पेरीकार्डिटिस (Pericarditis): हृदय की बाहरी झिल्ली की सूजन
परिचय
हमारा हृदय एक पतली, दोहरी परत वाली थैली के भीतर सुरक्षित रहता है, जिसे पेरीकार्डियम (Pericardium) या हृदयावरण कहते हैं। यह थैली हृदय को अपनी जगह पर थामे रखती है, उसे आसपास के अंगों से रगड़ खाने से बचाती है और संक्रमण के फैलाव को रोकने में मदद करती है। इसकी दोनों परतों के बीच थोड़ा-सा चिकना तरल पदार्थ (लगभग 15 से 50 मिलीलीटर) होता है, जो हृदय की हर धड़कन के साथ परतों को आसानी से फिसलने देता है।
जब इसी झिल्ली में सूजन आ जाती है, तो इस स्थिति को पेरीकार्डिटिस कहा जाता है। सूजन के कारण दोनों परतें खुरदरी हो जाती हैं और एक-दूसरे से रगड़ खाने लगती हैं, जिससे सीने में तेज़ दर्द होता है। कई बार यह दर्द इतना हृदयाघात (हार्ट अटैक) जैसा लगता है कि मरीज घबरा जाता है। अच्छी बात यह है कि अधिकांश मामलों में पेरीकार्डिटिस गंभीर नहीं होता और सही इलाज से कुछ हफ्तों में ठीक हो जाता है। फिर भी, इसे नज़रअंदाज़ करना ठीक नहीं है, क्योंकि कुछ मामलों में जटिलताएँ पैदा हो सकती हैं।
पेरीकार्डिटिस के प्रकार
अवधि और स्वरूप के आधार पर चिकित्सक इसे कई श्रेणियों में बाँटते हैं:
- तीव्र (Acute) पेरीकार्डिटिस: यह अचानक शुरू होता है और आमतौर पर चार से छह सप्ताह तक रहता है। यह सबसे आम प्रकार है।
- बार-बार लौटने वाला (Recurrent) पेरीकार्डिटिस: पहले दौर के ठीक होने के बाद, कम से कम चार से छह सप्ताह के लक्षणहीन अंतराल के पश्चात दोबारा लक्षण उभर आते हैं।
- निरंतर (Incessant) पेरीकार्डिटिस: इलाज रोकने या खुराक घटाने पर लक्षण फिर से लौट आते हैं और चार से छह सप्ताह से अधिक समय तक बने रहते हैं।
- दीर्घकालिक (Chronic) पेरीकार्डिटिस: सूजन तीन माह से अधिक समय तक बनी रहती है।
- संकुचनकारी (Constrictive) पेरीकार्डिटिस: लंबे समय की सूजन से झिल्ली मोटी और सख्त हो जाती है, जिससे हृदय पूरी तरह फैल नहीं पाता।
- इफ्यूज़न वाला पेरीकार्डिटिस: इसमें दोनों परतों के बीच अधिक मात्रा में तरल जमा हो जाता है।
कारण
अनेक मामलों में कारण स्पष्ट नहीं हो पाता। ऐसे मामलों को इडियोपैथिक (अज्ञात कारण वाला) कहा जाता है और इनमें अक्सर किसी वायरल संक्रमण की भूमिका मानी जाती है। प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:
संक्रमण:
- वायरस: कॉक्सैकी वायरस, इकोवायरस, इन्फ्लूएंज़ा, एडेनोवायरस, हेपेटाइटिस, एचआईवी और कोविड-19 जैसे वायरस सबसे आम कारणों में हैं।
- बैक्टीरिया: निमोनिया के जीवाणु, स्टैफिलोकोकस और स्ट्रेप्टोकोकस। भारत जैसे देशों में क्षय रोग (टीबी) पेरीकार्डिटिस का एक महत्वपूर्ण कारण है, इसलिए लंबे समय तक चलने वाले मामलों में टीबी की जाँच ज़रूरी होती है।
- फफूँद और परजीवी: ये दुर्लभ हैं, लेकिन कमज़ोर प्रतिरक्षा वाले लोगों में हो सकते हैं।
ऑटोइम्यून (स्वप्रतिरक्षी) रोग: रूमेटॉइड आर्थराइटिस, ल्यूपस (SLE), स्क्लेरोडर्मा और सूजन वाले आंत्र रोग में शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली झिल्ली पर असर डाल सकती है।
हृदय संबंधी घटनाएँ:
- हृदयाघात के कुछ दिनों के भीतर।
- ड्रेसलर सिंड्रोम: हृदयाघात या हृदय की सर्जरी के हफ्तों से महीनों बाद होने वाली सूजन, जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया मानी जाती है।
अन्य कारण:
- गुर्दे की विफलता (यूरीमिया), जब रक्त में अपशिष्ट पदार्थ जमा हो जाते हैं।
- सीने पर चोट या दुर्घटना।
- कैंसर, विशेषकर फेफड़े और स्तन का कैंसर, या छाती पर रेडिएशन थेरेपी।
- कुछ दवाएँ, जैसे हाइड्रैलाज़ीन, आइसोनियाज़िड और फेनिटोइन (दुर्लभ मामलों में)।
- थायरॉइड की कमी (हाइपोथायरॉइडिज़्म)।
जोखिम कारक
पेरीकार्डिटिस किसी को भी हो सकता है, पर यह 20 से 50 वर्ष की आयु के पुरुषों में अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है। हाल का वायरल संक्रमण, ऑटोइम्यून रोग, गुर्दे की बीमारी, हाल की हृदय सर्जरी या हृदयाघात, तथा कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता जोखिम को बढ़ाते हैं।
लक्षण
सीने का दर्द
यह सबसे प्रमुख लक्षण है। इसकी कुछ खास विशेषताएँ हैं:
- दर्द आमतौर पर छाती के बीच या बाईं ओर होता है और तेज़, चुभने वाला होता है। कभी-कभी यह दबाव जैसा भी लग सकता है।
- दर्द गर्दन, कंधे (विशेषकर ट्रेपीज़ियस मांसपेशी की ओर), पीठ या बाँह तक फैल सकता है।
- लेटने पर, गहरी साँस लेने पर, खाँसने या निगलने पर दर्द बढ़ जाता है।
- आगे की ओर झुककर बैठने पर दर्द में राहत मिलती है। यह पेरीकार्डिटिस की एक पहचान मानी जाती है।
अन्य लक्षण
- हल्का बुखार
- कमज़ोरी और थकान
- सूखी खाँसी
- लेटने पर साँस फूलना
- दिल की धड़कन तेज़ महसूस होना (धड़कन का एहसास)
- यदि तरल अधिक जमा हो जाए तो पैरों या पेट में सूजन
हृदयाघात के दर्द और पेरीकार्डिटिस के दर्द में समानता होने के कारण स्वयं निर्णय लेना खतरनाक है। सीने में कोई भी नया, तेज़ या असामान्य दर्द हो तो तुरंत चिकित्सकीय जाँच कराएँ।
निदान (जाँच)
चिकित्सक सबसे पहले मरीज का इतिहास सुनते हैं और शारीरिक परीक्षण करते हैं। स्टेथोस्कोप से सुनने पर पेरीकार्डियल फ्रिक्शन रब नामक एक विशेष खुरदरी, खरोंचने जैसी आवाज़ सुनाई दे सकती है, जो सूजी हुई परतों की रगड़ से पैदा होती है। इसके बाद ये जाँचें की जाती हैं:
- ईसीजी (ECG): इसमें अक्सर कई लीड्स में एक साथ ST-सेगमेंट का ऊपर उठना और PR-सेगमेंट में बदलाव दिखता है, जो हृदयाघात के पैटर्न से अलग होता है।
- रक्त जाँच: सूजन के संकेतक जैसे CRP और ESR, श्वेत रक्त कणिकाओं की गिनती, तथा हृदय को क्षति देखने के लिए ट्रोपोनिन। गुर्दे, थायरॉइड और ऑटोइम्यून मार्कर की जाँच भी की जा सकती है।
- छाती का एक्स-रे: हृदय की छाया बढ़ी हुई दिख सकती है, यदि अधिक तरल जमा हो।
- इकोकार्डियोग्राफी: इससे तरल की मात्रा और हृदय की कार्यप्रणाली पर पड़ने वाले असर का पता चलता है।
- सीटी या एमआरआई (कार्डियक MRI): जब निदान स्पष्ट न हो, झिल्ली की मोटाई या सूजन का आकलन करना हो या संकुचनकारी पेरीकार्डिटिस का संदेह हो।
- पेरीकार्डियोसेंटेसिस: यदि तरल अधिक हो, तो सुई से तरल निकालकर उसकी जाँच (टीबी, कैंसर या संक्रमण के लिए) की जाती है।
उपचार
उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि कारण क्या है और स्थिति कितनी गंभीर है। अधिकांश तीव्र मामलों का इलाज घर पर या सामान्य निगरानी में हो जाता है।
दवाएँ
- दर्द-निवारक और सूजन-रोधी दवाएँ (NSAIDs): आइबुप्रोफेन या एस्पिरिन आमतौर पर पहली पसंद हैं। इन्हें चिकित्सक की बताई मात्रा में और कुछ हफ्तों तक धीरे-धीरे खुराक घटाते हुए लिया जाता है। पेट की सुरक्षा के लिए अक्सर एसिडिटी की दवा भी दी जाती है।
- कोल्चिसीन (Colchicine): यह दवा इलाज की अवधि में सहायक है और बीमारी के दोबारा लौटने की संभावना को काफी घटाती है। इसे आमतौर पर तीन माह तक दिया जाता है।
- कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स: जब उपरोक्त दवाएँ काम न करें या उनका उपयोग संभव न हो, या ऑटोइम्यून कारण हो, तब चिकित्सक की निगरानी में दिए जाते हैं। इनके दीर्घकालिक उपयोग से दोबारा बीमारी लौटने का जोखिम बढ़ सकता है, इसलिए इन्हें सोच-समझकर प्रयोग किया जाता है।
- कारण-विशेष उपचार: बैक्टीरियल संक्रमण में एंटीबायोटिक, टीबी में टीबी-रोधी दवाओं का पूरा कोर्स, और गुर्दे की विफलता में डायलिसिस।
आराम और जीवनशैली
- पर्याप्त आराम करें। कठिन शारीरिक श्रम और खेलकूद से तब तक दूर रहें जब तक चिकित्सक अनुमति न दें। खिलाड़ियों के लिए आमतौर पर लक्षण समाप्त होने और जाँच सामान्य आने के बाद ही वापसी की सलाह दी जाती है, जो अक्सर कुछ माह तक हो सकती है।
- डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं का कोर्स पूरा करें, भले ही दर्द कम हो जाए। बीच में दवा छोड़ने से बीमारी दोबारा लौट सकती है।
- संतुलित, कम नमक वाला भोजन लें और खूब आराम व नींद लें।
अस्पताल में भर्ती कब ज़रूरी
तेज़ बुखार (38°C से ऊपर), लक्षणों का कई दिनों तक बढ़ना, ट्रोपोनिन का अधिक होना, अधिक तरल जमा होना, रक्त पतला करने वाली दवा लेना, या इम्यूनिटी कमज़ोर होना जैसी स्थितियों में अस्पताल में निगरानी की आवश्यकता होती है।
सर्जरी या प्रक्रिया
- पेरीकार्डियोसेंटेसिस: अधिक तरल के कारण हृदय पर दबाव पड़ने पर सुई या कैथेटर से तरल निकालना।
- पेरीकार्डियल विंडो: तरल को लगातार निकलने देने के लिए सर्जरी द्वारा छोटा मार्ग बनाना।
- पेरीकार्डियेक्टॉमी: संकुचनकारी पेरीकार्डिटिस में, जब दवाओं से लाभ न हो, मोटी और सख्त हो चुकी झिल्ली को सर्जरी से हटाना।
संभावित जटिलताएँ
- कार्डियक टैम्पोनेड (Cardiac Tamponade): झिल्ली में तेज़ी से तरल जमा होने पर हृदय पर दबाव पड़ता है और वह ठीक से भर नहीं पाता। इससे रक्तचाप गिरता है, साँस फूलती है और चक्कर आते हैं। यह आपातकालीन स्थिति है, जिसमें तुरंत तरल निकालना पड़ता है।
- संकुचनकारी पेरीकार्डिटिस: लंबे समय तक सूजन के बाद झिल्ली मोटी, सख्त और कभी-कभी कैल्शियम युक्त हो जाती है। इससे साँस की तकलीफ, पैरों व पेट में सूजन और थकान होती है।
- बार-बार रोग का लौटना: लगभग 15 से 30 प्रतिशत मरीजों में पहली बार के बाद रोग दोबारा उभर सकता है, खासकर यदि इलाज अधूरा छोड़ा जाए।
- मायोपेरीकार्डिटिस: जब सूजन हृदय की मांसपेशी तक भी फैल जाए।
रोकथाम और बचाव
पेरीकार्डिटिस को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन कुछ कदम जोखिम घटाने में सहायक हो सकते हैं:
- वायरल संक्रमण से बचाव के लिए स्वच्छता रखें और अनुशंसित टीके लगवाएँ।
- टीबी जैसे संक्रमणों का समय पर पूरा इलाज कराएँ।
- ऑटोइम्यून रोगों, गुर्दे की बीमारी और थायरॉइड की समस्या को नियंत्रण में रखें।
- हृदयाघात या हृदय की सर्जरी के बाद चिकित्सक के निर्देशों का पालन करें और नियमित जाँच कराएँ।
- पहले दौर के बाद इलाज पूरा करें और बिना सलाह दवा बंद न करें।
डॉक्टर के पास कब जाएँ
निम्न स्थितियों में तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें:
- सीने में अचानक तेज़ दर्द, खासकर यदि वह पसीने, घबराहट, चक्कर या बाँह-जबड़े तक फैलते दर्द के साथ हो
- साँस लेने में गंभीर कठिनाई
- बेहोशी या अत्यधिक कमज़ोरी
- तेज़ बुखार के साथ सीने में दर्द
- पैरों या पेट में तेज़ी से बढ़ती सूजन
निष्कर्ष
पेरीकार्डिटिस हृदय की बाहरी झिल्ली की सूजन है, जो प्रायः वायरल संक्रमण के बाद होती है और ज़्यादातर मामलों में उचित दवाओं और आराम से ठीक हो जाती है। इसकी पहचान का मुख्य संकेत लेटने पर बढ़ने और आगे झुकने पर घटने वाला सीने का दर्द है। चूँकि इसके लक्षण हृदयाघात से मिलते-जुलते हैं, इसलिए सही निदान के लिए चिकित्सक से जाँच कराना अत्यंत आवश्यक है। समय पर इलाज, कोल्चिसीन जैसी दवाओं का पूरा कोर्स और पर्याप्त आराम से जटिलताओं और रोग के दोबारा लौटने की संभावना को काफी कम किया जा सकता है। यदि आपको या आपके किसी परिजन को सीने में लगातार दर्द हो रहा हो, तो देर न करें और हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) से परामर्श लें।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है और चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी दवा को शुरू करने या बंद करने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य परामर्श करें।
