गुलियन-बैरे सिंड्रोम (GBS): नसों का ऑटोइम्यून लकवा
परिचय
गुलियन-बैरे सिंड्रोम (Guillain-Barré Syndrome, GBS) एक दुर्लभ लेकिन गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें शरीर की अपनी रोग-प्रतिरोधक प्रणाली (इम्यून सिस्टम) गलती से परिधीय तंत्रिकाओं (peripheral nerves) पर हमला कर देती है। ये वे नसें हैं जो मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी से निकलकर हाथ-पैरों, चेहरे, आँखों और शरीर के अन्य हिस्सों तक संदेश पहुँचाती हैं। जब इन नसों को नुकसान पहुँचता है, तो मांसपेशियाँ कमज़ोर पड़ने लगती हैं और गंभीर मामलों में पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो सकता है।
इस बीमारी का नाम दो फ्रांसीसी न्यूरोलॉजिस्ट, जॉर्ज गुलियन और जीन अलेक्ज़ेंडर बैरे के नाम पर रखा गया, जिन्होंने 1916 में इसका वर्णन किया था। अच्छी बात यह है कि समय पर इलाज मिलने पर अधिकांश मरीज़ धीरे-धीरे ठीक हो जाते हैं, हालाँकि रिकवरी में कई सप्ताह से लेकर महीनों या कभी-कभी वर्षों तक लग सकते हैं।
GBS क्या है और यह कैसे होता है?
हमारी नसों के चारों ओर माइलिन (myelin) नामक एक सुरक्षात्मक परत होती है, जो बिजली के तार पर चढ़े इन्सुलेशन की तरह काम करती है। यह परत संदेशों को तेज़ी से आगे बढ़ाने में मदद करती है। GBS में इम्यून सिस्टम इस माइलिन परत, और कुछ प्रकारों में नस के मूल तंतु (एक्सॉन) पर भी, हमला कर देता है। नतीजतन मस्तिष्क से मांसपेशियों तक संकेत धीमे पड़ जाते हैं या रुक जाते हैं। इसी कारण कमज़ोरी, सुन्नपन और लकवे के लक्षण उभरते हैं।
GBS संक्रामक (छूत की) बीमारी नहीं है। यह एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलती। यह आनुवंशिक भी नहीं मानी जाती, यानी सामान्यतः माता-पिता से बच्चों को नहीं मिलती।
कारण
GBS का सटीक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन अधिकांश मामलों में बीमारी शुरू होने से कुछ दिन या सप्ताह पहले कोई संक्रमण देखा जाता है। माना जाता है कि संक्रमण से लड़ते समय इम्यून सिस्टम भ्रमित हो जाता है और नसों को ही दुश्मन समझ बैठता है। इसे “मॉलिक्यूलर मिमिक्री” कहा जाता है।
मुख्य ट्रिगर इस प्रकार हैं:
- कैम्पिलोबैक्टर जेजुनी (Campylobacter jejuni): यह जीवाणु दूषित भोजन, अधपके मांस (विशेषकर पोल्ट्री) या दूषित पानी से पेट में संक्रमण (दस्त) करता है और GBS का सबसे आम ज्ञात कारण है।
- वायरल संक्रमण: फ्लू, साइटोमेगालोवायरस, एपस्टीन-बार वायरस, ज़ीका वायरस, चिकनगुनिया और कोविड-19 से जुड़े मामले भी सामने आए हैं।
- श्वसन तंत्र के संक्रमण: सर्दी-ज़ुकाम या गले का संक्रमण।
- सर्जरी या चोट: कभी-कभी ऑपरेशन के बाद।
- टीकाकरण: कुछ टीकों के बाद बहुत ही दुर्लभ मामलों में इसका जोखिम बताया गया है, पर यह जोखिम संक्रमण से होने वाले जोखिम की तुलना में बहुत कम है।
कई मामलों में कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता।
किसे ज़्यादा खतरा है?
GBS किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन यह वयस्कों और बुज़ुर्गों में अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है। पुरुषों में इसका जोखिम महिलाओं की तुलना में थोड़ा अधिक होता है। दुनिया भर में प्रति एक लाख आबादी में सालाना लगभग एक से दो लोग इससे प्रभावित होते हैं।
लक्षण
GBS के लक्षण आमतौर पर अचानक शुरू होते हैं और कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों में तेज़ी से बढ़ते हैं। अधिकतम कमज़ोरी प्रायः चार सप्ताह के भीतर चरम पर पहुँचती है।
शुरुआती लक्षण:
- पैरों की उंगलियों, तलवों या हाथों की उंगलियों में झुनझुनी, चुभन या सुन्नपन
- पैरों में कमज़ोरी, जो ऊपर की ओर (टाँगों से कमर, फिर हाथों और चेहरे तक) फैलती है
- पिंडलियों या पीठ में दर्द, जो अक्सर रात में बढ़ जाता है
बढ़ने पर दिखने वाले लक्षण:
- चलने में कठिनाई, सीढ़ियाँ चढ़ने में परेशानी, बार-बार लड़खड़ाना
- हाथों की पकड़ कमज़ोर होना, चीज़ें गिरना
- चेहरे की मांसपेशियों में कमज़ोरी, बोलने, चबाने या निगलने में दिक्कत
- आँखों की गति में कठिनाई, दोहरी दृष्टि
- शरीर की गहरी टेंडन रिफ्लेक्स (जैसे घुटने की झटका प्रतिक्रिया) कमज़ोर पड़ना या खत्म हो जाना
गंभीर लक्षण (आपातकालीन):
- साँस लेने में तकलीफ, क्योंकि साँस की मांसपेशियाँ कमज़ोर हो जाती हैं
- हृदय गति और रक्तचाप में असामान्य उतार-चढ़ाव (ऑटोनोमिक डिसफंक्शन)
- मूत्र या मल त्यागने में कठिनाई
- पूरे शरीर का लकवा
लगभग 20-30 प्रतिशत मरीज़ों को साँस के लिए वेंटिलेटर की सहायता की ज़रूरत पड़ सकती है। इसलिए GBS के संदेह में तुरंत अस्पताल पहुँचना ज़रूरी है।
GBS के प्रकार
- एक्यूट इन्फ्लेमेटरी डीमाइलिनेटिंग पॉलीन्यूरोपैथी (AIDP): उत्तरी अमेरिका और यूरोप में सबसे आम प्रकार, जिसमें माइलिन परत क्षतिग्रस्त होती है।
- एक्यूट मोटर एक्सोनल न्यूरोपैथी (AMAN): एशिया (भारत, चीन, जापान) में अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है; इसमें मुख्यतः मोटर नसों के एक्सॉन प्रभावित होते हैं।
- एक्यूट मोटर-सेंसरी एक्सोनल न्यूरोपैथी (AMSAN): मोटर और संवेदी दोनों नसों के एक्सॉन प्रभावित होते हैं; यह अधिक गंभीर हो सकता है।
- मिलर फिशर सिंड्रोम (MFS): इसमें आँखों की गति में कमज़ोरी, चाल में असंतुलन (अटैक्सिया) और रिफ्लेक्स का लोप होता है।
निदान
GBS का निदान मुख्यतः लक्षणों और न्यूरोलॉजिकल जाँच के आधार पर किया जाता है। पुष्टि के लिए ये जाँचें की जाती हैं:
- लम्बर पंक्चर (CSF जाँच): रीढ़ के पानी में प्रोटीन का स्तर बढ़ा हुआ मिलता है, जबकि कोशिकाओं की संख्या सामान्य रहती है। इसे “एल्ब्यूमिनो-साइटोलॉजिक डिसोसिएशन” कहते हैं। (पहले सप्ताह में यह सामान्य भी हो सकता है।)
- नर्व कंडक्शन स्टडी (NCS): नसों में संकेतों की गति मापी जाती है, जो GBS में धीमी या असामान्य होती है।
- इलेक्ट्रोमायोग्राफी (EMG): मांसपेशियों की विद्युत गतिविधि की जाँच।
- रक्त जाँच और MRI: अन्य कारणों (जैसे रीढ़ की समस्या, विटामिन की कमी, पोलियो या मायस्थीनिया ग्रेविस) को अलग करने के लिए।
इलाज
GBS का कोई एक निश्चित “इलाज” नहीं है जो बीमारी को पूरी तरह रोक दे, लेकिन कुछ उपचार इम्यून हमले को कम करके रिकवरी तेज़ करते हैं और जटिलताओं से बचाते हैं। मरीज़ को आमतौर पर अस्पताल में भर्ती किया जाता है, और कई बार ICU में निगरानी की ज़रूरत होती है।
मुख्य उपचार:
- इंट्रावीनस इम्यूनोग्लोब्युलिन (IVIG): स्वस्थ दाताओं से प्राप्त एंटीबॉडी की खुराक नस के ज़रिए दी जाती है, जो हानिकारक एंटीबॉडी के असर को कम करती है। यह आमतौर पर पाँच दिन तक दी जाती है।
- प्लाज़्मा एक्सचेंज (प्लाज़्माफेरेसिस): इसमें मशीन की मदद से खून से प्लाज़्मा (जिसमें हानिकारक एंटीबॉडी होती हैं) निकालकर उसकी जगह नया प्लाज़्मा या विकल्प चढ़ाया जाता है।
ये दोनों उपचार लगभग समान रूप से प्रभावी माने जाते हैं और इन्हें साथ-साथ देने का अतिरिक्त लाभ नहीं पाया गया। स्टेरॉयड दवाएँ GBS में कारगर साबित नहीं हुई हैं।
सहायक देखभाल:
- साँस की निगरानी और ज़रूरत पड़ने पर वेंटिलेटर
- हृदय गति और रक्तचाप की निरंतर निगरानी
- दर्द नियंत्रण के लिए दवाएँ
- खून के थक्के (डीप वेन थ्रॉम्बोसिस) रोकने के लिए दवाएँ और मोज़े
- निगलने में दिक्कत होने पर नली (फीडिंग ट्यूब) से पोषण
- बिस्तर के घाव (प्रेशर सोर) से बचाव के लिए नियमित करवट बदलना
पुनर्वास और रिकवरी
तीव्र चरण के बाद पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) रिकवरी का सबसे अहम हिस्सा है:
- फिज़ियोथेरेपी: मांसपेशियों की ताकत, जोड़ों की गतिशीलता और चलने की क्षमता वापस लाने के लिए
- ऑक्यूपेशनल थेरेपी: रोज़मर्रा के काम (खाना, कपड़े पहनना, लिखना) दोबारा सीखने के लिए
- स्पीच थेरेपी: बोलने और निगलने की समस्या में
- मनोवैज्ञानिक सहयोग: अचानक लकवे से मरीज़ और परिवार को चिंता, अवसाद और डर का सामना करना पड़ता है, इसलिए काउंसलिंग मददगार होती है
अधिकांश मरीज़ (लगभग 70-80 प्रतिशत) छह महीने से एक वर्ष के भीतर बिना सहारे के चलने लगते हैं। हालाँकि कुछ लोगों में थकान, हल्की कमज़ोरी, सुन्नपन या दर्द लंबे समय तक बना रह सकता है। लगभग 5-10 प्रतिशत मरीज़ों में गंभीर स्थायी विकलांगता रह सकती है, और बहुत कम मामलों (लगभग 3-7 प्रतिशत) में जटिलताओं के कारण मृत्यु हो सकती है, विशेषकर साँस या हृदय संबंधी समस्याओं से। कुछ मरीज़ों में बीमारी दोबारा लौट सकती है, पर यह दुर्लभ है।
संभावित जटिलताएँ
- साँस की विफलता और निमोनिया
- हृदय की अनियमित धड़कन, रक्तचाप का अचानक बढ़ना या गिरना
- खून के थक्के
- मूत्र संक्रमण
- लंबे समय तक चलने वाला न्यूरोपैथिक दर्द
- मांसपेशियों का सिकुड़ना और जोड़ों की जकड़न
- थकान और अवसाद
बचाव और सावधानियाँ
चूँकि GBS का कारण पूरी तरह ज्ञात नहीं है, इसलिए इसे सौ प्रतिशत रोकना संभव नहीं। फिर भी कुछ सावधानियाँ जोखिम घटा सकती हैं:
- खाना अच्छी तरह पकाकर खाएँ, खासकर चिकन और अन्य मांस
- साफ और उबला या फ़िल्टर किया हुआ पानी पिएँ
- हाथों की स्वच्छता बनाए रखें, भोजन से पहले और शौच के बाद हाथ धोएँ
- कच्चे और पके भोजन के बर्तन अलग रखें
- संक्रमण के बाद असामान्य कमज़ोरी या झुनझुनी हो तो टालें नहीं
डॉक्टर के पास कब जाएँ?
यदि किसी संक्रमण (दस्त, बुखार, ज़ुकाम) के बाद आपको या परिवार के किसी सदस्य को निम्न में से कुछ भी महसूस हो, तो तुरंत चिकित्सक या अस्पताल से संपर्क करें:
- हाथ-पैरों में बढ़ती हुई कमज़ोरी या झुनझुनी
- चलने या सीढ़ी चढ़ने में अचानक कठिनाई
- चेहरे में कमज़ोरी, निगलने या बोलने में परेशानी
- साँस फूलना या साँस लेने में तकलीफ
साँस की मांसपेशियाँ प्रभावित होने पर स्थिति कुछ ही घंटों में गंभीर हो सकती है, इसलिए देरी जोखिम भरी है।
निष्कर्ष
गुलियन-बैरे सिंड्रोम एक गंभीर, पर इलाज योग्य स्थिति है। शुरुआती पहचान, समय पर अस्पताल में भर्ती, IVIG या प्लाज़्मा एक्सचेंज जैसे उपचार और लंबी अवधि का पुनर्वास मरीज़ को सामान्य जीवन की ओर लौटाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। मरीज़ और परिवार के लिए धैर्य, सकारात्मक सोच और निरंतर फिज़ियोथेरेपी सबसे बड़े सहारे हैं। याद रखें, संक्रमण के बाद अचानक बढ़ती कमज़ोरी या सुन्नपन को हल्के में न लें; समय पर जाँच ही सबसे बड़ा बचाव है।
नोट: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में योग्य न्यूरोलॉजिस्ट या चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
