काला अजार (विसरल लीशमैनियासिस): सैंडफ्लाई से फैलने वाला खतरनाक रोग
परिचय
काला अजार, जिसे चिकित्सा विज्ञान में विसरल लीशमैनियासिस (Visceral Leishmaniasis) कहा जाता है, एक गंभीर परजीवी रोग है जो मादा सैंडफ्लाई (बालू मक्खी) के काटने से फैलता है। “काला अजार” शब्द का अर्थ है “काला बुखार”। इस रोग में रोगी की त्वचा का रंग कुछ गहरा या काला पड़ने लगता है, इसीलिए यह नाम पड़ा। हिंदी में इसे “कालाजार” भी लिखा जाता है, और स्थानीय बोलचाल में लोग इसे “दमदम बुखार” भी कहते हैं।
यदि समय पर इलाज न हो, तो यह रोग लगभग हमेशा जानलेवा सिद्ध होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इसे उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों (Neglected Tropical Diseases) की श्रेणी में रखता है। भारत में यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में पाया जाता है, जबकि बिहार सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहा है।
रोग का कारण
काला अजार लीशमैनिया डोनोवानी (Leishmania donovani) नामक एक एककोशिकीय परजीवी (प्रोटोज़ोआ) के कारण होता है। यह परजीवी मनुष्य के शरीर में प्रवेश करके रक्त और प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाओं, विशेषकर मैक्रोफेज में पनपता है और धीरे-धीरे यकृत (लिवर), प्लीहा (तिल्ली) और अस्थि मज्जा (बोन मैरो) जैसे महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित करता है। इसी कारण इसे “विसरल” यानी आंतरिक अंगों का रोग कहा जाता है।
संक्रमण कैसे फैलता है?
इस रोग का वाहक फ्लेबोटोमस अर्जेंटाइप्स (Phlebotomus argentipes) नामक मादा सैंडफ्लाई है। यह मक्खी आकार में मच्छर से भी बहुत छोटी, लगभग 2 से 3 मिलीमीटर की होती है।
संक्रमण का चक्र इस प्रकार चलता है:
- मादा सैंडफ्लाई किसी संक्रमित व्यक्ति का रक्त चूसती है और परजीवी उसके शरीर में पहुँच जाते हैं।
- मक्खी के भीतर परजीवी विकसित और संख्या में वृद्ध होते हैं।
- जब यही मक्खी किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटती है, तो परजीवी उसके रक्त में पहुँच जाते हैं।
सैंडफ्लाई आमतौर पर शाम और रात के समय सक्रिय रहती है। यह नम, अँधेरी और छायादार जगहों में पनपती है, जैसे मिट्टी की दीवारों की दरारें, पशुशालाओं के आसपास की नमी, कूड़े के ढेर और जमा गोबर वाले स्थान। कच्चे मकान और घनी बस्तियाँ इसके प्रजनन के लिए अनुकूल होती हैं।
रोग के लक्षण
काला अजार के लक्षण संक्रमण के कई सप्ताह या महीनों बाद दिखाई दे सकते हैं। इसकी इन्क्यूबेशन अवधि सामान्यतः 2 से 6 महीने होती है, हालाँकि कुछ मामलों में यह एक साल से भी अधिक हो सकती है। प्रमुख लक्षण ये हैं:
- लंबे समय तक बुखार: दो सप्ताह या उससे अधिक चलने वाला बुखार, जो अक्सर रुक-रुक कर आता है और कई बार दिन में दो बार चढ़ता है।
- तिल्ली और यकृत का बढ़ना: पेट के ऊपरी हिस्से में भारीपन या फुलाव महसूस होता है, खासकर बाईं ओर।
- वजन में गिरावट: भूख घटने और शरीर के कमजोर होने से वजन तेजी से कम होता है।
- खून की कमी (एनीमिया): चेहरा पीला पड़ना, थकान, सांस फूलना और चक्कर आना।
- त्वचा का रंग गहरा होना: विशेषकर हाथ, पैर, पेट और चेहरे की त्वचा पर।
- कमजोरी और थकावट: रोगी हर समय सुस्ती महसूस करता है।
- रक्तस्राव की प्रवृत्ति: नाक या मसूड़ों से खून आना।
- बार-बार संक्रमण: प्रतिरक्षा शक्ति कमजोर होने से अन्य बीमारियाँ घेर लेती हैं।
यदि किसी व्यक्ति को दो सप्ताह से अधिक बुखार हो और वह मलेरिया या अन्य सामान्य जाँचों में न पकड़ा जाए, तो काला अजार की जाँच अवश्य करानी चाहिए, खासकर प्रभावित क्षेत्रों में रहने वालों को।
पोस्ट काला अजार डर्मल लीशमैनियासिस (PKDL)
इलाज के बाद कुछ रोगियों में, कई महीनों या वर्षों बाद, त्वचा पर चकत्ते, धब्बे या गाँठें उभर आती हैं। इस स्थिति को पोस्ट काला अजार डर्मल लीशमैनियासिस (PKDL) कहते हैं। यह रोग का एक चरण है, और ऐसे रोगी परजीवी के भंडार का काम कर सकते हैं, यानी सैंडफ्लाई इनसे संक्रमण उठाकर दूसरों तक पहुँचा सकती है। इसलिए PKDL की पहचान और इलाज रोग उन्मूलन के लिए बेहद जरूरी है।
निदान (जाँच)
काला अजार की पुष्टि के लिए निम्न जाँचें की जाती हैं:
- rK39 रैपिड टेस्ट: यह एक सरल और तेज जाँच है जो रक्त की कुछ बूँदों से की जाती है। इसका परिणाम लगभग 15 से 20 मिनट में मिल जाता है और यह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी उपलब्ध है।
- अस्थि मज्जा या तिल्ली की आकांक्षा (Aspiration): इसमें सूक्ष्मदर्शी से परजीवी की सीधी पहचान की जाती है।
- रक्त जाँच: इसमें एनीमिया, श्वेत रक्त कोशिकाओं की कमी और प्लेटलेट्स की कमी देखी जाती है।
- पीसीआर (PCR) जाँच: अधिक सटीक पहचान के लिए प्रयोग होती है।
उपचार
पहले इस रोग का इलाज सोडियम स्टिबोग्लुकोनेट नामक दवा से होता था, परंतु प्रतिरोध और दुष्प्रभावों के कारण अब इसका उपयोग बहुत कम हो गया है। वर्तमान में भारत में मुख्य रूप से निम्न उपचार अपनाए जाते हैं:
- लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी (Liposomal Amphotericin B): यह भारत में पहली पसंद का उपचार है। अक्सर इसकी एक ही खुराक रोगी को दी जाती है, जो अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
- मिल्टेफोसिन: यह मुँह से ली जाने वाली दवा है, जिसे कुछ विशेष मामलों और संयुक्त उपचार में दिया जाता है। गर्भवती महिलाओं को यह दवा नहीं दी जाती, क्योंकि यह गर्भस्थ शिशु के लिए हानिकारक हो सकती है।
- संयुक्त चिकित्सा (Combination Therapy): कुछ मामलों में दो दवाओं का मेल दिया जाता है ताकि प्रतिरोध की संभावना कम हो।
उपचार हमेशा प्रशिक्षित चिकित्सक की देखरेख में और सरकारी अस्पतालों या मान्यता प्राप्त केंद्रों में ही कराना चाहिए। भारत सरकार के कार्यक्रम के तहत इस रोग का इलाज निःशुल्क उपलब्ध है, और रोगी को आर्थिक सहायता भी दी जाती है ताकि वह मजदूरी की हानि की भरपाई कर सके।
रोकथाम के उपाय
काला अजार से बचाव में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सैंडफ्लाई पर नियंत्रण की है।
1. कीटनाशक का छिड़काव: प्रभावित गाँवों में घरों की दीवारों और पशुशालाओं पर नियमित रूप से इनडोर रेजिडुअल स्प्रे (IRS) किया जाता है। यह छिड़काव सैंडफ्लाई की संख्या को काफी घटा देता है।
2. मच्छरदानी का उपयोग: सोते समय कीटनाशक-उपचारित मच्छरदानी का प्रयोग करें। सैंडफ्लाई बहुत छोटी होती है, इसलिए बारीक जाली वाली मच्छरदानी अधिक कारगर रहती है।
3. घर और आसपास की सफाई: दीवारों की दरारों को मिट्टी या सीमेंट से भरवाएँ। घर के आसपास गोबर, कचरा और सड़े पत्तों के ढेर न लगने दें।
4. पशुओं को घर से अलग रखें: गाय-भैंस और अन्य पशुओं को रहने के कमरे से दूर रखें, ताकि सैंडफ्लाई के प्रजनन स्थल घर के निकट न बनें।
5. नमी पर नियंत्रण: घर के भीतर और आसपास जल-जमाव न होने दें, और फर्श तथा दीवारों को सूखा रखें।
6. समय पर जाँच और इलाज: दो सप्ताह से अधिक बुखार होने पर तुरंत स्वास्थ्य केंद्र जाएँ। रोगी का शीघ्र इलाज होने से समुदाय में संक्रमण का फैलाव भी रुकता है।
7. जागरूकता: गाँवों में आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा लोगों को रोग के लक्षणों और बचाव के बारे में बताया जाता है। सामुदायिक सहयोग इसके उन्मूलन की कुंजी है।
भारत में स्थिति और उन्मूलन के प्रयास
भारत सरकार ने काला अजार को समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। उन्मूलन का मानक यह है कि प्रति 10,000 की आबादी पर वार्षिक मामलों की संख्या एक से कम हो, यह स्तर प्रखंड (ब्लॉक) स्तर पर मापा जाता है। पिछले वर्षों में मामलों में उल्लेखनीय गिरावट आई है, और बड़ी संख्या में प्रखंड इस लक्ष्य को प्राप्त कर चुके हैं। बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में सघन अभियान चलाए गए हैं।
इस सफलता के पीछे कई कारण हैं: प्रभावी दवाओं की उपलब्धता, rK39 जैसी सरल जाँच, नियमित कीटनाशक छिड़काव, और सामुदायिक भागीदारी। फिर भी, चुनौतियाँ बनी हुई हैं, जैसे PKDL रोगियों की पहचान, एचआईवी के साथ सह-संक्रमण, गरीबी, कच्चे मकान, और दूरस्थ इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुँच। नवीनतम आँकड़ों और लक्ष्य-वर्ष की जानकारी के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय या राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NCVBDC) की आधिकारिक सूचनाएँ देखना उचित रहेगा।
किन्हें अधिक खतरा है?
- गरीब और ग्रामीण समुदाय, जो कच्चे घरों में रहते हैं
- कुपोषित बच्चे और वयस्क
- एचआईवी या अन्य कारणों से कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोग
- पशुपालन करने वाले परिवार
- भीड़भाड़ और अस्वच्छ वातावरण में रहने वाले लोग
आम भ्रांतियाँ
कई लोग इसे साधारण बुखार या मलेरिया समझकर घरेलू नुस्खों में समय गँवा देते हैं, जो घातक साबित हो सकता है। यह भी गलत धारणा है कि यह रोग छूने या साथ खाने-पीने से फैलता है। काला अजार सीधे एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलता; इसका प्रसार केवल सैंडफ्लाई के काटने से होता है। रोगी के साथ रहना सुरक्षित है, बशर्ते घर में सैंडफ्लाई का नियंत्रण हो।
निष्कर्ष
काला अजार एक ऐसा रोग है जो गरीबी, कुपोषण और अस्वच्छ परिस्थितियों में सबसे अधिक पनपता है। परंतु अच्छी बात यह है कि यह पूरी तरह रोके जाने योग्य और इलाज योग्य है। समय पर जाँच, उचित उपचार, सैंडफ्लाई नियंत्रण और जन-जागरूकता के बल पर इसे जड़ से मिटाया जा सकता है। यदि किसी को दो सप्ताह से अधिक बुखार, पेट फूलना, कमजोरी या वजन घटने जैसे लक्षण दिखें, तो देर न करें और निकटतम सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में जाँच कराएँ। सतर्कता, स्वच्छता और सामूहिक प्रयास ही हमें इस बीमारी से मुक्त भारत की ओर ले जा सकते हैं।
नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी लक्षण की स्थिति में योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
