हिपेटोपल्मोनरी सिंड्रोम: लिवर रोग के कारण सांस की तकलीफ
परिचय
जब हम लिवर की बीमारी की बात करते हैं, तो आमतौर पर पीलिया, पेट में पानी भरना, उल्टी में खून आना या पैरों में सूजन जैसे लक्षण ध्यान में आते हैं। लेकिन लंबे समय से चल रही लिवर की बीमारी, खासकर सिरोसिस, फेफड़ों को भी प्रभावित कर सकती है। इसी स्थिति को हिपेटोपल्मोनरी सिंड्रोम (Hepatopulmonary Syndrome, HPS) कहा जाता है। इसमें फेफड़े की बनावट सामान्य दिखती है, पर उनकी छोटी रक्त वाहिकाएँ फैल जाती हैं और खून में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है। नतीजतन मरीज को सांस फूलने की शिकायत होने लगती है।
यह समस्या अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती है, क्योंकि मरीज और कई बार डॉक्टर भी सांस की तकलीफ को कमजोरी, खून की कमी या पेट में पानी भरने का असर मान लेते हैं। इसलिए इसके बारे में जानकारी होना ज़रूरी है।
हिपेटोपल्मोनरी सिंड्रोम क्या है?
चिकित्सा की दृष्टि से HPS तीन बातों के मेल से पहचाना जाता है:
- लिवर की बीमारी या पोर्टल हाइपरटेंशन: ज़्यादातर मामलों में सिरोसिस, यानी लिवर का सिकुड़ना और कड़ा हो जाना। कभी-कभी बिना सिरोसिस वाली पोर्टल हाइपरटेंशन में भी यह हो सकता है।
- फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं का फैलना (Intrapulmonary Vascular Dilatation): फेफड़ों की सूक्ष्म वाहिकाएँ, जिनसे खून में ऑक्सीजन मिलती है, असामान्य रूप से चौड़ी हो जाती हैं।
- ऑक्सीजन की कमी (Impaired Oxygenation): धमनी के खून में ऑक्सीजन का स्तर कम पाया जाता है।
यह स्थिति सामान्यतः सिरोसिस के लगभग 5 से 30 प्रतिशत मरीजों में देखी जाती है। इसका सिरोसिस के कारण (शराब, हेपेटाइटिस B या C, फैटी लिवर आदि) से सीधा संबंध नहीं है, यानी किसी भी कारण से हुए सिरोसिस में यह हो सकती है।
यह कैसे होता है? (कारण और तंत्र)
सटीक कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, पर माना जाता है कि बीमार लिवर कुछ रसायनों को ठीक से नष्ट नहीं कर पाता या ज़्यादा मात्रा में बनने देता है। इनमें नाइट्रिक ऑक्साइड प्रमुख है, जो रक्त वाहिकाओं को फैलाता है। आँतों से आने वाले जीवाणुओं के अंश और सूजन पैदा करने वाले पदार्थ भी इसमें भूमिका निभाते हैं।
सामान्य स्थिति में फेफड़ों की सूक्ष्म वाहिकाएँ बहुत पतली होती हैं, इसलिए हवा से ऑक्सीजन आसानी से खून में पहुँच जाती है। HPS में ये वाहिकाएँ चौड़ी हो जाती हैं। खून के बीच वाले हिस्से तक ऑक्सीजन पहुँच नहीं पाती और खून बिना पर्याप्त ऑक्सीजन लिए आगे बढ़ जाता है। कुछ मामलों में फेफड़े की वाहिकाओं और शरीर की वाहिकाओं के बीच सीधे जुड़ाव (शंट) भी बन जाते हैं।
लक्षण
HPS के लक्षण धीरे-धीरे उभरते हैं। मुख्य लक्षण ये हैं:
- सांस फूलना (Dyspnea): पहले चलने-फिरने या सीढ़ी चढ़ने पर, फिर धीरे-धीरे आराम की अवस्था में भी।
- प्लैटिप्निया (Platypnea): लेटने पर सांस आसान और बैठने या खड़े होने पर सांस फूलना। यह इस रोग की खास पहचान है, क्योंकि खड़े होने पर खून का ज़्यादा हिस्सा फेफड़ों के निचले भागों में जमा होता है, जहाँ फैली हुई वाहिकाएँ ज़्यादा होती हैं।
- ऑर्थोडिऑक्सिया (Orthodeoxia): बैठने या खड़े होने पर ऑक्सीजन का स्तर गिर जाना, जो जाँच में पकड़ में आता है।
- नीलापन (Cyanosis): होंठ, जीभ या उँगलियों के सिरों का नीला पड़ना।
- उँगलियों का क्लबिंग: उँगलियों के सिरे गोल और फूले हुए दिखना।
- मकड़ी जैसे लाल निशान (Spider Naevi): त्वचा पर, खासकर छाती और चेहरे पर, ये निशान अक्सर देखे जाते हैं।
- थकान, कमजोरी और व्यायाम की क्षमता में कमी।
खांसी, बलगम या सीने में दर्द अक्सर नहीं होते। फेफड़ों की जाँच (एक्स-रे) भी अक्सर सामान्य आती है, इसलिए रोग छूट जाने का खतरा रहता है।
निदान कैसे होता है?
लिवर रोग के किसी भी मरीज को, जिसे सांस की तकलीफ हो या जिसकी पल्स ऑक्सीमीटर रीडिंग कम हो, HPS के लिए जाँचा जाना चाहिए। जाँच के मुख्य चरण:
1. पल्स ऑक्सीमेट्री: यह सरल जाँच पहला संकेत दे सकती है। ऑक्सीजन सैचुरेशन लगभग 96 प्रतिशत से नीचे हो तो आगे जाँच की जाती है।
2. धमनी रक्त गैस जाँच (ABG): इसमें धमनी के खून में ऑक्सीजन का स्तर (PaO₂) और A–a ग्रेडिएंट नापा जाता है। A–a ग्रेडिएंट का 15 mmHg या उससे अधिक होना (65 वर्ष से ऊपर के लोगों में 20 mmHg) ऑक्सीजन की गड़बड़ी दर्शाता है। यह जाँच बैठकर और लेटकर दोनों स्थितियों में उपयोगी हो सकती है।
3. कंट्रास्ट इकोकार्डियोग्राफी (बबल स्टडी): हाथ की नस में हिलाया हुआ खारा घोल (सूक्ष्म बुलबुले) डाला जाता है। सामान्यतः ये बुलबुले फेफड़ों में छन जाते हैं, पर HPS में फैली वाहिकाओं से गुजरकर 3 से 6 धड़कनों के भीतर दिल के बाएँ हिस्से में दिखने लगते हैं। यह जाँच वाहिकाओं के फैलाव की पुष्टि का मुख्य तरीका है।
4. MAA लंग परफ्यूज़न स्कैन: इसमें रेडियोधर्मी कणों को नस में दिया जाता है और देखा जाता है कि वे दिमाग जैसे अंगों तक कितने पहुँचे। अधिक मात्रा में पहुँचना शंट का संकेत है।
5. अन्य जाँचें: फेफड़ों की अन्य बीमारियों (जैसे COPD, निमोनिया, फेफड़ों का फाइब्रोसिस) और हृदय रोगों को अलग करने के लिए छाती का एक्स-रे, HRCT, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट और इको जैसी जाँचें की जाती हैं।
गंभीरता का वर्गीकरण
ऑक्सीजन स्तर (PaO₂) के आधार पर HPS को चार श्रेणियों में बाँटा जाता है:
- हल्का: PaO₂ 80 mmHg या उससे अधिक
- मध्यम: 60 से 80 mmHg
- गंभीर: 50 से 60 mmHg
- अत्यंत गंभीर: 50 mmHg से कम
HPS और पोर्टोपल्मोनरी हाइपरटेंशन में अंतर
लिवर रोग के मरीजों में फेफड़ों की एक और समस्या, पोर्टोपल्मोनरी हाइपरटेंशन, भी होती है, जिसमें फेफड़ों की धमनियों में दबाव बढ़ जाता है। HPS में वाहिकाएँ फैलती हैं, जबकि इसमें वे सिकुड़ती हैं। दोनों के इलाज और जोखिम अलग हैं, इसलिए सही पहचान ज़रूरी है।
इलाज
लिवर ट्रांसप्लांट: HPS का एकमात्र प्रभावी और निर्णायक इलाज लिवर ट्रांसप्लांट है। सफल ट्रांसप्लांट के बाद अधिकांश मरीजों में फेफड़ों की स्थिति धीरे-धीरे, कई महीनों में, ठीक हो जाती है। इसीलिए गंभीर HPS वाले मरीजों को ट्रांसप्लांट के लिए प्राथमिकता देने की व्यवस्था कई देशों में है। रक्त में ऑक्सीजन बहुत कम होने पर ट्रांसप्लांट सूची में अतिरिक्त अंक (MELD exception) दिए जाते हैं।
ऑक्सीजन थेरेपी: ट्रांसप्लांट होने तक मरीज को अतिरिक्त ऑक्सीजन दी जाती है, ताकि सांस की तकलीफ कम हो। कुछ मरीजों को घर पर ऑक्सीजन कंसंट्रेटर की ज़रूरत पड़ सकती है। ध्यान रहे, शंट अधिक होने पर ऑक्सीजन का असर सीमित रह सकता है।
दवाइयाँ: अभी तक कोई दवा HPS के लिए पक्के तौर पर कारगर सिद्ध नहीं हुई है। अनेक दवाओं पर शोध चल रहा है, पर नियमित उपयोग की सलाह नहीं दी जाती।
अन्य उपाय: चुनिंदा मामलों में कॉइल एम्बोलाइज़ेशन (बड़ी असामान्य वाहिकाओं को बंद करना) या TIPS जैसी प्रक्रियाओं पर विचार किया गया है, पर इनके प्रमाण सीमित हैं। ये सामान्य इलाज नहीं हैं और केवल विशेषज्ञ की सलाह पर ही किए जाते हैं।
पूर्वानुमान (Prognosis)
अगर सिरोसिस वाले मरीज में HPS हो और ट्रांसप्लांट न हो, तो जीवित रहने की अवधि उन मरीजों की तुलना में काफी कम होती है जिन्हें HPS नहीं है, चाहे लिवर रोग की गंभीरता समान हो। ऑक्सीजन जितनी कम, जोखिम उतना अधिक। इसलिए जल्दी पहचान और समय पर ट्रांसप्लांट मूल्यांकन बहुत महत्वपूर्ण है।
मरीज और परिजन क्या ध्यान रखें?
- लिवर रोग के मरीज को अगर सांस फूलने, बैठने पर तकलीफ बढ़ने, होंठ या उँगलियाँ नीली पड़ने की शिकायत हो, तो इसे मामूली न समझें और तुरंत डॉक्टर को बताएँ।
- अपने हेपेटोलॉजिस्ट या गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से नियमित जाँच करवाते रहें और घर पर पल्स ऑक्सीमीटर की रीडिंग पर नज़र रखें, यदि डॉक्टर सलाह दें।
- शराब पूरी तरह छोड़ें, दवाइयाँ नियमित लें और डॉक्टर की बताई हुई खान-पान संबंधी सलाह (कम नमक आदि) का पालन करें।
- ऑक्सीजन की सलाह मिली हो तो उसे बिना डॉक्टर से पूछे बंद न करें।
- धूम्रपान से पूरी तरह बचें, क्योंकि यह फेफड़ों को और नुकसान पहुँचाता है।
- अगर डॉक्टर ट्रांसप्लांट की सलाह दें, तो किसी अनुभवी ट्रांसप्लांट केंद्र में समय रहते मूल्यांकन करवाएँ। देरी करने से मरीज की हालत बिगड़ सकती है।
- हेपेटाइटिस B का टीका और अन्य ज़रूरी टीके लगवाएँ, तथा संक्रमण से बचाव रखें।
निष्कर्ष
हिपेटोपल्मोनरी सिंड्रोम लिवर रोग की एक गंभीर, पर अक्सर अनदेखी रह जाने वाली जटिलता है। इसमें फेफड़ों की वाहिकाओं के फैलने से खून में ऑक्सीजन घट जाती है और मरीज को सांस की तकलीफ होती है। बैठने पर सांस का बढ़ना और लेटने पर आराम मिलना इसकी खास पहचान है। पल्स ऑक्सीमीटर, ABG और बबल इकोकार्डियोग्राफी जैसी सरल जाँचों से इसका निदान संभव है। ट्रांसप्लांट तक ऑक्सीजन से सहारा दिया जाता है, पर निर्णायक इलाज लिवर ट्रांसप्लांट ही है। इसलिए लिवर रोग के हर उस मरीज को, जिसे सांस की तकलीफ हो, समय रहते जाँच करवानी चाहिए। जल्दी पहचान और सही इलाज से जीवन की गुणवत्ता और जीवित रहने की संभावना बेहतर की जा सकती है।
