स्यूडोमेम्ब्रेनस कोलाइटिस (Pseudomembranous Colitis - सी. डिफ संक्रमण)
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स्यूडोमेम्ब्रेनस कोलाइटिस: एंटीबायोटिक के बाद आंत की गंभीर सूजन

प्रस्तावना

एंटीबायोटिक दवाएं आधुनिक चिकित्सा की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक हैं। इनसे निमोनिया, टाइफाइड, मूत्र संक्रमण और घाव के संक्रमण जैसी बीमारियों का इलाज संभव हुआ है। लेकिन कई बार यही दवाएं शरीर के लिए नई परेशानी भी खड़ी कर देती हैं। स्यूडोमेम्ब्रेनस कोलाइटिस ऐसी ही एक स्थिति है, जिसमें एंटीबायोटिक लेने के बाद बड़ी आंत (कोलन) में गंभीर सूजन हो जाती है। इसे एंटीबायोटिक-संबंधित कोलाइटिस या C. difficile संक्रमण भी कहा जाता है। समय पर पहचान और इलाज हो जाए तो यह पूरी तरह ठीक हो सकता है, पर देरी होने पर यह जानलेवा भी बन सकता है।

स्यूडोमेम्ब्रेनस कोलाइटिस क्या है?

इस बीमारी का नाम इसकी एक खास पहचान से आया है। जांच (कोलोनोस्कोपी) में बड़ी आंत की भीतरी परत पर पीले-सफेद रंग के धब्बे या झिल्लीनुमा परत दिखाई देती है। इसे “स्यूडोमेम्ब्रेन” यानी नकली झिल्ली कहते हैं। यह परत सूजी हुई आंतों की कोशिकाओं, सफेद रक्त कोशिकाओं, बलगम और मृत ऊतकों से बनती है।

कारण: क्लॉस्ट्रिडिओइडीज़ डिफिसाइल जीवाणु

इस बीमारी का मुख्य कारण Clostridioides difficile (पहले Clostridium difficile, संक्षेप में C. diff) नामक जीवाणु है। यह बैक्टीरिया कई स्वस्थ लोगों की आंतों में बिना कोई नुकसान किए मौजूद रहता है, क्योंकि आंत में रहने वाले करोड़ों “अच्छे” जीवाणु इसे बढ़ने नहीं देते।

जब हम एंटीबायोटिक लेते हैं, तो वह केवल बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं को ही नहीं, आंत के लाभकारी जीवाणुओं को भी मार देती है। इससे आंत का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है और C. difficile को तेजी से बढ़ने का मौका मिल जाता है। यह जीवाणु दो विषैले पदार्थ (टॉक्सिन A और टॉक्सिन B) बनाता है, जो आंत की परत की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। इसी से सूजन, दस्त और झिल्ली जैसी परत बनती है।

C. difficile बीजाणु (स्पोर) बनाता है, जो सतहों पर महीनों तक जीवित रह सकते हैं। अस्पताल के बिस्तर, शौचालय, चिकित्सा उपकरण और स्वास्थ्यकर्मियों के हाथ इन्हें फैलाने का जरिया बन सकते हैं। यह संक्रमण मल-मुख मार्ग से फैलता है।

कौन-सी एंटीबायोटिक अधिक जोखिम वाली हैं?

लगभग हर एंटीबायोटिक से यह समस्या हो सकती है, लेकिन कुछ दवाओं में जोखिम अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है:

  • क्लिंडामाइसिन
  • फ्लुओरोक्विनोलोन समूह की दवाएं (जैसे सिप्रोफ्लोक्सासिन, लेवोफ्लोक्सासिन)
  • सेफालोस्पोरिन समूह की दवाएं (विशेषकर तीसरी पीढ़ी की)
  • एम्पिसिलिन और अमोक्सिसिलिन जैसी पेनिसिलिन समूह की दवाएं

यह जोखिम दवा शुरू करने के कुछ दिनों बाद से लेकर बंद करने के कई हफ्तों बाद तक बना रह सकता है।

जोखिम कारक

कुछ लोगों में इस बीमारी की संभावना अधिक होती है:

  • लंबे समय तक या बार-बार एंटीबायोटिक लेना, खासकर एक साथ कई एंटीबायोटिक।
  • अस्पताल या नर्सिंग होम में भर्ती रहना, क्योंकि वहां बीजाणुओं का संपर्क अधिक होता है।
  • 65 वर्ष से अधिक उम्र।
  • कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता, जैसे कैंसर की कीमोथेरेपी, अंग प्रत्यारोपण या स्टेरॉइड के उपयोग के दौरान।
  • आंतों की पुरानी बीमारियां, जैसे इंफ्लेमेटरी बाउल डिज़ीज़ (अल्सरेटिव कोलाइटिस, क्रोहन रोग)।
  • पेट की सर्जरी का इतिहास।
  • पहले C. difficile संक्रमण हो चुका होना।
  • एसिड कम करने वाली दवाएं (PPI) लेना, जिनके साथ कुछ अध्ययनों में जोखिम बढ़ने का संबंध देखा गया है। फिर भी डॉक्टर की सलाह के बिना इन्हें बंद नहीं करना चाहिए।

लक्षण

लक्षण हल्के से लेकर बहुत गंभीर तक हो सकते हैं।

हल्की या मध्यम स्थिति में:

  • पानी जैसे दस्त, दिन में तीन या उससे अधिक बार
  • पेट में ऐंठन और दर्द
  • हल्का बुखार
  • मल से तेज, असामान्य बदबू
  • भूख न लगना और मिचली

गंभीर स्थिति में:

  • तेज बुखार
  • पेट में तीव्र दर्द और फूलना
  • मल में खून या मवाद
  • बार-बार और बहुत अधिक दस्त के कारण शरीर में पानी की कमी (मुंह सूखना, पेशाब कम आना, चक्कर आना, कमजोरी)
  • तेज धड़कन और रक्तचाप में गिरावट
  • गुर्दों पर असर

संभावित जटिलताएं

इलाज में देरी होने पर ये गंभीर समस्याएं हो सकती हैं:

  1. गंभीर डिहाइड्रेशन और इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन
  2. टॉक्सिक मेगाकोलन, जिसमें बड़ी आंत बहुत फैल जाती है और उसके फटने का खतरा रहता है
  3. आंत में छेद (परफोरेशन), जिससे पेट में संक्रमण (पेरिटोनाइटिस) हो सकता है
  4. सेप्सिस और अंगों का काम बंद होना
  5. बार-बार संक्रमण लौटना: लगभग 15 से 25 प्रतिशत मरीजों में पहले इलाज के बाद संक्रमण दोबारा हो सकता है।

जांच और निदान

यदि एंटीबायोटिक के दौरान या बाद में तीन या अधिक बार पानी जैसे दस्त हों, तो डॉक्टर इन जांचों की सलाह दे सकते हैं:

  • मल की जांच: इसमें C. difficile के टॉक्सिन या उसके जीन (PCR) और GDH एंजाइम की जांच होती है। यह सबसे आम और महत्वपूर्ण जांच है।
  • रक्त जांच: सफेद रक्त कोशिकाओं की गिनती, क्रिएटिनिन और एल्बुमिन से बीमारी की गंभीरता का अंदाजा मिलता है।
  • पेट का एक्स-रे या सीटी स्कैन: गंभीर मामलों में आंत के फैलाव या छेद की आशंका जांचने के लिए।
  • कोलोनोस्कोपी या सिग्मॉइडोस्कोपी: जब निदान स्पष्ट न हो या दूसरी बीमारियों को अलग करना हो, तब आंत की भीतरी परत देखी जाती है। इसमें स्यूडोमेम्ब्रेन दिखना इस रोग की पहचान है।

उपचार

1. पुरानी एंटीबायोटिक बंद करना: यदि संभव हो और डॉक्टर उचित समझें, तो जिस एंटीबायोटिक से समस्या शुरू हुई उसे बंद या बदल दिया जाता है। यह निर्णय डॉक्टर ही लें, खुद दवा बंद न करें।

2. विशेष एंटीबायोटिक: C. difficile के लिए मौखिक रूप से ली जाने वाली वैंकोमाइसिन या फिडैक्सोमाइसिन आजकल पसंदीदा दवाएं मानी जाती हैं। पहले मेट्रोनिडाज़ोल का अधिक उपयोग होता था, पर अब इसे मुख्यतः हल्के संक्रमण में या जब बाकी विकल्प उपलब्ध न हों तब ही दिया जाता है। उपचार सामान्यतः लगभग 10 दिन चलता है।

3. सहायक देखभाल: पर्याप्त तरल पदार्थ, ओआरएस और जरूरत पड़ने पर नस से (IV) तरल और इलेक्ट्रोलाइट दिए जाते हैं।

4. दस्त रोकने वाली दवाओं से बचाव: लोपेरामाइड जैसी दवाएं डॉक्टर की सलाह के बिना न लें। ये विषैले पदार्थों को आंत में रोककर स्थिति बिगाड़ सकती हैं और टॉक्सिक मेगाकोलन का खतरा बढ़ा सकती हैं।

5. गंभीर मामले: तेज संक्रमण में अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। आंत फटने या मेगाकोलन जैसी स्थिति में सर्जरी (कोलेक्टॉमी) की जरूरत पड़ सकती है।

6. बार-बार होने वाले संक्रमण का इलाज: जिन मरीजों में संक्रमण बार-बार लौटता है, उनके लिए कई विकल्प हैं, जैसे फिडैक्सोमाइसिन, वैंकोमाइसिन की घटती मात्रा वाला कोर्स, और फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट (FMT)। FMT में स्वस्थ दाता के जांचे हुए मल से लाभकारी जीवाणु मरीज की आंत में पहुंचाए जाते हैं ताकि आंत का संतुलन वापस आ सके। कुछ देशों में इसके लिए तैयार माइक्रोबायोम-आधारित उत्पाद भी स्वीकृत हैं। उपलब्धता आपके क्षेत्र और अस्पताल पर निर्भर करती है।

रोकथाम के उपाय

मरीज और आम लोगों के लिए:

  • एंटीबायोटिक केवल डॉक्टर की सलाह पर और निर्धारित मात्रा व अवधि तक ही लें। सर्दी-जुकाम और अधिकतर वायरल बुखार में एंटीबायोटिक बेकार हैं।
  • बिना पर्ची की दवा या पुरानी बची हुई एंटीबायोटिक खुद से न लें।
  • एंटीबायोटिक के दौरान या बाद में लगातार दस्त हो तो तुरंत डॉक्टर को बताएं।
  • शौचालय के बाद और खाने से पहले साबुन-पानी से हाथ धोएं। ध्यान रहे, अल्कोहल वाला सैनिटाइज़र C. difficile के बीजाणुओं पर प्रभावी नहीं होता, इसलिए साबुन और बहते पानी से हाथ धोना जरूरी है।

संक्रमित व्यक्ति के घर में देखभाल:

  • मरीज के लिए अलग शौचालय हो तो बेहतर है, और उसे ब्लीच-आधारित क्लीनर से साफ करें।
  • मरीज के कपड़े और चादरें गर्म पानी व डिटर्जेंट से धोएं।
  • देखभाल करने वाले दस्ताने पहनें और बाद में हाथ अच्छी तरह धोएं।

अस्पताल में:

  • संक्रमित मरीजों को अलग रखना और संपर्क-सावधानियां (दस्ताने, गाउन) अपनाना।
  • सतहों की ब्लीच या बीजाणुनाशक से सफाई।
  • एंटीबायोटिक का विवेकपूर्ण उपयोग (एंटीबायोटिक स्टूअर्डशिप)।

प्रोबायोटिक के बारे में: दही, छाछ या प्रोबायोटिक सप्लीमेंट आंत के लिए सामान्यतः लाभदायक माने जाते हैं, परंतु C. difficile संक्रमण को रोकने में इनकी भूमिका पर वैज्ञानिक प्रमाण अभी सीमित और मिले-जुले हैं। कमजोर प्रतिरक्षा वाले मरीजों को इन्हें लेने से पहले डॉक्टर से पूछना चाहिए।

कब तुरंत डॉक्टर के पास जाएं?

इनमें से कोई भी लक्षण हो तो देर न करें:

  • एंटीबायोटिक के बाद दो-तीन दिन से अधिक पानी जैसे दस्त
  • मल में खून
  • तेज बुखार या पेट में तेज दर्द और सूजन
  • पेशाब बहुत कम आना, अत्यधिक कमजोरी या बेहोशी जैसा महसूस होना

निष्कर्ष

स्यूडोमेम्ब्रेनस कोलाइटिस इस बात का उदाहरण है कि दवाओं का अनावश्यक या असावधान उपयोग कितना महंगा पड़ सकता है। इसका मुख्य कारण एंटीबायोटिक के कारण आंत के जीवाणुओं का संतुलन बिगड़ना और C. difficile का हावी हो जाना है। एंटीबायोटिक के बाद लगातार दस्त को सामान्य “पेट की गड़बड़ी” मानकर नजरअंदाज न करें। जांच और सही दवाओं से अधिकांश मरीज ठीक हो जाते हैं। रोकथाम का सबसे प्रभावी तरीका है एंटीबायोटिक का समझदारी से उपयोग, साफ-सफाई और अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण के नियमों का पालन।

नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है, यह चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी लक्षण में अपने डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।

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