एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing Spondylitis - रीढ़ की हड्डी का गठिया)
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एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (रीढ़ की हड्डी का गठिया): कारण, लक्षण, जाँच और इलाज

परिचय

क्या आपको सुबह उठते ही कमर में अकड़न महसूस होती है जो हल्की-फुल्की हरकत या कसरत के बाद ठीक हो जाती है, लेकिन आराम करने पर फिर लौट आती है? अगर यह तकलीफ महीनों से चल रही है, खासकर 40 साल से कम उम्र में शुरू हुई है, तो इसे सामान्य पीठ दर्द समझकर टालना ठीक नहीं। यह एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing Spondylitis, AS) का संकेत हो सकता है।

एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस गठिया का एक दीर्घकालिक (क्रॉनिक) सूजन वाला प्रकार है, जो मुख्य रूप से रीढ़ की हड्डी और कमर के निचले हिस्से में स्थित सैक्रोइलियक जोड़ों (Sacroiliac joints) को प्रभावित करता है। “एंकिलॉजिंग” का अर्थ है जुड़ जाना और “स्पॉन्डिलाइटिस” का अर्थ है रीढ़ की कशेरुकाओं (vertebrae) में सूजन। यानी समय के साथ, यदि इलाज न मिले, तो रीढ़ की हड्डियाँ आपस में जुड़ सकती हैं और रीढ़ की लचक कम हो जाती है। इसे सामान्य भाषा में “बाँस जैसी रीढ़” (Bamboo Spine) भी कहा जाता है।

एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस क्या है?

यह एक ऑटोइम्यून (स्वप्रतिरक्षी) बीमारी है, जिसमें शरीर की अपनी रोग प्रतिरोधक प्रणाली गलती से अपने ही जोड़ों और ऊतकों पर हमला करने लगती है। इससे रीढ़ के जोड़ों और उन स्थानों पर सूजन आती है जहाँ स्नायुबंधन (ligaments) और टेंडन हड्डियों से जुड़ते हैं। बार-बार सूजन और उसके ठीक होने की प्रक्रिया में शरीर नई हड्डी बनाने लगता है, जिससे कशेरुकाएँ धीरे-धीरे जुड़ने लगती हैं।

यह बीमारी आमतौर पर 15 से 45 वर्ष की उम्र के बीच शुरू होती है, और इसकी शुरुआत अक्सर 20 से 30 वर्ष की उम्र में होती है। पुरुषों में यह महिलाओं की तुलना में अधिक देखी जाती है, हालाँकि महिलाओं में भी यह होती है और कई बार उनमें इसे पहचानने में देर हो जाती है।

कारण और जोखिम कारक

इस बीमारी का सटीक कारण अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं है, लेकिन शोध से कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं:

1. आनुवंशिक कारण (HLA-B27 जीन): इस बीमारी से सबसे मजबूती से जुड़ा जीन HLA-B27 है। AS के अधिकांश मरीजों में यह जीन पाया जाता है। लेकिन ध्यान रहे, यह जीन होने का मतलब यह नहीं कि बीमारी होगी ही। बहुत से लोगों में यह जीन होता है और उन्हें कभी AS नहीं होता। इसी तरह, कुछ मरीजों में यह जीन नहीं मिलता, फिर भी उन्हें बीमारी हो सकती है।

2. पारिवारिक इतिहास: यदि परिवार में किसी को AS या संबंधित रोग रहा हो, तो जोखिम बढ़ जाता है।

3. प्रतिरक्षा प्रणाली की गड़बड़ी: शरीर में सूजन पैदा करने वाले रसायनों (जैसे TNF-अल्फा और इंटरल्यूकिन-17) की अधिक सक्रियता इस रोग में अहम भूमिका निभाती है।

4. अन्य संभावित कारक: आँतों के बैक्टीरिया का असंतुलन और पर्यावरणीय कारक भी शोध का विषय हैं।

प्रमुख लक्षण

रीढ़ और कमर से जुड़े लक्षण

  • इंफ्लेमेटरी बैक पेन: कमर के निचले हिस्से और नितंबों में दर्द, जो धीरे-धीरे शुरू होता है और तीन महीने से अधिक समय तक बना रहता है।
  • सुबह की अकड़न: सुबह उठने पर 30 मिनट या उससे अधिक समय तक अकड़न रहना।
  • आराम से बढ़ना, कसरत से घटना: सामान्य (मैकेनिकल) पीठ दर्द के विपरीत, इसमें आराम करने से दर्द बढ़ता है और हलचल या व्यायाम से राहत मिलती है।
  • रात के दूसरे हिस्से में दर्द: कई मरीज रात में दर्द के कारण जाग जाते हैं और करवट बदलने या उठकर चलने से आराम पाते हैं।
  • नितंबों में बारी-बारी से दर्द: कभी दाएँ और कभी बाएँ नितंब में दर्द होना।

रीढ़ के बाहर के लक्षण

  • छाती में जकड़न: पसलियों के जोड़ प्रभावित होने से गहरी साँस लेने में कठिनाई या छाती फैलने में कमी।
  • एड़ी का दर्द: एड़ी के पीछे या तलवे में दर्द (एंथेसाइटिस)।
  • जोड़ों में दर्द: कूल्हे, कंधे, घुटने आदि जोड़ों में सूजन और दर्द।
  • आँखों में सूजन (यूवाइटिस): आँख का लाल होना, दर्द, धुँधलापन और रोशनी से परेशानी। यह लगभग एक-तिहाई मरीजों में हो सकता है और तुरंत नेत्र विशेषज्ञ को दिखाना जरूरी है।
  • थकान: लगातार थकान रहना, जो जीवन की गुणवत्ता को काफी प्रभावित करती है।
  • वजन में कमी और हल्का बुखार: कुछ मामलों में।
  • आँतों की समस्या: पेट दर्द, दस्त, कभी-कभी इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज से संबंध।
  • सोरायसिस: त्वचा की यह समस्या भी कुछ मरीजों में साथ पाई जाती है।

बीमारी बढ़ने पर

यदि बीमारी बढ़ती जाए और इलाज न हो, तो रीढ़ आगे की ओर झुकने लगती है (कूबड़ जैसी मुद्रा), गर्दन सीधी घुमाना मुश्किल हो जाता है, और रोजमर्रा के काम जैसे जूते पहनना या पीछे मुड़कर देखना कठिन हो जाता है।

निदान (जाँच) कैसे होती है?

AS की पहचान में अक्सर देरी हो जाती है, कई बार सालों लग जाते हैं, क्योंकि इसे साधारण पीठ दर्द समझ लिया जाता है। सही निदान के लिए रूमेटोलॉजिस्ट (गठिया रोग विशेषज्ञ) से मिलना सबसे उपयुक्त है। निदान में ये चरण शामिल होते हैं:

1. चिकित्सा इतिहास और शारीरिक जाँच: डॉक्टर दर्द की प्रकृति, शुरुआत की उम्र, सुबह की अकड़न और पारिवारिक इतिहास के बारे में पूछते हैं। रीढ़ की गति और छाती के फैलाव की भी जाँच की जाती है।

2. एक्स-रे: सैक्रोइलियक जोड़ों और रीढ़ का एक्स-रे। लेकिन बीमारी की शुरुआती अवस्था में एक्स-रे सामान्य आ सकता है, क्योंकि हड्डी में बदलाव दिखने में वर्षों लग सकते हैं।

3. एमआरआई (MRI): शुरुआती सूजन पकड़ने में एमआरआई सबसे संवेदनशील जाँच है। यह हड्डी में बदलाव दिखने से पहले ही सूजन दिखा देती है।

4. रक्त जाँच: HLA-B27 जाँच, ESR और CRP (सूजन के मार्कर)। ध्यान रहे कि HLA-B27 पॉजिटिव होना अकेले निदान के लिए पर्याप्त नहीं है, और सूजन के मार्कर कुछ मरीजों में सामान्य भी रह सकते हैं।

इलाज

फिलहाल एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस का पूर्ण इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन सही और समय पर उपचार से दर्द व अकड़न को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है, बीमारी की प्रगति धीमी की जा सकती है और मरीज सामान्य, सक्रिय जीवन जी सकते हैं।

1. दवाइयाँ

  • एनएसएआईडी (NSAIDs): इबुप्रोफेन, नेप्रोक्सेन, इंडोमेथेसिन, एटोरिकोक्सिब जैसी दवाइयाँ आमतौर पर पहली पसंद होती हैं। ये दर्द और सूजन कम करती हैं। इन्हें डॉक्टर की सलाह से ही लें, क्योंकि लंबे समय तक इनके उपयोग से पेट, किडनी और हृदय पर असर पड़ सकता है।
  • डीएमएआरडी (DMARDs): सल्फासालाज़ीन जैसी दवाइयाँ मुख्यतः उन मरीजों में उपयोगी होती हैं जिन्हें हाथ-पैर के जोड़ों में भी सूजन हो। रीढ़ की समस्या में इनका असर सीमित रहता है।
  • बायोलॉजिक दवाइयाँ: जब NSAIDs से पर्याप्त लाभ न मिले, तब TNF इनहिबिटर (जैसे एडालिमुमैब, इन्फ्लिक्सिमैब, एटानरसेप्ट, गोलिमुमैब) या IL-17 इनहिबिटर (जैसे सेकुकिनुमैब) दी जाती हैं। ये दवाइयाँ सूजन के मूल कारक पर असर करती हैं और कई मरीजों में बहुत प्रभावी रहती हैं। इनके लिए जाँच (जैसे टीबी की स्क्रीनिंग) आवश्यक होती है।
  • JAK इनहिबिटर: कुछ नई मुँह से ली जाने वाली दवाइयाँ भी विकल्प के रूप में उपलब्ध हैं।
  • स्टेरॉयड इंजेक्शन: किसी विशेष जोड़ में तेज सूजन होने पर स्थानीय इंजेक्शन दिया जा सकता है।

2. फिजियोथेरेपी और व्यायाम

व्यायाम इस बीमारी के इलाज का अभिन्न हिस्सा है, केवल एक अतिरिक्त उपाय नहीं। नियमित व्यायाम से रीढ़ की लचक बनी रहती है और मुद्रा सुधरती है।

  • रीढ़ और गर्दन की स्ट्रेचिंग
  • गहरी साँस लेने के व्यायाम, ताकि छाती की गति बनी रहे
  • पीठ की मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम
  • तैराकी, जो जोड़ों पर कम दबाव डालते हुए पूरे शरीर का व्यायाम कराती है
  • योग और हल्की सैर, जो योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में करें

3. सर्जरी

अधिकांश मरीजों को सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन कूल्हे का जोड़ गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त होने पर जोड़ प्रत्यारोपण, या रीढ़ में गंभीर विकृति होने पर सुधारात्मक सर्जरी की जा सकती है।

जीवनशैली और घरेलू देखभाल

  • सही मुद्रा: बैठते और खड़े होते समय रीढ़ सीधी रखें। कुर्सी की ऊँचाई और कंप्यूटर की स्थिति ऐसी रखें कि झुकना न पड़े।
  • सोने का तरीका: सख्त गद्दे पर सोएँ और बहुत मोटा तकिया न लगाएँ। पेट के बल या पीठ के बल सोना अक्सर बेहतर रहता है।
  • धूम्रपान बंद करें: धूम्रपान से बीमारी तेजी से बढ़ती है और फेफड़ों की क्षमता पर भी असर पड़ता है।
  • संतुलित आहार: पौष्टिक भोजन लें, जिसमें फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज और प्रोटीन शामिल हों। वजन नियंत्रित रखने से जोड़ों पर कम दबाव पड़ता है।
  • गर्म सेंक: अकड़न में गर्म पानी से स्नान या सेंक से आराम मिल सकता है।
  • हड्डियों की सेहत: AS में ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ता है, इसलिए कैल्शियम और विटामिन डी के स्तर की जाँच कराते रहें।
  • तनाव प्रबंधन: लंबी बीमारी मानसिक तनाव और अवसाद का कारण बन सकती है। ध्यान, परिवार का सहयोग और जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग मददगार होती है।

संभावित जटिलताएँ

  • रीढ़ का जुड़ जाना और गतिशीलता में कमी
  • ऑस्टियोपोरोसिस और रीढ़ में फ्रैक्चर का खतरा
  • बार-बार होने वाला यूवाइटिस, जो उपचार न होने पर दृष्टि को नुकसान पहुँचा सकता है
  • हृदय संबंधी समस्याएँ, जैसे महाधमनी वाल्व में परेशानी
  • फेफड़ों की क्षमता में कमी
  • कभी-कभी गर्भावस्था और कार्यक्षमता से जुड़ी चुनौतियाँ

डॉक्टर से कब मिलें?

निम्न स्थितियों में विशेषज्ञ से जरूर परामर्श करें:

  • कमर दर्द तीन महीने से अधिक समय से बना हुआ है
  • दर्द 40 वर्ष से कम उम्र में शुरू हुआ हो
  • सुबह की अकड़न आधे घंटे से ज्यादा रहती हो
  • आराम से दर्द बढ़ता हो और व्यायाम से घटता हो
  • आँख में लालिमा या दर्द के साथ रोशनी से तकलीफ हो
  • परिवार में किसी को AS या संबंधित गठिया रोग रहा हो

निष्कर्ष

एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस एक लंबे समय तक चलने वाली बीमारी है, लेकिन यह जीवन का अंत नहीं है। आज आधुनिक दवाइयों, नियमित व्यायाम और जीवनशैली में बदलाव के साथ अधिकांश मरीज अच्छा, सक्रिय और उत्पादक जीवन जी पाते हैं। सबसे जरूरी है समय पर पहचान और उपचार। जितनी जल्दी निदान होगा, रीढ़ को स्थायी नुकसान से बचाना उतना ही आसान होगा।

यदि आपको या आपके किसी परिचित को लंबे समय से कमर दर्द और सुबह की अकड़न की शिकायत है, तो इसे नजरअंदाज न करें। किसी रूमेटोलॉजिस्ट या अस्थि रोग विशेषज्ञ से जाँच कराएँ।

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