पार्स प्लैनाइटिस (Pars Planitis)
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पार्स प्लैनाइटिस (Pars Planitis): कारण, लक्षण, जाँच और इलाज

भूमिका

हमारी आँखें शरीर का सबसे संवेदनशील अंग हैं। कई बार आँख की अंदरूनी सूजन बिना दर्द और बिना लालिमा के धीरे-धीरे बढ़ती है और मरीज़ को तब पता चलता है जब दृष्टि पर असर पड़ने लगता है। पार्स प्लैनाइटिस ऐसी ही एक स्थिति है। यह आँख के भीतर होने वाली दीर्घकालिक (क्रॉनिक) सूजन है, जो अधिकतर बच्चों और युवाओं में देखी जाती है। इस लेख में हम इसके कारण, लक्षण, जाँच, इलाज, जटिलताओं और बचाव के बारे में विस्तार से जानेंगे।

पार्स प्लैनाइटिस क्या है?

आँख की दीवार में तीन परतें होती हैं: सबसे बाहर श्वेतपटल (स्क्लेरा), बीच में यूविया और सबसे भीतर रेटिना। यूविया में आइरिस, सिलियरी बॉडी और कोरॉइड आते हैं। जब यूविया में सूजन होती है, तो उसे यूवाइटिस कहते हैं।

सिलियरी बॉडी का एक हिस्सा पार्स प्लाना कहलाता है, जो आँख के आगे और पीछे के भागों के बीच एक पतली पट्टी की तरह होता है। जब इस क्षेत्र और उससे सटे विट्रियस (काँच जैसे द्रव) में सूजन होती है, तो उसे पार्स प्लैनाइटिस कहते हैं। यह इंटरमीडिएट यूवाइटिस का ही एक प्रमुख रूप है। इसे “इंटरमीडिएट” इसलिए कहा जाता है क्योंकि सूजन आँख के मध्य भाग, यानी विट्रियस और रेटिना की परिधि के आसपास होती है।

यह रोग आमतौर पर दोनों आँखों को प्रभावित करता है, हालाँकि दोनों आँखों में सूजन की तीव्रता अलग-अलग हो सकती है। कई मामलों में एक आँख पहले प्रभावित होती है और कुछ समय बाद दूसरी आँख में भी लक्षण आ जाते हैं।

किन लोगों को होता है?

पार्स प्लैनाइटिस मुख्य रूप से बच्चों, किशोरों और 40 वर्ष से कम आयु के युवाओं में पाया जाता है। इसके दो आयु-वर्ग अधिक प्रभावित माने जाते हैं: पहला 5 से 15 वर्ष के बच्चे और दूसरा 20 से 40 वर्ष के वयस्क। पुरुषों और महिलाओं, दोनों में यह हो सकता है। बच्चों में यह कभी-कभी अधिक तीव्र रूप में सामने आता है, इसलिए समय पर पहचान और भी ज़रूरी हो जाती है।

कारण

ज़्यादातर मामलों में पार्स प्लैनाइटिस का सटीक कारण पता नहीं चलता। इसे इडियोपैथिक (अज्ञात कारण वाला) कहा जाता है। माना जाता है कि यह प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) की गड़बड़ी से जुड़ा है, जिसमें शरीर की रक्षा प्रणाली गलती से आँख के अपने ऊतकों पर हमला करने लगती है। इसी वजह से इसे स्वप्रतिरक्षी (ऑटोइम्यून) प्रकृति का रोग भी माना जाता है।

कुछ मामलों में यह अन्य बीमारियों से जुड़ा पाया गया है, जैसे:

  • मल्टीपल स्क्लेरोसिस (MS): यह तंत्रिका तंत्र की बीमारी है और पार्स प्लैनाइटिस के कुछ मरीज़ों में इससे संबंध देखा गया है।
  • सार्कोइडोसिस: यह एक सूजन संबंधी रोग है जो फेफड़ों और अन्य अंगों को प्रभावित करता है।
  • संक्रमण: टीबी, सिफलिस, लाइम रोग और टॉक्सोकैरियासिस जैसे संक्रमण इंटरमीडिएट यूवाइटिस जैसी तस्वीर पैदा कर सकते हैं। इन्हें अलग से खोजना और बाहर करना ज़रूरी होता है।

चूँकि सही कारण हर मरीज़ में स्पष्ट नहीं होता, इसलिए डॉक्टर पहले अन्य बीमारियों की संभावना को जाँच से परखते हैं।

लक्षण

इस रोग की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यह अक्सर दर्द रहित होता है और आँख लाल नहीं होती। इसी कारण शुरुआती अवस्था में मरीज़ इसे गंभीरता से नहीं लेते। प्रमुख लक्षण ये हैं:

  1. फ्लोटर्स (आँखों के सामने तैरते धब्बे): मरीज़ को मक्खी, धागे, जाले या धुएँ जैसी आकृतियाँ तैरती दिखती हैं। यह सबसे आम शिकायत है।
  2. धुँधला दिखाई देना: दृष्टि साफ़ नहीं रहती और चीज़ें कोहरे में लिपटी-सी लगती हैं।
  3. दृष्टि में उतार-चढ़ाव: कभी दिखाई ठीक रहता है, कभी अचानक कम हो जाता है।
  4. पढ़ने में कठिनाई: पास की चीज़ें देखने में परेशानी होती है।
  5. हल्की असुविधा या भारीपन: कुछ मरीज़ आँख में हल्की बेचैनी बताते हैं, हालाँकि तेज़ दर्द सामान्य नहीं है।

बच्चों में ये लक्षण अक्सर पहचाने नहीं जाते, क्योंकि वे शिकायत नहीं करते। माता-पिता को तब पता चलता है जब बच्चा किताब आँखों के बहुत पास ले जाए, टीवी के नज़दीक बैठे, पढ़ाई में पिछड़ने लगे या स्कूल में बोर्ड ठीक से न देख पाए। ऐसे संकेत दिखें तो आँखों की जाँच अवश्य करानी चाहिए।

रोग की पहचान कैसे होती है?

पार्स प्लैनाइटिस की पुष्टि नेत्र रोग विशेषज्ञ (ऑप्थल्मोलॉजिस्ट), विशेषकर यूवाइटिस या रेटिना विशेषज्ञ करते हैं। सामान्यतः निम्न जाँचें की जाती हैं:

  • स्लिट लैंप जाँच: इससे आँख के आगे और मध्य भाग में सूजन की कोशिकाएँ देखी जाती हैं।
  • इंडायरेक्ट ऑप्थल्मोस्कोपी: पुतली को दवा से फैलाकर आँख के पिछले हिस्से की विस्तृत जाँच की जाती है। इसमें पार्स प्लाना क्षेत्र में “स्नोबैंक” (बर्फ़ जैसी सफ़ेद जमावट) और विट्रियस में “स्नोबॉल” (गोल सफ़ेद कण) दिखाई दे सकते हैं। ये इस रोग की विशिष्ट पहचान माने जाते हैं।
  • OCT (ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी): इससे रेटिना के केंद्र, यानी मैक्युला, में सूजन या द्रव जमाव का पता चलता है।
  • फ्लोरेसिन एंजियोग्राफी: इससे रेटिना की रक्त वाहिकाओं में रिसाव और सूजन की स्थिति देखी जाती है।
  • रक्त जाँचें और छाती का एक्स-रे: इनसे टीबी, सिफलिस, सार्कोइडोसिस जैसे अन्य कारणों को परखा जाता है।
  • मस्तिष्क का MRI: जब मल्टीपल स्क्लेरोसिस की आशंका हो, तब डॉक्टर इसकी सलाह दे सकते हैं।

जटिलताएँ

अगर सूजन लंबे समय तक बनी रहे और इलाज न हो, तो दृष्टि को स्थायी नुकसान हो सकता है। संभावित जटिलताएँ हैं:

  • सिस्टॉइड मैक्युलर एडिमा (CME): मैक्युला में द्रव भर जाना। यह पार्स प्लैनाइटिस में दृष्टि कम होने का सबसे आम कारण है।
  • मोतियाबिंद: लंबी सूजन और स्टेरॉयड दवाओं के उपयोग से लेंस धुँधला हो सकता है।
  • ग्लूकोमा (काला मोतिया): आँख का दबाव बढ़ सकता है, जो सूजन या स्टेरॉयड दोनों से संभव है।
  • विट्रियस हेमरेज: नई असामान्य रक्त वाहिकाओं से आँख के भीतर रक्तस्राव।
  • रेटिनल डिटैचमेंट: रेटिना का अपनी जगह से हट जाना, जो आपातकालीन स्थिति है।
  • बैंड केराटोपैथी: कॉर्निया पर कैल्शियम की परत जमना।

इलाज

इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि सूजन कितनी है और दृष्टि पर कितना असर पड़ा है। लक्ष्य सूजन को नियंत्रित करना और दृष्टि को बचाना है।

1. निगरानी: अगर लक्षण बहुत हल्के हैं और दृष्टि सामान्य है, तो डॉक्टर तुरंत दवा न देकर नियमित अंतराल पर जाँच करते हैं। कुछ मरीज़ों में रोग स्वतः शांत हो जाता है।

2. स्टेरॉयड: यह इलाज का मुख्य आधार है। स्थिति के अनुसार ये कई रूपों में दिए जाते हैं:

  • आँख के आसपास इंजेक्शन (पेरिऑक्युलर ट्रायमसिनोलोन)
  • आँख के भीतर इंजेक्शन या इम्प्लांट (इंट्राविट्रियल)
  • गोलियों के रूप में (जैसे प्रेडनिसोलोन)

लंबे समय तक स्टेरॉयड के दुष्प्रभाव हो सकते हैं, इसलिए इन्हें केवल डॉक्टर की देखरेख में लें।

3. इम्यूनोसप्रेसिव दवाएँ: जब स्टेरॉयड से पर्याप्त लाभ न मिले या उसकी ज़रूरत लंबे समय तक पड़े, तब मेथोट्रेक्सेट, एज़ैथियोप्रिन, माइकोफेनोलेट और साइक्लोस्पोरिन जैसी दवाएँ दी जा सकती हैं। इनके साथ नियमित रक्त जाँच आवश्यक होती है।

4. बायोलॉजिक दवाएँ: गंभीर या जिद्दी मामलों में एडालिमुमैब जैसी दवाएँ उपयोगी साबित हुई हैं।

5. लेज़र या क्रायोथेरेपी: रेटिना की परिधि पर असामान्य वाहिकाओं या सूजन वाले हिस्से पर कुछ मरीज़ों में लेज़र फोटोकोएगुलेशन या क्रायोथेरेपी की जाती है।

6. सर्जरी (विट्रेक्टॉमी): अगर विट्रियस में बहुत अधिक मलबा जमा हो, रक्तस्राव हो या रेटिनल डिटैचमेंट हो जाए, तब विट्रेक्टॉमी की जाती है। मोतियाबिंद होने पर उसकी सर्जरी भी सूजन शांत होने के बाद ही की जाती है।

जीवनशैली और देखभाल

दवाओं के साथ कुछ सावधानियाँ भी मददगार हैं:

  • डॉक्टर की बताई दवा और जाँच की तारीखों का सख़्ती से पालन करें। बिना पूछे दवा बंद न करें।
  • अचानक बढ़े फ्लोटर्स, रोशनी की चमक, परदा-सा आना या दृष्टि में अचानक कमी को नज़रअंदाज़ न करें। ये रेटिना संबंधी आपात स्थिति के संकेत हो सकते हैं।
  • बच्चों की आँखों की समय-समय पर जाँच कराएँ।
  • संतुलित आहार लें, जिसमें हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, फल और पर्याप्त प्रोटीन हो।
  • धूम्रपान से बचें, क्योंकि यह आँखों की सेहत के लिए हानिकारक है।
  • धूप में चश्मा पहनें और आँखों को रगड़ने से बचें।
  • लंबे समय तक स्टेरॉयड लेने वालों को आँख के दबाव और मोतियाबिंद की नियमित जाँच करानी चाहिए।

पूर्वानुमान (Prognosis)

अच्छी बात यह है कि अधिकांश मरीज़ों में पार्स प्लैनाइटिस का पूर्वानुमान अच्छा रहता है। समय पर पहचान और उचित इलाज से बहुत से लोग वर्षों तक अच्छी दृष्टि बनाए रखते हैं। कुछ मामलों में रोग समय के साथ अपने आप शांत हो जाता है, जबकि कुछ में यह वर्षों तक उभरता और दबता रहता है। इसलिए दीर्घकालिक फॉलो-अप बहुत ज़रूरी है। देरी से इलाज कराने वाले मरीज़ों में मैक्युलर एडिमा और अन्य जटिलताओं का जोखिम बढ़ जाता है।

निष्कर्ष

पार्स प्लैनाइटिस एक ऐसी आँख की बीमारी है जो चुपचाप बढ़ती है, क्योंकि इसमें न तेज़ दर्द होता है और न आँख लाल दिखती है। आँखों के सामने तैरते धब्बे और धुँधलापन इसके शुरुआती संकेत हो सकते हैं, जिन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए। सही समय पर नेत्र विशेषज्ञ से जाँच, कारणों की पड़ताल और नियमित इलाज से सूजन को नियंत्रित करके दृष्टि को सुरक्षित रखा जा सकता है।

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