रेबीज: एक जानलेवा लेकिन रोकथाम योग्य बीमारी
परिचय
रेबीज एक विषाणुजनित (वायरल) रोग है जो मनुष्यों और जानवरों दोनों को प्रभावित करता है। यह दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञात बीमारियों में से एक है, फिर भी आज भी यह हर साल हजारों लोगों की जान ले लेती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि रेबीज लगभग पूरी तरह से रोकथाम योग्य बीमारी है, फिर भी जागरूकता की कमी, समय पर इलाज न मिलने और टीकाकरण की उपेक्षा के कारण यह आज भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। एक बार लक्षण प्रकट हो जाने के बाद रेबीज लगभग शत-प्रतिशत घातक साबित होता है, इसलिए इसके बारे में सही जानकारी होना और समय रहते सावधानी बरतना बेहद जरूरी है।
रेबीज क्या है?
रेबीज एक जूनोटिक बीमारी है, यानी यह जानवरों से मनुष्यों में फैलती है। यह “रैब्डोविरिडे” परिवार के एक विषाणु के कारण होता है, जो संक्रमित जानवर की लार के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है। यह विषाणु मुख्य रूप से मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी (केंद्रीय तंत्रिका तंत्र) को प्रभावित करता है, जिससे मस्तिष्क में गंभीर सूजन हो जाती है। दुनियाभर में हर साल अनुमानित रूप से लगभग 59,000 लोगों की मृत्यु रेबीज के कारण होती है, और इनमें से करीब 95 प्रतिशत मामले अफ्रीका और एशिया में दर्ज किए जाते हैं। भारत में रेबीज से होने वाली वैश्विक मौतों का एक बड़ा हिस्सा दर्ज होता है, जो इसे भारत के लिए विशेष रूप से गंभीर मुद्दा बनाता है।
रेबीज कैसे फैलता है?
रेबीज मुख्य रूप से संक्रमित जानवर के काटने, खरोंचने या लार के संपर्क में आने से फैलता है। दुनियाभर में लगभग 99 प्रतिशत मानव रेबीज मामलों के लिए कुत्ते जिम्मेदार होते हैं, विशेषकर आवारा और बिना टीकाकरण वाले कुत्ते। इसके अलावा बिल्ली, बंदर, गीदड़, लोमड़ी, नेवला और चमगादड़ जैसे जानवर भी रेबीज फैला सकते हैं। यह विषाणु संक्रमित जानवर की लार में मौजूद होता है और जब यह किसी घाव, खरोंच या श्लेष्मा झिल्ली (जैसे आंख, नाक या मुंह) के संपर्क में आता है, तो यह शरीर में प्रवेश कर जाता है। मनुष्य से मनुष्य में रेबीज फैलने की पुष्टि आज तक नहीं हुई है, हालांकि सैद्धांतिक रूप से इसे संभव माना जाता है।
रेबीज के लक्षण
रेबीज के लक्षण आमतौर पर संक्रमण के तुरंत बाद नहीं दिखते। इसकी ऊष्मायन अवधि (इनक्यूबेशन पीरियड) सामान्यतः दो से तीन महीने होती है, लेकिन यह एक सप्ताह से लेकर एक साल तक भी हो सकती है। यह अवधि इस बात पर निर्भर करती है कि काटने या घाव का स्थान मस्तिष्क से कितना नजदीक है और विषाणु की मात्रा कितनी थी।
शुरुआती लक्षणों में बुखार, दर्द, और काटे गए स्थान पर झुनझुनी या जलन जैसी असामान्य अनुभूति शामिल होती है। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, यह दो रूपों में सामने आ सकती है:
- उग्र (फ्यूरियस) रेबीज: इसमें अत्यधिक उत्तेजना, आक्रामकता, पानी से डर (हाइड्रोफोबिया), हवा से डर (एयरोफोबिया), भ्रम और मांसपेशियों में ऐंठन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
- पक्षाघाती (पैरालिटिक) रेबीज: इसमें धीरे-धीरे शरीर के अंग सुन्न पड़ने लगते हैं और लकवा हो जाता है। यह रूप कम आम है लेकिन पहचानना अधिक कठिन होता है।
एक बार लक्षण दिखाई देने के बाद, रेबीज लगभग हमेशा घातक साबित होता है, क्योंकि इसका कोई प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं है।
रेबीज से बचाव और उपचार
यहीं पर रेबीज की सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आती है — यह बीमारी लक्षण दिखने के बाद लाइलाज है, लेकिन संक्रमण के शुरुआती चरण में इसे पूरी तरह रोका जा सकता है।
काटने के तुरंत बाद क्या करें?
अगर किसी संदिग्ध जानवर ने काट लिया है या खरोंच दिया है, तो निम्नलिखित कदम तुरंत उठाने चाहिए:
- घाव को तुरंत धोएं: घाव को साबुन और बहते पानी से कम से कम 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना चाहिए। यह विषाणु की मात्रा को काफी हद तक कम कर सकता है।
- एंटीसेप्टिक लगाएं: घाव को धोने के बाद आयोडीन या एल्कोहल आधारित एंटीसेप्टिक लगाना चाहिए।
- घाव को न बांधें: घाव को कसकर पट्टी से न बांधें, इससे विषाणु के फैलने का खतरा बढ़ सकता है।
- तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें: बिना देर किए नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र जाकर चिकित्सकीय सलाह लें।
पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP)
काटने के बाद डॉक्टर आमतौर पर “पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस” (PEP) शुरू करते हैं, जिसमें शामिल है:
- रेबीज रोधी टीके की श्रृंखला: यह कई खुराकों में दी जाती है, जो सामान्यतः 0, 3, 7 और 14वें दिन दी जाती हैं।
- रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन (RIG): गंभीर घावों में, विशेषकर सिर, गर्दन या हाथ-पैर के गहरे घावों में, यह घाव के आसपास और मांसपेशी में इंजेक्ट किया जाता है ताकि तत्काल सुरक्षा मिल सके।
अगर यह उपचार समय पर और सही तरीके से शुरू किया जाए, तो यह लगभग शत-प्रतिशत प्रभावी होता है और मृत्यु को रोक सकता है।
प्री-एक्सपोजर वैक्सीनेशन
जो लोग उच्च जोखिम वाले पेशों में हैं — जैसे पशु चिकित्सक, वन्यजीव कर्मी, प्रयोगशाला कर्मचारी, या जो लोग ऐसे क्षेत्रों में यात्रा करते हैं जहां रेबीज आम है — उनके लिए काटे जाने से पहले ही टीकाकरण की सलाह दी जाती है। यह अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है, हालांकि काटे जाने के बाद भी बूस्टर खुराक की आवश्यकता होती है।
पालतू और आवारा जानवरों का टीकाकरण
चूंकि दुनियाभर में अधिकतर रेबीज मामलों के लिए कुत्ते जिम्मेदार होते हैं, इसलिए कुत्तों का व्यापक टीकाकरण रेबीज नियंत्रण की सबसे प्रभावी रणनीति मानी जाती है। यदि किसी क्षेत्र में कम से कम 70 प्रतिशत कुत्तों का टीकाकरण हो जाए, तो कुत्तों में रेबीज के फैलाव को रोका जा सकता है, जिससे मानव संक्रमण के मामलों में भी भारी कमी आती है। कई देशों ने इस रणनीति को अपनाकर रेबीज पर काफी हद तक नियंत्रण पाया है। पश्चिमी यूरोप, अमेरिका, कनाडा और जापान जैसे देशों में कुत्तों के माध्यम से फैलने वाला रेबीज लगभग समाप्त हो चुका है।
पालतू जानवरों के मालिकों को चाहिए कि वे अपने कुत्तों और बिल्लियों को नियमित रूप से रेबीज का टीका लगवाएं, आवारा जानवरों के संपर्क में आने से बचें, और अपने बच्चों को जानवरों के साथ सुरक्षित व्यवहार के बारे में शिक्षित करें।
जागरूकता की भूमिका
रेबीज से होने वाली अधिकतर मौतें ग्रामीण और गरीब आबादी में होती हैं, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं और टीकों तक पहुंच सीमित होती है। इसके अलावा, लगभग आधे मामलों में पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं, क्योंकि बच्चे अक्सर जानवरों के साथ खेलते समय काटे जाने की सूचना समय पर बड़ों को नहीं देते। इसलिए जन-जागरूकता अभियान बेहद महत्वपूर्ण हैं — लोगों को यह समझाना जरूरी है कि किसी भी जानवर के काटने या खरोंचने को हल्के में नहीं लेना चाहिए, चाहे वह घाव कितना भी छोटा क्यों न दिखे।
निष्कर्ष
रेबीज एक ऐसी बीमारी है जो एक ओर बेहद खतरनाक और लगभग शत-प्रतिशत घातक है, तो दूसरी ओर पूरी तरह से रोकथाम योग्य भी है। सही जानकारी, समय पर घाव की सफाई, तुरंत चिकित्सकीय सहायता, और पालतू व आवारा जानवरों का नियमित टीकाकरण — ये सभी मिलकर इस बीमारी से होने वाली मौतों को शून्य तक ला सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य वैश्विक संस्थाओं का लक्ष्य है कि 2030 तक कुत्तों से फैलने वाले मानव रेबीज को समाप्त किया जाए। इस लक्ष्य को पाने के लिए सरकार, स्वास्थ्य विभाग और आम जनता — सभी की सामूहिक भागीदारी आवश्यक है। अगर हम सब मिलकर जागरूकता फैलाएं और सावधानी बरतें, तो रेबीज जैसी सदियों पुरानी बीमारी को भी हराया जा सकता है।
