ओटोटॉक्सिसिटी (Ototoxicity - दवाओं के साइड इफेक्ट से बहरापन)
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ओटोटॉक्सिसिटी: जब दवा ही कानों की दुश्मन बन जाए

प्रस्तावना

दवाएं जीवन बचाती हैं, लेकिन कई बार इलाज के दौरान कुछ दवाएं शरीर के किसी अंग को नुकसान भी पहुँचा देती हैं। ऐसा ही एक कम चर्चित लेकिन गंभीर दुष्प्रभाव है ओटोटॉक्सिसिटी, यानी कुछ दवाओं या रसायनों के कारण भीतरी कान को होने वाली क्षति। यह क्षति सुनने की क्षमता को घटा सकती है, कानों में आवाज़ें (टिनिटस) पैदा कर सकती है और शरीर का संतुलन भी बिगाड़ सकती है। कई मामलों में यह नुकसान स्थायी होता है, इसलिए इसके बारे में जागरूक रहना बेहद ज़रूरी है।

ओटोटॉक्सिसिटी क्या है?

“ओटो” का अर्थ है कान और “टॉक्सिसिटी” का अर्थ है विषाक्तता। जब कोई दवा या रसायन भीतरी कान की संवेदनशील संरचनाओं को नुकसान पहुँचाता है, तो उसे ओटोटॉक्सिसिटी कहते हैं।

भीतरी कान के दो मुख्य हिस्से हैं:

  • कॉक्लिया (Cochlea): घोंघे के आकार का यह अंग ध्वनि को तंत्रिका संकेतों में बदलता है। इसमें हज़ारों सूक्ष्म बाल कोशिकाएं (हेयर सेल्स) होती हैं।
  • वेस्टिबुलर तंत्र: यह शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।

दवाएं इन बाल कोशिकाओं को नष्ट कर देती हैं या उनकी कार्यप्रणाली बिगाड़ देती हैं। समस्या यह है कि मनुष्यों में ये कोशिकाएं एक बार नष्ट होने पर दोबारा नहीं बनतीं। इसीलिए कई प्रकार की ओटोटॉक्सिसिटी में सुनने की क्षमता स्थायी रूप से घट जाती है।

कौन-सी दवाएं कान को नुकसान पहुँचा सकती हैं?

1. एमिनोग्लाइकोसाइड एंटीबायोटिक्स
जेंटामाइसिन, एमिकासिन, स्ट्रेप्टोमाइसिन, कैनामाइसिन और नियोमाइसिन इसी वर्ग में आती हैं। ये गंभीर संक्रमणों में बहुत उपयोगी हैं, लेकिन इनसे स्थायी बहरापन और संतुलन की समस्या हो सकती है। भारत में ड्रग-रेज़िस्टेंट टीबी के इलाज में एमिकासिन और कैनामाइसिन जैसे इंजेक्शन लंबे समय तक दिए जाते रहे हैं, इसलिए यहाँ यह जोखिम खास मायने रखता है। अब कई मामलों में इंजेक्शन-रहित मुँह से ली जाने वाली दवाओं के नियम अपनाए जा रहे हैं।

2. प्लैटिनम आधारित कीमोथेरेपी दवाएं
सिसप्लैटिन और कार्बोप्लैटिन कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होती हैं। सिसप्लैटिन से दोनों कानों में उच्च आवृत्ति (हाई-पिच) की आवाज़ें सुनने में कमी आती है, जो अक्सर स्थायी होती है। बच्चों में यह जोखिम विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि सुनने की कमी उनकी भाषा और पढ़ाई के विकास को प्रभावित कर सकती है।

3. लूप डाइयूरेटिक्स (मूत्रवर्धक दवाएं)
फ्यूरोसेमाइड जैसी दवाएं, खासकर तेज़ी से इंजेक्शन द्वारा या अधिक मात्रा में दिए जाने पर, कान पर असर डाल सकती हैं। इनका प्रभाव आमतौर पर अस्थायी होता है, पर गुर्दे की बीमारी वाले मरीज़ों में ख़तरा बढ़ जाता है।

4. सैलिसिलेट्स (एस्पिरिन)
एस्पिरिन की बहुत अधिक खुराक से कानों में घंटी बजने जैसी आवाज़ और अस्थायी बहरापन हो सकता है। खुराक कम करने या दवा बंद करने पर यह प्रायः ठीक हो जाता है।

5. कुनैन और संबंधित मलेरिया-रोधी दवाएं
कुनैन (क्विनिन) और क्लोरोक्वीन से टिनिटस और सुनने में कमी हो सकती है, जो आमतौर पर दवा रोकने के बाद ठीक हो जाती है।

6. अन्य दवाएं
वैंकोमाइसिन, कुछ मैक्रोलाइड एंटीबायोटिक्स (जैसे एरिथ्रोमाइसिन की अधिक खुराक) और कुछ अन्य दवाएं भी कभी-कभी कान को प्रभावित कर सकती हैं। सीधे कान में डाली जाने वाली कुछ बूंदें भी, यदि कान का पर्दा फटा हो, तो भीतरी कान तक पहुँचकर नुकसान कर सकती हैं।

7. औद्योगिक रसायन
टोल्यूइन, स्टायरीन, कार्बन मोनोऑक्साइड, सीसा और पारा जैसे रसायन भी कान के लिए विषैले हो सकते हैं। यदि कार्यस्थल पर शोर भी अधिक हो, तो दोनों मिलकर नुकसान को कई गुना बढ़ा देते हैं।

लक्षण: कैसे पहचानें?

ओटोटॉक्सिसिटी के लक्षण दवा शुरू करने के कुछ दिनों या हफ्तों में, कभी-कभी इलाज खत्म होने के बाद भी, दिख सकते हैं:

  • टिनिटस: कानों में सीटी, भनभनाहट या घंटी जैसी आवाज़ें
  • सुनने में कमी: शुरुआत में ऊँची आवाज़ें (पक्षियों की चहचहाहट, बच्चों की आवाज़) सुनने में दिक्कत
  • कान भरा हुआ महसूस होना
  • चक्कर आना और असंतुलन: चलते समय लड़खड़ाना, अंधेरे में गिरने का डर
  • ऑसिलोप्सिया: चलते समय आसपास की चीज़ों का हिलता हुआ दिखना
  • मतली और उल्टी (वेस्टिबुलर क्षति में)

छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं में ये लक्षण बता पाना संभव नहीं होता, इसलिए माता-पिता को आवाज़ पर प्रतिक्रिया न देने, बोलने में देरी या ध्यान न देने जैसे संकेतों पर नज़र रखनी चाहिए।

किन लोगों को अधिक ख़तरा है?

  • गुर्दे की बीमारी वाले मरीज़, क्योंकि दवा शरीर से देर से निकलती है और खून में उसकी मात्रा बढ़ जाती है
  • बुजुर्ग लोग
  • नवजात और छोटे बच्चे
  • लंबे समय तक या अधिक खुराक पर दवा लेने वाले
  • एक साथ कई ओटोटॉक्सिक दवाएं लेने वाले, जैसे एमिनोग्लाइकोसाइड के साथ फ्यूरोसेमाइड
  • पहले से सुनने की कमी या तेज़ शोर के संपर्क में रहने वाले
  • कुछ आनुवंशिक बदलाव रखने वाले लोग, जैसे माइटोकॉन्ड्रियल जीन में A1555G बदलाव, जिसमें एमिनोग्लाइकोसाइड की बहुत कम मात्रा भी बहरापन ला सकती है

निदान कैसे होता है?

ओटोटॉक्सिसिटी की जाँच में ये परीक्षण उपयोगी हैं:

  • प्योर टोन ऑडियोमेट्री: अलग-अलग आवृत्तियों पर सुनने की क्षमता मापना। जोखिम वाली दवाओं में हाई-फ्रीक्वेंसी ऑडियोमेट्री से शुरुआती बदलाव पकड़े जा सकते हैं।
  • ओटोएकॉस्टिक एमिशन (OAE): बाल कोशिकाओं की कार्यक्षमता जाँचने वाला परीक्षण, जो शिशुओं और बच्चों में भी संभव है।
  • ABR (ऑडिटरी ब्रेनस्टेम रिस्पॉन्स): जब मरीज़ सहयोग न कर सके।
  • वेस्टिबुलर जाँच: संतुलन संबंधी परीक्षण।

सबसे अहम है इलाज शुरू करने से पहले बेसलाइन ऑडियोमेट्री कराना, ताकि बाद में तुलना कर बदलाव पकड़ा जा सके।

इलाज और प्रबंधन

दुर्भाग्य से, बाल कोशिकाओं के स्थायी नुकसान का कोई सीधा इलाज नहीं है। इसलिए प्रबंधन इन बातों पर केंद्रित रहता है:

  1. दवा की समीक्षा: लक्षण दिखते ही डॉक्टर को बताएं। वे दवा की खुराक घटा सकते हैं, दवा बदल सकते हैं या बंद कर सकते हैं। अपने आप दवा बंद न करें, क्योंकि यह निर्णय संक्रमण या बीमारी की गंभीरता देखकर डॉक्टर को ही लेना चाहिए।
  2. श्रवण यंत्र (हियरिंग एड): हल्की से मध्यम कमी में उपयोगी।
  3. कॉक्लियर इम्प्लांट: गंभीर या पूर्ण बहरापन में विकल्प।
  4. वेस्टिबुलर रिहैबिलिटेशन: संतुलन की समस्या में विशेष व्यायाम।
  5. टिनिटस प्रबंधन: काउंसलिंग, साउंड थेरेपी और अन्य उपाय।
  6. बच्चों में सहायता: स्पीच थेरेपी और विशेष शैक्षिक सहयोग।

रोकथाम: सबसे कारगर उपाय

  • जोखिम-लाभ पर चर्चा: जीवन बचाने वाली दवाओं का लाभ अक्सर जोखिम से बड़ा होता है, पर डॉक्टर से इस बारे में बात करना उचित है।
  • नियमित निगरानी: इलाज के दौरान समय-समय पर ऑडियोमेट्री और गुर्दे की जाँच।
  • दवा के स्तर की निगरानी: एमिनोग्लाइकोसाइड जैसी दवाओं में रक्त में मात्रा जाँचकर खुराक समायोजित करना।
  • सही खुराक और पर्याप्त पानी: मरीज़ की उम्र, वज़न और गुर्दे की क्षमता के अनुसार खुराक तय हो।
  • बेवजह की दवाओं से बचें: बिना पर्ची के एंटीबायोटिक या दर्द-निवारक दवाओं का अत्यधिक सेवन न करें।
  • कान की बूंदों में सावधानी: कान बहने या पर्दा फटने की स्थिति में बिना डॉक्टरी सलाह के कोई बूंद न डालें।
  • शोर से बचाव: ओटोटॉक्सिक दवाओं के दौरान तेज़ आवाज़ और हेडफोन का अधिक इस्तेमाल घटाएं।
  • सुरक्षात्मक दवाओं पर शोध: बच्चों में सिसप्लैटिन से होने वाली सुनने की कमी घटाने के लिए सोडियम थायोसल्फेट जैसी सुरक्षात्मक दवाएं कुछ देशों में स्वीकृत हुई हैं। इस दिशा में और शोध जारी है, और इसका निर्णय ऑन्कोलॉजिस्ट ही कर सकते हैं।

कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?

निम्न स्थितियों में विलंब न करें:

  • किसी दवा के दौरान अचानक कानों में घंटी या सीटी बजना
  • सुनने में अचानक कमी महसूस होना
  • लगातार चक्कर या चलने में असंतुलन
  • बच्चे का आवाज़ों पर प्रतिक्रिया न देना

ध्यान रखें, शुरुआती स्तर पर पहचान होने पर दवा में बदलाव करके स्थायी नुकसान को बहुत हद तक रोका जा सकता है।

निष्कर्ष

ओटोटॉक्सिसिटी दवाओं का एक गंभीर लेकिन काफी हद तक रोके जा सकने वाला दुष्प्रभाव है। जागरूकता, इलाज से पहले बेसलाइन जाँच, नियमित निगरानी और डॉक्टर से खुला संवाद, ये चार बातें कानों की सुरक्षा में सबसे अहम भूमिका निभाती हैं। मरीज़ों और उनके परिजनों को यह समझना चाहिए कि दवा शुरू होने से पहले जोखिमों के बारे में पूछना उनका अधिकार है, और दवा के दौरान कान से जुड़े किसी भी बदलाव को हल्के में नहीं लेना चाहिए। सुनने की क्षमता अनमोल है और एक बार खो जाने पर उसे वापस पाना कठिन होता है, इसलिए सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।

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