसके दो प्रमुख उपप्रकार हैं:

  • लिमिटेड क्यूटेनियस सिस्टेमिक स्क्लेरोसिस: त्वचा की कठोरता मुख्यतः हाथों, चेहरे और अग्रबाहु तक रहती है। रोग धीमी गति से बढ़ता है। इसमें पहले CREST सिंड्रोम शब्द चलता था, जिसमें कैल्सिनोसिस, रेनॉ की समस्या, भोजन-नली की गड़बड़ी, स्क्लेरोडैक्टिली और टेलैंजिएक्टेसिया शामिल हैं। इसमें फेफड़ों की धमनियों में उच्च दाब (पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन) का जोखिम अधिक रहता है।
  • डिफ़्यूज़ क्यूटेनियस सिस्टेमिक स्क्लेरोसिस: त्वचा की कठोरता तेज़ी से हाथ-पैर, बाँहों और धड़ तक फैलती है। शुरुआती कुछ वर्षों में फेफड़ों, हृदय और गुर्दों के प्रभावित होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है।

कारण और जोखिम कारक

स्क्लेरोडर्मा का सटीक कारण अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं है। माना जाता है कि आनुवंशिक प्रवृत्ति और पर्यावरणीय कारक मिलकर रोग-प्रतिरोधक प्रणाली को असंतुलित कर देते हैं। जोखिम बढ़ाने वाले कारकों में ये शामिल हैं:

  • लिंग: महिलाओं में यह पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक होता है।
  • आयु: आमतौर पर 30 से 50 वर्ष के बीच शुरू होता है, हालाँकि किसी भी उम्र में हो सकता है।
  • आनुवंशिकता: परिवार में किसी ऑटोइम्यून रोग का इतिहास होने पर जोखिम कुछ बढ़ता है, पर यह सीधे वंशानुगत रोग नहीं है।
  • पर्यावरणीय संपर्क: सिलिका धूल, कुछ औद्योगिक रसायनों और सॉल्वेंट के लंबे संपर्क का संबंध बताया गया है।

लक्षण

लक्षण रोग के प्रकार और प्रभावित अंगों पर निर्भर करते हैं।

रेनॉ की घटना (Raynaud’s phenomenon): यह अक्सर सबसे पहला लक्षण होता है, और कई बार अन्य लक्षणों से वर्षों पहले दिखता है। ठंड या तनाव में उंगलियाँ और अंगूठे पहले सफ़ेद, फिर नीले और फिर लाल पड़ जाते हैं, साथ में सुन्नपन या दर्द होता है।

त्वचा में बदलाव:

  • उंगलियों और हाथों में सूजन, फिर त्वचा का कड़ा और चमकदार हो जाना
  • उंगलियों का मुड़ना और गतिशीलता घटना
  • चेहरे की त्वचा खिंचना, मुँह छोटा होना और नाक नुकीली दिखना
  • उंगलियों के सिरों पर घाव (डिजिटल अल्सर)
  • त्वचा के नीचे कैल्शियम की गाँठें
  • चेहरे और हथेलियों पर छोटे लाल धब्बे (टेलैंजिएक्टेसिया)

पाचन तंत्र: सीने में जलन, एसिड रिफ़्लक्स, निगलने में कठिनाई, पेट भरा लगना, कब्ज़ या दस्त, और भोजन के पोषक तत्वों का कम अवशोषण।

फेफड़े: साँस फूलना, सूखी खाँसी और थकान। फेफड़ों में ऊतकों का कड़ा होना (इंटरस्टिशियल लंग डिज़ीज़) और फेफड़ों की धमनियों में उच्च दाब सबसे गंभीर जटिलताओं में गिने जाते हैं।

हृदय: धड़कन की अनियमितता, सीने में असुविधा और हृदय की मांसपेशियों या उसके आवरण में सूजन।

गुर्दे: अचानक रक्तचाप का बहुत बढ़ जाना, सिरदर्द और धुँधला दिखना। इसे स्क्लेरोडर्मा रीनल क्राइसिस कहते हैं और यह आपात स्थिति है।

अन्य लक्षण: जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, अत्यधिक थकान, आँखों और मुँह में सूखापन, वज़न घटना।

निदान कैसे होता है?

निदान डॉक्टर की जाँच और विभिन्न परीक्षणों को मिलाकर किया जाता है। यह काम आमतौर पर रुमेटोलॉजिस्ट करते हैं।

  • इतिहास और शारीरिक जाँच: रेनॉ, त्वचा की कठोरता और उंगलियों के घावों का मूल्यांकन।
  • रक्त जाँच (ऑटोएंटीबॉडी): ANA अधिकांश मरीज़ों में पॉज़िटिव आता है। एंटी-सेंट्रोमियर, एंटी-Scl-70 (टोपोआइसोमरेज़-1) और एंटी-RNA पॉलीमरेज़ III जैसी विशिष्ट एंटीबॉडी रोग के प्रकार और संभावित जटिलताओं का अनुमान देती हैं।
  • नेलफ़ोल्ड कैपिलैरोस्कोपी: नाखून के आधार की छोटी रक्त वाहिकाओं की जाँच।
  • फेफड़ों की जाँच: पल्मोनरी फ़ंक्शन टेस्ट और छाती का HRCT स्कैन।
  • हृदय की जाँच: ECG और इकोकार्डियोग्राफ़ी, जिससे फेफड़ों की धमनियों के दाब का अंदाज़ा मिलता है।
  • अन्य जाँच: गुर्दों के लिए रक्तचाप और यूरिन-क्रिएटिनिन, तथा ज़रूरत पड़ने पर पाचन तंत्र की जाँच।

शुरुआती निदान बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अंगों को हुई क्षति को समय रहते नियंत्रित करना बाद में उलटने से आसान है।

इलाज

स्क्लेरोडर्मा का अभी कोई पक्का इलाज नहीं है, लेकिन आधुनिक दवाओं से लक्षणों को नियंत्रित करना, रोग की गति धीमी करना और जटिलताओं को रोकना काफ़ी हद तक संभव है। उपचार हर मरीज़ के लिए अलग-अलग तय होता है।

  • रेनॉ और उंगलियों के घाव: कैल्शियम चैनल ब्लॉकर (जैसे निफ़ेडिपिन), आवश्यकता पर अन्य वाहिका-विस्तारक दवाएँ। गंभीर घावों में विशेष इंजेक्शन या अस्पताल में उपचार।
  • पाचन संबंधी समस्याएँ: एसिड घटाने वाली दवाएँ (PPI) और पेट की गति बढ़ाने वाली दवाएँ। आँतों में जीवाणुओं की अधिकता हो तो एंटीबायोटिक।
  • त्वचा की कठोरता: मेथोट्रेक्सेट या माइकोफ़ेनोलेट जैसी प्रतिरक्षा-नियंत्रक दवाएँ।
  • फेफड़ों का रोग: माइकोफ़ेनोलेट, टोसिलिज़ुमैब, निंटेडैनिब जैसी दवाएँ। चुनिंदा गंभीर मामलों में स्टेम सेल ट्रांसप्लांट पर विचार किया जाता है।
  • पल्मोनरी हाइपरटेंशन: बोसेंटान, सिल्डेनाफ़िल जैसी विशेष दवाएँ।
  • गुर्दे की आपात स्थिति: ACE इनहिबिटर दवाएँ तुरंत शुरू की जाती हैं, जो जान बचा सकती हैं।
  • फ़िज़ियोथेरेपी: जोड़ों की जकड़न रोकने और हाथों की क्षमता बनाए रखने के लिए नियमित व्यायाम।

एक ज़रूरी बात: शुरुआती डिफ़्यूज़ रोग में उच्च मात्रा वाले स्टेरॉइड गुर्दों के संकट का जोखिम बढ़ा सकते हैं, इसलिए दवा हमेशा विशेषज्ञ की सलाह से ही लें।

दैनिक जीवन में देखभाल

  • ठंड से बचाव: दस्ताने, मोज़े और गर्म कपड़े पहनें। ठंडे पानी और ठंडी चीज़ों को सीधे न छुएँ।
  • धूम्रपान पूरी तरह छोड़ें: निकोटिन रक्त वाहिकाओं को और सिकोड़ता है।
  • त्वचा की देखभाल: नियमित मॉइस्चराइज़र लगाएँ और घावों को साफ़ रखें।
  • भोजन: थोड़ा-थोड़ा करके कई बार खाएँ, खाने के बाद तुरंत न लेटें, और सोते समय सिर ऊँचा रखें। तीखा और अधिक चिकना भोजन कम करें।
  • मुँह और दाँतों की स्वच्छता: मुँह कम खुलने से दाँतों की सफ़ाई कठिन हो जाती है, इसलिए दंत चिकित्सक से नियमित जाँच कराएँ।
  • व्यायाम: हल्का और नियमित व्यायाम जोड़ों को लचीला रखता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य: दीर्घकालिक रोग तनाव और अवसाद ला सकता है। परिवार का सहयोग, परामर्श और सहायता समूह बहुत मदद करते हैं।
  • नियमित फ़ॉलो-अप: रक्तचाप की घर पर निगरानी और समय-समय पर फेफड़ों-हृदय की जाँच कराते रहें।

रोग का पूर्वानुमान

लोकलाइज़्ड स्क्लेरोडर्मा आमतौर पर जानलेवा नहीं होता, हालाँकि त्वचा और ऊतकों में स्थायी बदलाव छोड़ सकता है। सिस्टेमिक स्क्लेरोसिस का पूर्वानुमान इस पर निर्भर करता है कि कौन-से अंग प्रभावित हैं और रोग कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। पिछले दशकों में जाँच और उपचार में बड़ी प्रगति हुई है, इसलिए समय पर निदान और नियमित इलाज से बहुत से मरीज़ लंबा और सक्रिय जीवन जी पाते हैं।

डॉक्टर से कब मिलें?

निम्न स्थितियों में विलंब न करें:

  • ठंड में उंगलियों का बार-बार रंग बदलना, विशेषकर घाव या दर्द के साथ
  • त्वचा का कड़ा, मोटा या चमकदार होना
  • निगलने में कठिनाई या लगातार सीने में जलन
  • साँस फूलना या सूखी खाँसी जो ठीक न हो
  • अचानक तेज़ सिरदर्द के साथ बहुत अधिक रक्तचाप (तुरंत आपातकालीन सहायता लें)

निष्कर्ष

स्क्लेरोडर्मा एक जटिल और दीर्घकालिक बीमारी है, पर यह अब पहले जितनी निराशाजनक नहीं रही। शुरुआती लक्षणों की पहचान, रुमेटोलॉजिस्ट की देखरेख, नियमित जाँच और जीवनशैली में सावधानी से इसे काफ़ी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। यदि आपको या आपके किसी परिजन को ऊपर बताए लक्षण दिखें तो घबराएँ नहीं, समय पर विशेषज्ञ से परामर्श लें।

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