लीशमैनियासिस: त्वचा और अंगों का परजीवी संक्रमण
परिचय
लीशमैनियासिस एक परजीवीजनित रोग है जो लीशमैनिया (Leishmania) नामक सूक्ष्म परजीवी के कारण होता है। यह रोग संक्रमित बालू मक्खी (sandfly) के काटने से मनुष्यों में फैलता है और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा इसे एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग (Neglected Tropical Disease) की श्रेणी में रखा गया है। भारत में इसे “काला-आज़ार” के नाम से भी जाना जाता है, विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में यह स्थानिक (endemic) रूप से पाया जाता है।
यह रोग गरीबी, कुपोषण, अस्वच्छ रहन-सहन और कमजोर स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े क्षेत्रों में अधिक फैलता है, इसलिए इसे “गरीबों की बीमारी” भी कहा जाता है।
लीशमैनियासिस के कारण
यह रोग लीशमैनिया वंश के प्रोटोज़ोआ परजीवी से होता है। इस परजीवी की लगभग 20 से अधिक प्रजातियाँ मनुष्यों में रोग उत्पन्न करने के लिए जानी जाती हैं, जैसे लीशमैनिया डोनोवानी, लीशमैनिया ट्रोपिका और लीशमैनिया ब्रैज़िलिएंसिस।
इस रोग का मुख्य वाहक (vector) मादा फ्लेबोटोमाइन बालू मक्खी है। जब यह मक्खी किसी संक्रमित व्यक्ति या जानवर (जैसे कुत्ते) का खून चूसती है, तो परजीवी उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसके बाद जब वही मक्खी किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटती है, तो परजीवी उसके रक्त में प्रवेश कर संक्रमण फैला देता है।
बालू मक्खियाँ सामान्यतः नम, अंधेरी और दरारयुक्त जगहों जैसे मिट्टी की दीवारों, पशुओं के बाड़ों, कूड़े के ढेर और घरों की दरारों में पनपती हैं। ये मुख्यतः शाम और रात के समय सक्रिय रहती हैं।
लीशमैनियासिस के प्रकार
चिकित्सा विज्ञान में इस रोग को मुख्यतः तीन रूपों में विभाजित किया जाता है:
1. आंत संबंधी लीशमैनियासिस (Visceral Leishmaniasis / काला-आज़ार)
यह सबसे गंभीर रूप है, जिसमें परजीवी शरीर के आंतरिक अंगों जैसे यकृत (liver), प्लीहा (spleen) और अस्थि मज्जा (bone marrow) को प्रभावित करता है। यदि समय पर उपचार न किया जाए, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है। भारत, बांग्लादेश, सूडान, इथियोपिया और ब्राज़ील में यह रूप अधिक देखा जाता है।
2. त्वचीय लीशमैनियासिस (Cutaneous Leishmaniasis)
यह सबसे सामान्य रूप है, जिसमें त्वचा पर घाव या छाले बन जाते हैं। ये घाव आमतौर पर उस स्थान पर होते हैं जहाँ मक्खी ने काटा हो। यह रूप आमतौर पर जानलेवा नहीं होता, परंतु स्थायी निशान (scar) छोड़ सकता है।
3. म्यूकोक्यूटेनियस लीशमैनियासिस (Mucocutaneous Leishmaniasis)
इस रूप में परजीवी नाक, मुँह और गले की श्लेष्मा झिल्लियों (mucous membranes) को नष्ट कर देता है। यह मुख्यतः दक्षिण अमेरिका के देशों में पाया जाता है और इससे चेहरे की बनावट में गंभीर विकृति हो सकती है।
लक्षण
आंत संबंधी लीशमैनियासिस के लक्षण
- लंबे समय तक बना रहने वाला बुखार (अक्सर दो सप्ताह से अधिक)
- अत्यधिक वजन कम होना
- प्लीहा और यकृत का बढ़ जाना (पेट फूलना)
- खून की कमी (एनीमिया)
- त्वचा का रंग गहरा पड़ना (इसी कारण इसे “काला-आज़ार” कहा जाता है)
- कमजोरी और थकान
- रक्तस्राव की प्रवृत्ति बढ़ना
त्वचीय लीशमैनियासिस के लक्षण
- त्वचा पर छोटे उभार जो धीरे-धीरे बड़े घाव में बदल जाते हैं
- घाव में दर्द रहित परंतु लंबे समय तक न भरने वाला व्रण
- घाव के किनारे उभरे हुए और बीच का हिस्सा गहरा
- ठीक होने के बाद स्थायी निशान
म्यूकोक्यूटेनियस लीशमैनियासिस के लक्षण
- नाक और मुँह में सूजन व घाव
- नाक का सेप्टम (विभाजक झिल्ली) नष्ट होना
- साँस लेने और निगलने में कठिनाई
संक्रमण कैसे फैलता है
लीशमैनियासिस के फैलने की प्रक्रिया को इस प्रकार समझा जा सकता है:
- संक्रमित मादा बालू मक्खी किसी व्यक्ति या जानवर को काटती है।
- परजीवी मक्खी की लार के माध्यम से रक्त में प्रवेश करता है।
- परजीवी शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं (macrophages) के अंदर बढ़ता है।
- संक्रमित व्यक्ति को जब दूसरी मक्खी काटती है, तो वह परजीवी को अपने शरीर में ले लेती है और आगे फैलाती है।
कुछ दुर्लभ मामलों में यह संक्रमित रक्त चढ़ाने, सुई साझा करने या माँ से बच्चे में भी फैल सकता है, परंतु यह आम तरीका नहीं है।
निदान (Diagnosis)
लीशमैनियासिस का निदान कई तरीकों से किया जाता है:
- रक्त परीक्षण: rK39 स्ट्रिप टेस्ट, जो आंत संबंधी लीशमैनियासिस के लिए व्यापक रूप से प्रयोग होता है।
- अस्थि मज्जा या प्लीहा से नमूना लेना: सूक्ष्मदर्शी द्वारा परजीवी की पहचान के लिए।
- त्वचा बायोप्सी: त्वचीय रूप के निदान हेतु।
- PCR परीक्षण: परजीवी के DNA की पहचान के लिए, जो अधिक सटीक होता है।
- सीरोलॉजिकल परीक्षण (ELISA): एंटीबॉडी की उपस्थिति जाँचने के लिए।
समय पर सही निदान होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि आंत संबंधी रूप उपचार न मिलने पर 95 प्रतिशत तक जानलेवा हो सकता है।
उपचार
लीशमैनियासिस का उपचार रोग के प्रकार और गंभीरता पर निर्भर करता है। कुछ प्रमुख उपचार विधियाँ इस प्रकार हैं:
- एम्फोटेरिसिन बी (Amphotericin B): लिपोसोमल रूप में यह आंत संबंधी लीशमैनियासिस के उपचार में अत्यंत प्रभावी माना जाता है और भारत में इसका व्यापक उपयोग होता है।
- मिल्टेफोसिन (Miltefosine): यह मौखिक दवा के रूप में उपलब्ध है और इसका उपयोग आसान होने के कारण व्यापक रूप से किया जाता है।
- पैरोमोमाइसिन (Paromomycin): इंजेक्शन के रूप में प्रयोग की जाने वाली दवा।
- सोडियम स्टिबोग्लूकोनेट: पारंपरिक रूप से प्रयोग होने वाली दवा, हालांकि अब प्रतिरोध के मामलों के कारण इसका उपयोग सीमित हो गया है।
त्वचीय रूप में कई बार घाव अपने आप भी ठीक हो जाते हैं, परंतु स्थायी निशान से बचने और संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए उपचार की सलाह दी जाती है।
रोकथाम और बचाव
लीशमैनियासिस से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय कारगर सिद्ध होते हैं:
- मच्छरदानी का उपयोग: कीटनाशक युक्त मच्छरदानी का उपयोग करें, विशेषकर रात में सोते समय।
- कीट प्रतिरोधी क्रीम: शरीर के खुले हिस्सों पर कीट भगाने वाली क्रीम या स्प्रे का प्रयोग करें।
- घर की सफाई: घर की दीवारों की दरारें भरें और आसपास स्वच्छता बनाए रखें।
- पशुओं के बाड़ों का प्रबंधन: पशुओं के बाड़े घर से दूर रखें, क्योंकि बालू मक्खियाँ इन स्थानों पर पनपती हैं।
- कीटनाशक छिड़काव: सरकार द्वारा चलाए जा रहे इंडोर रेजिड्यूअल स्प्रेइंग (IRS) कार्यक्रमों में सहभागिता करें।
- समय पर जाँच और उपचार: संदिग्ध लक्षण दिखने पर तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें, ताकि रोग का समय पर पता चल सके और वह आगे न फैले।
भारत में स्थिति और सरकारी प्रयास
भारत सरकार ने “राष्ट्रीय काला-आज़ार उन्मूलन कार्यक्रम” के तहत इस रोग को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। बिहार जैसे राज्यों में मुफ्त जाँच और उपचार की सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं, साथ ही बालू मक्खियों के नियंत्रण के लिए नियमित कीटनाशक छिड़काव कार्यक्रम चलाए जाते हैं। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप पिछले कुछ वर्षों में काला-आज़ार के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है।
निष्कर्ष
लीशमैनियासिस एक गंभीर परंतु रोकथाम योग्य रोग है। यदि समय रहते इसके लक्षणों की पहचान कर ली जाए और उचित उपचार लिया जाए, तो इससे होने वाली जटिलताओं और मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। व्यक्तिगत स्वच्छता, वातावरण की सफाई और मच्छरों से बचाव के उपायों को अपनाकर इस रोग के प्रसार को प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है। साथ ही, स्थानिक क्षेत्रों में जन-जागरूकता बढ़ाना और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करना भी इस रोग के उन्मूलन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
