नाइट टेरर्स (Night Terrors - नींद में अचानक अत्यधिक डर जाना)
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नाइट टेरर्स (Night Terrors): नींद में अचानक अत्यधिक डर जाना

नाइट टेरर्स क्या हैं?

नाइट टेरर्स एक नींद संबंधी विकार है, जिसमें व्यक्ति गहरी नींद के दौरान अचानक अत्यधिक भय, चीख-पुकार और घबराहट के साथ जाग उठता है। यह स्थिति सामान्य बुरे सपनों (नाइटमेयर्स) से बिल्कुल अलग होती है। नाइट टेरर्स के दौरान व्यक्ति भले ही आंखें खोलकर बैठा हुआ दिखे, चिल्ला रहा हो या हाथ-पैर पटक रहा हो, लेकिन वह वास्तव में पूरी तरह जागा हुआ नहीं होता। यह एक प्रकार की “पैरासोम्निया” (Parasomnia) है, यानी नींद के दौरान होने वाला असामान्य व्यवहार।

चिकित्सा भाषा में इसे “स्लीप टेरर डिसऑर्डर” या “पैवोर नॉक्टर्नस” (Pavor Nocturnus) भी कहा जाता है। यह मुख्यतः गहरी नॉन-आरईएम (Non-REM) नींद के दौरान होता है, जबकि सामान्य बुरे सपने आमतौर पर आरईएम (REM) नींद के दौरान आते हैं।

किसे और कब होते हैं नाइट टेरर्स?

नाइट टेरर्स सबसे ज्यादा बच्चों में देखे जाते हैं, खासकर 3 से 12 वर्ष की उम्र के बीच। कुछ अध्ययनों के अनुसार लगभग 1 से 6 प्रतिशत बच्चे इस समस्या से प्रभावित होते हैं। हालांकि यह वयस्कों में भी हो सकता है, लेकिन वयस्कों में इसकी दर काफी कम (लगभग 1-2 प्रतिशत) होती है।

आमतौर पर नाइट टेरर्स सोने के पहले एक से तीन घंटों के भीतर होते हैं, क्योंकि यही वह समय होता है जब व्यक्ति सबसे गहरी नींद (स्लो-वेव स्लीप) में होता है। एक एपिसोड कुछ सेकंड से लेकर 10-15 मिनट तक चल सकता है, और ज्यादातर मामलों में व्यक्ति को अगली सुबह इसकी कोई याद नहीं रहती।

लक्षण क्या हैं?

नाइट टेरर्स के दौरान व्यक्ति में निम्नलिखित लक्षण देखे जा सकते हैं:

  • अचानक जोर से चीखना या रोना
  • बिस्तर पर बैठ जाना, आंखें खुली होना लेकिन घबराई हुई अवस्था
  • तेज़ दिल की धड़कन, तेज़ सांस लेना, पसीना आना
  • चेहरे पर भय और आतंक के भाव
  • हाथ-पैर पटकना, कभी-कभी बिस्तर से उठकर इधर-उधर भागने की कोशिश करना
  • सांत्वना देने या जगाने की कोशिश का कोई असर न होना, कभी-कभी व्यक्ति और ज्यादा परेशान हो जाना
  • असंगत या समझ में न आने वाली बातें बड़बड़ाना
  • एपिसोड के बाद फिर से गहरी नींद में चले जाना
  • सुबह उठने पर घटना की कोई स्मृति न होना

यह देखना माता-पिता या परिवार के सदस्यों के लिए बेहद डरावना अनुभव हो सकता है, खासकर जब बच्चा आंखें खोलकर भी किसी को पहचान नहीं पाता।

नाइट टेरर्स और नाइटमेयर्स में अंतर

लोग अक्सर नाइट टेरर्स और सामान्य बुरे सपनों को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों में स्पष्ट अंतर है:

नींद का चरण: नाइटमेयर्स आरईएम नींद के दौरान आते हैं, जो आमतौर पर रात के दूसरे पहर में ज्यादा होती है। नाइट टेरर्स गहरी नॉन-आरईएम नींद में होते हैं, जो रात के पहले हिस्से में आती है।

जागृति: बुरे सपने के बाद व्यक्ति पूरी तरह जाग जाता है और उसे सपने की बातें याद रहती हैं। नाइट टेरर्स में व्यक्ति ठीक से जागता ही नहीं और उसे कुछ भी याद नहीं रहता।

प्रतिक्रिया: नाइटमेयर के बाद बच्चा सांत्वना चाहता है और आसानी से शांत हो जाता है। नाइट टेरर्स के दौरान सांत्वना देना अक्सर मुश्किल होता है, और कभी-कभी छूने या जगाने की कोशिश से स्थिति और बिगड़ सकती है।

कारण क्या हैं?

नाइट टेरर्स के पीछे कोई एक निश्चित कारण नहीं है, लेकिन कई कारक इसे बढ़ावा दे सकते हैं:

नींद की कमी और थकान: पर्याप्त नींद न लेना या अत्यधिक थकान नाइट टेरर्स का सबसे आम कारण है।

तनाव और चिंता: बच्चों में स्कूल का दबाव, नए माहौल में एडजस्ट होना, या पारिवारिक तनाव इसे ट्रिगर कर सकता है।

बुखार: बीमारी के दौरान, खासकर तेज़ बुखार होने पर बच्चों में नाइट टेरर्स की संभावना बढ़ जाती है।

अनियमित नींद का समय: सोने-जागने का समय बार-बार बदलना नींद के चक्र को प्रभावित करता है।

पारिवारिक इतिहास: अगर परिवार में किसी को नींद में चलने (स्लीपवॉकिंग) या नाइट टेरर्स की समस्या रही हो, तो बच्चों में इसकी संभावना अधिक होती है। यह आनुवंशिक रूप से जुड़ी हो सकती है।

कुछ दवाएं: कुछ प्रकार की दवाएं नींद के पैटर्न को प्रभावित कर सकती हैं।

स्लीप एपनिया या अन्य नींद संबंधी विकार: सांस लेने में रुकावट जैसी समस्याएं भी नाइट टेरर्स को ट्रिगर कर सकती हैं।

वयस्कों में इसके अतिरिक्त कारणों में शराब का सेवन, मानसिक तनाव, अनिद्रा और कुछ मानसिक स्वास्थ्य स्थितियां भी शामिल हो सकती हैं।

नाइट टेरर्स के दौरान क्या करें?

अगर आपका बच्चा या परिवार का कोई सदस्य नाइट टेरर्स का अनुभव कर रहा हो, तो निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:

शांत रहें: घबराएं नहीं। याद रखें कि यह एक अस्थायी अवस्था है और कुछ ही मिनटों में खुद ब खुद समाप्त हो जाएगी।

जगाने की कोशिश न करें: व्यक्ति को जबरदस्ती जगाने की कोशिश न करें, क्योंकि इससे वह और ज्यादा भ्रमित या परेशान हो सकता है। इसके बजाय उसे सुरक्षित रहने दें।

सुरक्षा सुनिश्चित करें: सुनिश्चित करें कि व्यक्ति खुद को चोट न पहुंचाए। बिस्तर से गिरने, तेज वस्तुओं से टकराने या सीढ़ियों तक पहुंचने से रोकें।

धीरे से बात करें: नरम और शांत आवाज़ में बात करें, लेकिन ज्यादा छूने या पकड़ने से बचें जब तक जरूरी न हो।

एपिसोड के बाद सामान्य दिनचर्या अपनाएं: एपिसोड खत्म होने के बाद व्यक्ति को सामान्य तरीके से सोने दें। सुबह इस बारे में विस्तार से बात करने की जरूरत नहीं, क्योंकि उन्हें कुछ याद नहीं रहता।

रोकथाम के उपाय

नाइट टेरर्स को पूरी तरह रोकना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन इनकी आवृत्ति कम करने के लिए कुछ उपाय अपनाए जा सकते हैं:

  • सोने और जागने का एक निश्चित समय तय करें और उसका पालन करें
  • सुनिश्चित करें कि बच्चे को उम्र के अनुसार पर्याप्त नींद मिल रही है
  • सोने से पहले एक शांत और आरामदायक दिनचर्या अपनाएं, जैसे हल्की कहानी सुनना या गुनगुने पानी से स्नान
  • सोने से पहले स्क्रीन (मोबाइल, टीवी) का उपयोग सीमित करें
  • दिन में अत्यधिक थकान से बचें, जरूरत पड़ने पर छोटी झपकी लें
  • तनाव को कम करने के उपाय अपनाएं, जैसे बच्चे से दिनभर की बातें साझा करना
  • अगर एपिसोड एक निश्चित समय पर होते हैं, तो कुछ विशेषज्ञ उस समय से 15-30 मिनट पहले बच्चे को हल्के से जगाकर फिर सुलाने (“स्केड्यूल्ड अवेकनिंग”) की सलाह देते हैं, ताकि नींद का चक्र टूटे

डॉक्टर से कब मिलें?

ज्यादातर मामलों में नाइट टेरर्स उम्र बढ़ने के साथ अपने आप कम हो जाते हैं और किसी गंभीर उपचार की जरूरत नहीं होती। लेकिन निम्नलिखित स्थितियों में डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है:

  • एपिसोड बहुत बार-बार (हफ्ते में कई बार) हो रहे हों
  • एपिसोड की वजह से व्यक्ति या परिवार को चोट लगने का खतरा हो
  • नींद में चलना (स्लीपवॉकिंग) भी साथ में हो रहा हो
  • दिन में अत्यधिक नींद आना या थकान बनी रहना
  • वयस्क अवस्था में नए सिरे से नाइट टेरर्स शुरू हों, क्योंकि इसके पीछे तनाव, मानसिक स्वास्थ्य या नींद संबंधी अन्य विकार हो सकते हैं
  • सांस लेने में तकलीफ या खर्राटों जैसी समस्या भी साथ दिखाई दे

डॉक्टर आवश्यकता पड़ने पर स्लीप स्टडी (पॉलीसोम्नोग्राफी) की सलाह दे सकते हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं इसके पीछे कोई और नींद संबंधी समस्या तो नहीं है।

निष्कर्ष

नाइट टेरर्स देखने में जितने डरावने लगते हैं, वास्तव में उतने खतरनाक नहीं होते। यह ज्यादातर बच्चों के विकास का एक सामान्य हिस्सा है और उम्र बढ़ने के साथ अपने आप ठीक हो जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि माता-पिता और परिवार वाले घबराएं नहीं, सुरक्षा का ध्यान रखें, और बच्चे को पर्याप्त नींद और तनाव-मुक्त माहौल देने की कोशिश करें। अगर समस्या बार-बार हो या गंभीर लगे, तो बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क करना ही सबसे सही कदम है।

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