प्रोस्टेट कैंसर (Prostate Cancer)
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प्रोस्टेट कैंसर (पौरुष ग्रंथि का कैंसर): कारण, लक्षण, जाँच और उपचार

पुरुषों में उम्र बढ़ने के साथ कई स्वास्थ्य समस्याएँ सामने आती हैं, जिनमें प्रोस्टेट से जुड़ी बीमारियाँ सबसे आम हैं। इन्हीं में से एक है प्रोस्टेट कैंसर, जो दुनिया भर में पुरुषों में पाए जाने वाले प्रमुख कैंसरों में गिना जाता है। भारत में भी शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और जागरूकता बढ़ने के कारण इसके मामले अब पहले से अधिक पहचाने जा रहे हैं। अच्छी बात यह है कि यदि यह कैंसर शुरुआती अवस्था में पकड़ में आ जाए, तो इसका इलाज काफ़ी हद तक सफल रहता है। इसलिए इस बीमारी के बारे में सही जानकारी होना हर पुरुष, और उसके परिवार के लिए ज़रूरी है।

प्रोस्टेट ग्रंथि क्या है?

प्रोस्टेट (पौरुष ग्रंथि) पुरुषों के प्रजनन तंत्र का हिस्सा है। यह अखरोट के आकार की एक छोटी ग्रंथि होती है, जो मूत्राशय (ब्लैडर) के ठीक नीचे और मलाशय (रेक्टम) के सामने स्थित होती है। मूत्रनली (यूरेथ्रा), जिससे मूत्र शरीर से बाहर निकलता है, इसी ग्रंथि के बीच से होकर गुज़रती है। प्रोस्टेट का मुख्य कार्य एक विशेष द्रव बनाना है, जो वीर्य का हिस्सा होता है और शुक्राणुओं को पोषण व सुरक्षा देता है।

प्रोस्टेट कैंसर क्या है?

जब प्रोस्टेट ग्रंथि की कोशिकाएँ असामान्य रूप से और अनियंत्रित ढंग से बढ़ने लगती हैं, तो उसे प्रोस्टेट कैंसर कहा जाता है। अधिकांश प्रोस्टेट कैंसर बहुत धीमी गति से बढ़ते हैं और सालों तक ग्रंथि तक ही सीमित रह सकते हैं। हालाँकि कुछ प्रकार आक्रामक होते हैं और तेज़ी से आसपास के ऊतकों, लिम्फ नोड्स और हड्डियों तक फैल सकते हैं। इसी कारण हर मरीज़ का इलाज उसकी बीमारी की प्रकृति के अनुसार तय किया जाता है।

यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि प्रोस्टेट का आकार बढ़ना हमेशा कैंसर नहीं होता। बढ़ी हुई प्रोस्टेट (बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लेसिया, BPH) एक सामान्य और कैंसर-रहित स्थिति है, जो 50 वर्ष के बाद अधिकतर पुरुषों में देखी जाती है। दोनों के लक्षण मिलते-जुलते हो सकते हैं, इसलिए केवल लक्षणों से अंतर करना संभव नहीं है और जाँच आवश्यक होती है।

प्रोस्टेट कैंसर के कारण और जोखिम कारक

प्रोस्टेट कैंसर का कोई एक निश्चित कारण अभी तक ज्ञात नहीं है। लेकिन कुछ कारक इसका जोखिम बढ़ा देते हैं:

  • बढ़ती उम्र: यह सबसे बड़ा जोखिम कारक है। अधिकांश मामले 65 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों में पाए जाते हैं। 50 वर्ष से कम उम्र में यह अपेक्षाकृत कम होता है।
  • पारिवारिक इतिहास: यदि पिता, भाई या किसी निकट रक्त-संबंधी को प्रोस्टेट कैंसर हुआ हो, तो जोखिम बढ़ जाता है। विशेषकर तब, जब बीमारी कम उम्र में हुई हो।
  • आनुवंशिक कारण: BRCA1 और BRCA2 जैसे जीन में बदलाव (म्यूटेशन) से भी जोखिम बढ़ सकता है।
  • मोटापा: कुछ अध्ययनों में मोटापे को अधिक आक्रामक प्रकार के कैंसर से जोड़ा गया है।
  • आहार और जीवनशैली: अधिक वसायुक्त, लाल मांस और प्रोसेस्ड भोजन वाला आहार, कम फल-सब्ज़ियाँ और शारीरिक निष्क्रियता को जोखिम बढ़ाने वाला माना जाता है, हालाँकि इनके प्रमाण पूरी तरह निर्णायक नहीं हैं।

जोखिम कारक होने का अर्थ यह नहीं है कि कैंसर होगा ही, और कई पुरुषों को बिना किसी स्पष्ट जोखिम कारक के भी यह बीमारी हो जाती है।

प्रोस्टेट कैंसर के लक्षण

शुरुआती अवस्था में प्रोस्टेट कैंसर अक्सर कोई लक्षण नहीं दिखाता। यही कारण है कि इसे “खामोश बीमारी” भी कहा जाता है। जब ग्रंथि बढ़ने लगती है या कैंसर फैलने लगता है, तब निम्न लक्षण दिख सकते हैं:

  • बार-बार पेशाब आना, विशेषकर रात में
  • पेशाब की धार कमज़ोर होना या रुक-रुक कर आना
  • पेशाब शुरू करने या रोकने में कठिनाई
  • पेशाब करने के बाद भी मूत्राशय खाली न होने का एहसास
  • पेशाब या वीर्य में खून आना
  • पेशाब करते समय जलन या दर्द
  • कमर, कूल्हों, जाँघों या पीठ के निचले हिस्से में लगातार दर्द
  • इरेक्टाइल डिसफंक्शन (स्तंभन में कठिनाई)
  • बिना कारण वज़न घटना और थकान

हड्डियों में दर्द और कमज़ोरी उन्नत अवस्था का संकेत हो सकती है, जब कैंसर हड्डियों तक फैल चुका हो। ध्यान रखें कि इनमें से अधिकांश लक्षण BPH या मूत्र संक्रमण में भी हो सकते हैं, पर इन्हें नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

जाँच और निदान

प्रोस्टेट कैंसर की पहचान के लिए डॉक्टर (यूरोलॉजिस्ट) कई जाँचों की सलाह दे सकते हैं:

  1. PSA (प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन) रक्त जाँच: प्रोस्टेट कोशिकाएँ PSA नामक प्रोटीन बनाती हैं। रक्त में इसका स्तर बढ़ा होना कैंसर का संकेत हो सकता है, पर संक्रमण और BPH में भी यह बढ़ सकता है। इसलिए परिणाम की व्याख्या डॉक्टर ही करते हैं।
  2. डिजिटल रेक्टल एग्ज़ामिनेशन (DRE): इसमें डॉक्टर उँगली से प्रोस्टेट की बनावट, आकार और कठोरता जाँचते हैं। यह जाँच कम समय की होती है।
  3. मल्टीपैरामेट्रिक MRI: यदि संदेह हो तो MRI से प्रोस्टेट की विस्तृत तस्वीर ली जाती है, जिससे संदिग्ध हिस्से की पहचान और बायोप्सी की योजना में मदद मिलती है।
  4. प्रोस्टेट बायोप्सी: कैंसर की पक्की पुष्टि इसी से होती है। इसमें प्रोस्टेट से ऊतक के छोटे नमूने लेकर माइक्रोस्कोप में जाँचे जाते हैं।
  5. अन्य जाँचें: यदि कैंसर की पुष्टि हो जाए, तो फैलाव जानने के लिए CT स्कैन, बोन स्कैन या PSMA PET स्कैन कराया जा सकता है।

बायोप्सी के बाद रिपोर्ट में ग्लीसन स्कोर और ग्रेड ग्रुप बताए जाते हैं, जिनसे पता चलता है कि कैंसर कितना आक्रामक है। स्कोर जितना ऊँचा, कैंसर उतना तेज़ी से बढ़ने वाला माना जाता है।

कैंसर के चरण (स्टेज)

सामान्य रूप से प्रोस्टेट कैंसर को इन अवस्थाओं में समझा जाता है:

  • स्थानीय (Localized): कैंसर केवल प्रोस्टेट के भीतर है।
  • स्थानीय रूप से उन्नत: कैंसर प्रोस्टेट के बाहर आसपास के ऊतकों या वीर्य-थैलियों तक पहुँच गया है।
  • मेटास्टेटिक: कैंसर लिम्फ नोड्स, हड्डियों या अन्य अंगों में फैल चुका है।

स्टेज, ग्लीसन स्कोर, PSA स्तर, मरीज़ की उम्र और सामान्य स्वास्थ्य मिलकर उपचार की दिशा तय करते हैं।

उपचार के विकल्प

प्रोस्टेट कैंसर का इलाज हर मरीज़ में अलग होता है। प्रमुख विकल्प ये हैं:

1. सक्रिय निगरानी (Active Surveillance): कम जोखिम वाले, धीमी गति से बढ़ने वाले कैंसर में तुरंत इलाज के बजाय नियमित PSA, MRI और बायोप्सी के ज़रिए निगरानी रखी जाती है। इससे अनावश्यक उपचार और उसके दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।

2. सर्जरी (रेडिकल प्रोस्टेटेक्टॉमी): इसमें पूरी प्रोस्टेट ग्रंथि निकाल दी जाती है। आजकल रोबोटिक या लैप्रोस्कोपिक तकनीक से यह कम चीरे और जल्दी रिकवरी के साथ की जाती है। यह आमतौर पर उन मरीज़ों के लिए उपयुक्त है जिनका कैंसर प्रोस्टेट तक सीमित हो।

3. रेडिएशन थेरेपी: उच्च ऊर्जा किरणों से कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। यह बाहर से मशीन द्वारा (एक्सटर्नल बीम) या ग्रंथि के भीतर रेडियोधर्मी बीज लगाकर (ब्रैकीथेरेपी) दी जा सकती है।

4. हार्मोन थेरेपी (एंड्रोजन डिप्रिवेशन थेरेपी): प्रोस्टेट कैंसर की कोशिकाओं को बढ़ने के लिए टेस्टोस्टेरोन जैसे पुरुष हार्मोन की ज़रूरत होती है। दवाओं या इंजेक्शन से इनका स्तर घटाकर कैंसर की वृद्धि धीमी की जाती है। यह अक्सर उन्नत अवस्था में, या रेडिएशन के साथ दी जाती है।

5. कीमोथेरेपी और नई दवाएँ: जब कैंसर फैल जाता है या हार्मोन थेरेपी असर करना बंद कर देती है, तब कीमोथेरेपी, नई पीढ़ी की हार्मोनल दवाएँ, लक्षित थेरेपी (जैसे PARP इनहिबिटर, कुछ आनुवंशिक बदलाव वाले मरीज़ों में) या रेडियोन्यूक्लाइड थेरेपी का उपयोग किया जा सकता है।

किस विकल्प का चयन होगा, यह यूरोलॉजिस्ट, रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट और मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट के साथ विस्तृत चर्चा के बाद तय होना चाहिए। चाहें तो दूसरे विशेषज्ञ की राय (सेकंड ओपिनियन) भी ले सकते हैं।

उपचार के संभावित दुष्प्रभाव

हर इलाज के कुछ दुष्प्रभाव हो सकते हैं, जिनके बारे में पहले से जान लेना बेहतर है। सर्जरी या रेडिएशन के बाद पेशाब पर नियंत्रण में कमी (यूरिन लीकेज) और स्तंभन संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं। हार्मोन थेरेपी से गर्मी के दौरे (हॉट फ्लैशेज़), थकान, यौन इच्छा में कमी, मांसपेशियों व हड्डियों की कमज़ोरी और वज़न बढ़ने जैसी दिक़्क़तें आ सकती हैं। इनमें से कई समस्याओं के लिए दवाएँ, पेल्विक फ्लोर व्यायाम और परामर्श उपलब्ध हैं, इसलिए संकोच किए बिना डॉक्टर को बताएँ।

रोकथाम और स्वस्थ जीवनशैली

प्रोस्टेट कैंसर को पूरी तरह रोकने का कोई पक्का तरीका नहीं है, पर स्वस्थ जीवनशैली जोखिम और समग्र स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी है:

  • फल, हरी सब्ज़ियाँ, टमाटर, साबुत अनाज और दालों से भरपूर संतुलित आहार लें।
  • लाल और प्रोसेस्ड मांस, तले-भुने और अत्यधिक वसायुक्त भोजन कम करें।
  • नियमित व्यायाम करें; हफ़्ते में कम से कम 150 मिनट की मध्यम गतिविधि अच्छी मानी जाती है।
  • वज़न नियंत्रित रखें।
  • तंबाकू और अत्यधिक शराब से दूर रहें।
  • पर्याप्त नींद लें और तनाव को नियंत्रित रखें।

जाँच कब और किसे करानी चाहिए?

बिना लक्षण वाले पुरुषों में PSA जाँच (स्क्रीनिंग) के फ़ायदे और नुकसान दोनों होते हैं, क्योंकि इससे कभी-कभी ऐसे धीमे कैंसर भी पकड़ में आ जाते हैं जिन्हें इलाज की ज़रूरत नहीं होती। इसलिए यह निर्णय डॉक्टर से चर्चा करके लेना चाहिए। आम तौर पर 50 वर्ष की उम्र के आसपास इस पर बात शुरू करने की सलाह दी जाती है। जिनके परिवार में प्रोस्टेट कैंसर का इतिहास है, उन्हें 40 से 45 वर्ष की उम्र में ही डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। पेशाब संबंधी कोई भी लगातार बदलाव दिखे, तो उम्र की परवाह किए बिना जाँच कराएँ।

प्रचलित भ्रांतियाँ

  • “प्रोस्टेट बढ़ा है, मतलब कैंसर है”: ऐसा नहीं है। अधिकांश मामलों में यह BPH होता है।
  • “कैंसर का मतलब मौत है”: प्रोस्टेट कैंसर के कई मरीज़ वर्षों तक सामान्य जीवन जीते हैं, विशेषकर जब बीमारी जल्दी पकड़ी जाए।
  • “इलाज से हमेशा पुरुषत्व खत्म हो जाता है”: कुछ दुष्प्रभाव संभव हैं, पर आधुनिक तकनीकों और पुनर्वास से इन्हें काफ़ी हद तक कम या नियंत्रित किया जा सकता है।
  • “लक्षण नहीं हैं तो जाँच की ज़रूरत नहीं”: शुरुआती कैंसर में लक्षण अक्सर होते ही नहीं।

निष्कर्ष

प्रोस्टेट कैंसर एक गंभीर लेकिन समझदारी से संभाली जा सकने वाली बीमारी है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआत में यह चुपचाप बढ़ता है और झिझक या जानकारी की कमी के कारण कई पुरुष डॉक्टर तक देर से पहुँचते हैं। पेशाब संबंधी बदलावों को उम्र का असर मानकर टालना सही नहीं है। समय पर जाँच, सही निदान, विशेषज्ञ से खुली बातचीत और परिवार के सहयोग से इस बीमारी का सफलतापूर्वक सामना किया जा सकता है। स्वस्थ जीवनशैली अपनाएँ, नियमित स्वास्थ्य जाँच कराएँ और किसी भी असामान्य लक्षण पर बिना देर किए चिकित्सक से मिलें।

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