रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा (Retinitis Pigmentosa)
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रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा (Retinitis Pigmentosa): कारण, लक्षण, निदान और इलाज

परिचय

हमारी आँख के पीछे एक पतली, पारदर्शी परत होती है जिसे रेटिना (दृष्टिपटल) कहते हैं। यह कैमरे की फ़िल्म की तरह काम करती है। बाहर से आने वाली रोशनी को यह विद्युत संकेतों में बदलती है और ऑप्टिक नर्व के ज़रिए दिमाग तक पहुँचाती है। इसी वजह से हम देख पाते हैं। रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा (RP) आँखों की एक आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें रेटिना की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं। इससे रोगी की दृष्टि समय के साथ कमज़ोर होती जाती है।

नाम में “रेटिनाइटिस” शब्द है, पर यह कोई संक्रमण या सूजन की बीमारी नहीं है। यह एक अपक्षयी (degenerative) रोग है, यानी कोशिकाएँ धीरे-धीरे क्षीण होती जाती हैं। “पिगमेंटोसा” इसलिए जुड़ा है कि जाँच में रेटिना पर गहरे रंग के रंजक (पिगमेंट) के जमाव दिखाई देते हैं।

दुनिया भर में लगभग 4,000 में से 1 व्यक्ति इस रोग से प्रभावित माना जाता है। अनुमान है कि विश्व में 15 लाख से अधिक लोग इससे जूझ रहे हैं। यह वंशानुगत अंधेपन के सबसे आम कारणों में से एक है।

रेटिना की कोशिकाएँ और RP

रेटिना में दो मुख्य प्रकार की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ होती हैं:

  • रॉड कोशिकाएँ (Rods): ये कम रोशनी में देखने और आसपास की (परिधीय) दृष्टि के लिए ज़िम्मेदार हैं।
  • कोन कोशिकाएँ (Cones): ये तेज़ रोशनी में देखने, रंग पहचानने और बारीक चीज़ें देखने (जैसे पढ़ना) के लिए ज़रूरी हैं।

RP में आमतौर पर सबसे पहले रॉड कोशिकाएँ नष्ट होती हैं। इसलिए शुरुआती लक्षण रात में कम दिखना और किनारे की नज़र का कमज़ोर होना हैं। बाद में कोन कोशिकाएँ भी प्रभावित होती हैं और केंद्रीय दृष्टि व रंग-दृष्टि पर असर पड़ता है।

कारण

RP का मुख्य कारण जीन में गड़बड़ी (म्यूटेशन) है। अब तक 80 से अधिक जीन इस रोग से जुड़े पाए गए हैं, जिनमें RHO, USH2A, RPGR और RPE65 प्रमुख हैं। ये जीन रेटिना की कोशिकाओं के काम और उनके जीवित रहने के लिए ज़रूरी प्रोटीन बनाते हैं। जीन में गड़बड़ी होने पर ये कोशिकाएँ धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं।

यह रोग तीन तरीकों से अगली पीढ़ी में जा सकता है:

  1. ऑटोसोमल रिसेसिव: बच्चे को माता और पिता दोनों से खराब जीन मिलता है। माता-पिता में अक्सर कोई लक्षण नहीं होते। भारत जैसे देशों में, जहाँ रक्त-संबंधियों में विवाह के मामले अधिक हैं, इस प्रकार का जोखिम बढ़ जाता है।
  2. ऑटोसोमल डोमिनेंट: एक अभिभावक से खराब जीन मिलना ही रोग के लिए काफ़ी है। इसमें आमतौर पर बीमारी हल्की और देर से शुरू होती है।
  3. एक्स-लिंक्ड: जीन X गुणसूत्र पर होता है। यह प्रकार अधिकतर पुरुषों को प्रभावित करता है और अक्सर अधिक गंभीर होता है।

कुछ मामलों में परिवार में पहले किसी को रोग नहीं होता, और रोगी अपने परिवार में पहला होता है। ऐसे मामलों में भी आमतौर पर जीन की गड़बड़ी ही कारण होती है।

लक्षण

RP के लक्षण धीरे-धीरे बढ़ते हैं और हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। शुरुआत अक्सर बचपन, किशोरावस्था या युवावस्था में होती है।

1. रतौंधी (Night Blindness): यह सबसे पहला और आम लक्षण है। अंधेरे या कम रोशनी वाली जगह में देखने में दिक्कत होती है। रोगी को शाम के बाद चलने में ठोकर लगती है, या रोशनी वाली जगह से अंधेरे कमरे में जाने पर आँखें देर से ढलती हैं।

2. परिधीय दृष्टि का घटना (Tunnel Vision): दृष्टि का दायरा धीरे-धीरे सिकुड़ता जाता है। व्यक्ति को ऐसा लगता है जैसे वह किसी सँकरी नली से देख रहा हो। इसी कारण वह चीज़ों से टकरा सकता है और खेलकूद या गाड़ी चलाने में परेशानी होती है।

3. चकाचौंध (Glare): तेज़ रोशनी या धूप से आँखों में असुविधा होती है।

4. रंग पहचानने में कठिनाई: बीमारी बढ़ने पर रंगों की पहचान प्रभावित हो सकती है।

5. केंद्रीय दृष्टि का कमज़ोर होना: उन्नत अवस्था में पढ़ना, चेहरे पहचानना और बारीक काम करना भी कठिन हो जाता है।

कई बार रोगी या उसके परिजन शुरू में इसे सामान्य कमज़ोर नज़र समझ लेते हैं। इसलिए यदि बच्चा अंधेरे में बहुत डरता है, बार-बार टकराता है या शाम को चलने से कतराता है, तो नेत्र विशेषज्ञ को ज़रूर दिखाना चाहिए।

RP से जुड़े अन्य सिंड्रोम

कुछ मामलों में RP अकेला नहीं होता, बल्कि अन्य अंगों की समस्याओं के साथ जुड़ा होता है। इनमें प्रमुख हैं:

  • अशर सिंड्रोम (Usher Syndrome): इसमें RP के साथ सुनने की क्षमता में कमी होती है।
  • बार्डे-बीडल सिंड्रोम: इसमें RP के साथ मोटापा, अतिरिक्त उँगलियाँ और किडनी की समस्याएँ हो सकती हैं।

इसलिए RP के निदान के बाद सुनने की जाँच और अन्य शारीरिक जाँच भी उपयोगी हो सकती हैं।

जटिलताएँ

RP के रोगियों में कुछ अन्य आँखों की समस्याएँ भी देखी जाती हैं:

  • मोतियाबिंद: विशेषकर लेंस के पीछे वाला (पोस्टीरियर सबकैप्सुलर) मोतियाबिंद कम उम्र में ही हो सकता है।
  • मैक्युलर एडिमा (सिस्टॉइड): रेटिना के केंद्र में सूजन आ सकती है, जिससे दृष्टि और घट जाती है।
  • ग्लूकोमा और निकट-दृष्टि दोष भी कुछ रोगियों में पाए जाते हैं।

इनमें से कई जटिलताओं का इलाज संभव है, इसलिए नियमित जाँच बहुत ज़रूरी है।

निदान

नेत्र रोग विशेषज्ञ (विशेषतः रेटिना विशेषज्ञ) कई जाँचों से RP की पुष्टि करते हैं:

  • पुतली फैलाकर रेटिना की जाँच (फंडस परीक्षण): इसमें रेटिना पर हड्डी की किरचों जैसे गहरे रंग के जमाव, पतली रक्त नलिकाएँ और ऑप्टिक डिस्क का पीलापन दिख सकता है।
  • विज़ुअल फ़ील्ड टेस्ट: इससे देखने के दायरे के सिकुड़ने का पता चलता है।
  • इलेक्ट्रोरेटिनोग्राफ़ी (ERG): यह रेटिना की विद्युतीय गतिविधि मापती है और रॉड व कोन के काम का आकलन करती है। RP में अक्सर यह जाँच शुरुआती दौर में ही असामान्य मिलती है।
  • OCT (ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफ़ी): इससे रेटिना की परतों की बारीक तस्वीर मिलती है और सूजन या पतलेपन का पता चलता है।
  • जेनेटिक टेस्टिंग: इससे संबंधित जीन की पहचान होती है। यह इसलिए अहम है कि कुछ जीन-आधारित उपचार केवल विशेष म्यूटेशन वाले रोगियों के लिए ही उपलब्ध हैं, और परिवार नियोजन में भी इससे मदद मिलती है।

इलाज: क्या उपलब्ध है?

वर्तमान में RP का कोई ऐसा इलाज उपलब्ध नहीं है जो सभी रोगियों में बीमारी को पूरी तरह रोक दे या खोई हुई दृष्टि लौटा दे। फिर भी कई उपाय रोगी के जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने और जटिलताओं को सँभालने में मदद करते हैं।

1. जीन थेरेपी: RPE65 जीन के दोनों प्रतियों में म्यूटेशन वाले रोगियों के लिए लक्स्टर्ना (Luxturna, voretigene neparvovec) नामक जीन थेरेपी को अमेरिका सहित कुछ देशों में मंज़ूरी मिली है। यह केवल इसी विशेष जीन के रोगियों के लिए है, और RP के अधिकांश रोगी इस श्रेणी में नहीं आते। इसलिए जेनेटिक जाँच से पहले यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई व्यक्ति इसके योग्य है या नहीं। भारत में इसकी उपलब्धता और लागत के बारे में अपने विशेषज्ञ से जानकारी लेना बेहतर है।

2. विटामिन और पूरक आहार: कुछ अध्ययनों में विटामिन A (पामिटेट) और ओमेगा-3 (DHA) से रोग की गति कुछ धीमी होने के संकेत मिले हैं। लेकिन विटामिन A की अधिक मात्रा लिवर और हड्डियों के लिए हानिकारक हो सकती है, और गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष रूप से जोखिम भरी है। इसलिए कोई भी पूरक अपने आप न लें, केवल डॉक्टर की सलाह और निगरानी में ही लें।

3. सहायक उपचार:

  • मोतियाबिंद की सर्जरी, जब आवश्यक हो।
  • मैक्युलर एडिमा के लिए दवाएँ या आई-ड्रॉप्स।
  • धूप और चकाचौंध से बचाव के लिए UV-सुरक्षा वाले उपयुक्त चश्मे।

4. लो-विज़न एड्स: मैग्निफ़ायर, विशेष चश्मे, स्क्रीन-रीडर, बड़े अक्षरों वाली सामग्री और अच्छी रोशनी की व्यवस्था रोज़मर्रा के कामों में मदद करती है। चलने-फिरने की ट्रेनिंग (mobility training) और ब्रेल सीखना भी कई लोगों के लिए उपयोगी है।

5. रेटिनल इम्प्लांट: कुछ उन्नत मामलों में कृत्रिम रेटिना (प्रोस्थेसिस) के प्रयोग हुए हैं, पर इनकी उपलब्धता बहुत सीमित है और परिणाम भी सीमित रहे हैं।

अनुसंधान और भविष्य की उम्मीदें

दुनिया भर में RP पर तेज़ी से शोध हो रहा है। जीन थेरेपी, जीन एडिटिंग (CRISPR), स्टेम सेल थेरेपी और ऑप्टोजेनेटिक्स जैसी तकनीकों पर परीक्षण चल रहे हैं। ऑप्टोजेनेटिक्स में बची हुई रेटिना कोशिकाओं को प्रकाश-संवेदी बनाने की कोशिश होती है। ये उपचार अभी प्रायोगिक चरण में हैं, पर आने वाले वर्षों में इनसे नई उम्मीदें जुड़ी हैं। रोगी चाहें तो अपने नेत्र चिकित्सक से मान्यता प्राप्त क्लिनिकल ट्रायल्स के बारे में पूछ सकते हैं।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सावधानियाँ और सुझाव

  • नियमित जाँच: साल में कम से कम एक बार रेटिना विशेषज्ञ से जाँच कराएँ।
  • घर में सुरक्षा: रास्ते में अनावश्यक सामान न रखें, सीढ़ियों और दरवाज़ों के किनारों पर चमकीले निशान लगाएँ, और रात में हल्की रोशनी रखें।
  • धूप से बचाव: बाहर निकलते समय धूप के चश्मे और टोपी का इस्तेमाल करें।
  • स्वस्थ आहार: हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, फल, मछली और मेवे जैसे संतुलित आहार लें। धूम्रपान से पूरी तरह बचें, क्योंकि यह आँखों के लिए नुकसानदेह है।
  • गाड़ी चलाना: दृष्टि का दायरा घटने पर, विशेषकर रात में, गाड़ी चलाना असुरक्षित हो सकता है। इस बारे में डॉक्टर की सलाह मानें।
  • भावनात्मक सहारा: दृष्टि घटने की आशंका से चिंता और तनाव होना स्वाभाविक है। परिवार, मित्रों, काउंसलर या सहायता समूहों से बात करना मददगार होता है।
  • शिक्षा और रोज़गार: सहायक तकनीकों की मदद से RP के कई रोगी पढ़ाई और नौकरी में सफल होते हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत मिलने वाले अधिकारों और सुविधाओं की जानकारी भी लें।

आनुवंशिक परामर्श और परिवार

चूँकि RP वंशानुगत रोग है, इसलिए रोगी के परिवार में आनुवंशिक परामर्श (genetic counselling) बहुत उपयोगी होता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि रोग किस प्रकार से वंश में चल रहा है, भाई-बहनों या बच्चों को इसका कितना जोखिम है, और विवाह या संतान की योजना बनाते समय क्या विकल्प हैं। निकट रक्त-संबंधियों में विवाह से रिसेसिव रोगों का जोखिम बढ़ता है, इसलिए इस बारे में जागरूक रहना चाहिए।

कुछ आम भ्रांतियाँ

  • “यह छूने या साथ रहने से फैलता है।” यह गलत है। RP संक्रामक नहीं है।
  • “RP का मतलब पूरा अंधापन है।” ऐसा हमेशा नहीं होता। कई लोगों में दृष्टि का कुछ हिस्सा लंबे समय तक बना रहता है, हालाँकि प्रगति की गति हर व्यक्ति में अलग होती है।
  • “चश्मा लगाने से ठीक हो जाएगा।” चश्मा केवल सामान्य दृष्टि-दोष सुधारता है, RP की प्रगति को नहीं रोकता।
  • “घरेलू नुस्खों या जड़ी-बूटियों से इलाज हो सकता है।” ऐसे दावों का कोई प्रमाणित वैज्ञानिक आधार नहीं है। भ्रामक विज्ञापनों और महँगे अप्रमाणित इलाज से सावधान रहें।

डॉक्टर से कब मिलें?

यदि आपको या आपके बच्चे को रात में देखने में लगातार कठिनाई हो, किनारे की चीज़ें दिखाई न दें, बार-बार चीज़ों से टकराना हो, या परिवार में किसी को RP रहा हो, तो देर न करें और किसी रेटिना विशेषज्ञ से मिलें। शुरुआती निदान से जटिलताओं का समय पर इलाज हो पाता है और रोगी को आगे की योजना बनाने का समय मिलता है।

निष्कर्ष

रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा एक चुनौतीपूर्ण आनुवंशिक नेत्र रोग है, जो धीरे-धीरे दृष्टि को प्रभावित करता है। अभी इसका सर्वमान्य स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है, पर सही समय पर निदान, नियमित निगरानी, जटिलताओं के उपचार, सहायक उपकरणों और भावनात्मक सहारे से रोगी एक सक्रिय और सार्थक जीवन जी सकते हैं। जीन थेरेपी और अन्य तकनीकों में हो रही प्रगति भविष्य के लिए आशा जगाती है। जागरूकता, वैज्ञानिक जानकारी और परिवार व समाज के सहयोग से इस रोग का सामना बेहतर तरीके से किया जा सकता है।

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