ग्लोसोफेरीन्जियल न्यूराल्जिया (Glossopharyngeal Neuralgia)
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ग्लोसोफेरीन्जियल न्यूराल्जिया: गले और कान में अचानक उठने वाले तीव्र दर्द की दुर्लभ बीमारी

परिचय

खाना निगलते समय या बात करते-करते अचानक गले या कान में बिजली के झटके जैसा असहनीय दर्द उठे और कुछ सेकंड में गायब हो जाए, तो यह ग्लोसोफेरीन्जियल न्यूराल्जिया (Glossopharyngeal Neuralgia, GPN) का संकेत हो सकता है। यह एक दुर्लभ तंत्रिका रोग है, जिसमें नौवीं कपाल तंत्रिका (ग्लोसोफेरीन्जियल नर्व) से जुड़े क्षेत्र में बार-बार तेज दर्द के दौरे पड़ते हैं। यह ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया से बहुत कम पाई जाती है। अनुमान है कि इसके मामले उसके लगभग सौवें हिस्से के बराबर होते हैं। इसीलिए अक्सर इसकी पहचान में देरी होती है और मरीज कई डॉक्टरों के चक्कर काटते रहते हैं।

ग्लोसोफेरीन्जियल नर्व क्या है?

यह मस्तिष्क के निचले भाग (ब्रेनस्टेम के मेडुला) से निकलने वाली नौवीं कपाल तंत्रिका है। इसके कई काम हैं:

  • जीभ के पिछले एक-तिहाई हिस्से से स्वाद और संवेदना पहुँचाना
  • टॉन्सिल, ग्रसनी (गले का पिछला भाग) और मध्य कान की संवेदना ले जाना
  • निगलने में मदद करने वाली एक मांसपेशी (स्टाइलोफेरीन्जियस) को नियंत्रित करना
  • लार ग्रंथि (पैरोटिड) को संकेत भेजना
  • गर्दन की कैरोटिड धमनी के पास स्थित सेंसर से रक्तचाप और हृदय गति के संकेत पहुँचाना

जब यह तंत्रिका दबती है, चिढ़ती है या इसका सुरक्षात्मक आवरण (मायलिन) क्षतिग्रस्त होता है, तो यह गलत और अत्यधिक संकेत भेजने लगती है, जिसे मरीज तीव्र दर्द के रूप में महसूस करता है।

कारण

1. रक्तवाहिका द्वारा दबाव (सबसे आम कारण): मस्तिष्क की कोई धमनी, जैसे पोस्टीरियर इन्फीरियर सेरिबेलर आर्टरी (PICA) या वर्टिब्रल आर्टरी, तंत्रिका की जड़ पर दबाव डालती है। इसे “क्लासिकल” प्रकार माना जाता है।

2. ट्यूमर और गाँठें: मस्तिष्क के आधार के पास, गले या गर्दन के गहरे हिस्सों में बनी गाँठें तंत्रिका को दबा सकती हैं। गले या टॉन्सिल के कैंसर में भी ऐसा दर्द हो सकता है।

3. ईगल सिंड्रोम: कान के पीछे की स्टाइलॉइड हड्डी असामान्य रूप से लंबी हो या उससे जुड़े लिगामेंट में कैल्शियम जम जाए, तो वह तंत्रिका को छू या दबा सकता है।

4. मल्टीपल स्क्लेरोसिस: इस रोग में मायलिन को क्षति पहुँचने से तंत्रिका असामान्य व्यवहार करती है।

5. अन्य कारण: गले या गर्दन की चोट या सर्जरी, टॉन्सिल के आसपास मवाद (पेरिटॉन्सिलर एब्सेस), संक्रमण और आर्नोल्ड-कियारी विकृति। कई मामलों में कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता, तब इसे “इडियोपैथिक” कहा जाता है।

यह रोग आमतौर पर 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखा जाता है, हालाँकि कम उम्र में भी हो सकता है।

लक्षण

  • दर्द का स्वरूप: अचानक उठने वाला, चुभन या बिजली के झटके जैसा तीव्र दर्द
  • दर्द की जगह: गले का पिछला भाग, टॉन्सिल का क्षेत्र, जीभ का पिछला हिस्सा, कान के भीतर की गहराई और जबड़े का कोण। दर्द अक्सर एक ही तरफ होता है।
  • अवधि: कुछ सेकंड से लेकर लगभग दो मिनट तक। दौरे दिन में कई बार भी आ सकते हैं, फिर हफ्तों या महीनों की राहत मिल सकती है।
  • ट्रिगर (दर्द भड़काने वाली क्रियाएँ): निगलना, खाँसना, बोलना, जम्हाई लेना, चबाना, ठंडा पानी पीना और कभी-कभी गले को छूना
  • अन्य संकेत: मुँह में कड़वा या धात्विक स्वाद, लार का अधिक बनना, खाँसी का दौरा

दर्द निगलने से भड़कता है, इसलिए मरीज खाने-पीने से डरने लगते हैं। इससे वजन घटना, कमजोरी और पानी की कमी हो सकती है। लंबे समय तक दर्द रहने से चिड़चिड़ापन, नींद की कमी और अवसाद भी घर कर सकते हैं।

हृदय से जुड़ी गंभीर जटिलता

इस रोग का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ग्लोसोफेरीन्जियल नर्व और वेगस नर्व का हृदय और रक्तचाप के नियंत्रण से गहरा संबंध है। कुछ मरीजों में दर्द के दौरान:

  • हृदय गति बहुत धीमी हो जाती है (ब्रैडीकार्डिया)
  • हृदय कुछ क्षणों के लिए रुक सकता है (एसिस्टोल)
  • रक्तचाप गिरने से बेहोशी (सिंकोपी) आ सकती है
  • कभी-कभी दौरे जैसे झटके भी हो सकते हैं

इस स्थिति को वेगोग्लोसोफेरीन्जियल न्यूराल्जिया कहा जाता है। यह दुर्लभ है, पर जानलेवा हो सकती है। अगर दर्द के साथ चक्कर, आँखों के आगे अँधेरा, बेहोशी या सीने में तकलीफ हो, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

निदान कैसे होता है?

निदान मुख्यतः मरीज के बताए लक्षणों और डॉक्टर की जाँच पर आधारित होता है। इसके लिए आमतौर पर ये कदम उठाए जाते हैं:

  1. विस्तृत इतिहास और जाँच: दर्द कहाँ होता है, कितनी देर रहता है और किससे भड़कता है, यह जानना सबसे महत्वपूर्ण है।
  2. स्थानीय एनेस्थेटिक टेस्ट: गले या टॉन्सिल के क्षेत्र में सुन्न करने वाली दवा लगाने पर अगर दर्द और ट्रिगर तुरंत शांत हो जाएँ, तो निदान की पुष्टि में मदद मिलती है।
  3. MRI और MR एंजियोग्राफी: इनसे रक्तवाहिका का दबाव, ट्यूमर या अन्य संरचनात्मक कारण देखे जाते हैं।
  4. CT स्कैन: स्टाइलॉइड हड्डी की लंबाई देखने और ईगल सिंड्रोम की पहचान के लिए।
  5. ECG और होल्टर मॉनिटरिंग: जिन मरीजों को बेहोशी या धड़कन की गड़बड़ी हो, उनके लिए।
  6. ENT और दंत जाँच: गले, टॉन्सिल और दाँतों की किसी अन्य बीमारी को अलग करने के लिए।

मिलते-जुलते रोगों से अंतर

  • ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया: दर्द चेहरे, गाल और जबड़े में होता है। ग्लोसोफेरीन्जियल में दर्द गले और कान की गहराई में रहता है।
  • जेनिकुलेट न्यूराल्जिया: कान की गहराई में दर्द होता है, पर निगलने से आमतौर पर नहीं भड़कता।
  • सुपीरियर लैरिंजियल न्यूराल्जिया: दर्द स्वरयंत्र और गर्दन के ऊपरी हिस्से में होता है।
  • टॉन्सिलाइटिस, गले का संक्रमण या कैंसर: इनमें बुखार, सूजन या घाव जैसे लक्षण मिल सकते हैं।
  • जबड़े और दाँत की समस्याएँ: TMJ विकार और दाँत का दर्द इससे भ्रमित हो सकते हैं।

उपचार

दवाइयाँ

पहली पंक्ति का उपचार आमतौर पर दौरे रोकने वाली (एंटी-एपिलेप्टिक) दवाएँ हैं, जो तंत्रिका की अतिसक्रियता को शांत करती हैं:

  • कार्बामाज़ेपिन: सबसे अधिक प्रयोग होने वाली दवा। इसे कम मात्रा से शुरू करके धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है। इसके साथ खून की जाँच (सोडियम, लिवर और ब्लड काउंट) कराई जाती है, और कुछ आबादियों में शुरू करने से पहले HLA-B*1502 जाँच की सलाह दी जाती है। अन्य विकल्प ऑक्सकार्बाज़ेपिन हैं।
  • गैबापेंटिन और प्रीगैबालिन
  • फ़ेनिटॉइन, लैमोट्रिजिन और बैक्लोफ़ेन जैसी दवाएँ, जो अन्य दवाओं से लाभ न होने पर या साथ में दी जाती हैं
  • एमिट्रिप्टिलिन: कुछ मामलों में सहायक

ये सभी दवाएँ केवल डॉक्टर की देखरेख में ही लें। मात्रा अपने आप बदलना या अचानक बंद करना खतरनाक हो सकता है। सामान्य दर्दनिवारक (पैरासिटामोल, आइबुप्रोफेन) इस तरह के तंत्रिका दर्द में आमतौर पर बहुत कम असर करते हैं।

इंटरवेंशनल उपचार

जब दवाओं से आराम न मिले या दुष्प्रभाव सहन न हों, तब ये विकल्प देखे जाते हैं:

  • नर्व ब्लॉक: ग्लोसोफेरीन्जियल नर्व के पास स्थानीय एनेस्थेटिक और स्टेरॉयड का इंजेक्शन, जिससे अस्थायी राहत मिलती है
  • रेडियोफ्रीक्वेंसी थेरेपी: तंत्रिका के दर्द-संकेतों को कम करने की प्रक्रिया
  • गामा नाइफ रेडियोसर्जरी: बिना चीरे के केंद्रित विकिरण द्वारा उपचार

सर्जरी

  • माइक्रोवैस्कुलर डीकम्प्रेशन (MVD): जब रक्तवाहिका का दबाव कारण हो, तब यह सबसे प्रभावी और लंबे समय तक राहत देने वाला विकल्प माना जाता है। इसमें सर्जन तंत्रिका और धमनी के बीच एक छोटा कुशन रखकर दबाव हटाता है।
  • नर्व रूटलेट सेक्शनिंग: तंत्रिका के कुछ रेशे काटे जाते हैं। इसमें निगलने में कठिनाई या आवाज में बदलाव का खतरा रहता है।
  • स्टाइलोइडेक्टॉमी: ईगल सिंड्रोम में लंबी स्टाइलॉइड हड्डी का हिस्सा हटाया जाता है।
  • ट्यूमर का उपचार: अगर कारण गाँठ है, तो उसकी सर्जरी, विकिरण या अन्य उपचार किया जाता है।
  • पेसमेकर: जिन मरीजों में हृदय गति गंभीर रूप से गिरती है, उनमें अस्थायी या स्थायी पेसमेकर की जरूरत पड़ सकती है।

रोजमर्रा की देखभाल

  • अपने ट्रिगर पहचानें और जहाँ संभव हो उनसे बचें।
  • बहुत ठंडे या बहुत गर्म पेय की जगह गुनगुना पानी और सामान्य तापमान का भोजन लें।
  • नरम, अर्ध-तरल आहार लें और छोटे-छोटे निवाले धीरे-धीरे निगलें।
  • दवा नियमित समय पर लें और दुष्प्रभावों (उनींदापन, चक्कर, दाने) पर नज़र रखें।
  • पानी की कमी और वजन घटने से बचने के लिए पोषण का ध्यान रखें।
  • मानसिक तनाव और अवसाद के लक्षण दिखें तो परिवार या काउंसलर से बात करें।
  • दौरे की डायरी रखें: कब, कितनी देर और किस कारण से दर्द हुआ। इससे डॉक्टर को उपचार तय करने में मदद मिलती है।

पूर्वानुमान

दवाओं से बहुत से मरीजों को अच्छा आराम मिल जाता है, हालाँकि कुछ में समय के साथ असर घट सकता है। जिन मामलों में कारण पहचानकर हटाया जा सके, जैसे रक्तवाहिका का दबाव या ट्यूमर, उनमें सर्जरी के बाद लंबे समय तक राहत की अच्छी संभावना रहती है। समय पर निदान और सही विशेषज्ञ से उपचार से जीवन की गुणवत्ता काफी बेहतर हो सकती है।

डॉक्टर से कब मिलें?

  • गले या कान में बार-बार अचानक तेज दर्द उठे, खासकर निगलने या बोलने पर
  • दर्द के कारण खाना-पीना कम हो गया हो या वजन घट रहा हो
  • तुरंत आपातकालीन सहायता लें: दर्द के साथ बेहोशी, बहुत धीमी धड़कन, सीने में दर्द या दौरे जैसे झटके हों

शुरुआत में न्यूरोलॉजिस्ट या ENT विशेषज्ञ से मिलना उचित है। जरूरत पड़ने पर न्यूरोसर्जन, दर्द विशेषज्ञ और हृदय रोग विशेषज्ञ की मदद ली जाती है।

निष्कर्ष

ग्लोसोफेरीन्जियल न्यूराल्जिया दुर्लभ जरूर है, पर इसका दर्द बहुत कष्टदायक और कभी-कभी हृदय के लिए खतरनाक भी हो सकता है। गले या कान के इस अचानक, बिजली जैसे दर्द को “सामान्य गले की खराबी” मानकर टालना ठीक नहीं है। सही जाँच से कारण पता चलता है, और आज दवाओं, इंटरवेंशनल प्रक्रियाओं और सर्जरी के विकल्पों से अधिकांश मरीज दर्द पर काफी हद तक नियंत्रण पा सकते हैं। समय पर विशेषज्ञ से परामर्श ही सबसे अच्छा कदम है।

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