हाइपरपैराथायरायडिज्म (Hyperparathyroidism)
|

हाइपरपैराथायरायडिज्म: कारण, लक्षण, जांच और इलाज की पूरी जानकारी

परिचय

हमारे शरीर में कैल्शियम की मात्रा को संतुलित रखने का काम कई हार्मोन मिलकर करते हैं। इनमें पैराथायरायड हार्मोन (PTH) की भूमिका बहुत अहम है। जब यह हार्मोन ज़रूरत से ज़्यादा बनने लगता है, तो इस स्थिति को हाइपरपैराथायरायडिज्म कहते हैं। इसमें खून में कैल्शियम का स्तर बढ़ सकता है और हड्डियां, गुर्दे, हृदय और तंत्रिका तंत्र सब प्रभावित हो सकते हैं।

यह समस्या अक्सर सालों तक बिना बड़े लक्षणों के चलती रहती है और किसी दूसरे कारण से कराई गई ब्लड जांच में अचानक पकड़ में आती है। इसीलिए इसके बारे में जागरूकता ज़रूरी है।

पैराथायरायड ग्रंथियां क्या हैं?

पैराथायरायड ग्रंथियां चावल के दाने या मटर जितनी छोटी चार ग्रंथियां होती हैं। ये गर्दन में थायरॉइड ग्रंथि के पीछे स्थित होती हैं। नाम में समानता के बावजूद थायरॉइड और पैराथायरायड अलग-अलग ग्रंथियां हैं और उनके काम भी अलग हैं।

पैराथायरायड ग्रंथियों का मुख्य काम खून में कैल्शियम का स्तर सामान्य रखना है। जब कैल्शियम कम होता है, तो ये PTH छोड़ती हैं। PTH हड्डियों से कैल्शियम निकलवाता है, गुर्दों को कैल्शियम रोकने का संकेत देता है और आंतों में कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ाता है (विटामिन डी की मदद से)। कैल्शियम सामान्य होने पर PTH का स्राव घट जाता है। हाइपरपैराथायरायडिज्म में यह संतुलन बिगड़ जाता है।

हाइपरपैराथायरायडिज्म के प्रकार

1. प्राथमिक (Primary): इसमें ग्रंथि खुद खराब हो जाती है और कैल्शियम ज़्यादा होने पर भी PTH बनाती रहती है। यह सबसे आम प्रकार है। ज़्यादातर मामलों में एक ग्रंथि में गैर-कैंसरीय गांठ (एडेनोमा) होती है। कभी-कभी सभी ग्रंथियां बढ़ जाती हैं (हाइपरप्लासिया)। कैंसर बहुत ही दुर्लभ कारण है।

2. द्वितीयक (Secondary): इसमें ग्रंथियां किसी दूसरी समस्या की प्रतिक्रिया में ज़्यादा काम करती हैं, क्योंकि खून में कैल्शियम कम रहता है। इसके सामान्य कारण हैं:

  • लंबे समय की गुर्दे की बीमारी (क्रोनिक किडनी डिज़ीज़)
  • विटामिन डी की गंभीर कमी
  • आहार में कैल्शियम की कमी या आंतों से उसका कम अवशोषण

3. तृतीयक (Tertiary): लंबे समय तक द्वितीयक हाइपरपैराथायरायडिज्म रहने पर ग्रंथियां स्वायत्त हो जाती हैं और कैल्शियम सामान्य या ज़्यादा होने पर भी PTH बनाती रहती हैं। यह अधिकतर गुर्दे की गंभीर बीमारी और किडनी प्रत्यारोपण के बाद देखा जाता है।

कारण और जोखिम कारक

प्राथमिक हाइपरपैराथायरायडिज्म के अधिकतर मामलों में सटीक कारण अज्ञात रहता है। कुछ कारक जोखिम बढ़ाते हैं:

  • उम्र और लिंग: यह 50 वर्ष के बाद ज़्यादा होता है, और रजोनिवृत्ति के बाद की महिलाओं में पुरुषों की तुलना में अधिक देखा जाता है।
  • आनुवंशिक स्थितियां: जैसे मल्टीपल एंडोक्राइन नियोप्लेसिया (MEN) सिंड्रोम, या परिवार में इसका इतिहास।
  • गर्दन पर पहले हुआ विकिरण (रेडिएशन): सिर या गर्दन के कैंसर के इलाज में मिला रेडिएशन।
  • कुछ दवाएं: लंबे समय तक लिथियम का सेवन।
  • लंबे समय से कैल्शियम या विटामिन डी की कमी।

लक्षण

बहुत से मरीजों में शुरुआत में कोई लक्षण नहीं होते। जब लक्षण आते हैं, तो वे धीरे-धीरे और अस्पष्ट होते हैं, इसलिए अक्सर उम्र या तनाव समझकर नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं। इन्हें याद रखने के लिए एक पुरानी कहावत है: “पत्थर, हड्डियां, पेट की कराह और मानसिक धुन।”

हड्डियों और जोड़ों से जुड़े लक्षण

  • हड्डियों और जोड़ों में दर्द
  • हड्डियों का कमज़ोर होना (ऑस्टियोपोरोसिस)
  • मामूली चोट पर फ्रैक्चर

गुर्दों से जुड़े लक्षण

  • बार-बार गुर्दे की पथरी बनना
  • बहुत ज़्यादा प्यास लगना और बार-बार पेशाब आना
  • पीठ या बगल में तेज़ दर्द

पेट और पाचन से जुड़े लक्षण

  • भूख कम लगना, मतली, उल्टी
  • कब्ज़
  • पेट दर्द

मांसपेशियों, तंत्रिका और मानसिक लक्षण

  • हमेशा थकान और कमज़ोरी
  • मांसपेशियों में दर्द
  • उदासी या चिड़चिड़ापन
  • याददाश्त और ध्यान लगाने में कठिनाई
  • नींद की समस्या

हृदय से जुड़े लक्षण

  • उच्च रक्तचाप
  • कभी-कभी धड़कन की अनियमितता

बहुत ज़्यादा कैल्शियम बढ़ने पर (हाइपरकैल्सीमिक संकट) अत्यधिक कमज़ोरी, भ्रम, बेहोशी और गंभीर निर्जलीकरण हो सकता है। यह आपातकालीन स्थिति है।

जटिलताएं

समय पर इलाज न मिलने पर ये समस्याएं हो सकती हैं:

  • गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस और बार-बार फ्रैक्चर
  • गुर्दे की पथरी और गुर्दों को स्थायी नुकसान
  • हृदय रोग और उच्च रक्तचाप का खतरा
  • गर्भावस्था में मां और शिशु दोनों के लिए जटिलताएं (मां में मूत्र पथ की पथरी, नवजात में कैल्शियम की कमी)
  • गंभीर मामलों में मानसिक भ्रम और कोमा

निदान कैसे होता है?

निदान मुख्यतः ब्लड टेस्ट से होता है।

  1. सीरम कैल्शियम: प्राथमिक हाइपरपैराथायरायडिज्म में यह बढ़ा हुआ मिलता है।
  2. PTH स्तर: कैल्शियम ज़्यादा होने पर भी PTH सामान्य या ज़्यादा रहे, तो प्राथमिक समस्या की संभावना होती है।
  3. फॉस्फोरस, विटामिन डी और क्रिएटिनिन: ये द्वितीयक कारण और गुर्दे की स्थिति पहचानने में मदद करते हैं।
  4. बोन डेंसिटी टेस्ट (DEXA स्कैन): हड्डियों की मज़बूती जांचने के लिए।
  5. 24 घंटे का यूरिन टेस्ट और किडनी का अल्ट्रासाउंड/CT: पेशाब में कैल्शियम की मात्रा और पथरी देखने के लिए।
  6. गर्दन का अल्ट्रासाउंड और सेस्टामिबी स्कैन: असामान्य ग्रंथि का स्थान पता करने के लिए, खासकर सर्जरी की योजना से पहले।

उपचार

उपचार इस पर निर्भर करता है कि हाइपरपैराथायरायडिज्म किस प्रकार का है, लक्षण कितने गंभीर हैं और मरीज की उम्र व अन्य बीमारियां क्या हैं।

प्राथमिक हाइपरपैराथायरायडिज्म

सर्जरी (पैराथायरॉइडेक्टॉमी): यह एकमात्र निश्चित इलाज है। इसमें प्रभावित ग्रंथि या ग्रंथियां निकाल दी जाती हैं। अधिकांश मामलों में सफलता दर बहुत अच्छी है। आजकल छोटे चीरे वाली (मिनिमली इन्वेसिव) तकनीक अपनाई जाती है और अक्सर मरीज उसी दिन या अगले दिन घर जा सकता है। ऑपरेशन के बाद कुछ समय के लिए कैल्शियम कम हो सकता है, इसलिए खून की जांच और कैल्शियम की खुराक की ज़रूरत पड़ सकती है।

सर्जरी आमतौर पर तब सुझाई जाती है जब:

  • लक्षण मौजूद हों
  • गुर्दे की पथरी या गुर्दों को नुकसान हो
  • हड्डियां काफी कमज़ोर हों या फ्रैक्चर हुआ हो
  • खून में कैल्शियम सामान्य से काफी ऊपर हो
  • मरीज की उम्र 50 वर्ष से कम हो

निगरानी: हल्के और बिना लक्षण वाले मामलों में डॉक्टर तुरंत सर्जरी की जगह नियमित निगरानी की सलाह दे सकते हैं। इसमें समय-समय पर कैल्शियम, गुर्दे की कार्यक्षमता और हड्डियों की जांच होती है।

दवाएं: जो मरीज सर्जरी नहीं करा सकते, उनके लिए दवाएं दी जा सकती हैं। इनमें सिनाकैल्सेट (कैल्शियम कम करने के लिए) और हड्डियों की रक्षा के लिए बिस्फॉस्फोनेट जैसी दवाएं शामिल हैं। रजोनिवृत्त महिलाओं में कुछ मामलों में हार्मोन-संबंधी उपचार भी विचार में लिए जाते हैं। कोई भी दवा केवल डॉक्टर की सलाह से लें।

द्वितीयक हाइपरपैराथायरायडिज्म

यहां मूल कारण का इलाज ज़रूरी है:

  • विटामिन डी और कैल्शियम की कमी पूरी करना
  • गुर्दे की बीमारी में फॉस्फेट बाइंडर और सक्रिय विटामिन डी जैसी दवाएं
  • गंभीर मामलों में सिनाकैल्सेट या सर्जरी

आहार और जीवनशैली

  • पर्याप्त पानी पिएं: इससे पथरी का जोखिम कम होता है और गुर्दे स्वस्थ रहते हैं।
  • कैल्शियम और विटामिन डी: इन्हें अपनी मर्ज़ी से न बढ़ाएं या घटाएं। कितनी मात्रा उचित है, यह आपके डॉक्टर तय करेंगे, क्योंकि प्रकार के अनुसार सलाह अलग होती है।
  • नियमित हल्का व्यायाम: पैदल चलना और वज़न उठाने वाले हल्के व्यायाम हड्डियों को मज़बूत रखते हैं।
  • धूम्रपान और शराब से बचें: ये हड्डियों को और कमज़ोर करते हैं।
  • दवाओं पर ध्यान दें: कुछ दवाएं, जैसे थायज़ाइड मूत्रवर्धक, कैल्शियम बढ़ा सकती हैं। डॉक्टर से इनकी समीक्षा कराएं।
  • नियमित जांच: खासकर 50 वर्ष के बाद या परिवार में इतिहास होने पर समय-समय पर कैल्शियम की जांच कराते रहें।

डॉक्टर से कब मिलें?

निम्न स्थितियों में देर न करें और एंडोक्राइनोलॉजिस्ट (हार्मोन विशेषज्ञ) या फिजिशियन से संपर्क करें:

  • बार-बार पथरी होना
  • बिना कारण लगातार थकान, हड्डियों में दर्द या मांसपेशियों की कमज़ोरी
  • मामूली चोट पर फ्रैक्चर
  • अत्यधिक प्यास और बार-बार पेशाब
  • ब्लड रिपोर्ट में कैल्शियम बढ़ा हुआ आना
  • भ्रम, अत्यधिक कमज़ोरी या बेहोशी (तुरंत आपातकालीन सहायता लें)

निष्कर्ष

हाइपरपैराथायरायडिज्म एक आम लेकिन अक्सर अनदेखी रह जाने वाली हार्मोनल समस्या है। इसके लक्षण थकान, हड्डियों के दर्द या पथरी जैसे रोज़मर्रा की शिकायतों जैसे लगते हैं, इसलिए यह देर से पकड़ में आती है। अच्छी बात यह है कि एक साधारण ब्लड टेस्ट से इसका पता चल जाता है और सही समय पर इलाज, खासकर सर्जरी, से अधिकांश मरीज पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। सतर्क रहें, जांच कराएं और लक्षणों को हल्के में न लें।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *