इडियोपैथिक नेफ्रोटिक सिंड्रोम (Idiopathic Nephrotic Syndrome)
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इडियोपैथिक नेफ्रोटिक सिंड्रोम: कारण, लक्षण, निदान और उपचार

प्रस्तावना

हमारी किडनी (गुर्दे) शरीर का एक बेहद अहम अंग हैं। ये खून को छानकर अपशिष्ट पदार्थों और अतिरिक्त पानी को मूत्र के रूप में बाहर निकालती हैं और शरीर के लिए ज़रूरी प्रोटीन को रोके रखती हैं। जब किडनी की छन्नी प्रणाली में खराबी आ जाती है, तो प्रोटीन मूत्र के रास्ते बाहर निकलने लगता है। इसी स्थिति का एक प्रमुख रूप नेफ्रोटिक सिंड्रोम है। जब इसका कोई स्पष्ट कारण पता नहीं चलता, तो इसे इडियोपैथिक नेफ्रोटिक सिंड्रोम (INS) कहते हैं। “इडियोपैथिक” का अर्थ है, जिसका कारण अज्ञात हो।

यह बच्चों में होने वाली किडनी की सबसे आम बीमारियों में से एक है। भारत में भी बाल-किडनी रोग विशेषज्ञों के पास आने वाले बहुत से मामले इसी के होते हैं।

नेफ्रोटिक सिंड्रोम क्या है?

नेफ्रोटिक सिंड्रोम कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि लक्षणों का समूह है। इसकी चार प्रमुख पहचानें हैं:

  1. मूत्र में अत्यधिक प्रोटीन का निकलना (प्रोटीन्यूरिया): बच्चों में 40 मिलीग्राम/वर्ग मीटर/घंटा से अधिक, या मूत्र प्रोटीन-क्रिएटिनिन अनुपात 2 से अधिक।
  2. रक्त में एल्बुमिन की कमी (हाइपोएल्बुमिनेमिया): सीरम एल्बुमिन का 2.5 ग्राम/डेसीलीटर से कम होना।
  3. शरीर में सूजन (एडिमा)।
  4. रक्त में कोलेस्ट्रॉल और वसा का बढ़ना (हाइपरलिपिडेमिया)।

इडियोपैथिक नेफ्रोटिक सिंड्रोम के कारण

बच्चों में लगभग 90 प्रतिशत मामले इडियोपैथिक होते हैं, यानी इनका कोई बाहरी या पहचाना गया कारण नहीं होता। माना जाता है कि प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) की गड़बड़ी इसमें भूमिका निभाती है। किडनी की छानने वाली इकाई ग्लोमेरुलस में मौजूद विशेष कोशिकाएँ, जिन्हें पोडोसाइट कहते हैं, प्रभावित हो जाती हैं। इससे छन्नी की दीवार प्रोटीन के लिए पारगम्य हो जाती है।

किडनी बायोप्सी में इसके मुख्य हिस्टोलॉजिकल प्रकार दिखते हैं:

  • मिनिमल चेंज डिज़ीज़ (MCD): बच्चों में सबसे आम, लगभग 80 से 85 प्रतिशत मामले। यह स्टेरॉयड दवा से अक्सर ठीक हो जाता है।
  • फोकल सेगमेंटल ग्लोमेरुलोस्क्लेरोसिस (FSGS): इसमें ग्लोमेरुलस के कुछ हिस्सों में घाव बन जाते हैं। यह अक्सर स्टेरॉयड-रोधी होता है।
  • मेम्ब्रेनस नेफ्रोपैथी: वयस्कों में अधिक आम।
  • मेसेंजियल प्रोलिफरेटिव ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस: अपेक्षाकृत कम मामलों में।

कुछ बच्चों में आनुवंशिक कारण भी मिलते हैं, खासकर जब बीमारी बहुत कम उम्र (जन्म के पहले साल) में शुरू हो या दवाओं का असर न हो।

किसे होता है?

यह मुख्यतः 2 से 8 वर्ष की उम्र के बच्चों में पाया जाता है। लड़कों में यह लड़कियों की तुलना में लगभग दोगुना आम है। सर्दी-जुकाम, गले का संक्रमण या एलर्जी जैसी स्थितियों के बाद बीमारी शुरू होने या दोबारा उभरने की घटनाएँ देखी जाती हैं।

लक्षण

  • चेहरे और पलकों की सूजन: खासकर सुबह उठने पर आँखों के आसपास सूजन। यह अक्सर पहला लक्षण होता है।
  • पैरों और टखनों में सूजन: समय के साथ सूजन पूरे शरीर में फैल सकती है।
  • पेट फूलना (एसाइटीज़): पेट में पानी भरने से।
  • फेफड़ों के आसपास पानी: साँस फूलने की शिकायत हो सकती है।
  • मूत्र में झाग: प्रोटीन की अधिकता के कारण।
  • मूत्र की मात्रा में कमी।
  • वजन का अचानक बढ़ना।
  • थकान, भूख में कमी, चिड़चिड़ापन।

कई बार माता-पिता शुरू में इसे एलर्जी या आँख की समस्या समझ लेते हैं, इसलिए जाँच में देरी हो जाती है।

संभावित जटिलताएँ

  1. संक्रमण: शरीर से प्रतिरक्षा प्रोटीन निकल जाने से निमोनिया, पेट का संक्रमण (पेरिटोनाइटिस) और त्वचा के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
  2. रक्त के थक्के बनना (थ्रोम्बोसिस): खून गाढ़ा होने से नसों में थक्के जम सकते हैं।
  3. गंभीर सूजन और साँस की तकलीफ।
  4. तीव्र किडनी क्षति: कुछ स्थितियों में।
  5. कुपोषण और वृद्धि पर असर: लंबे समय तक बीमारी रहने और स्टेरॉयड के उपयोग से।
  6. उच्च रक्तचाप।

निदान

निदान के लिए डॉक्टर लक्षणों, शारीरिक जाँच और निम्न परीक्षणों पर निर्भर करते हैं:

  • मूत्र जाँच: प्रोटीन की मात्रा (डिपस्टिक और 24 घंटे का मूत्र प्रोटीन या स्पॉट प्रोटीन-क्रिएटिनिन अनुपात)।
  • रक्त जाँच: सीरम एल्बुमिन, कुल प्रोटीन, कोलेस्ट्रॉल, क्रिएटिनिन, यूरिया और इलेक्ट्रोलाइट्स।
  • पूरा रक्त गणना (CBC) और अन्य संक्रमण संबंधी जाँचें।
  • सेकेंडरी कारणों को बाहर करना: लूपस, हेपेटाइटिस B और C, एचआईवी आदि की जाँच, जरूरत के अनुसार।
  • किडनी बायोप्सी: हर बच्चे में आवश्यक नहीं होती। यह तब की जाती है जब बच्चा एक साल से छोटा या 12 साल से बड़ा हो, मूत्र में रक्त हो, रक्तचाप अधिक हो, किडनी की कार्यक्षमता घटी हो, या स्टेरॉयड का असर न हो रहा हो।
  • आनुवंशिक परीक्षण: स्टेरॉयड-रोधी या बहुत कम उम्र में शुरू हुए मामलों में।

उपचार

1. स्टेरॉयड चिकित्सा

उपचार की पहली और मुख्य दवा प्रेडनिसोलोन है। बच्चों में सामान्यतः इसे उच्च मात्रा में कई हफ्तों तक दिया जाता है, फिर धीरे-धीरे घटाया जाता है। पूरा कोर्स कई महीनों तक चलता है। अधिकांश बच्चों (लगभग 85 से 90 प्रतिशत) में कुछ ही हफ्तों में मूत्र से प्रोटीन बंद हो जाता है। ऐसे बच्चों को स्टेरॉयड-संवेदनशील कहा जाता है।

स्टेरॉयड की मात्रा और अवधि डॉक्टर तय करते हैं। इसे अपने आप बंद करना या घटाना खतरनाक हो सकता है।

2. बीमारी के प्रकार

  • स्टेरॉयड-संवेदनशील: स्टेरॉयड से ठीक हो जाता है।
  • बार-बार लौटने वाला (फ्रीक्वेंट रिलैप्सिंग): बीमारी बार-बार वापस आती है।
  • स्टेरॉयड-निर्भर: स्टेरॉयड घटाते ही या बंद करने के तुरंत बाद लक्षण लौट आते हैं।
  • स्टेरॉयड-रोधी: पर्याप्त उपचार के बावजूद प्रोटीन बंद नहीं होता।

3. अन्य दवाएँ

जब बीमारी बार-बार लौटे, स्टेरॉयड के दुष्प्रभाव बढ़ें या दवा काम न करे, तब डॉक्टर स्टेरॉयड-बचाने वाली दवाएँ देते हैं, जैसे लेवामिसोल, साइक्लोफॉस्फेमाइड, माइकोफेनोलेट मोफेटिल, टैक्रोलिमस, साइक्लोस्पोरिन और रिटक्सिमैब। इनका चयन बीमारी के प्रकार, उम्र और दुष्प्रभावों के जोखिम को देखकर विशेषज्ञ करते हैं।

4. सहायक उपचार

  • मूत्रवर्धक (डाइयूरेटिक): गंभीर सूजन में।
  • एल्बुमिन इन्फ्यूजन: कुछ गंभीर मामलों में।
  • एसीई इन्हिबिटर या एआरबी: प्रोटीन का रिसाव घटाने और रक्तचाप नियंत्रण में।
  • कैल्शियम और विटामिन D: स्टेरॉयड से हड्डियों पर पड़ने वाले असर को कम करने के लिए।
  • संक्रमणों का शीघ्र इलाज।

आहार और जीवनशैली

  • नमक कम खाएँ: सूजन के दौरान नमक पर सख्त नियंत्रण जरूरी है। अचार, पापड़, चिप्स और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से बचें।
  • संतुलित प्रोटीन: बच्चे की उम्र के अनुसार सामान्य मात्रा में प्रोटीन दें। अत्यधिक प्रोटीन से बचें।
  • पानी का सेवन: डॉक्टर की सलाह अनुसार। गंभीर सूजन में कभी-कभी तरल सीमित करना पड़ता है।
  • वसा और शर्करा पर नियंत्रण: स्टेरॉयड से वजन और कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है।
  • साफ-सफाई: हाथ धोना और भीड़ में संक्रमण से बचाव।
  • टीकाकरण: सभी टीके समय पर लगवाएँ। निमोनिया और फ्लू के टीके विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। स्टेरॉयड की उच्च मात्रा के दौरान जीवित टीके डॉक्टर की सलाह से ही लगवाएँ।
  • सामान्य दिनचर्या: सूजन घटने पर बच्चा स्कूल जा सकता है और खेल-कूद कर सकता है।

घर पर निगरानी

  • रोज सुबह की पहली मूत्र धार की डिपस्टिक से प्रोटीन जाँचें और एक डायरी में लिखें।
  • नियमित रूप से वजन और सूजन देखें।
  • बुखार, पेट दर्द, साँस की तकलीफ या मूत्र कम होने पर तुरंत डॉक्टर से मिलें।
  • दवा कभी बीच में न छोड़ें।

डॉक्टर से कब संपर्क करें?

  • चेहरे या शरीर में अचानक सूजन बढ़ना
  • लगातार बुखार या पेट में तेज दर्द
  • साँस लेने में कठिनाई
  • पैर में सूजन के साथ दर्द या लालिमा (थक्के का संकेत हो सकता है)
  • लगातार उल्टी या मूत्र बहुत कम आना
  • मूत्र में खून दिखना

पूर्वानुमान (प्रोग्नोसिस)

स्टेरॉयड-संवेदनशील बच्चों में दृष्टिकोण आम तौर पर अच्छा रहता है। अधिकांश बच्चे किशोरावस्था तक बीमारी से मुक्त हो जाते हैं, हालाँकि बीच-बीच में बीमारी लौट सकती है। बार-बार लौटने वाले मामलों में भी उपयुक्त दवाओं से बीमारी को नियंत्रित रखा जा सकता है। स्टेरॉयड-रोधी और FSGS वाले मामलों में जोखिम अधिक है, क्योंकि कुछ बच्चों में समय के साथ किडनी की कार्यक्षमता घट सकती है। इसलिए ऐसे मामलों में नियमित निगरानी और विशेषज्ञ देखभाल आवश्यक है।

माता-पिता के लिए सुझाव

  • यह लंबी चलने वाली बीमारी है, धैर्य रखें और उपचार में निरंतरता बनाए रखें।
  • नियमित फॉलो-अप में शामिल हों।
  • स्टेरॉयड के दुष्प्रभाव, जैसे वजन बढ़ना, चेहरा गोल होना और चिड़चिड़ापन, अस्थायी होते हैं और दवा घटाने पर कम होते हैं।
  • बच्चे को भावनात्मक सहारा दें। बार-बार बीमार पड़ने पर बच्चे तनाव में आ सकते हैं।
  • बिना डॉक्टर की सलाह के घरेलू नुस्खे, आयुर्वेदिक या अन्य दवाएँ शुरू न करें। कुछ दवाएँ किडनी को नुकसान पहुँचा सकती हैं।
  • स्कूल को बीमारी की जानकारी दें ताकि बच्चे की देखभाल में सहयोग मिल सके।

निष्कर्ष

इडियोपैथिक नेफ्रोटिक सिंड्रोम बच्चों में आम लेकिन उपचार योग्य किडनी रोग है। समय पर पहचान, सही जाँच और विशेषज्ञ की निगरानी में नियमित उपचार से अधिकांश बच्चे सामान्य और स्वस्थ जीवन जीते हैं। सूजन के शुरुआती लक्षणों को अनदेखा न करें और जाँच में देरी न करें। नमक पर नियंत्रण, संक्रमण से बचाव, दवाओं का अनुशासित सेवन और नियमित फॉलो-अप इस बीमारी के प्रबंधन की कुंजी हैं। सही जानकारी और सहयोग के साथ माता-पिता और बच्चा दोनों इस चुनौती का सफलतापूर्वक सामना कर सकते हैं।

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