प्लांटर फेशिआइटिस (एड़ी का दर्द) के लिए नाइट स्प्लिंट्स और सिलिकॉन हील का उपयोग: क्या ये वास्तव में फायदेमंद हैं?
सुबह बिस्तर से उठते ही एड़ी में तेज दर्द महसूस होना प्लांटर फेशिआइटिस (Plantar Fasciitis) का सबसे सामान्य लक्षण है। यह समस्या आजकल हर उम्र के लोगों में देखने को मिल रही है, विशेषकर उन लोगों में जो लंबे समय तक खड़े रहते हैं, अधिक वजन वाले हैं, दौड़ते हैं या गलत प्रकार के जूते पहनते हैं।
प्लांटर फेशिआइटिस में पैर के तलवे में मौजूद प्लांटर फेशिया (Plantar Fascia) नामक मजबूत ऊतक में सूजन या सूक्ष्म चोटें हो जाती हैं। यदि समय पर सही उपचार न किया जाए तो यह दर्द महीनों तक बना रह सकता है।
फिजियोथेरेपी, स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज, सही फुटवियर, नाइट स्प्लिंट्स (Night Splints) और सिलिकॉन हील (Silicone Heel Cups) जैसे सहायक उपकरण इस समस्या में काफी प्रभावी साबित होते हैं। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि नाइट स्प्लिंट्स और सिलिकॉन हील कैसे काम करते हैं, इन्हें कब उपयोग करना चाहिए और किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।
प्लांटर फेशिआइटिस क्या है?
प्लांटर फेशिया एक मजबूत लिगामेंट जैसा ऊतक है जो एड़ी की हड्डी को पैर की उंगलियों से जोड़ता है। यह चलते समय शरीर का भार संभालने और पैर के आर्च (Arch) को बनाए रखने में मदद करता है।
जब इस ऊतक पर लगातार अधिक दबाव पड़ता है, तो उसमें सूजन और छोटे-छोटे टियर (Micro Tears) बनने लगते हैं, जिससे एड़ी में दर्द शुरू हो जाता है।
प्लांटर फेशिआइटिस के प्रमुख लक्षण
- सुबह उठते समय एड़ी में तेज दर्द
- लंबे समय तक बैठने के बाद चलने में दर्द
- सीढ़ियां चढ़ते समय असुविधा
- लंबे समय तक खड़े रहने पर दर्द बढ़ना
- तलवे में खिंचाव महसूस होना
- एड़ी के अंदरूनी हिस्से में दबाने पर दर्द
प्लांटर फेशिआइटिस क्यों होता है?
इसके कई कारण हो सकते हैं—
- लंबे समय तक खड़े रहना
- अधिक वजन
- फ्लैट फुट (Flat Foot)
- हाई आर्च (High Arch)
- गलत जूते पहनना
- अचानक अधिक दौड़ना या व्यायाम करना
- अकिलिस टेंडन (Achilles Tendon) का टाइट होना
- उम्र बढ़ने के साथ ऊतकों की लचीलापन कम होना
नाइट स्प्लिंट (Night Splint) क्या है?
नाइट स्प्लिंट एक विशेष ऑर्थोटिक उपकरण है जिसे रात में सोते समय पहना जाता है।
इसका उद्देश्य पैर को हल्का ऊपर की ओर (Dorsiflexion) रखना होता है ताकि पूरी रात प्लांटर फेशिया और अकिलिस टेंडन हल्के स्ट्रेच की स्थिति में रहें।
इससे सुबह उठते समय होने वाला तेज दर्द काफी कम हो सकता है।
नाइट स्प्लिंट कैसे काम करता है?
रात में सोते समय पैर सामान्यतः नीचे की ओर मुड़ जाता है। इससे प्लांटर फेशिया सिकुड़ जाता है।
सुबह जब व्यक्ति पहला कदम रखता है, तब यह ऊतक अचानक खिंचता है और दर्द उत्पन्न होता है।
नाइट स्प्लिंट—
- प्लांटर फेशिया को पूरी रात लंबाई में बनाए रखता है।
- ऊतक को सिकुड़ने से रोकता है।
- सुबह का दर्द कम करता है।
- ऊतक की मरम्मत (Healing) में सहायता करता है।
- अकिलिस टेंडन की जकड़न कम करता है।
किन लोगों को नाइट स्प्लिंट पहनना चाहिए?
नाइट स्प्लिंट विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी है—
- जिन्हें सुबह पहला कदम रखते समय अत्यधिक दर्द होता है।
- जिनका दर्द 6 सप्ताह से अधिक समय से बना हुआ है।
- जिनकी स्ट्रेचिंग से पर्याप्त राहत नहीं मिल रही।
- जिनका काम लंबे समय तक खड़े रहने का है।
- जिनमें क्रॉनिक प्लांटर फेशिआइटिस है।
नाइट स्प्लिंट पहनने का सही तरीका
- सोने से पहले स्प्लिंट पहनें।
- पैर को आरामदायक स्थिति में रखें।
- स्ट्रैप बहुत ज्यादा टाइट न बांधें।
- शुरुआत में 1–2 घंटे पहनें।
- धीरे-धीरे पूरी रात पहनने की आदत बनाएं।
- डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह के अनुसार उपयोग करें।
नाइट स्प्लिंट के फायदे
- सुबह का दर्द कम होता है।
- रिकवरी की गति बढ़ती है।
- ऊतकों में लचीलापन बढ़ता है।
- सर्जरी की आवश्यकता कम हो सकती है।
- लंबे समय के दर्द में प्रभावी।
- अकिलिस टेंडन की जकड़न कम होती है।
क्या नाइट स्प्लिंट के कोई नुकसान हैं?
कुछ लोगों को शुरुआत में—
- असुविधा
- नींद में बाधा
- त्वचा पर दबाव
- हल्की अकड़न
महसूस हो सकती है।
सही साइज और उचित फिटिंग से ये समस्याएं काफी कम हो जाती हैं।
सिलिकॉन हील (Silicone Heel Cup) क्या है?
सिलिकॉन हील एक नरम कुशन होता है जिसे जूते के अंदर एड़ी के नीचे रखा जाता है।
यह चलने के दौरान एड़ी पर पड़ने वाले झटकों और दबाव को कम करता है।
सिलिकॉन हील कैसे काम करता है?
चलते समय एड़ी पर सबसे अधिक भार पड़ता है।
सिलिकॉन हील—
- झटकों को अवशोषित करता है।
- एड़ी पर दबाव कम करता है।
- दर्द में राहत देता है।
- प्लांटर फेशिया पर तनाव घटाता है।
- लंबे समय तक चलने में आराम देता है।
सिलिकॉन हील के फायदे
- तुरंत आराम का अनुभव
- पूरे दिन उपयोग किया जा सकता है
- आसानी से जूते में फिट हो जाता है
- एड़ी की सुरक्षा करता है
- खेल गतिविधियों में सहायक
- अधिक वजन वाले व्यक्तियों के लिए उपयोगी
सिलिकॉन हील का सही उपयोग
- सही साइज का चयन करें।
- दोनों पैरों में हील कप पहनें ताकि शरीर का संतुलन बना रहे।
- अच्छे स्पोर्ट्स या सपोर्टिव जूतों के साथ उपयोग करें।
- नियमित रूप से साफ करें।
- घिस जाने पर बदल दें।
क्या केवल सिलिकॉन हील से समस्या ठीक हो जाएगी?
नहीं।
सिलिकॉन हील केवल दर्द कम करने में मदद करता है। यदि मूल कारण का उपचार नहीं किया जाए, तो दर्द बार-बार वापस आ सकता है।
सर्वोत्तम परिणाम के लिए क्या करें?
नाइट स्प्लिंट और सिलिकॉन हील का उपयोग निम्न उपायों के साथ करने पर बेहतर परिणाम मिलते हैं—
1. प्लांटर फेशिया स्ट्रेचिंग
रोजाना 3–5 बार करें।
2. काफ स्ट्रेचिंग
अकिलिस टेंडन की जकड़न कम करें।
3. टॉवल स्ट्रेच
सुबह बिस्तर से उठने से पहले करें।
4. टेनिस बॉल या बॉटल रोल
तलवे की हल्की मसाज करें।
5. पैर की मांसपेशियों को मजबूत बनाएं
टो कर्ल, मार्बल पिक-अप और शॉर्ट फुट एक्सरसाइज करें।
6. वजन नियंत्रित रखें
अधिक वजन एड़ी पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
7. सही फुटवियर पहनें
कुशनिंग और अच्छे आर्च सपोर्ट वाले जूते चुनें।
किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए?
यदि आपको—
- मधुमेह के कारण पैरों की संवेदना कम है
- पैरों में घाव हैं
- गंभीर रक्त संचार की समस्या है
- त्वचा पर संक्रमण है
तो किसी भी ऑर्थोटिक उपकरण का उपयोग करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।
कब डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट से मिलना चाहिए?
यदि—
- दर्द 4–6 सप्ताह से अधिक रहे।
- चलना मुश्किल हो जाए।
- सूजन लगातार बढ़ती जाए।
- पैर में सुन्नपन हो।
- घरेलू उपायों से लाभ न मिले।
तो शीघ्र विशेषज्ञ से परामर्श लें।
निष्कर्ष
प्लांटर फेशिआइटिस एक सामान्य लेकिन कष्टदायक समस्या है, जिसका समय पर सही उपचार करना आवश्यक है। नाइट स्प्लिंट्स सुबह होने वाले दर्द और प्लांटर फेशिया की जकड़न को कम करने में प्रभावी होते हैं, जबकि सिलिकॉन हील कप चलने-फिरने के दौरान एड़ी पर पड़ने वाले दबाव और झटकों को कम करके राहत प्रदान करते हैं।
हालांकि, केवल इन उपकरणों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। नियमित स्ट्रेचिंग, मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम, सही फुटवियर, वजन नियंत्रण और फिजियोथेरेपी के साथ इनका उपयोग करने से बेहतर और लंबे समय तक रहने वाले परिणाम प्राप्त होते हैं। यदि दर्द लगातार बना रहे या बढ़ता जाए, तो बिना देरी किए फिजियोथेरेपिस्ट या ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
