मास्टॉयडाइटिस (Mastoiditis): कान के पीछे की हड्डी का संक्रमण
परिचय
कान केवल सुनने का अंग नहीं है, बल्कि यह कई जटिल संरचनाओं से मिलकर बना है। कान के पीछे, खोपड़ी की एक उभरी हुई हड्डी होती है जिसे मास्टॉयड हड्डी (Mastoid bone) कहते हैं। इसे आप कान के ठीक पीछे उंगली से छूकर महसूस कर सकते हैं। यह हड्डी ठोस नहीं होती, बल्कि स्पंज की तरह हवा से भरी छोटी-छोटी कोशिकाओं (Mastoid air cells) से बनी होती है।
जब मध्य कान का संक्रमण इन कोशिकाओं तक फैल जाता है, तो इस स्थिति को मास्टॉयडाइटिस कहते हैं। यह एक गंभीर बीमारी है, जिसमें समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा जटिलताएँ भी हो सकती हैं। यह बच्चों में अधिक पाई जाती है, लेकिन वयस्कों को भी हो सकती है।
मास्टॉयडाइटिस क्या है?
मास्टॉयडाइटिस मास्टॉयड हड्डी की वायु कोशिकाओं में होने वाला जीवाणु संक्रमण है। आमतौर पर यह तीव्र मध्य कर्ण संक्रमण (Acute Otitis Media) का इलाज ठीक से न होने या संक्रमण के बार-बार होने के कारण विकसित होता है। मध्य कान और मास्टॉयड कोशिकाएँ आपस में जुड़ी होती हैं, इसलिए कान का संक्रमण आसानी से इन कोशिकाओं में पहुँच सकता है।
संक्रमण के कारण इन कोशिकाओं में मवाद (pus) भर जाता है और हड्डी की पतली दीवारें धीरे-धीरे गलने लगती हैं। इसी कारण यह रोग केवल कान तक सीमित नहीं रहता और आसपास के अंगों को भी प्रभावित कर सकता है।
मास्टॉयडाइटिस के प्रकार
- तीव्र मास्टॉयडाइटिस (Acute Mastoiditis): यह अचानक शुरू होता है और कुछ दिनों में लक्षण तेजी से बढ़ते हैं। अधिकतर मामले इसी प्रकार के होते हैं।
- दीर्घकालिक मास्टॉयडाइटिस (Chronic Mastoiditis): यह लंबे समय तक चलने वाला संक्रमण है, जो महीनों तक बना रह सकता है। इसमें कान से बार-बार पानी या मवाद निकलता है।
- मास्क्ड मास्टॉयडाइटिस (Masked Mastoiditis): इसमें लक्षण स्पष्ट नहीं होते और संक्रमण छिपा रहता है, इसलिए इसकी पहचान कठिन होती है।
मास्टॉयडाइटिस के कारण
मास्टॉयडाइटिस के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- मध्य कान का अनुपचारित संक्रमण: सबसे आम कारण। यदि कान के संक्रमण का पूरा इलाज न हो, तो वह मास्टॉयड तक फैल जाता है।
- जीवाणु (बैक्टीरिया): स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिया, हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा, स्ट्रेप्टोकोकस पायोजीन्स और स्टैफिलोकोकस ऑरियस जैसे बैक्टीरिया आमतौर पर जिम्मेदार होते हैं।
- बार-बार होने वाले कान के संक्रमण: जिन बच्चों को बार-बार कान बहने की समस्या होती है, उनमें जोखिम अधिक रहता है।
- कोलेस्टीटोमा (Cholesteatoma): कान के पर्दे के पीछे त्वचा की असामान्य वृद्धि, जो संक्रमण को बढ़ावा देती है।
- कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता: मधुमेह, एचआईवी, कुपोषण या कीमोथेरेपी जैसी स्थितियों में संक्रमण फैलने की संभावना बढ़ जाती है।
- यूस्टेशियन ट्यूब में रुकावट: यह नली मध्य कान और गले को जोड़ती है। इसके बंद होने से कान में द्रव जमा होता है और संक्रमण पनपता है।
जोखिम कारक
- उम्र: छह महीने से दो वर्ष तक के शिशु और छोटे बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
- सर्दी-जुकाम, एलर्जी और साइनस की समस्या
- टीकाकरण का अधूरा होना (विशेषकर न्यूमोकोकल और हिब वैक्सीन)
- धुएँ और प्रदूषण का संपर्क
- भीड़-भाड़ वाले स्थानों या डे-केयर में रहना
- तालु या चेहरे की जन्मजात बनावट में विकृति
मास्टॉयडाइटिस के लक्षण
मास्टॉयडाइटिस के लक्षण आमतौर पर कान के संक्रमण के कुछ दिन बाद उभरते हैं:
- कान के पीछे दर्द, सूजन और लालिमा
- कान के पीछे की हड्डी को छूने पर तेज दर्द
- कान से मवाद या गाढ़ा पानी निकलना
- तेज बुखार और ठंड लगना
- सुनने की क्षमता में कमी
- लगातार सिरदर्द और कान में भारीपन
- थकान और कमजोरी
- कान का आगे की ओर बाहर निकल आना, यानी कान का सामान्य से अलग दिखना (गंभीर अवस्था में)
बच्चों में विशेष लक्षण: चिड़चिड़ापन, लगातार रोना, कान को बार-बार खींचना या छूना, दूध न पीना, बुखार और सोने में कठिनाई।
जटिलताएँ
यदि मास्टॉयडाइटिस का समय पर इलाज न हो, तो संक्रमण आसपास के नाजुक अंगों तक फैल सकता है:
- स्थायी बहरापन: संक्रमण से कान की आंतरिक संरचनाएँ क्षतिग्रस्त हो सकती हैं।
- मेनिन्जाइटिस: मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी की झिल्लियों का संक्रमण।
- मस्तिष्क में फोड़ा (Brain abscess): मवाद का मस्तिष्क में जमा होना।
- चेहरे का पक्षाघात (Facial nerve palsy): चेहरे की नसों पर असर।
- लेबिरिंथाइटिस: आंतरिक कान का संक्रमण, जिससे चक्कर और संतुलन की समस्या होती है।
- रक्त के थक्के: कान के पास की नसों में थक्का जमना (Sigmoid sinus thrombosis)।
- सेप्सिस: संक्रमण का रक्त में फैलना, जो जानलेवा हो सकता है।
इसीलिए लक्षण दिखते ही चिकित्सक से मिलना अत्यंत आवश्यक है।
निदान (पहचान)
डॉक्टर निम्न तरीकों से रोग की पुष्टि करते हैं:
- शारीरिक जाँच: कान के पीछे सूजन, लालिमा और दर्द की जाँच। ओटोस्कोप से कान के पर्दे का परीक्षण।
- रक्त जाँच: संक्रमण के स्तर को जानने के लिए (WBC काउंट, CRP आदि)।
- कान के स्राव की जाँच (Culture): यह पता लगाने के लिए कि कौन-सा बैक्टीरिया संक्रमण का कारण है और कौन-सी दवा असरदार होगी।
- CT स्कैन: मास्टॉयड हड्डी की स्थिति और संक्रमण के फैलाव को देखने के लिए सबसे उपयोगी जाँच।
- MRI: यदि मस्तिष्क या आसपास के ऊतकों में संक्रमण की आशंका हो।
- ऑडियोमेट्री: सुनने की क्षमता का आकलन।
उपचार
उपचार संक्रमण की गंभीरता पर निर्भर करता है।
1. एंटीबायोटिक दवाएँ
शुरुआती अवस्था में मरीज को अस्पताल में भर्ती करके नस के माध्यम से (IV) एंटीबायोटिक दी जाती है। स्थिति सुधरने पर मुँह से ली जाने वाली दवाएँ दी जाती हैं। कोर्स आमतौर पर कई दिनों से लेकर कुछ सप्ताह तक चलता है। पूरा कोर्स पूरा करना बहुत जरूरी है, चाहे लक्षण पहले ही ठीक क्यों न हो जाएँ।
2. मायरिंगोटॉमी (Myringotomy)
इसमें कान के पर्दे में एक छोटा चीरा लगाकर मध्य कान में जमा मवाद और द्रव बाहर निकाला जाता है। कई बार इसमें एक छोटी ग्रोमेट ट्यूब (Tympanostomy tube) लगाई जाती है, ताकि कान में हवा का प्रवाह बना रहे और द्रव दोबारा जमा न हो।
3. मास्टॉयडेक्टॉमी (Mastoidectomy)
यदि दवाओं से आराम न मिले या संक्रमण गंभीर हो, तो सर्जरी की जाती है। इसमें मास्टॉयड हड्डी के संक्रमित हिस्से को हटाया जाता है। यह सर्जरी सामान्य बेहोशी (General anesthesia) में की जाती है। ऑपरेशन के बाद कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ सकता है।
4. दर्द और बुखार की दवा
दर्द और बुखार से राहत के लिए पैरासिटामोल जैसी दवाएँ चिकित्सक की सलाह पर दी जाती हैं।
घरेलू देखभाल और सावधानियाँ
मास्टॉयडाइटिस का इलाज घरेलू नुस्खों से संभव नहीं है, लेकिन इलाज के दौरान ये सावधानियाँ मददगार हैं:
- डॉक्टर की बताई दवाएँ समय पर और पूरी लें।
- कान को सूखा रखें; नहाते समय कान में पानी जाने से बचाएँ।
- कान में कोई तेल, ड्रॉप या घरेलू चीज़ डॉक्टर की सलाह के बिना न डालें।
- कान को माचिस की तीली, पिन या ईयरबड से न कुरेदें।
- पर्याप्त आराम करें और पौष्टिक भोजन लें।
- फॉलो-अप के लिए नियमित रूप से डॉक्टर के पास जाएँ।
बचाव के उपाय
- कान के संक्रमण का तुरंत इलाज कराएँ। कान दर्द या बहने को नजरअंदाज न करें।
- टीकाकरण: बच्चों को न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन, हिब वैक्सीन और फ्लू का टीका समय पर लगवाएँ।
- स्तनपान: शिशुओं को कम से कम छह महीने तक स्तनपान कराएँ, इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
- लेटकर दूध पिलाने से बचें। शिशु को हल्का ऊँचा रखकर दूध पिलाएँ।
- धूम्रपान से दूरी: बच्चों के आसपास सिगरेट-बीड़ी का धुआँ न होने दें।
- सर्दी-जुकाम और एलर्जी का समय पर उपचार करें।
- स्वच्छता: हाथ धोने की आदत डालें ताकि संक्रमण न फैले।
डॉक्टर से कब मिलें?
निम्न स्थितियों में तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें:
- कान के पीछे सूजन, लालिमा या तेज दर्द
- कान के संक्रमण के बाद भी बुखार का लगातार बने रहना
- कान से मवाद निकलना
- सुनने में अचानक कमी
- चेहरे में टेढ़ापन या कमजोरी
- तेज सिरदर्द, गर्दन में अकड़न, उल्टी या अत्यधिक सुस्ती (ये मस्तिष्क संक्रमण के संकेत हो सकते हैं और आपातकालीन स्थिति हैं)
रोग का पूर्वानुमान
समय पर निदान और उचित उपचार मिलने पर अधिकांश मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं। तीव्र मास्टॉयडाइटिस में एंटीबायोटिक और आवश्यकता पड़ने पर सर्जरी से अच्छे परिणाम मिलते हैं। हालाँकि, देरी करने पर सुनने की क्षमता को स्थायी नुकसान या गंभीर जटिलताओं का खतरा रहता है। इसलिए जागरूकता और शीघ्र उपचार ही सबसे बड़ा बचाव है।
निष्कर्ष
मास्टॉयडाइटिस कान के संक्रमण की एक गंभीर परिणति है, जो अक्सर लापरवाही या अधूरे इलाज के कारण होती है। कान के पीछे दर्द, सूजन, बुखार और कान से स्राव जैसे लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए, विशेषकर बच्चों में। सही समय पर जाँच, पूरी एंटीबायोटिक चिकित्सा और जरूरत पड़ने पर सर्जरी से यह रोग पूरी तरह ठीक हो सकता है।
याद रखें, कान का हर दर्द मामूली नहीं होता। यदि आपको या आपके बच्चे को कान के संक्रमण के बाद कान के पीछे सूजन या दर्द महसूस हो, तो बिना देर किए किसी ईएनटी (ENT) विशेषज्ञ से परामर्श करें। जागरूकता, टीकाकरण और स्वच्छता अपनाकर इस रोग से काफी हद तक बचा जा सकता है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है और इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी लक्षण के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
